Posted by: Dr.Desh Bandhu Bajpai on: July 1, 2009
In Ayurved, the practitioners celebrates “Chikitsak Divas – Doctor’s Day” every year before one day of DIPAWALI ferstival , which is called Dhanateras and thus Ayurveda celebrates the Doctor’s day.
Homoeopathic practitioners celebrates the Doctor’s Day on 10th April every year, on the birthday of the originator of Homoeopathic science Dr. Samuel Hahnemnann.
I do not know about the Unani system of medicine & Yoga and Nature cure sustem , on which day they gether and celebrates the Doctor,s day.
In Modern western medicine Doctor’s day is celebrated on 1st July every year. I can not say about the tredition and convention of this day appearence, but I appreciate in one sense that for the unity of the medical sciences , it is essential to celebrate the Doctor’s day unanimously by all the practitioners of all healing system at one roof, in the idea and moto keeping in their minds that they all are healing the sick huminity.
Posted by: Dr.Desh Bandhu Bajpai on: June 24, 2009

Electro Tridosha Graphy scanning area of Epigastrium
मैने और हकीम मोहम्मद शरीफ़ अन्सारी जी ने जनवरी २००९ से लेकर मई २००९ तक के बीच में हमारे सेन्टर में आये मरीजों और उनके किये गये ई०टी०जी० परीक्षण और इन परीक्षणों के प्राप्त परिणाम और तदनुसार डाटा के किये गये अध्ध्यन के पश्चात बहुत रोचक और आश्चर्य जनक तथ्य सामने आये हैं ।
अध्ध्यन से प्राप्त जानकारी इस प्रकार है ।
१ – हमने 100 मरीजों की Random studies की है ।
२- हमने इन सभी मरीजों के जो अलग अलग तरह की बीमारियों से पीड़ित थे उनका अध्ध्यन किया है । इसमें स्वस्थ और बीमार दोनों ही शामिल है ।
३ – इपीगैस्ट्रियम सेक्टर्स का अध्ध्यन करने के साथ साथ [१] किडनी Kidney [२] लीवर Liver [३] गाल ब्लैडर Gall Bladder [४] पैन्क्रियाज Pancreas [५] बड़ी आन्त Large Intestines [६] छोटी आन्त Small Intestines और [७] इरीटेबिल बावेल सिन्ड्रोम्स – Irritable Bowel Syndromes का भी अध्ध्यन किया गया ।
अध्ध्यन करने के साथ साथ [१] किडनी Kidney [२] लीवर Liver [३] गाल ब्लैडर Gall Bladder [४] पैन्क्रियाज Pancreas [५] बड़ी आन्त Large Intestines [६] छोटी आन्त Small Intestines और [७] इरीटेबिल बावेल सिन्ड्रोम्स – Irritable Bowel Syndromes का भी अध्ध्यन किया गया
४- इस अध्ध्यन में Evaluation के लिये पांच ष्रेणी चुनी गयीं हैं ।
५- ष्रेणियां निम्न प्रकार से catagorise की गयीं ।
a- 64 to below % सामान्य से बहुत कम
b- 65 to 89 % सामान्य से कम
c- 90 to 104 % सामान्य
d- 105 to 139 % सामान्य से अधिक
e- 140 to above % सामान्य से बहुत अधिक
ETG trace record-Epigastrium-1
Epigastrium-2
Epigastrium-3

Epigastrium-4

Epigastrium-5

Epigastrium-6

अध्ध्यन के परिणाम:
इपीगैस्ट्रियम के निम्न परिणाम मिले :
अ- केवल १५ प्रतिशत लोगों के इपिगैस्ट्रियम सामान्य मिले [९०-१०४%]
ब- १६ प्रतिशत सामान्य से अधिक [१०५-१३९%]
स- ३४ प्रतिशत सामान्य से बहुत अधिक [१४० से अधिक ऊपर %]
द- १७ प्रतिशत सामान्य से कम [६५-८९%]
क- १८ प्रतिशत सामान्य से बहुत कम [६४ से अधिक नीचे]
विशेष बात इस अध्ध्यन में यह मिली कि जिनके १४० से अधिक प्रतिशत देखने में आया , ये मरीज ब्लड सुगर, हाई ब्लड प्रेसर, गुर्दे या ह्रदय रोग से पीड़ित मिले ।
जिनके सामान्य से कम प्रतिशत देखने को मिले, उनको पाचन सम्न्धी विकार, आन्तो से सम्बन्धित बीमारियों , अम्ल पित्त, कब्ज, पेट साफ न होना आदि जैसी बीमारियों से पीड़ित मिले।
हमने इपीगस्ट्रियम क्षेत्र के अन्य अन्गों का भी अध्य्यन किया है जिसमे प्रति १०० मरीजों में [१] ०८ प्रतिशत लोगों के गुर्दे स्वस्स्थ मिले [२] १४ प्रतिशत के लीवर स्वस्थ मिले [३] १९ प्रतिशत के गाल ब्लैडर स्वस्थ्य मिले [४] ०५ प्रतिशत के पैन्क्रियाज स्वस्थ्य मिले [५] ०८ प्रतिशत की बड़ी आन्त स्वस्थय मिली [६] १४ प्रतिशत की छोटी आन्त स्वस्थय मिली [७] २० प्रतिशत को इरीटेबिल बावेल सिन्ड्रोम्स नहीं मिले ।
Posted by: Dr.Desh Bandhu Bajpai on: June 8, 2009
There is great controversy in modern time that Ayurveda have no mention of Bacteriology as it is talks in the sense of Modern western medicine. In the main page of the Ayurveda questions have been raised about the Bacteria, infections etc. Let us see that Bacteriology came in existence after the invention of microscope. Microscope in invented by a French person, who was a “Kabari” , round about 200 years ago. Bacteriology came in existence round about 100 years ago. Before that no mention of Bacterial causes disease in any pathology or physiology books or practice of medicine except few like Malaria. Clinical pathology and testing of blood, urine etc. came in existence within 100 years.
Those who are raising questions, they should go for the history of Ayurveda, how much it is old. Scientist say that tiny creatures was in existence since thousands of thousands years, when earth separated from the celestial body. Ayurveda came in proper existence after the collection of the experiences gained by the practice in different part of the land some how before 5000 years. When writing came in existence, this collection was written on the wood, metal, leaves, stones and finally on paper. Earlier to it, the knowledge was transferred by memorizing the youngsters by the teachers.
One should go with a serious thinking before commenting Ayurveda, how this scientific knowledge was saved by the Indians. Why people forget the invasion history by the foreigners. This is a fact which should not be forgotten. These hurdles in view of the scientific progress, development and researches in Ayurveda, should not be over looked by anyone. In between these high crisis situations, Ayurveda was alive because of the Ayurveda have provided the living style, the life style, which every Indian has adopted since centuries even today.
If anybody will go with the literature of the Ayurveda classical, he will find the mention of some hidden creatures, like fungus, spores that can damage the human system under the Bhut Vidya and Vish vigyan [Agad Tantra]. It seems that at that time the sharp vision of the Ayurvedic practitioners observed that there is some factors which damages the normal health. These Ayurvedic practitioners naturally shall have the capacity to invent and recognize the bacteria and bacterial originated diseases, if they have invented microscope in their time.
However these Ayurvedicians have given foolproof treatment to over ride the consequences as result of bacterial infections with a concept of total cure. If anybody talk of the infectious disease conditions, they should first go to study seriously Bhut Vidya, Kay chikitsa and Visha Vigyan. They will get the answer as they want.
Posted by: Dr.Desh Bandhu Bajpai on: June 5, 2009
इसे मेरा भाग्य कहें या दुर्भाग्य, मैने जब से अपनी चिकित्सा की प्रेक्टिस शुरू की है, मुझे अपने शुरू की गयी चिकित्सा के काल में पुरानी बीमारियों के इलाज से ही शुरूआत करनी पड़ी । यह सिल्सिला आज तक चल रहा है । मेरा चिकित्सा व्यव्साय का सबसे पहला केस एक स्त्री का था, जिसे बच्चा होने के बाद देखभाल न होने के कारण Severe Puperal Fever के साथ साथ अन्य complications हो गये थे ।
सन १९६८ मई महीने की बात है, दवाखान शुरू करने का पहला दिन था । मैं अपने पिता जी स्व० वैद्य शीतला सहाय बाजपेयी के साथ दवाखाने में बैठा था । पिता जी अपने मरीज देख रहे थे, मुझसे कोई दवा लेने वाला आया ही नहीं । काम बन्द करके रिक्शा करने के लिये सड़क पर खड़े थे कि तभी इस स्त्री का पति बदहवास स्तिथि में आया और घर में मरीज देखने के लिये आग्रह करने लगा । साथ में आये कई लोगों ने कहा कि स्त्री मरणासन्न अवस्था में पड़ी है और मौत के मुह में जा रही है ।
यह सुनते ही मेरे पिता जी ने मुझे साथ लेकर कहा कि जाकर देखो क्या बात है ? मै उसके पति के साथ उसके घर गया और उस कमरे का जो नजारा देखा, उसको देखकर मेरे पैतड़े ढीले पड़ गये । बाहर भीतर लोग जमा थे, अन्दर उसकी स्त्री बेसुध पड़ी थी, बीच बीच में चीख पड़ती थी, फिर वही हाल । यह नजारा देखकर मै खुद घबरा गया । मैने उसके पति से कहा कि आओ जल्दी दवा लेकर इसे खिलाओ और में उलटे पैर दवाखाने आया ।
मैने उसे “योगेन्द्र रस” स्वर्ण युक्त की एक एक रत्ती की दो खुराके बनाकर दीं और कहा की अभी शहद से एक खुराक खिला देना तथा दूसरी तब खिलाना जब पहली वाली खुराक एक घन्टे में असर ना करे । तभी रिक्सा आ गया था, मै पिता जी के साथ वापस घर आ गया । रास्ते में हम यही सोच रहे थे की यह औरत बचेगी नही और जब हम रात को घर लौटेंगे तो उसकी मृत्यु का समाचार सुनने को मिलेगा । यह दोपहर २ बजे की बात है ।
रात ८ बजे के करीब मैं और पिता जी मन में आशन्का लिये हुये घर/दवाखाना में पहुचे । वहां सन्नाटा छाया हुआ था । मन में आशन्का बलवती हुयी कि शायद रुग्ना चल बसी । कोई आस्पास दिखई भी नहीं दिया जिससे समाचार लेते । ५- १० मिनट बीत गये तभी रुग्ना का पति दूर से आता दिखाई दिया । उसे देखकर हम भी तनाव में आ गये । वह पास आकर चुप्चाप आकर खड़ा हो गया । मेरे पिता जी बोले ” बेटा, क्या करोगे उसकी इतनी ही जिन्दगी थी…” । अभी वह और कुछ कहते कि वह बोला, ” दादा ऐसी कोई बात नहीं है, दर असल मेरी पत्नी तो दवा की पहली खुराक खाने के आधे घन्टे में ही ठीक होना शुरू गयी थी । इस समय वह भूख भूख चिल्ला रही है । आपने परहेज तो बताया ही नहीं, अब बतायें कि उसे क्या खाने के लिये दिया जाये । मैने उसको दूसरी खुराक भी नही खिलायी है, वह भी बतायें कब खिलानी है ।”
यह सुनते ही मेरी तो खुसी का ठिकान ही नहीं था । मैने उसे परहेज बताया और कहा कि दवा की दूसरी खुराक रात को सोते समय खिला देना ।
इसके बाद से तो मेरे पास बड़े कठिन, पुराने असाध्य रोगी आने लगे । यह सिल्सिला अभी तक चालू है ।
पुरानी बीमारियों के इलाज में सब्से ज्यादा ध्यान मरीज की दिन चर्या, खान्पान, आचार व्यवहार, रहन सहन की तरफ़ ज्यादा ध्यान देना चाहिये । जब बीमारी बहुत पुरानी हो जाती है तो जीवनी शक्ति कमजोर हो जाती है और शरीर उतना तेजी से दवाओं को रिस्पान्स नहीं करता जितनी अपेक्षा की जाती है । इसलिये खान्पान और दिन चर्या की तरफ़ ध्यान देना जरूरी हो जाता है ताकि उसकी जीवनी शक्ति बढे , तभी औषधियों का लाभ मिल पाता है । यह मानना चाहिये कि दवायें सहारा देने के लिये हैं , बाकी का काम तो शरीर को ही करना होता है ।
आयुर्वेद में रसायन औषधियों का अतुल भन्डार है । यह चिकित्सक पर निर्भर करता है कि वह इनका उपयोग किस प्रकार से कर पाता है । हो सकता है कि एक रसायन किसी को सूट करे और वही दूसरे को नुकसान करे । इसलिये जो चिकित्सक आयुर्वेद के सिददान्तों का पालन करते हुये चिकित्सा व्यवस्था करते है, वे निश्चय ही सफ़ल होते है ।
Posted by: Dr.Desh Bandhu Bajpai on: May 30, 2009
अस्थमा के रोगी का ई०टी०जी० परीक्षण से प्राप्त डाटा और निदान पश्चात की गयी चिकित्सा से रोगी को आरोग्य प्राप्त हुआ है । यह रोगी उम्र 71 साल, दिनान्क 20 मार्च 2009 को परीक्षण कराने आया था । इसके ट्रेस रिकार्ड को देखिये ।



तेजी से सान्स चलने से इसकी पल्स रेट १०५ प्रति मिनट है । इसके शरीर का सबसे हाई लाइटेड एरिया इसका “इपीगैस्ट्रियम” है । “डी” और “ई” वेव नार्मल पैरामीटर से बहुत अधिक हैं । ट्रेस रिकार्ड में सबसे लोवेस्ट एरिया आर० के० यानी “राइट [दाहिना] कफ” है । एफ०एच० यानी “फोर हेड” का ट्रेस बहुत कम है, यह इन्गित करता है कि रोगी को अक्सीजन की कमी है ।
चित्र में बताया गया है कि इस रोगी के “वात” और “वात भेद” कितना है? डाटा में दर्शाया गया है कि अन्य दोषों की क्या स्तिथि है ?
परीक्षनोपरान्त इस रोगी के प्राप्त डाटा को आधार मान्कर आयुर्वेद और होम्योपैथी का सम्मिलित इलाज दिया गया । अब रोगी को ९५ प्रतिशत आराम है और इनकी दवायें अभी चल रही है । रोगी पिछले ३५ साल से एलोपैथी, आयुर्वेदिक,होम्योपैथी , तन्त्र मन्त्र, झाड़ फूंक इत्यादि सभी टुटके आजमा चुका था, इसको कही से भी फायदा नहीं हुआ था ।
Posted by: Dr.Desh Bandhu Bajpai on: May 27, 2009
मैने और मेरे साथी हकीम शरीफ अन्सारी जी ने ई०टी०जी० रिपोर्ट में एक बात खास अध्ध्यन करके निकाली है कि जिन रोगियों में “कफ” दोष अधिक प्रतिशत में निकलता है, उनके “कैल्सियम लेवल” अधिक होता है । ऐसे रोगियों मे प्राय: आम वात, जोड़ों के दर्द, गठिया वात, Osteoarthritis, Arthritis, Muscular Arthritis, Calcium deposits in joints & similar complaints इत्यादि तकलीफों वाले होते हैं ।
“कफ़” दोष के बढे हुये प्रतिशत के अलावा “कफ” के पांच त्रिदोष भेद में “श्लेषमन कफ भेद” भी बढा हुआ होता है । आयुर्वेद के ग्रन्थों में बताया गया है कि श्लेशमन कफ अस्थियों के जोड़ों में पाया जाता है ।
ईलेक्ट्रो त्रिदोष ग्राफ तकनीक से आयुर्वेद के चिकितसकों को यह सुविधा भी मिलती है कि शरीर में व्याप्त Calcium Level कितना है, यह पता चल जाता है । इस तकनीक से Heamoglobin का प्रतिशत भी ग्यात हो जाता है ।
कफ दोष के बढे हुये रोगियों में कैल्सियम लेवेल का बढना ज्ञात होने से “श्लेशमन कफ” का हड्डियों के जोड़ॊ में पड़ने वाले प्रभाव के इस अध्ध्यन से आयुर्वेद चिकित्सा विज्ञान के मौलिक सिद्धान्तों का ई०टी०जी० तकनीक की मदद से विश्व के सामने साक्ष्य स्वरूप में प्रस्तुत किया जा सकता है ।
हलांकि यह प्रारम्भिक अध्ध्यन है जिसमे 90 % प्रतिशत रोगियों में इस तरह की आन्तरिक समबन्धता मिली है । बाकी के 10 % प्रतिशत रोगियों में Calcium Level सामान्य से कम प्राप्त हुये हैं । ऐसा क्यों है ? मैं और हकीम शरीफ अन्सारी जी इसका उत्तर खोजने का प्रयास कर रहे हैं ।
Posted by: Dr.Desh Bandhu Bajpai on: May 15, 2009
हमारे परीक्षण केन्द्र में बड़ी सन्ख्या में high blood sugar के मरीज आते हैं । हम ऐसे मरीजों को सलाह देते हैं कि वे पहले अपना ई०टी०जी० परीक्षण करा लें ताकि उनके शरीर में व्याप्त दोषों के अलावा , यह भी पता चल जाये कि उनको इस सुगर की तकलीफ के अलावा और कौन कौन सी तकलीफें हैं ।
उस समय हमे बहुत आश्चर्य होता है, जब मरीजों के किये गये परीक्षण में ऐसे स्वास्थ्य समबन्धी तथ्य मिलते हैं जिनके बारे में बहुत प्रयत्न करने के बाद भी नहीं सोच सकते कि इसे यह तकलीफ भी होगी ।
सुगर वाले रोगियों में यह आन्कड़ा मिला है कि सभी को Epigastritis जरूर होती है । इपीगैस्ट्रिउम से रिकार्ड की गयी ट्रेस के अध्ध्यन करने के बाद पता चलता है कि किसी रोगी को ळिवर बढा हुआ है, किसी का कम काम कर रहा है,किसी का पित्ताशय कम काम कर रहा है या उसमें कोई विकार है, पैन्क्रियाज ज्यादा या कम काम कर रहा है, पैन्क्रियाज में सुजन है या कैल्सियम जमा है या इन्फ़ेक्शन है, प्लीहा में कोई विकार है इत्यादि ।
कुछ मरीजों को उच्च रक्त चाप की प्रवृत्ति पाई जाती है । किसी को गुर्दे की शिकायत होती है, पथरी भी हो सकती है । छोटी आन्त और बड़ी आन्त की सूजन या इरीटेबल बावल सिन्ड्रोम या बावेल पैथोफीजीयोलाजी अक्सर देखने को मिलती है । थायरायड की कार्य विकृति Thyroid pathophysiology अधिकन्शत: मरीजों में देखने में आती है । किसी किसी को सारे शरीर में हल्की सूजन होती है, जिसे बड़ी सन्ख्या में मरीज समझ ही नही पाते । बहुतों को ज्यादा धड़्कन होने की तकलीफ़ होती है और किसी को कम । चिकित्सा करने वाले डाक्टर तक नहीं समझ पाते हैं कि मरीज के शरीर में दूसरी कौन कौन सी बीमारियां अन्दर ही अन्दर पनप रही हैं ।
पहले हम सभी इलाज कराने वाले मरीजों को सलाह देते थे कि वे अगर ठीक होना चाहते है और आयुर्वेद/ होम्योपैथी की दवाओं से लाभ उठाना चाहते है तो वे अपना ई०टी०जी० परिक्षण जरूर करायें । आज हालत यह है कि मरीज पहले कहता है कि आप परीक्षण करें , फिर इलाज करें ।
इस तरह से सुगर के मरीजों का जब सारे शरीर के परीक्षण का परिणाम मिल जाता है तब उनकी चिकित्सा करते है । हमे यह देखना होता है कि विकार की समस्या कहा कहां है । मरीज की बिमारी की समस्या के जड़ तक पहुचने के बाद हमारी कोशिश होती है कि कम से कम दवा खिलाकर आरोग्य देने में सहाय्ता करें । उचित दावाओं के काम्बीनेशन , पथ्य और परहेज, रहन सहन में परिवर्तन करा कर लगभग सभी मरीज आरोग्य की दिशा प्राप्त कर लेते हैं ।
Posted by: Dr.Desh Bandhu Bajpai on: May 8, 2009
पिछले एक दशक से अधिक हो चुके हैं, जब मरीजों के किये गये इलेक्ट्रो त्रिदोष ग्राम ई०टी०जी० की फाइंन्डिंग्स में त्रिदोषों, त्रिदोष भेदों, सप्त धातुऒं तथा अन्य मौलिक सिद्धन्तों को आधारित करके और इन सभी फाइन्डिन्ग्स को एक साथ लेकर मरीज के लिये औषधियां सेलेक्ट की बात आती , तो मुझे लगता की जिस काम्बिनेशन की मुझे आवश्यकता है, वह पूरी नहीं हो पा रही है । अभी आवश्यक्ता इस बात की है कि काम्बीनेशन के हिसाब से दवायें फैब्रीकेट की जायें । दवायें भी ऐसी हों, जो शीघ्र फायदा पहुचायें और त्वरित लाभ कारी हों, जैसा कि आधुनिक चिकित्सा विग्यान की दवायें हैं ।
मै इस विचार में लगा रहा और मुझे समझ में आया कि शन्खद्राव को आधार बना करके कुछ अन्शों में यह लक्ष्य प्राप्त किया जा स्कता है । इस पर मैने काम करना शुरू किया और मुझे सफ़लता भी मिली । NAtional Innovation Foundation , Ahamadabad को भेजे गये शोध पत्र की Original script से कुछ मैटर आपके लिये दे रहा हुं। 



Posted by: Dr.Desh Bandhu Bajpai on: May 3, 2009
Epidemic of Swine Flue virus is spreading world wide and every corner of the globe is being affected every day.
I will not discuss about the Virus here, I will only share my experiences of the treatment of Viruses spreading every year in India. I have treated Viruses infections since three decades successfully without any casuality & safe, solid way by the use of Homoeopathic and Ayurvedic medicines. When I need , I use Allopathic medicine for a while to support the Ayurvedic and Homoeopathic treatment, not in every case, but for precautions.
The Homoeopathic medicine which I use, is a combination of Homoeopathic Medicinal Mother Tinctures in equal ratio. The Formula is given below:
Homoeopathic Mother Tincture Mixture
• Ceasalpeania Bonducela Mother Tincture
• Azadirachta Indica Mother Ticture
• Gentiana Chirayata Mother Tincture
• Kalmegha Mother Tincture
• Tinospora Cardifolia Mother Tincture
• Echinesia Mother Tincture
Mix all mother tinctures in equal quantity. Take one or two spoonful mixture with half cup of fresh water two hourly or three hourly or four hourly
This Homoeopathic medicine mixture is sufficient to cure the Infection. To make the more foolproof treatment , the following Ayurvedic Herbal Tea is very effective . This tea can be taken with the Homoeopathic mixture with safety.
Ayurvedic Herbal Tea
Take the following Herbs in equal quantity,
• Gorakhmundi
• Manjistha
• Chirayata
• Nim
• Tulasi
• Ginger dried
• Nagarmotha
• katakranj
• Haritaki
• Anantmool
Grind all Herbs , not in fine powder but in crude powder. Take 10 Gms Crude powder, make decoction with one cup of water, boiling smoothly. Drink lukwarm.
This tea can be taken 3 or 4 times a day.
These Homoeopathic mixture & Ayurvedic Herbal Tea medicine can be taken in alternation, several times a day.
Follow the health maintenance rules strictly. Don’t be panic youself, I have treated every years Virus infections successfully with 100% recovery, by using Homoeopathic and Ayurvedic medicines simultaneously.
Posted by: Dr.Desh Bandhu Bajpai on: May 2, 2009



बाबा राम देव द्वारा योग विज्ञान पर प्रकाशित की जाने वाली पत्रिका योग सन्देश के अप्रैल २००९ के अन्क में इलेक्ट्रो त्रिदोष ग्राम तकनीक का उल्लेख किया गया है । हलांकि यह इस तकनीक पर स्वतन्त्र लेख नहीं है, फिर भी विद्वान लेखक नें अपने लेख में इसका उल्लेख करके आयुर्वेद चिकित्सा विज्ञान को अत्याधुनिक तकनीक से लैस होने की बात करके सम्पूर्ण विश्व में यह सन्देश देने की कोशिश की है कि आयुर्वेद भी अब निदान ज्ञान की तकनीक, उन्गलियों के साथ साथ, मशीनी युग में और लैप्टाप तक आ चुकी है और इसे अब किसी भी कीमत पर आधुनिक चिकित्सा विज्ञान से निदान ज्ञान के मामले में कम न आंका जाये ।
बेहतर होता , यदि ई०टी०जी० तकनीक पर , इस पत्रिका में और लेख प्रकशित किये जाते, ताकि विश्व समुदाय को विस्तार से पता चल सके कि यह तकनीक आयुर्वेद में क्या गुल खिला सकती है ?
Aapane Likha, bahut khusi huyi आपने लिखा, बहुत प्रसन्नता हुयी