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HOMOEOPATHY BASIC FUNDAMENTALS ; होम्योपैथी के मूल सिद्धान्त :

 

जैसा की हर विज्ञान के साथ होता है कि कुछ बुनियादी सिद्धान्त उन observations पर स्थिर किये जाते हैं जिनसे यह सिद्ध होता है कि नियम की सत्यता यदि परख्ननी है तो उस procedure  को बार बार दोहराये । यही बार दोहराये जाने से जब एक ही तरह के results मिलते हैं , तब उसके नियम बन जाते हैं । इन्ही नियमों के समूह को मूल सिद्धान्त या बेसिक फन्डामेंन्टल कहा जाने लगता है ।  

 

Homoeopathy विज्ञान के साथ भी यही है । इस विज्ञान के जनक डा० हॆनिमेन नें जब इसके प्रयोग करके देखे तो उन्होने इसके बारे में एक साधारण सा लेख लिखा जिसका शीर्षक था, ” Medicine of exprience “  |

 

होम्योपैथी चिकित्सा  विज्ञान का बीज इसी लेख के द्वारा existence में आया । इसके बाद डा० हैनीमेन ने जब इस लाइन पर experiments करने शुरु किये और उसे practice में लाकर अधिक अनुभव प्राप्त किया तब उन्होने अपने क्रियात्मक उसूलों को ” Organon of  the rational art of healing ” नाम की किताब में लिपिबध्ध करके चिकित्सक समाज के सामने पेश किया । 

 

हलांकि ” Organon ” पुस्तक के कई edition निकले और हर एडीसन में हॆनिमेन ने कई कई परिवर्तन अपने बदलते हुये अनुभवों के आधार पर करते चले गये ।यह सब बदलाव उन्होनें अपने अनुभव के आधार पर किया, जो दिन प्रतिदिन उन्होने अपनी practice  से करके प्राप्त किया था । यह अनुभव प्राप्त करने का कठिन मार्ग केवल वही समझ सकता है, जिसने किसी प्रकार की वैज्ञानिक शोध की हो । निसन्देह डा० हैनीमेन एक बहुत ही प्रबुद्ध,प्रतिभाशाली, अन्वेषण की प्रवृति और द्रष्टि कोण रखने वाले व्यक्तित्व थे । यद्यपि उनके साथ, उनकी इस खोज के कार्य को आगे बढाने वालों में उनके बहुत से सहयोगी थे, लेकिन जो बात original  में होती है, वह duplicate या copy में कहां से प्राप्त हो सकती है ?

 

हैनीमेन ने जब कुनैन का प्र्भाव अपने स्वस्थ्य शरीर पर जान्चा और उसकी प्रतिक्रिया स्वरूप जितने भी अनुभव उनकॊ हुये, वह उन्होने लिपिबध्ध करके एक ऐसी चिकित्सा प्रणाली की नींव डाल दी, जिससे सारा सन्सार आश्चर्य चकित रह गया । किसी ने इससे पहले ऐसी कोई कल्पना नहीं की थी ।  

 

शुरू शुरू में हैनीमेन अपने मरीजों को दवाइयॊ का काढा decoction पीने की सलाह देते थे । इसमें एक कमी थी कि यह ज्यादा दिन तक टिकाऊ नहीं रह पाता था । इसलिये जड़ी बूटियों के काढे को टिकाऊ बनाने के लिये , वे इसमें थोड़ी मात्रा में alcohol मिला देते थे । आज भी यह विधि प्रचिलिति है, लेकिन थोड़े परिवर्तन के साथ । लेकिन यह विधि शायद उनको जड़ी के चूर्ण के माम्ले में ठीक न लगी हो, इसलिये उन्होनें जड़ी को सीधे सीधे alcohol   में डालकर mother tincture बनाने की कल्पना का विकास किया हो ।  

 

दवा की मात्रा का विकास भी लम्बे परीक्षणों पर आधारित रहा होगा । पहले काढा ज्यादा मात्रा में पिलाने का रिवाज रहा होगा, जिसे बद्लते बदलते कुछ बून्दों तक ले आये । १० या २० बून्द की एक खुराक चार या पांच चम्मच या अधिक पानी में देने से जब अपेक्षित चिकित्सकीय परिणाम मिलने लगे , तो उनको यह लगा होगा और गुणा भाग करके उनहॊने अनुमान लगाया होगा कि मूल दवा की मात्रा तो ना के बराबर हो चुकी होगी, फिर भी शरीर में व्याप्त बीमारियों को दूर करने में सक्षम है । ऐसा अनुमान है कि potentisation का विचार उनकॊ इसी बिन्दु पर मिला होगा । 

 

हैनीमेन द्वारा लिखे गये साहित्य में यह जिक्र मिलता है कि वे अपने मरीजों में decoction, mother tincture और lower potencies का प्रयोग करते थे ।

 

डा० हैनीमेन को समझने के लिये तथा Homoeopathy चिकित्सा विज्ञान को समझने के लिये , उनके द्वारा लिखी गयी सभी सामग्री का अद्धय्य्न करना बहुत आवश्यक है । सबसे बड़ी कमी इस बात की है कि मूल रचनायें German Language में हैं । जो भी पढा जा रहा है, वह मूल रचना नहीं है, बल्कि मूल रचना का Translation है । इसमें बहुत फर्क होता है । मै German language का जान्कार हूं और इसे मै अच्छी तरह से समझता हुं कि कमियां कहां लगती है । 

 

Higher potencies के उपयोग के बारे में हैनीमेन द्वारा कहीं जिक्र किया गया हो, ऐसा कहीं मिलता नहीं ।एक अन्य बात का जिक्र करना समयानुकूल होगाकि हैनीमेन ने ३० से अधिक पोटेंसी का शायद ही प्रयोग किया हो ।

 

होम्योपथी के जनक और होम्योपैथी के मर्म को समझने के लिये उनके द्वारा लिखे गये सभी लेख और साहित्य को पढना बहुत आवश्यक है । चूंकि यह चिकित्सा विज्ञान बहुत धीरे धीरे विकसित हुआ और experiments करने में ढेर सारा समय लगा, इसलिये जो भी progress के results मिलेउनकॊ तदनुसार लिपिबद्ध किया गया ।

 

इसके साथ साथ Organon के सभी editions को पढ़ना चहिये और इसका अध्य्य्न इसलिये जरूरी है ताकि यह समझा जा सके कि जितने बदलाव step by step किये गये , वह किसलिये किये गये और इनके बदलाव करने के पीछे डा० हैनीमेन  की क्या मंशा थी ? तभी इस विज्ञान के मर्म को समझा जा सकता है ।

 

 

 

 

 

 

[ अभी लेख लिखना बाकी है ]

8 Responses »

  1. meri beti ko 3 mah pahle typhied rog hua tha uske ilaj k bad se aaj tak uska pachan tantra thik nahi hai pet saaf nahi hota gas problem aur aur bukhar rahta hai kripya koi ayurvedink kargar dawa bataye

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  2. पिगबैक: Fool

  3. पिगबैक: Best Food Eat Vitiligo

  4. पिगबैक: Vitiligo Hla

  5. पिगबैक: Vitiligo Groin Area

  6. पिगबैक: Anonymous

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