Posted by: prakruti on: April 19, 2009
अपने देश में जितनीं भी आयुर्वेद की दवायें बनाने वाली फार्मेसियां है, लगभग सभी कोई न कॊई पेटेण्ट दवायें बना रही हैं । इस समय तो हाल यह है कि सभी उन बीमारियों के इलाज के लिये आयुर्बेद की पेटेण्ट दवायें आयुर्वेद के औषधि निर्माताओं ने उपलब्ध करा दी हैं, जिनको लाइलाज माना जाता है । बहरहाल हालात यह हैं कि आयुर्वेद के चिकित्सक भी बिना समझे बूझे धड़ाधड़ इन दवाओं का उपयोग कर रहे हैं, नतीजा यह निकल रहा है कि नुकसान मरीज का हो रहा है और फायदा उठा रहे है औषधि निर्माता और चिकित्सक बन्धु ।
सबसे बड़ा नुकसान इन औषधियों के कारण आयुर्वेद को उठाना पड़ रहा है । पहली बात यह कि इन दवाओं का निर्माण आयुर्वेद के मूलभूत सिद्धान्तों Ayurvedic Basic Fundamentals पर कतई आधारित नहीं है । दूसरा ये सब दवायें न तो किसी लैबोरेटरी में या अस्पताल में या किसी रिसर्च सन्सथान में टेस्ट की जाती हैं और न किसी दवा की टेस्ट रिपोर्ट उपलब्ध होती है । जो भी विवरण उपलब्ध होते हैं , वे केवल अनुमान या कल्पना पर आधारित होते हैं । तीसरा, इन दवाओं में प्रयोग होने वाले द्रव्यों मे अक्सर विरोधाभासी दवाओं का उप्योग किया जाता है । इसके अलावा अन्य कारण भी हैं ।
ऐसा भी नही है कि इन दवाओं के टॆस्ट करने के लिये साधन उपलब्ध नही है । सभी साधन है । आजकल तो ई०टी०जी० तकनीक के अलावा कई और तकनीक आ गयीं है जैसे मुम्बई आई० आई० टी० के डा० जोशी द्वारा आविष्कृत की गयी “नाड़ी तरन्गिनी” तकनीक, चीन और जापान द्वारा Pulse Diagnosis पर आधारित मशीने इत्यदि आसानी से उपलब्ध हैं ।
कुछ लैबोरेटरीज ने दवाओं के टेस्ट के लिये विशेष प्रबन्ध किये है । जब इतने साधन उपलब्ध है , तो दवा बनाने वाले निर्माताओं को अपने पेटेन्ट योगों को इन तकनीकों द्वारा टेस्ट कराकर देखना चाहिये कि उन्के दावों में कितनी सच्चाई है और उनके योग बीमारियों पर कितने कार्गर साबित होते हैं ।
Aapane Likha, bahut khusi huyi आपने लिखा, बहुत प्रसन्नता हुयी