Posted by: prakruti on: August 6, 2009
वैसे तो मैं इन्टर्नेट पर इस साइट पर आकर सवाल पूछने वालों को कोई जवाब नहीं देता. क्योंकि मुझे समझ में यह कतई नहीं आता कि सवाल पूछने वाला कितना गम्भीर है । मै सवाल पूछने वाले की मस्तिश्क की तरन्गों को पढता हूं । चिकित्सा मनोविग्यान Clinical Psychiatry मेरा प्रिय विषय रहा है, इसलिये मै मष्तिष्क की तरन्गें पढता हूं और लिखने वाले के लिखने के अन्दाज़ से समझ जाता हुं कि सवाल पूछने वाला वास्तव में गम्भीर है या यों ही दिल बहलाने के लिये लिख मारा है ।
इस साईट को देख करके बहुत से लोग , जो इलाज कराना चाहते है, वे शिधे हमारे दोनों केन्द्रों में कहीं भी आकर इलाज करा रहे है और वे ज्यादा सवाल जवाब भी नही करते । महीने दो महीने की दवा लेकर उप्योग करते है और फिर दुबारा आकर कन्सल्ट करते हैं ।
इन्टर्नेट पर जो सबसे बड़ा सवाल मुझसे किया जाता है कि “व्हाट इज द प्रोसीजर आफ योर ट्रीट्मेन्ट ?”
लीजिये मैं जवाब भी दे रहा हुं ।
१- सबसे पहले मै मरीज का ई०टी०जी० का परिक्षण करता हूं और यह पता लगाने का पिन प्वाइन्ट प्रयास करता हूं कि मरीज को तकलीफ क्या क्या है और शरीर में कहां कहा है ? यह सब ई०टी०जी० रिपोर्ट मे छपकर मिल जाता है ।
२- मरीज की बीमारी के अलावा आयुर्वेद के त्रिदोष, धातु , मल ओज आदि का ग्यान हो जाता है ।
३- सारा डाटा सामने होने से मरीज के शरीर की एक एक जरूरी चिकित्सा समबन्धी बातेण सामने होने से आयुर्वेदिक औषधियों के चयन में सरलता आ जाती है ।
४- कभी कभी कुछ ऐसी तकलीफें होती है जिनकी कोई दवा आयुर्वेद में बहुत सतीक नहीं समझ में आती है, तब होम्योपैथी के मदर टींक्चर का उपयोग करते हैं ।
५- तेज़ दर्द या ज्यादा बुखार या ज्यादा ब्लड प्रेसर की अवस्था में सहारे के लिये कुछ खुराकें एलोपैथी की खिलानी पड़ जाती है, वह भी यदि मरीज चाहे तो अन्यथा नही ।
६- वस्ति का उपयोग १५ दिन या एक माह में एक दिन कराता हू ताकि आन्ते साफ़ रहें ।
७- पथ्य परहेज आयुर्वेद के अनुसार कराता हुं ।
यही मेरा चिकित्सा कर्य करने का तरीका है ।
August 9, 2009 at 6:58 PM
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