Posted by: prakruti on: September 4, 2009
जब से और जिस उम्र से मुझे समझ आने लगी और मैं सिनेमा और सिनेमा के कलाकारों के बारे मे समझ रखने लगा, तब से फिल्म स्टार देव आनन्द मुझे सबसे प्यारे लगने लगे । मैं आठ साल का रहा हून्गा, मेरे बहनोई मुझे देवानन्द की फिल्म दिखाने ले गये, फिल्म का नाम मुझे याद नही, लेकिन हीरोइन का नाम याद है , हीरोइन ”शीला रमानी” थी । मुझे देव आनन्द के हाव भाव बहुत पसन्द आये और मै उनकी नकल करने लगा ।
धीरे धीरे देव आनन्द मेरे प्रिय हीरो हो गये । मैने उनकी सभी फिल्में देखीं है । कोई भी नहीं छूटी । कई कई बार फिल्में देखी, आज भी मेरे अन्दर देव आनन्द का क्रेज़ वैसा ही है जैसा कि आठ साल की उम्र में था ।
परोक्ष और अपरोक्ष यानी चेतन मन और अवचेतन मन में मेरे अन्दर कहीं न कहीं देव आनन्द मौजूद रहते हैं । आज भी मै काम करते करते भूल जाता हूं कि मेरी उम्र ६३ वर्ष की हो गयी है और मुझे ज्यादा मानसिक और शारीरिक काम नहीं करना चाहिये । ळेकिन जब मै काम में जुट जाता हूं तो भूल जाता हूं कि मेरी उम्र क्या है ? अपरोक्ष मन से मुझे समझ में आता है कि मै अभी २० बीस साल का हूं और यही समझ कर मै काम करने में जुटा रहता हू। यह कम उम्र की मान्सिकता मेरे ऊपर हाबी हो जाती है । लेकिन जैसे ही ध्यान आता है मै आराम करने चला जाता हूं ।
लोग मेरी वास्तविक उम्र से १५-२० साल कम समझते हैं । मेरे बाल ३० साल की उम्र में सफेद हो गये थे , जब मै जरमनी में था। भारत वापस आने पर मेरे बाल जयादा तेज़ी से सफेद होने लगे और कुछ साल में एक्दम झकाझक सफेद । मैने कभी डाई नहीं लगायी । एक आध बार मेंहदी लगाने से मुझे सर्वाइकल स्पान्डिलाइटिस का दर्द होने लगा था, तब से फिर कभी कोई बाल रंगने का प्रयास नहीं किया ।
यह सच है कि देव आनन्द मेरे मन में बसते है । सत्तर के दशक में दिल्ली से प्रकशित होने वाली साप्ताहिक पत्रिका “साप्ताहिक हिन्दुस्तान” में देव आनन्द ने एक सेरीज में कुछ लेख लिखे थे । एक लेख में उन्होने अपनी सफ़लता का राज बताते हुये लिखा था कि “मैं पीछे मुड़्कर नहीं देखता कि मैने क्या किया ? “
यह बात मुझे बहुत इन्स्पायर करती है । मै भी पीछे मुड़्कर नही देखता कि मैने क्या किया ? जो किया सो ठीक किया, गलत हो या सही, यह सुधार तो होते रहते हैं । त्वरित एक्सन न लेने , समय पर काम न करने का खमियाजा वही लोग उठाते हैं जो अकर्मण्य होकर चुप्चाप बैठे रहते हैं । मै पहले सोचता हू फिर करता हू । मेरे काम करने में क्या कमी रही , यह सब सुधार तो होते रहेन्गे । अगर यह सब मस्तिस्क में न होता, तो ई०टी०जी० जैसी जटिल तकनीक कभी जन्म न ले पाती ।
मुझे देव आनन्द की एक फिल्म का सीन कभी नही भूलता, इसे मै दिन में कई बार याद करता हूं । मधुबाला के साथ उनका एक गाना है ” अच्छा जी मैं हारी चलो मान जाओ न, देखी सबकी यारी मेरा दिल जलाओ न ” । इस गाने में मधुबाला कहती है “जीवन के ये रास्ते लम्बे हैं सनम, काटेंगे ये जिन्दगी ठोकर खाके हम, देखो दिल न तोड़ॊ, छोड़ॊ हाथ छोड़ो, छोड़ दिया तो हाथ मलोगे सम्झे “ इस गाने में दोनों कलाकारों के फेसियल एक्स्प्रेसन्स इतने नेचुरल लगे , मुझे यह भूलता नहीं । शायद गाने का यह हिस्सा मेरे जीवन की किसी घटना के किसी हिस्से से मेल खाता है ।
दिसम्बर सन १९८१, दिसम्बर १९८२ और दिसम्बर १९८३ में जब मै बम्बई पढायी करने गया था,उस समय मैं देव आनन्द से मिलने उनके आफिस गया था । लेकिन मेरा दुर्भाग्य कि मै उनसे नही मिल पाया । एक बार वे सूटिन्ग के सिल्सिले में देश से बाहर थे । बाकी मुझे याद नहीं कि उन्के आफिस बियरर ने मुझे क्या उत्तर दिया था ?
आज भी मेरी तमन्ना देव आनन्द से मिलने की है, लेकिन मै चाहता हू कि मै जब उनसे मिलूं तो उनका एक ई०टी०जी० परीक्षण करके यह देखूं कि देव साहब का शरीर आखिर क्यों इतना हिलोरें मारा करता है और उनके अन्दर की कौन सी ऐसी नस और नाड़ियां है जो उनको हमेशा झक्झोरा करती हैं और चैन से बैठने नही देती ?
Aapane Likha, bahut khusi huyi आपने लिखा, बहुत प्रसन्नता हुयी