स्वमूत्र चिकित्सा ; मेरा व्यक्तिगत और व्यावसायिक चिकित्सकीय अनुभव


लगभग चालीस साल पहले मुझे एक पुस्तक “स्वमूत्र चिकित्सा” पर लिखी हुयी पढने के लिये मिली , जो हिन्दी भाषा में थी और उसका प्रकाशन पान्कोर नाका, अहमदाबाद, गुजरात कि किसी सन्सथा द्वारा किया गया था, जो “नर मूत्र चिकित्सा” के प्रचार और प्रसार में लगी हुयी थी /

एक और पुस्तक मुझे पढने के लिये मिली जिसका शीर्षक The Water of Life था और यह किसी ब्रिटिश लेखक द्वारा लिखी गयी थी /

चिकित्सा विग्यान की कुछ magazines मे मैने मूत्र चिकित्सा के बारे में पढा था /

मेरे मन में स्वमूत्र पीकर इस पर experiment करना चाहिये, यह बात जोर पकडने लगी / बार बार जब दिन में कई समय हयी विचार जोर मारने लगा, तो मैने भी ठान लिया कि अब मै स्वमूत्र पीकर एक्स्पेरीमेन्ट जरूर करून्गा /

पेशाब जैसी गन्दी वस्तु, जिसे हम छूना भी नहीं पसन्द करते, उसे पीना तो बहुत मुश्किल काम था / मन मे कई बार विचार बदले , लेकिन अनुसन्धानात्मक स्वभाव एक्स्पेरीमेन्ट के लिये बार बार उसी स्थान पर खीन्च लाता / अन्त में एक दिन मैने दृढ निश्चय कर लिया कि मै अमुक दिन से पेशाब पीना शुरू करून्गा /

एक दिन सुबह मैने अपना पेशाब एक कान्च के गिलास में एकत्र किया / इस पेशाब में अपनी उन्गली डालकर उस पेशाब को अपने गालों में मला / फिर माथे मे लगाया /

दूसरे दिन सुबह अपने पेशाब को लेकर अपना मुह धोया / तीसरे दिन मैने अपने पेशाब से मुह धोया और एक चम्मच पेशाब को होठो पर लगाया और एक दो बून्द पेशाब जबान पर दाल ली / अगले दिन मैने एक कुल्ला पेहाब का किया और एक दो दिन बाद मै आधा कप अपना स्वमूत्र, ताज़ा पेशाब पी गया /

यद्यपि मुझे कोई बीमारी नहीं थी , जिसके लिये मुझे स्वमूत्र पीने की आकांछा थी / मै इसे एक्स्पेरीमेन्ट करके अनुभव और समझना चाहता था कि अपना स्वमूत्र पीने से होता क्या है और स्वास्थय बनाये रखने के लिये स्वमूत्र का शरीर पर क्या असर पड़ता है ?

 इसके अलावा स्वमूत्र का रोगों पर क्या असर होता है , इसका भी अनुभव करना था /

 मैने बाद में एक दिन पेशाब से कुल्ला करने के बाद  ३० मिली लीटर अपना स्वमूत्र पी लिया / इसके पहले मै कई बार “गो मूत्र” का सेवन कर चुका था / “गो मूत्र” का स्वाद और उसका अनुभव मुझे पता था / अपना स्वयम का “स्वमूत्र” पीने के बाद मुझे अपने मूत्र और गोमूत्र मे यह फर्क पता चला कि गोमूत्र का स्वाद, तरलता, गन्ध आदि में मानव मूत्र हल्का होता है, स्वाद में हल्का नमकीन तथा थोड़ा सा खारी होता है / जबकि तुलनात्मक रूप में गोमूत्र का स्वाद यूरिया से सन्युक्त जैसा, तरलता मे अधिक गाढा और पित्त युक्त कडुआ स्वाद होता है /

 पहली बार अपना मूत्र पीने के बाद मुझे कोई विशेष परेशानी नहीं हुयी / इसके बाद से मै रोजाना अपना मूत्र सुबह खाली पेट पीने लगा /

 यह सिल्सिला कई साल चला / जितने दिन मैने अपना स्वमूत्र पिया , उतने दिन तक मुझे सर्दी, जुखाम , बुखार जैसी तकलीफॆ बहुत कम  हुयी , अगर हुयी भी तो एक दो दिन में स्वमूत्र पीने से ही ठीक हो गयी / शरीर का  रन्ग बहुत खिल गया और मै अपनी वास्तबिक उम्र से १० या १५ साल छोटा नजर आने लगा /

 स्वमूत्र के इस अनुभव को लिखकर मैने कई प्रतिष्ठित समाचर पत्रों और मैगज़ीन्स मे लेख स्वरूप प्रकाशित कराया , जिसे पढकर बहुत से लोगों नें इस पर अनुभव प्राप्त किया / 

 मेरा अनुभव है कि जो भी स्वमूत्र का सेवन करना चाह्ते है , वे किसी स्वमूत्र चिकित्सा विशेषग्य की देखरेख में चिकित्सा व्यवस्था करें /

 आयुर्वेद में विभिन्न जानवरों और नरमूत्र के गुण और कर्म के , इनके उपयोग के बारे मे ” भाव प्रकाश ” ग्रन्थ में बहुत विस्तार से बताया गया है /

 

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