मलेरिया का आयुर्वेदिक उपचार ; Treatment of all kinds of MALERIAL FEVER by Ayurvedic Remedies


मलेरिया जिसे विषम ज्वर भी कहते है, सारे विश्व की एक ऐसी बीमारी है जो हर साल करोड़ॊं लोगो को प्रभावित करती है /

आयुर्वेद में इसे विषम ज्वर कहते है क्योंकि शास्त्रों में जितने भी लक्षण और पहचान चिन्ह इस बीमारी के बारे मे बताये गये हैं , निदान ग्यान के द्रूस्टिकोण सब इसी मलेरिया बीमारी की ओर ही इन्गित करते हैं / इस प्रकार से आयुर्वेद के बारे में यह कहा जा सकता है कि Maleria के बारे में आयुर्वेद के चिकित्सकों को ग्यान था और आयुर्वेद के चिकित्सक इस बीमारी का इलाज और उसका management करना जानते थे /

लगभग १०० साल से अधिक हो चुके है, उस समय ब्रिटिश सरकार की फौज मे काम करने वाले एक ब्रिटिश चिकित्सक ने हैदराबाद, भारत [अब] स्तिथि एक अस्पताल में काम करते हुये यह पता लगाया था कि मलेरिया बुखार मच्छरों के काटने से पैदा होता है, उसके बाद उन्होने और भी कई तथ्य इक्ठ्ठा किये और बाद मे की गई कई research में यह पाया गया कि मादा अनोफेलिक्स मच्छर के काटने से मलेरिया बुखार होता है /

ब्रिटिशर्स द्वारा की गयी मलेरिया के बारे मे जानकारी से पहले ऐसा समझा जाता है कि मलेरिया बुखार का इलाज आयुर्वेद के राज वैद्यों द्वारा तत्कालीन ब्रिटिश नागरिकों का किया जाता रहा होगा / क्योंकि आधुनिक चिकित्सा विग्यान के पास उस समय तक “क्वीनीन” के बारे में कोई जानकारी नही थी /

“क्वीनीन” के बारे मे कहा जाता कि एक बार पेरू देश के किसी शहर में कोई ब्रिटिश राज घराने की एक राज कुमारी दौरे पर गयी थी / वहीं उसे मलेरिया के बुखार का अटैक पड़ा / ब्रिटिश डाक्टर उसका इलाज कर रहे थे लेकिन कोई लाभ नही मिला / वहां के नागरिकों से मलेरिया बुखार के उपचार के बारे में पूछने पर पता चला कि वहां की एक जन जाति ऐसे बुखार के उपचार के लिये पहाड़ॊ पर होने वाली एक जड़ी का उपयोग करते हैं, जिससे मलेरिया ठीक हो जाता है /

ब्रिटिश डाक्टरों नें इस जड़ी को मन्गवाकर और जैसे वहां के लोगों ने इसके उपयोग का तरीका बताया , वैस्से ही इसका उपयोग राज कुमारी को कराया / कुछ दिनों के प्रयोग से बुखार ठीक हो गया और राज कुमारी को आरोग्य प्राप्ति हो गयी /

इस घटना के बाद चिकित्सकों का ध्यान इस जड़ी की तरफ गया और उन्हे तब पता चला कि इसका प्रोनान्सिएशन CHINCHONA “खिन्खोना” जैसा वहां के लोग करते है / बाद मे यह शब्द अपभ्रन्स होकर Cincona बन गया और बाद में Quinine कहा जाने लगा /

बहर्हाल बात करते हैं आयुर्वेद चिकित्सा की / आयुर्वेद में सप्त पर्ण और चिरायता और काल्मेघ और कूटकी और नीम जैसी मुख्य औषधियों के साथ सहायक द्रव्यों से बनी हुयी औषधियों के उपयोग से ्मलेरिया बुखार का इलाज सदियों से करते चले आ रहे है / आज भी कर रहे है और आगे भी होता रहेगा /

एक खास बात आयुर्वेद चिकित्सा में यह है कि मलेरिया कभी भी resistent नही होता, बल्कि जड़ मूल से नष्ट होता है और शरीर को कोई नुकसान नही होता /

जिन्हे मलेरिया का रोग हो वे सप्त पर्ण घन सत्व से बनी सप्त पर्ण बटी का सेवन करें / साथ में महा सुदरशन चूर्ण के घन्सत्व से बनी गोलॊ का उपयोग दिन में चार बार करें / मलेरिया अवश्य cure होगा / इस दवाओं के कोई भी साइड एफेक्ट नही हैं /

Ayurveda have many medicine to treat malarial fever in toto. Masters of Ayurveda formulated many remedies to meet out the various nature and sympatomatology available defferently in patients with their maagement.
A Solely chapter on JWAR is created by the Ayurvedicians wth the philosophy in background that at the time of birth and at the time of death humans have fever an in every disease condition the body fever fluctuates and therefore fever is an important place in view of the Ayurvedic treatment.

The classic book BHAV PRAKASH have a separate part specially compilled to FEVER, w2here every kind of fever is widely discussed with their treatment and management including MALARIA.

And at last those cases were not responded and mal treated wit the QUININE and quinine resisted cases are successfully treated and fully cured by Ayurveda treatment.

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