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पित्त की थैली की बीमारियां ; Gall Bladder anomalies


आयुर्वेद मे पित्त की थैली को यानी पित्ताशय को पित्त भेद का एक भेद पाचक पित्त के अन्तर्गत माना है / वैसे पाचक पित्त दो अन्गों को मिलकर बनाया अथवा मान्य किया गया है जिसमें पिताशय Gall Bladder के अलावा पैन्क्रियाज यानी क्लोम अथवा तिल यानी Pancreas दोनों ही अन्ग शामिल किये गये हैं / “पाचक पित्त” भेद इन दोनों की कार्य प्राणाली को सहायक मानकर ्प्राचीन आचार्यों ने शायद इसकी महत्ता को देखते हुये और समझते हुये , नाम सन्ग्या दी गयी है /

इस नाम सन्ग्या के पीछे के कारण क्या हो सकते हैं ? यह समझने के लिये अगर आधुनिक चिकित्सा विग्यान की फीजियोलाजी physiology और आयुर्वेद की निदान ग्यान की पहली और विश्व की एकदम अकेली परीक्षण विधि ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन की फाइन्डिन्ग्स के साथ अध्य्यन करें तो बहुत कुछ आयुर्वेद के मनिषियों के ग्यान की पुष्टि हो सकती है /

आधुनिक मेडिकल साइन्स कहता है कि Gall Bladder और pancreas ये दोनों ही पाचन सन्सथान के दो अलग अलग अन्ग हैं / जब ये दो अलग अलग अन्ग है, ऐसा मान लिया गया है , तो इनके कार्य भी अलग अलग है , यह भी आधुनिक काल के चिकित्सा विग्यानियो द्वारा अध्ध्यनित किया जा चुका है /

पित्ताशय के कामों का अध्धयन बताता है कि इसका श्राव या Gall bladder juice भोजन के साथ खायी गयी सभी प्रकार की चर्बी को soapify बनाता है यानी पित्त का रस खाये गये भोजन  मे मिलकर न ह्जम होने वाली चर्बी को इतना पतला करके मुलायम बना देता है ताकि उसकी स्तिथि हजम होने लायक बन जाये /

जबकि पैन्क्रियाज का काम तुलनात्मक तौर पर तीन स्तर का होता है /

आयुर्वेद के शरीर रचना विग्यान और शरीर क्रिया विग्यान का अध्ध्यन करने वाले मनीषियों ने इन दोनों अन्गों की अन्तिम स्तिथि को देखकर और परख कर यह निष्कर्ष निकाला होगा कि इन दोनों अन्गों के अन्तिम छोर एक ही जगह  बहुत थोड़े से अन्तराल में स्तिथि हैं और इसीलिये शायद इनका काम पाचन क्रिया में सहयता देना होगा, ऐसा समझ कर इन दोनों अन्गों को एक में मिलाकर यह तय किया गया होगा कि “पाचक पित्त भेद” सन्ग्या देना सर्वथा उचित होगा / इसी कारण ” पाचक पित्त को पित्त भेद” कहा जाता है/

पित्त की थैली की मुख्य बीमारियां जो आयुर्वेदिक और यूनानी और होम्योपैथी की औषधि करने या चिकित्सा करने से अवश्य ठीक हो जाती है;

१- Sludge deposits  या तलछट का जमना

२- पित्त की थैली का सन्क्रमण

३- पित्त की थैली की दीवालों का मोटा हो जाना

४- पित्त की थैली में  सूजन आ जाना

५- पित्त की थैली का सिकुड़ जाना

६- पित्त की थैली का छोटा हो जाना

७- पित्त की थैली का दर्द करना

८- पित्त की थैली में पथरी पड़ना या Gall Bladder stone होना जिनका साइज अधिकतम ८ मिलीमीटर तक हो , इतनी बड़ी पथरी घुलकर और छोटी होकर निकल जाती है /

अधिक बड़े साइज की पथरी नही निकल पाती है /इसके अलावा पथरी अगर चर्बी यानी कोलेस्टेराल की बनी होगी तो ऐसी पथरी बहुत सख्त होती है और गल नही पाती / इसलिये इसका अन्तिम उपाय आपरेशन करा लेना ही उचित होता है /

इसके अलावा पित्त की थैली से सम्बन्धित अन्य बहुत सी अवस्थायें तथा समस्याये या बीमारिया होती हैं जिनके इलाज के लिये आयुर्वेदिक चिकित्सक या अपनी रुचि के किसी भी चिकित्सक से परामर्श करके औषधियों के सेवन से अवश्य आराम मिल  जाती है /

आपरेशन कराना एक अन्तिम विकल्प reserve कर रख लेना चाहिये/ इससे पहले दवाओं का उपयोग करके और थोड़ा कष्ट उठाकर इलाज करने से पथरी अवश्य ठीक होती है /

Gall Bladder शरीर का एक बहुत उपयोगी अन्ग है / इसके आपरेशन करा लेने के बाद प्राय: लोगों को पाचन समबन्धि तथा दूसरी अन्य व्याधियां हो जाती हैं, इसलिये जहां तक सम्भव हो इसे बचाने का प्रयास करें /

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About prakruti

Born 20 November 1945. Graduate in Ayurveda, Homoeopathy and Modern western medicine, Inventer of "Electro-tridosha-graphy" and "Electro-Homoeo-grapy". Over 50 years Medical practice experience of Homoeopathy, Ayurveda, Herbal and Modern western medicne etc etc, Research and development of newly invented technology Electro Tridosha Graphy ; ETG AyurvedaScan system is under taken still with new estabilization of parameter for status quantification of the AYURVEDA PRINCIPALS and disease diagnosis.

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