आयुर्वेदिक भस्म का उपयोग आयुर्वेद के जन्म के साथ साथ ही किया जाता रहा है , ऐसा तथ्य आयुर्वेद के प्राचीन compile किये गये ग्रन्थों में मिलता है / किसी खास बीमारी में या अनुपान भेद के साथ भस्मों का उपयोग करते रहे हैं, अभी भी कर रहे हैं और आगे भी करते रहेन्गे/
भस्मों के शरीर में होने वाले अच्छे प्रभावों के कारण ही भस्मों का उपयोग अकेले या दवाओं के फार्मूले में मिलाकर किया जाने लगा / आज भी कर रहे हैं , उदाहरण के लिये हजरुल यहूद भस्म का उपयोग कुल्थी के काढे या पुनर्नवाष्टक कवाथ के साथ करने से चाहे कितनी बड़ी गुर्दे की पथरी हो melt होकर या धीरे धीरे गलकर निकल जाती है /
इसी प्रकार अभ्रक भस्म का उपयोग अनुपान भेद से जितनी भी शरीर में बीमारियां हि, उनमे उपयोग करते हैं / इन बीमारियों का चाहे कोई भी नाम दिया गया हो या नाम हो जो दरावना सा लगता हो, वे भी इसके उपयोग से ठीक होती है /
किस व्यक्ति ने या किस शख्स ने आयुर्वेदे की भस्मों के उपयोग को लेकर और आयुर्वेद को सीधे सीधे बदनाम करने के लिये ऐसा कुचक्र किया है , इसके पीछे की मन्शा का पता करना बहुत जरूरी है / आज तक न तो दुनियां के किसी हिस्से मे आयुर्वेद की भस्मों को लेकर कहीं कोई वैग्यानिक शोध हुआ है और इ इसकी efficiency के बारे में कोई वैग्यानिक अध्ध्य्यन भी, इसलिये मेरा मानना है कि जो भी ऐसा कह रहे हैं उसके पीछे ऐसा कहने वालों का क्या फायदा हो सकता है इसे केवल समझा जा सकता है /
फिर भी मै सबको बताना चाहता हूं कि आयुर्वेद की शास्त्रोक विधि पूर्वक बनायी गयी भस्मों का शरीर पर कोई भी बुरा प्रभाव नही पड्ता है , ऐसा मै कई बार ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन आधारित अध्ध्य्यन अपनी टीम के साथ कर चुका हूं और इसके परिणाम भी प्रकाशित किये जा चुके हैं / मेरा निष्कर्ष यही है कि आयुर्वेद की शास्त्रोक्त विधि से बनायी गयी भस्में रोगों में उपयोग के लिये शत प्रतिशत सुरक्षित हैं और इनके कोई भी side effects नही होते हैं /
ऐसे लोगों को इस तरह का आयुर्वेद को बदनाम करने वाला झूठा अभियान फौरन बन्द कर देना चाहिये / आव्श्यकता पड़ने पर किसी भी न्यायालय में ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन की रिपोर्ट जो भस्मों के अध्ध्य्यन से सम्बन्धित है , अनकड़ों समेत प्रस्तुत की जा सकती है , उन लोगों के खिलाफ जो इस तरह का प्रचार और प्रसार करते हुये पाये जा सकते हैं


