बीमारी जब पुरानी हो जाये तो क्या करना चाहिये ???? WHEN DISEASE / AILMENTS BECOMES CHRONIC / OLD, WHAT TO DO ?????

ऐसा देखने मे आया है कि आजकल के समय मे देश और विदेश की आम जनता को यह तक नही पता है कि अगर उनको कोई रोग हो जाये तो उनको क्या करना चाहिये ? किस तरह का इलाज करना चाहिये ? जो उनकी बीमारी दूर करने मे सहाय्क तो हो ही , उनके शरीर को किसी तरह का side effects  जैसा नुकसान भी न हो ?

आज से तीस पैतिस साल पहले तक चिकित्सा क्षेत्र मे BRITISH IDEOLOGY का बोलबाला था / चिकित्सा विग्यान मे औषधियों के क्षेत्र में और चिकित्सा शिक्षा मे BRITISH PATTERN  की पुस्तकों का अध्य्यन  चिकित्सा विग्यान की सभी धारा के छात्र / छात्राये किया करते थे / उस समय ५० के दशक की दवाये मिला करती थी और मारकेट मे उपलब्ध होती थी / यह दवाये ऐसी होती थी जिनके खाने से न तो कोई साइड प्रभाव होता था और न मरीज को कोई दिक्कत होती थी /

इसका कारण यह था कि  BRITISH PATTERN  की प्रभाव MISSIONARY के तौर तरीके का था, जहां सेवा भावना पहले होती थी और बाकी सब बाद में /

लेकिन आज से ३५ साल के अन्दर ही जब से अमरीकन प्रभाव का चिकित्सा के क्षेत्र मे प्रवेश हुआ है , तब से सब कुछ और सोच विचार “राक्षसी विचार धारा” का हो गया है / सारी सोच बदल गयी और मनुष्य को मनुष्य नही “मशीन” की तरह से समझा जाने लगा है / क्योंकि जब मनुष्य को मशीन समझा जायेगा तो इलाज भी मशीन के पुर्जे की ही तरह से किया जायेगा /

और आज यही हो रहा है /

[to be loaded soon]

 

LEUCODERMA / WHITE SPOTS / VITILIGO / सफेद दाग ; शत-प्रतिशत ठीक होते है , यदि ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन आधारित आयुर्वेदिक इलाज किया जाये ; 100 % curable , if AYURVEDA treatment given on the ground of E.T.G. AyurvedaScan reports

सफेद दाग LEUCODERMA ;अब लाइलाज बीमारी नही है ; आयुर्वेद चिकित्सा से शत प्रतिशत ठीक होता है

LEUCODERMA यानी सफेद दाग अब लाइलाज बीमारी की श्रेणी मे नही है / आयुर्वेद की आधुनिक तकनीक ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन के परीक्षण और इस परीक्षण के निष्कर्ष के आधार पर आयुर्वेद की चिकित्सा करने से WHITE SPOTS / LEUCODERMA / VITILIGO / सफेद दाग अवश्य ठीक होते है /

आयुर्वेद के दूसरे अन्य आविष्कृत किये गये परीक्षणो से यथा आयुर्वेद थर्मल स्कैनिन्ग, आयुर्वेद रक्त परीक्षण और आयुर्वेद मूत्र परीक्षण से प्राप्त आन्कड़ो और रोग निदान के निष्कर्ष आधारित इलाज से त्वचा सम्बन्धी सभी बीमारियो का इलाज सफलता पूर्वक किया जा सकता है /

हमारे अनुसन्धान केन्द्र ; कनक पाली-थेरापी क्लीनिक एवम अनुसन्धान केन्द्र , कानपुर , उत्तर प्रदेश , भारत मे सफेद दाग LEUCODERMA / WHITE SPOTS / VITILIGO के रोगियो का इलाज सफलता पूर्वक किया जा चुका है और इलाज मे सफलता का प्रतिशत ; १०० % शत – प्रतिशत रहा है /

हमारा इलाज करने का तौर तरीका निम्न प्रकार का है ;

१- सभी तरह के परीक्षण मशीनो द्वारा अथवा मशीनो की सहायता द्वारा किये जाते है

२- सबसे पहले आयुर्वेद थरमल स्कैनिन्ग करते है और इसके साथ साथ ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन का परीक्षण करते है

३- आवश्यकता के अनुसार मशीन द्वारा मैनुअल ट्रेस रिकार्ड किये जाते है

४- आयुर्वेद के रक्त परीक्षण किये जाते है

५- आयुर्वेद के मूत्र परीक्षण किये जाते है

६- त्वचा का जहां सफेद दाग होते है वहां का microscopic परीक्षण करते है

७- त्वचा का color deflection जान्चा जाता है 

८- इसके अलावा अन्य दूसरे परीक्षण आवश्यकता के अनुसार किये जाते है

इन सभी परीक्षणो को करने मे और रिपोर्ट तैयार करने मे 8  से 12 घन्टे तक लग जाते है

परीक्षण पूरे हो जाने के बाद  और रिपोर्ट फाइनल तैयार होने के बाद , मरीज की तकलीफ का Three Dimensional Diagnosis  निकाली जाती है और यह establish  किया जाता है कि [ पहला] LEUCODERMA / WHITE SPOT / VITILIGO / सफेद दाग को पैदा करने के बीज या जड़ बुनियाद कहां से पैदा हो रही है , दूसरा [२] यह जड़-बुनियाद किस रास्ते से होकर और किन किन अन्गो की विकृति के साथ होकर त्वचा तक पहुन्च रही है और तीसरा [३] शरीर के हिस्से की त्वचा कहां कहां प्रभावित हो रही है और उसकी intensity level  किस स्तर की है / इसके अलावा थरमल स्कैन और रक्त परीक्षण और मूत्र परीक्षण तथा अन्य परीक्षणो का सहारा निदानात्म्क दृष्टिकोण के मद्दे नज्रर  लिया जाता है /

क्या इलाज करना है, कहा शरीर मे गड़बड़ी है और किस तरह का उप्चार तथा खाना पीना और जीवन चर्या किस तरह की मरीज की होना चाहिये , यह सब एक विसतृत फाइल मे आदेशित किया जाता है /

मरीज के लिये उपयुक्त दवा क्या होना चाहिये , इसके लिये दवाओं का  चुनाव आयुर्वेदिक या होम्योपैथिक या यूनानी सिस्टम से एकल अथवा बहुल तरीके से मरीज की आवश्यकता के अनुसार चुनाव करके PRESCRIPTION  लिख दिया जाता है / यह दवाये मरीज को अपने शहर के दुकानो से खरीद कर सेवन करना होता है / सभी दवाये भारत के सभी शहरो और कस्बो मे उपलब्ध होती है /

हमारे यहा से मरीज को कोई भी किसी किस्म की दवा नही दी जाती है / मरीज को दवा लिखकर दे दी जाती है जिसे वह अपनी सुविधा के अनुसार कही से भी किसी भी दूकान से खरीद कर सेवन करता है /

हम केवक ONLY परीक्षण करके दवा का पर्चा देते हैं /

हमारे केन्द्र मे आकर इलाज कराने वाले सभी LEUCODERMA या सफेद दाग के रोगी ठीक हो गये है , जिनका इलाज चल रहा है , उनको भी दिन प्रतिदिन आराम मिल रही है और यह उम्मीद करते है और विश्वास करते है कि आगे भविष्य मे आने वाले सभी leucoderma के रोगी अवश्य ठीक होन्गे और इस तरह की लाइलाज बतायी गयी और कही गयी बीमारी से अवश्य मुक्त होन्गे /

LEUCODERMA / WHITE SPOTS are now not an incurable disease condition according to the AYURVEDA based newly invented technology E.T.G. AYURVEDASCAN and its supplementary tests results.

Ayurvedic treatment have been given a large number of LEUCODERMA patients at KANAK POLYTHERAPY CLINIC AND RESEARCH CENTER, KANPUR, UTTAR PRADESH , INDIA .

CURE Results are obtained 100%, which is an astonishing facts for ETG AyurvedaScan Chief Investigator Dr D.B.Bajpai, who is engaging in this task.

ETG AyurvedaScan Report ; Details of the files and supplementary tests done for patient ; ई०टी०जी० आयुर्वेदस्कैन और सप्लीमेन्टरी परीक्षण की रिपोर्ट्स के बारे मे जानकारी

रोजाना बहुत बड़ी सन्खया मे देश और विदेश से आयुर्वेद प्रेमी  और जिग्यासु जनता “ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन ” परीक्शण के बारे मे जानना चाहती है / बहुत से लोग इस बात को ग्यात करना चाहते है कि ई०टी०जी० परिक्षण के साथ अन्य कौन कौन से परीक्षण किये जाते है /

नीचे दिये गये वीडियो मे  ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन रिपोर्ट और इसके supplementary tests और examination के बारे मे बताया गया है ताकि सभी लोग यह समझ ले कि आयुर्वेद की यह तकनीक किस प्रकार से आयुर्वेदिक रोग निदान आयुर्वेदिक और रोग चिकित्सा मे किस तरह से उपयोगी साबित हो चुकी है /

10 th APRIL ; HOMOEOPATHY HAHANEMANN DAY ; NEW DIAGNOSTICS INSTRUMENTATIONS AND CHEMICAL EXAMINATION’S INVENTION IN HOMOEOPATHY MEDICAL SYSTEM WILL BOOST THE ADOPTION OF HOMOEOPATHY GLOBALLY

10th April , the birth day of the founder and  Father of Homoeopathy is celebrated as HOMOEOPATHY DAY by the admirer and followers of the Homoeopathic medical system.

In our research center, we have done already  few research work for AYURVEDA, duly accredited by the Government of India.

We have also done the development of the instrumentation and chemical tests for evaluation and perfectness of the Ayurveda and Homoeopathy both in view of the SCIENTIFIC EVIDENCE BASED MEDICAL SYSTEM.

Both the system AYURVEDA and  H omoeopathy is now evidence based medical system in view of instrumentations and chemical laboratory testings.

ELECTRO HOMOEO GRAPHY  ; E.H.G. HomoeopathyScan

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This is one of the DIGITAL HEAMOMETER,  which is being used for WHOLE  BLOOD examination in view of AYURVEDIC and  HOMOEOPATHIC  principles. Impregnated alchemical paper bits are used for TEST purposes. The machine reads the intensity level and shows in number.

WE are using  some other developed  HEAMOMETER in our research center for status quantification of HOMOEOPATHIC PRINCIPALS AND DIAGNOSIS OF BLOOD CONTENTS.

We use the readings for AYURVEDA and HOMOEOPATHIC purposes and used data for AYURVEDIC and HOMOEOPATHIC Diagnosis.

Whole Blood Test with the HEAMOMETER gives the following parameters of Homoeopathic HAHANEMANNIAN fundamentals ;

1- PSORA

2- SYCOSIS

3- SYPHILIS

4- VITAL FORCE

5- IDEOSYNCRACY

6- SENSITIVENESS

 

Homoeopathy Blood Test Report for status quantification of Hahnemannian Homoeopathic Principals

Homoeopathy Blood Test Report for status quantification of Hahnemannian Homoeopathic Principals

These Data are for the ONLY USE OF AYURVEDICIANS AND HOMOEOPATHS  and have no relation  in any manner to other systems of diagnosis.

We warn that the data of Ayurveda and Homoeopathy should not  be  compared  to other medical system’s findings because diagnosis and treatment approach of each system differs in Single unite and multiunite philosophy of  their practicing systems.

Main objectives of the information for the test and mechanical diagnosis is to proove that HOMOEOPATHY  now should be considered as an evidence based medical system, where principles can be quantified now at present.

 

 

 

आयुष-आयुर्वेद के प्रोत्साहन और चिकित्सा विग्यान की गुणवत्ता बढाने के लिये अति आवश्यक भारत सरकार का निर्णय ; पद स्थापन अति शीघ्र होना चाहिये

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क्या आयुर्वेद और  आयुष चिकित्सा विग्यान की  अन्य पध्ध्यतियों यथा होम्योपैथी और यूनानी और सिध्धा और  अन्य हर्बल जनित दवाओं की गुण वत्ता के लिये उच्च मान दन्ड स्थापित करने हेतु ड्रग कन्ट्रोलर की नियुक्ति का मामला सरकार की लाल्फीता शाही के कारण क्यों रुका हुआ है , इसका जवाब तो भारत सरकार के नेता ही दे सकते है ?

दूसरा यह नेक काम तो आयुर्वेद की नेता मन्डली को ही करना चाहिये था लेकिन नेता तो अपनी नेतागीरी चमकाने मे लगे है , आयुर्वेद की दुर्दशा हो तो हो , आयुर्वेद गर्त मे जाये तो जाये , नेता को तो सिर्फ दोहन करने की जुगत मे ही लगे हुये है /

जब आप कुछ मान्गोगे ही नही तो मिलेगा क्या ?

यह सोचने का विषय है कि आयुर्वेद के निदान ग्यान के क्षेत्र मे निदानात्मक मशीनीकरण  हो चुका है और इसकी सेवाये सीमित ही सही , देश की जनता के लिये उपलब्ध है /

ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन तकनीक, आयुर्वेद रक्त परीक्शन , आयुर्वेद मूत्र परीक्शन, होम्योपैथिक स्कैन, होम्योपैथिक रक्त परीक्षण की तकनीके  विकसित की जा चुकी है /

ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन का प्रारम्भिक परीक्षण भारत सरकार द्वारा कई साल पहले किया जा चुका है / यह तकनीक निरन्तर शोध कार्य किये जाने के कारण विकसित और विकास की गति मे है /

आयुर्वेद के केमिकल द्वारा किये गये प्रारम्भिक परीक्षणो द्वारा यह स्थापित किया जा चुका है कि आयुर्वेद की दवाओं का आयुर्वेद के सिध्धान्तों को मद्दे नज़र रखते हुये Test   और examination किये जा सकते है, जिनसे यह पता किया जा सकता है कि आयुर्वेद के १० सिध्धान्त यथा

१- वात

२- पित्त

३- कफ

४-रस

५-रक्त

६-मान्स

७- मेद

८- अस्थि

९- मज्जा

१- – शुक्र

का क्या measurement  and level औषद्गियो मे मौजूद है /

 

SINUSITIS ; A NASAL CAVITY PROBLEM ; CAUSES MANY AILMENTS OF HEAD AND EAR AND MOUTH AND TEETH AND OFCOURSE HEAD AND SPINE AND BRAIN RELATED AILMENTS ; ्सायनुसायटिस ; नाक से सम्बन्धित बीमारी जिससे सिर और दिमागऔर गरदन की रीढ की हड्डी से सम्बन्धित बहुत सी बीमारियां पैदा होती है यहां तक कि ब्रेन की अन्दरूनी तकलीफें भी ……….

आयुर्वेद मे उर्ध्व जत्रु रोग के विस्तृत विवरण मे गले से ऊपर के रोगो के बारे मे बताया गया है / उर्ध्व जत्रु रोगो के अन्तर्गत वे सभी प्रकार के विकार और बीमारियां गिनी जाती है जो गले के ऊपर की शारीरिक बनावट से जुड़ती है / इसमे दोनों हाथ तथा कन्धा भी शामिल हो जाता है , इसलिये कन्धे की तकलीफे और हाथ की तकलीफो को उर्धव ज्कत्रु रोग से जोड़्कर भी देखते और समझते हैं /

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आयुर्वेद के मनीषियों ने त्रिक स्थान यानी शरीर के वह सन्धि स्थल जहां तीन अन्ग सामूहिक रूप से मिलते है /  ऐसे तीन अन्ग सिर और दोनों हाथ  होते है , इसे समझने के लिये  पहला त्रिक स्थान का नाम दिया गया है और दूसरा दोनों पैरो और कमर की हड्डी से जुड़ा हुआ हिस्सा , इसे दूसरा त्रिक स्थान माना जाता है /

पहले त्रिक स्थान का महत्व इसलिये बहुत महत्व पूर्ण है क्योंकि शरीर को जिन आवश्यक  प्रक्रियाओं की आवश्यकता होती है वह यही से ही पूरी होती है / पहली प्रक्रिया [१] स्वांस यानी सांस यानी शरीर के लिये आवश्यक आक्सीजन की पूर्ति के लिये नाक अथवा मुख का उपयोग करना  , दूसरा [२] शरीर को जान देने के लिये खाना पीना मुख के द्वारा सम्भव करना  शामिल है / ्तीसरा काम senses  से जुड़ा है यानी देखना और सुनना और महसूस करना , यह सब brain  अथवा मष्तिष्क से जुड़ हुये है /

 

इस प्रकार से त्रिक स्थान कि शरीर का सबसे महतव पूर्ण स्थान स्थापित करने का कारण बनता है / अगर त्रिक स्थान की हिफाजत नही की जायेगी , और ऐसी ही धाराणा बनती है तो यह विचार करने की बात है कि मनुष्य कितने दिन जिन्दा रह सकेगा /

त्रिक स्थान से समबन्धित मुख्य बीमारियां निम्न श्रेणी मे बान्टी जा सकती है ;

१- कान से समब्नधित सभी विकार

२- दान्त और मसूढो से समब्नधित विकार

३- आन्ख से समब्नह्दित सभी विकार

४- मष्तिष्क से समब्नधित सभी विकार

५- नाक से समबन्धित सभी विकार

६- गर्दन की रीढ की हड्डी से समब्नधित सभी विकार

७- चेहरे की त्वचा से समब्नह्दित सभी विकार

८- चेहरे के जबडओ से समब्नधित सभी विकार

९- सिर और सिर के बालों से समबन्धित सभी विकार

१०- गर्दन और गरदन के चारो ओर के होने वाली बनावटॊ हड्डियो और मान्श्पेशियो के विकार

११-थायरायड और अन्दरूनी गले के विकार

१२- मुख तथा जीभ और Laryngal, pharyngeal and tracheal विकार

१३- श्वास नली का ऊपरी हिस्से के विकार

१४- Throat Pit  के विकार

यहां एक लम्बी लिस्ट उर्ध्व जत्रु रोग के विवरण के लिये General to specific level  की बीमारियो को बताने के लिये  दी जा सकती है लेकिन यह बताना यहा पर्याप्त है कि उर्ध्व जत्रु के रोग आयुर्वेद के हिसाब से एक दूसरे के साथ जुड़े हुये होते है और इन सभी तकलीफो का उपचार मूल बीमारी के उपचार के साथ साथ ठीक होती जाती है /

उदाहरण के लिये एक मरीज का विवरण नीचे दे रहा हूं /

एक पुरुष मरीज को नाक के अन्दर तेज दर्द होता है, यह बहुत तेज दर्द जब होने लगता है तब यह चेहरे के चारों तरफ फैलने लगता है और आन्ख और कान और सिर के ऊपर की ओर तथा नीचे के जबड़ो से लेकर गले की और बाहर और अन्दर  दोनो तरफ होता है / दरद इतना भीषण  और तेज होता है कि ्मरीज न तो ठीक से खाना पीना कर पाता है और न  ही दरद के मारे ठीक से रात मे सो पाता है / खाना चबाने मे भी उसे बहुत भीषण तकलीफ होती है /
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यह तकलीफ मरीज को कई साल से है / इलाज करने से ्दर्द ठीक हो जाता है लेकिन ठन्डक के दिनों मे तकलीफ फिर होने लगती है /

बहुत से लोगों ने कहा कि इसे Trigeminal neuralgia हो गया है कोई Sinusitis  की तकलीफ बता रहा है , कोई mandibular joints की ARTHRITIS   बता रहा है कोई कुछ और कोई कुछ बीमारी बता रहा है / कोई गले की बीमारी बता रहा है / कोई इस तरह के दर्द को Psychological  बताने लगा और किसी ने कहा कि “दर्द जैसी चीज इस दुनिया मे है ही नही , यह तो महसूस करने की बात है कि दर्द है क्या चीज” /

सब अपने अपने विचार व्यक्त करते है , इसके बारे मे क्या कहा जा सकता है /

मरीज कई साल से यह तकलीफ भोग रहा था /

बहरहाल मरीज के साथ इतनी तकलीफ होने के बाद जब मुझसे उसका साबका पड़ा तो मै भी थोड़ा सा पशोपेश मे पड़ा कि इसे क्या तकलीफ हो सकती है /

मैने मरीज की तकलीफ को जड़ बुनियाद से समझने की कोशिश करने का प्रयत्न किया / मुझे पता चला कि मरीज के निचले जबडे के कई दान्त टूटे हुये है, लेकिन इसके बावजूद वह चबा कर किसी तरह सेखाना खा लेता है /

मेरी निगाह उसके निचले जबड़े के DECAYED TOOTH  और इसके नीचे के मसूढे पर पड़ी जहां मुझे सूजन दिखाई पड़ी / मरीज ने बताया कि दान्त मे सूजन के कारण वह खा पी और चबा नही सकता तथा अधिक गरम तथा अधिक ठन्डी चिझे वह खा नही सकता / मैने अधिक जान्च पड़्ताल की और ANATOMICALLY  and physiologically  views से रोग को समझने की कोशिश की /

मैने diagnosis establish  की कि मरीज को तकलीफ दान्त मे हो रही जड़ों के neuralgic inflammation  के कारण है / इसी की वजह से चेहरे की सारी बीमारियां पैदा हो गयी है / मरीज बहुत लम्बे समय से बीमारी भोग रहा था / तकलीफ ठन्दक के शुरु होने के साथ साथ बहुत अधिक बढती थी / मरीज को बहुत severe  SPONDYLITIS  रही है जो पिछले तीस  साल से बनी हुयी थी  / मरीज को कान से कम सुनायी पड़ने की बीमारी पैदा हो गयी और कान मे दर्द भी रहने लगा /

बहुत ज्यादा इलाज कराने के बाद भी तकलीफ मे कुछ समय के लिये फायदा हो जाता था और दर्द भी कम हो जाता था लेकिन फिर पलट कर बीमारी एक दो दिन बाद आ जाती थी /

मुझे यह समझ मे आया कि मरीज को तकलीफ दान्त की जड़ मे पैदा हो गयी सूजन के कारण है जिससे NEURALGIA पैदा हुयी है और इसी के कारण न्यूरैल्जिक दर्द का विस्तार चेहरे के आधे हिस्से मे हो गया है जो गर्दन तक जा रहा है / इस neuralgic pain का extension कान और नाक और गले और आन्ख तथा चेहरे की मान्शपेशियों तक पहुन्च गया है जिससे तकलीप पैदा हो रही है / इससे पहले कान का इलाज और नाक का इलाज और आन्ख का इलाज और neuralgia pain  का अलग अलग बीमारी मानकर दवाये दी जा रही थी /

मरीज की बीमारी की जड़ बुनियाद समझ कर होम्योपैथिक और आयुर्वेदिक और एलोपैथिक की दवाये prescribe  की गयी /

१-  मरीज को दर्द के कारण नीन्द नही आती थी इससे उसका blood pressure  बढ जाता था / इसको रोकने के लिये मरीज को एलोपैथी की दवा खाने के लिये बताया गया /

२- दान्त की तकलीफो के लिये Homoeopathic and Bio-chemic  दवाये दी गयी क्योकि दान्त की तकलीफ मे मेरा अनुभव यही है कि Homoeopathic remedies तकलीफ को दूर करती है और दान्त के दर्द मे स्थायी फायदा पहुचाती है /

३- आयुर्वेद मे बताया गया है कि दान्त दर्द मे वात नाशक उपचार करना चाहिये / आयुर्वेद मे यह भी बताया गया है कि किस तरह का खान पान और जीवन शैली के management को ठीक रखने  से  बीमारिया चाहे जो भी हो वे अवश्य बहुत जल्दी ठीक होती है / इसलिये मरीज को वात नाशक उपचार के साथ साथ जीवन शैली को बदलने और यथायोग्य खान पान के निर्देश दिये गये /

एक हफ्ते के समन्वित आयुर्वेदिक और होम्योपैथिक और एलोपैथिक के दवाओ द्वारा किये गये उपचार से मरीज के सभी दर्द यथा कान का दर्द, नाक के अन्दर का दर्द, गले के दर्द, दान्त का दर्द, mandible  jaw joint आदि सारी तकलीफे ठीक हो गये / मरीज को किसी किस्म का कोई भी PAIN KILLERS   नही दिये गये /

निष्कर्ष;

निष्कर्ष स्वरूप यही कहा जा सकता है कि

[१] यह establish  करना बहुत आवश्यक है कि मरीज की तकलीफ किन कारणो से और क्यो और कैसे हो रही है ?

[२] सही इलाज करने से और जड़ मूल की तकलीफ दूर होने से ही बीमारी मे स्थायी फायदा होता है /

[३] लाक्षणिक उपचार से फौरन फायदा तो होता है लेकिन बीमारी बार बार पलट पलट कर आती रहती है , इसलिये स्थायी उपचार की ओर चिकित्सको को ध्यान देना चाहिये और ऐसे उपाय ढून्ढने चाहिये जिससे मरीज को स्थायी लाभ हो /

[४] आयुर्वेद मे सारे शरीर की तकलीफो का एक मुश्त चिकित्सा करने का विधान है / ऊपर बताये गये रोगी के विवरण से यह पता चलता है कि एक स्थान की बीमारी से किस तरह कई बीमारियों का जन्म हो जाता है

और

[५] यह कि एक ही बीमारी का इलाज करने से किस तरह से सभी additional problems आयुर्वेद और होम्योपैथी से ठीक होती है और मरीज को स्थायी लाभ मिलता है /

 

 

 

HOLI COMPLIMENTS TO ALL VIEWERS ; होली त्योहार की शुभ कामनायें

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होली त्योहार की शुभ कामनायें

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डा० डी०बी० बाजपेयी
आयुर्वेद – आयुष वैग्यानिक
मुख्य ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन इन्वेस्टीगेटर,
कनक पाली थेरापी क्लीनिक एवम रिसर्च सेन्टर
६७-७०, भूसाटोली रोड, बरतन बाज़ार,
कानपुर

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  OUR CLINIC AT KANPUR CITY, STATE UTTAR PRADESH, INDIA

WE ARE DEDICATED TO AYURVEDA AND AYUSH THERAPIES RELATED FUNDAMENTAL RESEARCH

WOLRD WOMENS DAY ; AYURVEDA -AYUSH ADOPTION IS THE BEST WAY FOR WOMENS’ AILMENTS

AYURVEDA adoption for women illnesses could be a best help for women ailments.

Almost every women’s illnesses is best treated in AYURVEDA since centuries. Ayurveda classics have much more for maintaining women’s health and their fitness. Ayurveda guide lines suggestions to keep women health in Toto , if adopted by women , it will be a great beneficial for women’s itself.

AYURVEDA guides women to follow the rules , by which they can maintain their normal health conditions. If they become ill, AYURVEDA suggests medications and do and dont to regain their health.

Ayurveda style of living for Women is directed what to do or what not to do during  menstruation till appearance to end of period duration. The other directions are given for GENERAL MAINTENANCE OF HEALTH , so that they could be able to keep themselves healthy.

In Ayurveda , Single Herbal medication, which have very important place in the treatment and maintenance of female health , is TURMERIC [Latin; CURCUMA LONGA] , which is directive to take in at least 4 Gram in raw powder form with milk or with plain water in summer and in winter with warm water to be taken one or two times a day.

TURMERIC is an specific herbal medications , covering almost all the complaints of females and female reproductive disorders.

SELECTION OF ACCURATE AND PERFECT BIO-CHEMIC SALT REMEDIES FOR A PARTICULAR PATINET IS POSSIBLE BASING ON THE “AYURVEDA BLOOD CHEMICAL CHEMISTRY” EXAMINATION REPORT

BIO-CHEMIC  SALT REMEDIES  system is invented by a GERMAN DOCTOR SHUESSLER  , who first expressed his views that HUMAN DISEASES  are a reflection of a deficiency in his blood chemistry salts.

When these salt’s deficiency are completed by giving a similar matching salt to repair the BLOOD CHEMISTRY  , the symptoms or disease condition is corrected to normal recovery by body itself.

This is a very popular system of treatment , which entirely needs only 12 salts.

These salts are  given below ;

1- CALCAREA FLOUR

2- CALCAREA PHOS

3- CALCAREA SULPH

4- FERRUM PHOS

5- KALI MURIATICUM

6- KALI PHOSPHORICUM

7- KALI SULPH

8- MAGANESIA PHOS

9- NATRUM PHOS

10- NATRUM MUR

11- NATRUM SULPH

12- SILICEA

Although the selection of remedies are not easy to say, but it needs an expert and analytical mind for selection. This is not an easy task to perform as it is assumed. Because so many factors are involved while selecting a proper and perfect remedy for matching the patient problem.

We have gone through to this problem and we find the perfect solution of this difficulty.

But latest invention and continuous work  for selection of correct and perfect BIO-CHEMIC  medications are going on in our research center. We have founded that AYURVEDA BLOOD CHEMICAL CHEMISTRY TEST  is solving well this problem of the selection of correct BIO-CHEMIC remedy or remedies.

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The above report shows the elevated level of SODIUM  and IODINE and below normal level of CALCIUM  and CHLORIDE and MAGNESIUM and UREA.

If we go through the above  report , it can be well assessed that patient needs NATRUM MUR and CALCAREA PHOS Bio-chemic Salts  for treatment.

Sodium and Chloride level of patient Blood ions are in abnormal level. Therefore Natrum-mur  is well selected salt to cover the deficiency of this bio-chemic salt.

Calcium level is also low with Iodine level high. Selection of CALCAREA PHOS  is best suited to this patient because Calcarea phos will cover the deficiency of Calcium and Phosphte which will also control the high level of IODINE, which is high in patient blood.

Now this is a new and latest approach  to show the logical and evidence based selection of BIO-CHEMIC SALTS, which is never done before.

In Our research center , we are continuous doing this practice and BIO-CHEMIC SALTS  are also suggested with other medications, which could be given safely AYURVEDIC or HOMOEOPATHIC or UNANI  or ALLOPATHIC MEDICINE, because BIO-CHEMIC SALTS  are said to be completing the deficiency  of  the Blood components or Blood chemical chemistry.

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