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Category Archives: ETG Technology

World CANCER Day 4th February ; Ayurveda answer to Cancer ; विश्व कैन्सर दिवस ४ फरवरी ; आयुर्वेद आयुष चिकित्सा विग्यान द्वारा भी कैन्सर रोग का सटीक उपचार

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ऐसा कहना और ऐसा विपरीत प्रचार करना इस विश्व के लोगों के लिये घातक होगा कि कैन्सर जैसी बीमारी का एलोपैथी के अलावा और किसी चिकित्सा विग्यान में इलाज नही है / “और किसी चिकित्सा विग्यान ” से मतलब आयुर्वेद और होम्य्पैथी और यूनानी चिकित्सा विग्यान से है /

आयुर्वेद की निदान ग्यान और रोग की पकड़ और रोग की जड़ तक मालूम कर लेने वाली आयुर्वेद की क्रान्तिकारी तकनीक ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन की बदौलत अब यह समभव हो गया है कि शरीर के अन्दर की विकृतियां यानी कार्य विकृति और अन्ग विकृति यानी pathophysiology और pathology किस स्तर की है और कहां कहां है, इनका pathway किस तरफ से मुख्य तकलीफ की तरफ गया है अथवा जा रहा है आदि आदि महीन बातों का पता चल जाता है ,जब इस findings को लेकर और इस पर आधारित होकर इलाज करते है तो मर्ज चाहे जो भी हो और चाहे जैसा हो, ये सब अवश्य ठीक होते हैं चाहे वह कैन्सर ही क्यों न हो या वह कोई भी तकलीफ हो जिसका बड़ा लम्बा चौड़ा नाम दिया गया हो और यह सुनकर जो लोगों को भयभीत और दहशत से भर देता हो /

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लगभग ३० साल पहले तक जब कैन्सर की बीमारी का कोई इलाज नही था, न आज की तरह सर्जरी का विकास हुआ था तो लोग कैन्सर का इलाज होम्योपैथी और आयुर्वेद के चिकित्सकों द्वारा कराते थे / उस समय भी कुछ किसम के कैन्सर की चिकित्सा में रोगी को आन्सिक या अर्ध आन्शिक या पूर्ण आन्सिक अथवा पूर्ण लाक्षणिक आराम मिल जाता था / आज के हालात यह है कि सरजरी कराने के बाद भी कैन्सर उसी तरह फिर पैदा हो जाता है बल्कि उससे अधिक उग्र अवस्था मे फैलता है जिसे रोक पाना मुश्किल होता है /

दुर्भाग्य की बात यह है कि कैन्सर के लिये की गयी सर्जरी या केमोथेरपी या रेडियेशन या अन्य नये तरीकों के after effects या post anomalies या post problems के प्रभाव या complications पर अध्ध्यन नही किये गये और न कोई रिसर्च / जो भी अध्ध्यन है वे सब पुराने पड़ चुके है / सभी वही लकीर के फकीर की स्तिथि का इलाज कर रहे है ं /

आधुनिक चिकित्सा विग्यान का ग्यान कैन्सर के इलाज को लेकर बहुत बढ गया है / अब समय आ गया है कि इसे नये विचारों के साथ नये innovation के साथ आजमाया जाये ताकि पीड़ित मानवता की सही मायने में सेवा की जा सके और सही तथा सुरक्षित सेवा उपलब्ध कराई जा सके /

ETG AyurvedaScan ; how the system detects the entire body problems and how accurate Ayurvedic-AYUSH treatment is possible?; ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन सिस्टम किस तरह से सारे शरीर का परीक्षण करता है और कैसे आयुर्वेद-आयुष द्वारा सही और सटीक इलाज सम्भव करता है ?

आयुर्वेद की नयी निदान ग्यान की क्रान्तिकारी तकनीक ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन द्वारा किस तरह से सारे शरीर का परीक्शण होकर किस तरह से सही और सटीक सभी बीमारियों का इलाज समभव हो जाता है , जिनके बारे मे धारणा है कि ऐसी बीमारियों का इस दुनियां में कोई इलाज नही है ?

सही बात यह है कि आयुर्वेद की इस क्रान्तिकारी तकनीक द्वारा सम्पूर्ण शरीर की तीन आयामी यानी 3 Dimentional अध्ध्य्यन किया जाता है / यह अध्ध्यन ठीक उसी तरह से है जिसे उदाहरण स्वरूप किसी पेड़ से तुलनात्मक रूप में कर सकते हैं / कैसे ?

यहां दिये गये स्केच चित्र के {A} भाग का अवलोकन कीजिये / इसमें दिये गये एक पेड़ को देखिये और उसका बेसिक structure समझिये / कोई भी पेड़ तीन मुख्य हिस्सों में बन्ट जाता है / ये हिस्से होते हैं [१] जड़ यानी root [२] तना यानी trunk और [३] ऊपर की शाखा यानी branches के साथ अन्य / यह एक पेड़ का मूल स्वरूप है , जो तीन हिस्सों में मुख्यतया बटा हुआ होता है / इस पेड़ की सारी जीवन कथा इन्ही तीन भागों मे समाहित है /

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अब इसी स्केच चित्र के दूसरे {B} भाग को देखिये और समझिये / यही वह मुख्य समझने वाला तत्व है जो ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन को विशिष्ट बनाता है / दरअसल आयुर्वेद के मौलिक सिध्धान्तों के निदान और शरीर के रोगों के निदान ग्यान को त्रिआयामी यानी Three Dimentional रूप यहीं बनता है / जब इस तकनीक के फाइनल रिजल्ट मिलते हैं तो इसमें तीन स्तर का निदान हो जाता है / इन तीन स्तरों मे पहला स्तर Manifestation / Symptoms / Unhealthy conditions का होता है यानी वह मुख्य तकलीफें या वह मुख्य पीड़ायें, जिनके इलाज के लिये मरीज डाक्टर के पास आता है / दूसरा स्तर उस pathway यानी रास्ते का होता है , जिससे होकर मुख्य तकलीफ या व्यथा या पीड़ा उस स्थान से चलती है जहां मुख्य तकलीफ की जड़ बुनियाद होती है / यानी तीसरा स्तर जहां pathophysiology या pathology पैदा होती है, उन Organs / Vital parts / Torso Organs में , जिनकी कार्य विकृति या विकृति के कारण मौजूदा तकलीफ होती है और जिस तकलीफ का इलाज मरीज डाक्टर के पास कराने के लिये आता है / यहा उल्लेखनीय होगा और कहना होगा कि त्रिआयामी यानी Three Dimentional Diagnosis की सुविधा ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन के जरिये मिल जाती है /

यहां दिये गये स्केच चित्र के तीसरे भाग यानी {C} हिस्से को देखिये / यह वह महत्वपूर्ण चरण हैं जहां आयुर्वेद की दवाओं के multi-functional area का लोहा मानना पड़ता है / ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन की फाइन्डिन्ग्स रिपोर्ट के तीन आयामी पहलू के अध्ध्य्यन के पश्चात यह विभाग सुविधा देता है कि ऐसी आयुर्वेदिक औषधियों का चुनाव किया जाये तो [१] पहला और [२] दूसरा और [३] तीसरा यानी तीनों चरण की बीमारियों को एक ही दवा या बहुल दवा और उसका अनुपान बीमारी को जड़ बुनियाद से आरोग्य प्रदान कर देने की क्षमता पैदा कर देता है / चाहे उस बीमारी का कोई भी नाम दिया गया हो, चाहे उस बीमारी का कितना भी डरावना नाम हो , चाहे उस बीमारी का कितना भी भयभीत करने वाला आकार प्रकार बता दिया गया हो या बीमारी को यह बता दिया गया हो कि इसका कोई इलाज नही है /

यह बात सब्को समझ लेना चाहिये कि कोई भी बीमारी होगी तो यह शरीर में ही पैदा होगी और इस बीमारी को शरीर के विकृत अन्ग ही पैदा करेन्गे / बीमारी कहीं बाहर से नही आयेगी , न ही इसे कोई implant कर सकता है / ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन की इस तकनीक से तीन आयामी यानी पहला मुख्य बीमारी के लक्षण दूसरा इस बीमारी को लाने वाला या बनाकर लाने वाला रास्ता और तीसरा मुख्य बीमारी को पैदा करने वाला शरीर का अन्ग, आदि सभी बातों का पता चल जाता है / जिससे बीमारी कोई भी हो और उसका कोई भी नाम दिया गया हो , सभी आरोग्य होते है /

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Tribhuvan Kirti Ras ; an Ayurvedic classical remedy for Winter Season

Every year winter season comes and while its commencement, it brings many health problems with the persons almost every one of all ages. Those who are living in those areas, where almost all months of a year, winter or winter like atmosphere persists, they also feel problems from more cold.

In those countries, where atmosphere of winter is persists around the year, in this region the skin of the person becomes more harder than comparatively to person of the tropical region. The persons, who are living in a cold atmosphere, their skin quality is somehow changed comparatively to those who are living in tropical regions and where cold or winter persists only few days or few months.

Case studies with the help of ETG AyurvedaScan system reveals that traces recorded from European countries and Tropical regions patients are differs from elevation , which is due to hard and soft skin of the patient belongs to specific regions. Where cold season is very prominent the skin of the person are thick and deposition of fat layer in under skin persists.

Although the diagnosis of disorders are same, ayurvedic fundamentals evaluations are same and no differences seen in between the results except the hights and longitudinal appearence of traces, which is due to skin of the subjects undergone for the test.

However, this dose not matter. Here TRIBHUVAN KIRTI RAS is beneficial in the following ailing conditions;

1- Cures exposure of cold either from cold of winter or wetting in rain
2- Used in almost all kinds of FEVER of any origin, whatever they may be.
3- Lower down HIGH FEVER just like PARACETAMOL do in feverish conditions.
4- suppressed sweat comes out after use of this remedy
5-= Very fast acts in Just appeared fever
6- acts fast in Phlegm-cough-Fever conditions
7- Useful in Pneumonia and Pneumonia like syndromes
8- Influenza of any origin and anywhere
9- Useful in small pox and measles and like syndromes

Doses; One /two tablets should be taken four hourly with tea or warm water or Ginger Tulasi tea

Ayurveda have many remedies for winter ailing conditions, TRIBHUVAN KIRTI RAS is one of them. Those who desire they should use this safe remedy.

EPILEPSY : FITS : totally CURABLE by AYURVEDA Remedies based on the findings of ETG AyurvedaScan Report

The only and existing commercially available facility for scanning and examining whole body according to the principals of AYURVEDA, a well known SCANNING system called ETG AyurvedaScan, have great priveledge to cure the hazarduous disease condition EPILEPSY or FITS, in accordance based on the findings and report of EPILEPSY or CONVULSIVE FITS patient , is able to provide total cure and root out the condition and patient problem in toto.

EPILEPSY and FITS conditions are seems that they are incurable and when once start medications , the medications should be taken whole life, as it is understood today by the Modern Western medicine takers. In fact , it is a mockery among the physicians that they are not well aware of the other systems of practicing medicine, which have a plentiful solutions of these ? incurable problems and that is to be understood the incurable conditions.

The basic problem with the EPILEPSY patient , is related with the Temporal region and parietal region of the Brain parts physiology, sometimes FRONTAL Lobe of Brain could be involved in the production of convulsions. Tremors and twitching of muscles. The excited stages of these Brain  regions  produces convulsions. The reason of excitation of nerve cells of Brain or the areas mentioned , are not well established, but it is presumed that certain factors are responsible for producing the brain anomalies.

Some facts  came in our observation that  over reading, over studying, over mental work, irregular life style, watching in night, irregular sleeps, menstrual anomalies, uterus excitation, hormonal problems , suppressive anomalies, use of  Anti-biotics, anti-allergic drugs , narcotic drugs habits etc etc causes the EPILEPSY or FITS problems.

In Allopathic system of medicine hypnotic and tranquilizers and  anti-convulsive drugs are used to control the EPILEPSY episodes for regular use till life time. Some times after use of these medicine convulsions appears and not controlled by the proper settled doses earlier, then much stronger medications are used to control. The series is going on till the spawn of life.

Ayurveda’s New revolutionary technology “ETG AyurvedaScan” have privilege to treat EPILEPSY by root. A 100 page reports provides the detailed examination data  of the patient, which clues the path of the triggering convulsive effects through systems of body either mental to physical or physical to mental, that causes the exciting of brain faculties earlier mentioned.

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RTI2005-ETGAS

RTI2005-ETGAS-2

मानसिक रोगी का ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन का ट्रेस रिकार्ड ; Psychosomatic Disorders of a patient , studies of ETG AyurvedaScan Traces

लगभग ३०० किलोमीटर दूर से आये एक पुरूष रोगी का नीचे दिया गया ट्रेस रिकार्ड है, जो दिनान्क १८ अक्टूबर २०११ को अन्कित किया गया / मरीज ने अनुरोध किया कि उसे अपने घर वापस जाने के लिये कानपुर सेन्ट्रल स्टेशन से चार पान्च घन्टे बाद रेल गाड़ी मिलेगी , इसलिये वह चाहता है कि उसकी रिपोर्ट बनाकर दवा आदि की जैसी व्यवस्था हो सके , सीमित समय के अन्दर करके दे तो बहुत अच्छा होगा, ताकि वह वापसी की गाड़ी पकड़ कर अपने घर वापस जा सके /
मैने उसका अनुरोध मान लिया और कहा कि अर्जेन्ट रिपोर्ट बनवाने में उसे रूपये ४०० अतिरिक्त और अधिक लग जायेन्गे और लगभग तीन घन्टे के अन्दर रिपोर्ट मिल जायेगी /

मैने रोगी की यह बात सुनकर कहा कि पहले आप अपना तुरन्त ETG AyurvedaScan करायें और फिर बाद में जब रिपोर्ट बन जायेगी तब देखून्गा कि क्या क्या आपके शरीर के अन्दर बीमारियां निकली हैं / मैने इस रोगी का पहले ई०टी०जी० रिकार्ड किया फिर उसके बाद जितनी जल्दी हो सका step by step सारे procedure निपटा करके लगभग ३ घन्टे बाद उसकी रिपोर्ट बन पायी /

इस व्यक्ति के निम्न रोगों का निदान ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन के अध्ध्यन के पश्चात निर्धारित हुआ/

१- रोगी को लेटने [on lying position] की स्तिथि में High Blood Pressure की tendency है जिसके कारण उसे रात में नीन्द न आने की तकलीफ है /
२- रोगी का रक्त का प्रवाह सिर की ओर अधिक है , ऐसा ट्रेस रिकार्ड ‘ई’ मे देखने में आया है / जब भी इस तरह की पाजिटिव ट्रेसेस होती है , यह मानसिक रोग यानी psychological disorders दर्शाती हैं /
३- ३- ‘ई’, ‘एफ’, ‘जी’ ट्रेसेस रिकार्ड देखने में पाजिटिव और निगेटिव डिफ्लेक्सन एक जैसे नेचर के हैं / ‘जी’ ट्रेस के ट्रेस अन्र्तराल को देखने से पता चलता है कि इस व्यक्ति को “डायबिटीज” की बीमारी है / लगभग २८० पीका की नाप से यह स्थापित हुआ कि, जिस समय इस व्यक्ति का ट्रेस रिकार्ड किया गया था, उस समय इस व्यक्ति के रक्त में रक्त शर्करा को इसी सीमा में उपास्तिथि होना चाहिये / इसी समय तुरन्त ही Glucometer से जान्च करने में पता चला कि व्यक्ति की रक्त शर्करा Blood sugar level 268 mg per dilution उपस्तिथि है /

४- इसे हाई ब्लड प्रेशर की तकलीफ है, ट्रेस ‘a’ को देखने से पता चला कि रोगी को ब्लड प्रेशर की बीमारी है /

इसे अन्य बीमारियां भी निकली, जो उसकी रिपोर्ट बनने के बाद बतायी गयी /

रोगी ने बाद मे सारी बात बतायी कि उसकी पत्नी पागल है और उसका पारिवारिक जीवन सुखी नहीं है / उसे खाना भी हॊटलों में जाकर खाना पड़ता है /

मैने उसे प्रेस्क्रिप्सन लिख कर आयुर्वेदिक दवाये खाने के लिये कहा और उससे कहा कि उसे शारीरिक बीमारी कम है और मानसिक अधिक / इसलिये मानसिक दबाव जितना ही कम से कम होगा , उसकी तकलीफ उतनी ही तेजी से ठीक होगी /

Similarly another one case of Psychosomatic disorders case came for the treatment on 18th October 2011. His ETG AyurvedaScan Trace rcords are  having  similar pattern as to earlier. Although he have some other PSYCHOLOGICAL PROBLEMS , which tends him sick, below is his trace records  to evaluate in view of AYURVEDIC TREATMENT.

ETG AyurvedaScan , which examines the whole body for purpose of AYURVEDIC TREATMENT and management , have major diagnostic value for physical ailments detection.

दान्तों तथा मसूढों और मुख के अन्दर के तमाम विकारों के लिये आयुर्वेद का दन्त मन्जन ; Ayurvedic Tooth Powder for Dental and Oral Problems

आयुर्वेद पूर्ण चिकित्सा विग्यान है / आदि काल से हमारे चिकित्सा पूर्वजों ने समाज को स्वस्थय बनाये रखने के लिये बहुत से नुस्खे लिपिबध्ध करके दिये है , जो आज भी उसी तरह से कारगर और प्रभावशाली है, जैसे उस समय थे /

दान्तों के रोगों के उपचार के लिये आयुर्वेद के शास्त्रीय ग्रन्थों में प्राय:
सभी आचार्यों ने जितना भी अनुभव और ग्यान प्राप्त किया था , उसका वर्णन बहुत सूच्छमता के साथ किया है /

चिकित्सा चन्द्रोदय़ चिकित्सा ग्रन्थ में दान्त के रोगों के लिये एक नुस्खा दिया गया गया है, जो दान्त की बहुत सी बीमारियों में बहुत प्रभाव शाली साबित हुआ है / यह बहुत सरल और सफल योग है /

योग मे निम्न काष्ठौशधियों का मिश्रण है /

मिश्रन; हरड़, बहेडा, आमला, सोन्ठ, काली मिर्च, छोटी पीपल, शोधित तुथ्थ, सेन्धा नमक, रूचक नमक, विड नमक, पतन्ग, माजूफल , ये सब द्रव्य बराबर बराबर मात्रा मे लेना चाहिये / इन सभी द्रव्यों को महीन कूट पीसकर पाउडर जैसा बना लेना चाहिये और बाद में मैदा छानने वाली चलनी से छान लेना चाहिये और किसी एयर टाइट डिब्बे में बन्द करके रख लेना चाहिए /

उपयोग के लिये किसी छोटे प्लास्टिक के डिब्बे या कान्च की शीशी में इस चूरन को रख लेना चाहिये /

एक ग्राम चुर्ण को लेकर दान्तों में मलना चाहिये / जो ब्रश से इस मन्जन को लेकर उपयोग करना चाहे वे ब्रश के साथ इसे दान्तों में मल सकते है / जिन्हें दान्तों मे दर्द हो, मसूढों मे दर्द हो, जिनके दान्त सेन्सिटिव हो गये हों, ठन्डा या गरम पानी लगता हो, या हवा या छूने से दर्द होता हो या दान्तों की अन्य कोई तकलीफ हो , उन सबमे यह दन्त मन्जन असर करक है /

मन्जन करते समय यदि इसमें एक बून्द “नीम का तेल” मिला लें और फिर मन्जन करें तो मुख रोग के लिये यह एक उत्कृष्ठ औषधि हो जाती है /

जिनके दान्त कमजोर हो गये हैं , मसूढॊ के विकर हों, पायरिया से पीडित हों , दान्त हिलने लगे हों और जड़ से कमजोर हो रहे हों, उनको यह मन्जन अवश्य उपयोग में लेना चाहिये /

नीम के तेल को इस मन्जन में मिला लेने से यह मन्जन दान्तों के सभी प्रकार के infection को दूर कर देता है, दान्तों में लगे हुये कीड़ों को यह नष्ट कर देता है /

इस मन्जन को ब्रश से न लगाकर यदि उन्गलियों से मन्जन करते है तो अधिक फायदा करता है और शीघ्र लाभकारी है /

सफेद दाग बढने और न ठीक होने का कारण ; जीवन शैली में बदलाव , प्रतिकूल खान-पान और कुछ Allopathic दवायें ; LEUCODERMA & Life-style and some Remedies

बहुत से आयुर्वेदिक वैद्य और आयुर्वेदिक चिकित्सक अक्सर पूछते रहते हैं कि सफ़ेद दाग Leucoderma के रोगियों का रोग अचानक ही बहुत तेजी से बढने लगता है , जबकि वे दवा दे रहे होते है और अच्छे से अच्छा इलाज कर रहे होते हैं , उनके रोगी ठीक भी हो रहे होते है फिर ऐसा क्यॊं होता है कि सफेद दाग ठीक होने के बजाय बढते चले जाते है? इस तरह की रोग-बढने से रोकने के सारे उपाय कम नहीं होते, जिससे मरीज और चिकित्सक दोनो के सामने बहुत विचित्र स्तिथि पैदा हो जाती है ?

यद्यपि यह स्तिथि मेरे सामने पिछले २० सालों से कभी नहीं आयी / मैने इस सवाल पर और ऐसी स्तिथि के लिये जिम्मेदार कारणो का पता करने का प्रयास किया है /

पहला कारण मेरी समझ में यह आया है कि लियूकोडर्मा के मरीज स्वस्थय वृत्त के नियमों का पालन नहीं करते है, जिससे उनको पाचन सन्स्थान से सम्बन्धित कार्य- विकृति बनी रहती है / ऐसे रोगी अपचन, एसीडिटी, Irritable Bowel syndromes, Inflammatroy condition of bowels, constipation, irregular bowels आदि आदि से ग्रसित होते हैं / Digestive system से सम्बन्धित यह तकलीफें दूषित खान पान से पैदा होती हैं / कुछ खाद्य पदार्थ ऐसे है जो सफेद दाग बढाने में सबसे आगे है / जैसे चाऊमिन, सिरका या Vinegar या सिरका युक्त खाद्य पदार्थ, non-veg foods, अत्यधिक मसाला और चर्बी युक्त खाद्य पदार्थ जैसे चाट, समोसा आदि आदि / इन और इन जैसे खाद्य पदार्थ खाने से सफेद दाग बढते है / ऐसे खाद्य पदार्थ Digestive system के लिये बहुत सेन्सिटिव होते है और यह एक तरह से sudden painless allergical reaction like action पैदा करते है जिससे त्वचा की melenine अचानक घटकर सफेद दाग को और अधिक बढाने का काम करती है /

बहुत से रोगियों के रोग-इतिहास chronological case-history को देखने और समझने के बाद यह बात दृस्टिगत हुयी हैं कि जीवन शैली के कारण और दूषित खानपान के कारण सफ़ेत दाग अधिक तेजी से विकसित हुये और उनके रोकने के सभी प्रयास फ़ेल हो गये / किसी किसी रोगी ने बताया कि उनके सफ़ेद दाग हर मिनट में बढते चले गये / किसी ने बताया कि उनके सफ़ेद दाग एक दो दिन में ही इतने बढ गये जो उनकी उम्मीद से परे थे / ऐसा तभी होता है जब शरीर का सिस्टम बहुत सम्वेदन शील हो जाये और अक तरफा कार्य करने लगे /

कई रोगियों के रोग इतिहास को देखने के बाद यह बात भी पता चली कि एलोपैथिक चिकित्सा विग्यान की कुछ दवायें सेवन करने के बाद शरीर में कुछ ऐसे परिवर्तन हुये , जिनके कारण सफ़ेत दाग अधिक तेजी से विकसित हुये और दागो को बढने से रोकने के सभी प्रयास फ़ेल हो गये /

इसी कारण से रोगियों कॊ हिदायत दी जाती है कि उन्हे चाहे कैसे भी acute problem हों या sudden ailments हो जायें , वे एलोपैथी की कुछ दवायें न लें तो बेहतर होगा / देखा गया है कि एलोपैथी की दवा खाने के बाद सफेद दाग किसी किसी रोगी के बहुत बढ जाते हैं फिर किसी तरह से ठीक नहीं होते है या ठीक होने में बहुत ज्यादा समय लग जाता है / इसलिये यदि तकलीफ हो तो फिर आयुर्वेदिक दवायें लें या प्राकृतिक उपचार लेना चाहिये /

Leucoderma के इलाज में बहुत सावधानी बरतनी होती है, यह बहुत sensitive disease condition है, इसलिये पथ्य परहेज , जीवन शैली में बदलाव, खान पान में परहेज और दूसरी हिदायतो को यदि follow किया जाये तो आरोग्य शीघ्र प्राप्त होता है /

हृदय रोगों के मरीजों के लिये एक आयुर्वेद तथा दूसरा होम्योपैथी का दिल को मजबूत करने वाला टानिक

दिल की बीमारी के मरीज बनना अच्छी बात नहीं है / आदि काल से हृदय रोग होते रहे है, आज के महौल में हो रहे है और आगे भी होते रहेन्गे / यह सिल्सिला चलता रहेगा /

मानसिक तनाव इस बीमारी का एक कारण सभी चिकित्सक बताते है / “तनाव” तो हमेशा और हर युग और हर समय में रहा है / ऐसा कौन सा समय सुरक्षित कहा जा सकता है जब मनुष्य के व्यक्तिगत जीवन और सामाजिक परिवेश में तनाव न रहा हो / चाहे वह राजा महाराजाओं का समय रहा हो या कोई अन्य समह और काल / मानसिक तनाव के बहुत से कारण होते है / किसी एक कारण को फिक्स नहीं किया जा सकता कि तनाव का यही एक मुख्य कारण है /

यह कहा जाता है कि जीवन शैली के बदलाव के कारण ह्रूदय रोग पनपते है, यह आज की बात नहीं है / प्राचीन काल में राज दरबारों में, धनी मानी लोगों के यहां, वैवाहिक तथा अन्य समारोहों में शाम को सजी हुयी महफिलें देर रात तक चलती रहती थीं और उसी अनुसार लोगों की दिन चर्या होती थी / यही सिलसिला आज भी जस का तस चल रहा है लेकिन उनका स्वरूप बदल गया है /

Cut section of HEART with their identity

Cut section of HEART with their identity

यह सही है कि हृदय रोगों के निदान ग्यान में Diagnosis के लिये आज हमारे पास् बहुत से मशीनी साधन उपलब्ध है जो पहले नहीं थे / लेकिन इतना सब होते हुये हृदय रोग जस के तस है बल्कि उनकी सन्ख्या बढती चली जा रही है / यह विचारणीय विषय है कि इसका क्या कारण हो सकता है ?

अधिकतर हृदय रोग उन लोगों को होने की सम्भावना रहती है, जिनके परिवार में पिता को यह रोग होता है / यह genetic tendency होती है, इसलिये heart disorders होने की सम्भावना सबसे अधिक इसी group को होती है / लेकिन इसमें अपवाद है, ऐसा सभी के साथ नही होता, अगर mother side से arthritis या skin disorders जैसी कोई metabolic disorders की problem हो जाये तो फिर ह्रूदय रोग की सम्भावना जब तक अनुकूल परिस्तिथियां न बने तब तक नहीं होता है /

एक और कारण हृदय रोग का है जिसे high blood pressure अथवा low blood pressure कहते हैं / अकेले ब्लड प्रेशर की तकलीफ हो तो यह warning signal समझना चाहिये , लेकिन यदि यह Diabeties के साथ हो जाय तो और भी खतरनाक है / डायबेटीज से ब्लड प्रेसर control करने में दिक्कत आती है / हलान्कि यह भी जरूरी नहीं कि जिसे Blood pressure हो उसे डायबेटीज जरूर होगी या जिसे डायबेटीज हो उसे ब्लड प्रेसर जरूर होगा / ऐसा होता नही है और जहां तक मेरा अनुभव है कि यह ratio केवल 40 प्रतिशत [अनुमानित] रोगियों में देखने में आता है / इसलिये ऐसे रोगियों को हृदय रोग से बचने के लिये विशेष ध्यान देना चाहिये /

आयुर्वेद मे बहुत सी औषधियां हृदय रोग के उपचार के लिये उपस्तिथि हैं उनका उप्योग किसी सिद्ध हस्त वैद्य की देख रेख में करना चाहिये / आयुर्वेद में “अर्जुन” की छाल [Latin; Terminalia Arjuna] का गोदुग्ध-नीर मिश्रित क्षीर-पाक तथा अन्य औषधीय द्रव्यों के साथ मिलित क्वाथ अथवा काढा सेवन करने से हृदय रोग की सम्भावना से बचत होती है /

इसी प्रकार होम्योपैथी की दवा Crateagus Oxycantha Q के सेवन से हृदय रोग में आश्चर्य जनक फायदा होता है / यह हृदय के लिये टानिक का कार्य करती है /

जिन्हे हृदय रोग हो वे इसे अन्य दवाओं के साथ [ as a supplementary remedy ] ले सकते है / यह safe बनौषधियां है और इनका कोई side effect नही होता है /

अच्छा होगा ऊपर बताई गयी दवा सेवन करने से पहले अपने नजदीक के किसी आयुर्वेदिक या होम्योपैथिक चिकित्सक से इन औषधियों के बारे मे अधिक जानकारी प्राप्त कर लें /

रीढ की हड्डी के दो हिस्सों का दर्द ; एक सर्वाइकल तथा दूसरा लम्बर यानी पहला गर्दन और दूसरा कमर का पीडादायक मर्ज ; Painful condition of SPINAL PROBLEMS

मानव शरीर में रीढ की हड्डी का बहुत महत्व है / वैसे तो सभी अन्गों का अपनी अपनी जगह बहुत महत्व है और मानव शरीर के सभी अन्ग एक दुसरे से जुड़े होने के कारण स्वाभविक है कि ये एक दूसरे को सपोर्ट करते है और इसी वजह से सभी जिन्दा हैं /

रीढ की हड्डी भी पान्च हिस्सों मे बान्टी गयी है / जिसमें पहला हिस्सा सर्वाइकल है जिसमें सात वरटेब्रा vertebra होते है / पहला वर्टेब्रा एटलस कहलाता है जिसके ऊपर खोपड़ी रखी हुयी होती है / सातवां वरटेब्रा महत्व्पूर्ण इसलिये होता है क्यों कि यह पहले थोरसिक या डारसल वरटेब्रा के ऊपर आकर स्थान पाता है जहां शरीर की पहली पसली और गरदन तथा कन्धे की हड्डियों को यथा स्थान देता है ताकि शरीर के महत्व पूर्ण अन्ग सुरक्शित रहें , यह सब कुदरती व्यवस्था है /गर्दन तथा मनव मस्तिष्क के साथ साथ खोपड़ी का भार इसी junckcher पर सबसे अधिक पड़ता है / बारह पसलियों की वजह से तथा मान्स्पेशियों के सपोर्ट से मानव धड़ human torso गर्दन और खोपड़ी को सम्भाले रखता है /

रीढ का Lumber region इसके नीचे से शुरू होता है / इसमें पान्च वरटेब्रा होते है / आखिरी का पान्चवां वरटेब्रा सैक्रल वेर्टेब्रा के पहले वेर्टेब्रा के ऊपर होता है /

कुदरत ने सर्वाइकल, थोरेसिक और लम्बर वेरटेब्रा को अलग अलग करके उपस्तिथि किया है लेकिन सैक्रल और काक्सीजियल वेरेतेब्रा को आपस में fuse करके उपस्तिथि किया है / इन fused vetebra से कमर की हड्डी और फिर दोनों पैरों की हड्डियां मिलती हैं /

शरीर का सारा भार सैक्रल वेरेटेब्रा के ऊपर आता है / धरती की Gravitational force के कारण शरीर जब vertical position में होता है तो शरीर के कुल अन्गों का यह भार कमर में ही पड़्ता है /

जब दोनों हाथों से काम लेते है तो शरीर का सर्वाइकल वाला हिस्सा अधिक activate होने के कारण मान्स्पेशियों के साथ तनता है / गर्दन का दर्द इसी तनाव के कारण होता है / ऐसा अकेला नही होता है, गर्दन के Ligaments, tendons तथा दूसरे articulations सब साथ साथ affected होते हैं / इसी कारण से गरदन का दर्द पैदा होता है / हलाकि यह प्रारम्भिक कारण है जो नई उम्र के लोगों में देखने में बहुत आता है / अधिक उम्र के लोगों में दर्द होने कई और दूसरे कारण होते हैं /

मोटर साइकिल चलाने, बहुत देर तक कम्प्य़ूटर पर काम करने , अधिक देर तक बिना गरदन हिलाये एक्ल दिशा में काम करने से गर्दन का दर्द बहुत होता है /

कमर के दर्द के कई कारण हैं / यदि पुरुषों में कमर का दर्द है तो ऐसा दर्द भारी वजन उठाने, मोटर साइकिल चलाने, कार ड्राइव करने, बोझा उठाने, कमर के बल गिरने या चोट खाने के कारं होता है/ ज्यादा उमर वालों को हड्डियों के आकार में परिवर्तन या मन्स्पेशियों इत्यादि के कड़े हो जाने या नरम हो जाने के कारण कमर का दर्द होता है /

स्त्रियों में गर्भाशय की बीमारियों, पेल्विक इन्फ्लेमेटरी डिसार्डर्स आदि के कारण कमर का दर्द हो सकता है /

कमर के दर्द का कारण पता करने से ही इसका जड़ मूल से उपचार सम्भव है / पेन किलर खाने से ततकाल आराम मिल जाता है , जिससे रोगी यह समझता है कि उसकी तकलीफ ठीक हो गयी है और मरीज उसी धुन में अधिक काम करने लगता है , जिसका नतीजा यह होता है कि उसकी दर्द की जगह की टूट फूट और अधिक हो जाती है और दर्द के स्थान के टीश्यूज टूट करके inflammatory condition पैदा करते है / यह स्तिथि बहुत खतरनाक होती है / अगर इसी स्तिथि को ठीक नहीं किया गया तो कु हफ्तों में चलना फिरना तक बन्द हो सकता है /

इलाज से बीमारी की यह स्तिथि ठीक हो सकती है / विश्राम करने, कम चलने, उपयुक्त दवा खाने से रोगी ठीक होते है /

य़दि एलोपैथी की चिकित्सा कराना चाहते हैं तो अपने नजदीक के Orthopeadic Surgeon से सलाह लेकर रोग-निदान के लिये एक्स-रे, एम०आर०आई०, सी०टी० स्कैन, रक्त परीक्षण आदि करा लेना चाहिये , ताकि बीमारी का निदान किया जा सके और तदनुकूल चिकित्सा व्यवस्था की जा सके /

यदि आयुर्वेदिक इलाज कराना चाहते है तो ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन परीक्षण सबसे श्रेष्ठ है / ETG AyurvedaScan Findings पर आधारित इलाज हमेशा फलदायी होते हैं /

यदि होम्योपैथी का इलाज कराना चाहते है तो ई०एच०जी० होम्योपैथीस्कैन E.H.G.HomoeopathyScan कराना चाहिये और फिर इसकी फाइन्डिन्ग्स पर आधारित दवायें repertorise करके सेवन करने से अवश्य लाभ होता है /

य़ुनानी चिकित्सा में भी बहुत सटीक इलाज इस बीमारी का है, लेकिन किसी सिध्ध हस्त हकीम से परामर्श करना चाहिये /

य़ोग और प्राकृतिक चिकित्सा, मैगनेट थेरेपी, आकूपन्कचर, फीजियोथेरापी और जीवन शैली के बदलाव, खान-पान में परहेज इत्यादि के सम्मिलित प्रयोग से रीढ की हड्डियों के रोगों को दूर किया जा सकता है /

A FEMALE case of HYPER-THYROIDISM with other gyneacological disorders एक महिला रोगी की हाइपेर-थायरायड के साथ साथ अन्य गायनोकोलाजिकल बीमारी की समस्या


यह केस एक ३५ साल की महिला का है , जिसको Hyper Thyroidism की शिकायत कई साल से थी / मरीजा ने दिनान्क २६.०६.२०१० को परामर्श किया था /

महिला को निम्न शिकायते थी, जिनके लिये वह परामर्श के लिये आयी थी /

१- अनियमित मासिक धर्म
२- मासिक होने से १० दिन पहले से मानसिक तनाव , अत्यधिक गुस्सा, झगड़ालू प्रवृति
३- मासिक के समय अत्यधिक रक्त श्राव, जिसके कारण रोगिणी बहुत कमजोर हो जाती थी
४- रोगिणी के स्तनॊं में सूजन और गान्ठे पड़ जाती है
५- पेट में सूजन

रोगिणी एलोपैथी का बहुत इलाज करा चुकी थी, उसको एलोपैथी के इलाज से कोई आराम नही मिला / मैने उसको सलाह दी कि अगर वह आयुर्वेदिक इलाज कराना चाहिती है तो वह एक ई०टी० जी० आयुर्वेदस्कैन का परीक्षण करा ले तो उसके सारे शरीर की बीमारियों के बारे मे पता चल जायेगा / दूसरा ऐसा कोई सरल तरीका नहीं है, जिससे उसकी बीमारी के बारे मे पता लगाया जा सके /

रोगिणी ने अपना ई०टी०जी० परीक्षण कराया, जिसकी फाइन्डिन्ग्स निम्न प्रकार से थी /

[अ] त्रिदोष;

कफ १३७.५२
पित्त ६८.७६
वात ५८.१५

[ब] सप्त धातु ;

मान्स १०२.०३
मेद ८१.००

[स] शरीर मे व्याप्त तकलीफॊं का अन्कलन

Mammery Glands 134.00
Lumber spine 122.22
Urinary Bladder 112.50
Mental/emotional/intellect 110.00
Sinusitis 110.00
Thyroid Pathophysiology 106.67
Uterus anomalies 88.50
Pelvic inflammatory disease 88.50
Renal anomalies 80.00
Menstrual anomalies 46.67

[द] रोग निदान ;

Bowel’s pathophysiology
Cervical spondylitis with Lymphadenitis
Epigastritis
Hormonal anomaly
Inflammatory and irritable bowel syndromes
Large intestines anomalies
Lumber pain
Mammary glands anomalies
Nervous temperaments
Tachycardia

इस रोगुणी को बताया गया कि उसे उक्त बीमारियां है / यह देखकर वह घबरा गयी कि इतनी बीमारियां एक साथ हो गयीं है / मैने उसको बताया कि ई०टी०जी० सिस्टम चूंकि सारे शरीर का स्कैन करता है इसलिये जो भी बीमारी या कार्य विकृति होती वह यह सब बता देता है / आयुर्वेद में सम्पूर्ण शरीर की चिकित्सा करने का विधान है, इसलिये जो भी फाइन्डिन्ग्स है उन सबका इलाज एक साथ होगा और आपको सारी तकलीफॊं में एक साथ आराम मिलेगा /

यह सुनकर मरीजा आश्वस्त हो गयी और उसको निम्न चिकित्सा व्यवस्था दी गयी /

अ- कान्चनार गुग्गुल १ गोली ; गले की गान्ठ के लिये
रज: प्रवर्तिनी वटी १ गोली ; मासिक धर्म की अनियमितता के लिये
ब्राम्ही वटी १ गोली ; नरवस्नेस और धड़कन के लिये
पुष्य्यानुग चूर्ण २ ग्राम के साथ दिन में दो बार सादे पानी से

ब- दश्मूलारिष्ट १० मिलीलीटर
कुमारीआसव १० मिलीलीटर
भोजन करने के बाद दोनों समय

मरीजा को १२० दिन दवा सेवन करायी गयी / दवा सेवनोपरान्त वह पूर्ण स्वस्थय है और उसे मासिक सम्बन्धी कोई तकलीफ नहीं है / उसकी थायरायड भी अब सामान्य कार्य कर रही है /

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