आयुर्वेद: आयुर्विग्यान:आयुर्वेदास्कैन:ई०टी०जी०:आयुषमन::AYUSH Therapies

पुराना जुखाम अथवा Chronic Coryza

Posted by: prakruti on: अप्रैल 23, 2012

नाक की होने वाली यह बहुत प्रसिद्द तकलीफ है / अक्सर जुखाम सभी प्राणियों के होते हैं, ऐसा कोई भी नही है जिसे जुखाम न होता हो / यह बहुत कामन तकलीफ है / आम्तौर पर जुखाम बिना दवा और केवल मात्र परहेज करने से ही ठीक हो जाते हैं और एक दिन से लेकर एक सप्ताह मे ज्यादा से इयादा समय लगता है इसे पूर्ण आरोग्य प्राप्त करने में / लेकिन जब जुखाम बार बार हो और जरा सी भ सर्दी या गरमी या मौसम के बदलाव से जुखाम होने लगे, दवा करते करते कई सपताह लग जायें और एक जुखाम ठीक न हो और उसी बीच में दूसर जुखाम पैदा हो जाये तो इसे बीमारी मानकर निदान करते  है /

बार बार जुखाम होना या एक जुखाम का होना न ठीक हो पाये और इसी बीच में दूसरा जुखाम हो जाये , दूसरा जुखाम भी इलाज करने के बाद जैसे ही ठीक होने की कगार पर आये कि तीसरा जुखाम का दौरा पड़ जाये और यह सिल्सिला चालू रहे तो इसे गम्भीर बीमारीसमझ कर इलाज करना जरूरी हो जाता है /

साल मे मौसम बदलने पर यदि जुखाम ओ तीन बार हो जाये तो इसे सामान्य स्वास्थ्य परिवर्ध्न की प्रक्रिया समझना चाहिए / लेकिन जब यह उग्र रूप ले , बार बार हो तो इसे बीमारी समझना चाहिये  और इसका इलाज बीमारी समझ कर करना चाहिये /

जुखाम सर्दि और गर्नी की प्रतिक्रिया स्वरूक हो जाते है , जैसे अचानक मौसम में परिवरतन, ठ्न्दे स्थान से एक्दम से गरम स्थान पर आ जाना आदि, समय कुसमय ठन्दे पानी से स्नान या नदी मे स्नान करना आदि , यह सबसे बडा कारण होता है /

बहुत पुराना जुखाम इन्फेक्श्न होने से या इन्फ़ेक्सन होने के असर से होता है / इसमे सबसे पहले koch’s infection या tubercular infection हो सकता है / कभी कभी गले के sterptococci या staphilococci के कारण भी हो सकता है / जब तक यह इन्फ़ेक्सन कम नही होता या जाता नही है, तब तक जुखाम ठीक नही होता और बाद मे यह पीनस और ज्यादा जटिल बीमारियों मे तब्दील हो जाता है /

ऐसे जुखाम दूसरी अन्य बीमारियां पैदा कर देते है / जिनमें टोन्सिल्लितिस, यूवेलाइटिस, tracheal, laryngeal, pharyngeal, respiratory tract inflammation और pulmonaru organs related ्बीमारियां शामिल हैं / जल्दी ही इलाज नही क्या गया तो गम्भीर न्बीमारियों की चपेट में आ सकते हैं /

पुराने जुखाम का इलाज अगर बहुत emergent condition है या बहुत complicated स्तिथि है तो कुछ दिन के लिये allopathic medicines  का कोर्स कर लेना चाहिये  जब स्तिथि सामन्य हो जाये तो फिर आयुर्वेद या होम्योपैथी या प्राकृतिक चिकित्सा या यूनानी का इलाज करना चाहिये, इससे जुखाम की तकलीफ धीरे धीरे सामान्य हो जाती है//

आयुर्वेद मे प्रकृति और दोष निर्धारण करके औषधियों का चुनाव करते हैं , जिसके लिये किसी वैद्य या आयुर्वेद चिकित्सक की सहायता लेना चाहिये / लेकिन कुछ सामन्य औषधियां है, जिन्हे सभी लोग उपयोग कर सकते हैं /

१- चित्रक हरीतकी

२- लक्षमी विलास रस नार्दीय

३- वासावल

४- अगस्त्य हरीतकी

५-स्तोपलादि चूर्ण

६- अभ्रक भस्म

सामय तौर पर उपरोक्त औषधियों का एकल प्रयोग या सामिलित प्रयोग रोग की अवस्था के अनुसार किया जाता है / इसे सुबह शाम शहद या सादे पानी या अन्य रोगोचित अनुपान के साथ सेवन कराते है /

आयुर्वेद की चिकित्सा से शत प्रतिशत पुराने और बिगड़े हुये जुखाम ठीक हो जाते हैं / अगर ETGAyurvedaScan का परीक्षण कराकर इलाज करायें तो शीघ्र आरोग्य प्राप्ति के लिये और बेहतर रिजल्ट मिलते हैं /

/

 

खान्सी यानी cough  yaa bronchitis ,  बहुत तकलीफ देने वाली बीमारी है / जब जुखाम या सर्दि लग जाती है या ठन्डा गरम मौसम में अचानक बदलाव आ जाय तो इसके impact  के कारण खान्सी की दिक्कत हो जाती है / लेकिन इसका मुख्य pathophysiological  कारण यह है कि नाक की श्लैष्मिक कला से लेकर लैरिन्ग्स और  फैरिन्ग्स , ट्रैकिया आदि बनावटे कि mucous surface और mucous secretion  करने वाली  glands  मे किसी कारण से inflammation पैदा हो जाता है या यह स्थान सेन्सिटिव हो जाते हैं तो इसके रियक्शन में खान्सी पैदा हो जाती है / क्योन्कि इस हिस्सों की म्यूकस बाहर निकालने के लिये इस स्थान की मान्स्पेशियां आटो नामिक नर्वस सिस्टम की सहायता लेकर तेज झटका पैदा करती है जिससे प्रतिक्रिया स्वरूप कफ बाहर निकलता है और गले की नली साफ होकर सामन्य कार्य करने की अवस्था में आ जाती है /

सर्दी गर्मी से होने वाली खान्सी ज्यादा से ज्यादा १५ दिन में ठीक हो जाती है /  लेकिन कुछ खान्सी ऐसी होती है जो या तो किसी बीमारी के कारण पैदा हो जाती है, जैसे tubercular infection अथवा koch’ infection अथवा lIvar की किसी बीमारी से या कोई अन्य तकलीफ जैसे महिलाओं में यूटेरस की कोई बीमारी / गले में Vocal cord की कोई बीमारी  पैदा हो रही हो तो भी खान्सी आती है / पुराना जुखाम जब बस जाता है और जाने का नाम नही लेता तब बहुत तेज खान्सी आती है /

कई बार गले की टान्सिल बढ जाने से अथवा UVULA  अधिक लम्बा हो जाने से भी बहुत खान्सी आती है /

कई बार मरीजों की खान्सी का कोई कारण समझ में नही आया, ऐसे मरीज सभी परीक्शण करा चुके थे

/ सभी कुछ सामान्य निकला /

इसलिये खान्सी की चिकित्सा शुरू करने से  सबसे पहले “कारण का पता ” करना बहुत जरूरी है / जब कारण का पता चल जाय तब चिकित्सा करने से बहुत शीघ्र लाभ होता है /

आयुर्वेदमें खान्सी  bronchitis  के उपचार के लिये औषधियों का बहुत विशाल भन्दार है /

वासवलेह, चित्रक हरीतकी, कन्ट्कार्यावलेह, अस्त्य हरीतकी,  कास कुठार रस, रूदन्ती चूर्ण, अभ्रक भस्म आदि दवओं के उपयोग से चाहे जैसी खान्सी हो और किसी भी सीमा की हो, सभी ठीक होती है /

दुर्दम खान्सी और असाध्य खान्सी या वह खान्सी जो लाइलाज    समझ ली गयी हो, ऐसी खान्सी     का इलाज यदि ETG AyurvedaScan आधारित रिपोर्ट का साहार लेकर चिकित्सा ग्रहण करते हैं तो अवश्य लाभ होता है /

चक्कर आना या सिर घूमना या आन्खों के आगे गोल गोल घूमती हुयी दिखाई देने वाली स्तिथि को चक्कर आना या vertigo कहते है /

यह बहुत परेशान करने वाली और चिन्तित करने वाली और घबराहट पैदा करने वाली तकलीफ है / कब कहां चक्कर आ जाये सिर घूमने लगे यह किसी को भी पता नहीं होता /

आयुर्वेद में इसे “भ्रम” कहते हैं   /  अन्ग्रेजी में Vertigo /  Giddiness  कहते है /

इस बीमारी के कारणों में बहुत से फैक्टर हैं जिनमें सबसे पहला और आम तौर पर पाया जाने वाला कारण “सर्वाइकल स्पान्डिलाइटिस” का है / गर्दन की कशेरुपाओ अथवा cervicak vertebra  या cervical region  मे बनावट में कोई दिक्कत पैदा हो जाये जैसे वर्टिब्रा में ओस्टियोफाइटिक बदलाव आ जायें या वर्टेब्रा की बीच का गैप कम हो जाये और हद्दियां एक दूसरे से रगड़ने लगे या इन्हे जोड़नेवाली बनावटें यथा तेन्डन, लीगामेन्ट्स आदि कड़े पद जायेम अथवा गर्दन की कोई नस दब रही हो या सुजन आ गयी हो तो चक्कर आने लगते है /

एक दूसरा कारण यह भी है कि अगर खून की कमी होती है तो भी चक्कर आने लगते है लेकि यह हमेशा उठते बैठते होता है /

आन्खों के द्रष्टि दोष के करण भी चक्कर आते है / इसी तरह कान के अन्दर घाव होना ्कान बहना या नाक के अन्दर गोश्त का बढ जाना या जैसे सायनुसाइटिस हो जाय , के कारण भी चक्कर आने लगते है /

मस्तिष्कगत बहुत सी तकलीफे होती है उनके कारण भी चक्कर आने लगते है / हृदय के कई रोगों में भी चक्कर आने लगते है / अगर  मष्तिष्क मे रक्र या खून की मात्रा कम पहुचती तो भी चक्कर आने लगते है / गुर्दे की कुछ तकलीफों में चक्कर आने लगते है / अत्यधिक वीर्य्पात या हस्त्मैथुन करने या अत्यधिक सम्भोग करने से भी चक्कर आने लगते है / शराब का नशा, भान्ग का नशा, कई अन्य नशा करने या तम्बाकू का अधिक सेवन करने से भी चक्कर आते है / किसी कारण से खून की आक्सीजन कम होने लगे तो भी चक्कर आने लगते है /  ब्लड्प्रेशर कम हो जाये तो भी चक्कर आते है और ब्लड्प्रेशर ज्यादा हो जाये तो भी चक्कर आते है / नजर की गड़्बड़ी से भी चक्कर आते है हारमोनल प्रक्रिया मे कोई गद़्बड़ी हो ति उसके प्रभाव से भी चक्कर आ जाते है / रात मे जगने से भी चक्कर आ जाते है /

कहने का मतलब यह कि चक्कर आने का सबसे पहले कारण समझना होगा / जब तक कारण नहि समझेन्गे , तब तक चक्कर का कोई सटीक इलाज नही हो पायेगा , केवल लाक्षणिक इलाज करने से कोई आराम नहि होगा / इसलिये पहले कारण का निवारण करना बहुत जरूर है /

आयुर्वेद की जड़ी “जवासा” का काढा शहद मिलाकर दिन मे दो बार पीने से सभी प्रकार के चक्कर ठीक होते है / लेकिन मुकम्मल इलाज के लिये आयुर्वेदिक चिकित्सक की सलाह लेना चाहिये / चक्कर आना अपने आप मे ब्मारी नही मानी जाती यह किसी दूसरी बीमारी का expression  है , जिसे मूल रूप से उपचार करक ठीक करना चाहिये /

बीमारी के मूल कारण को दूर कर देने या मूल बीमारी का इलाज / उपचार  कर देने से  चक्कर आने की तकलीफ जड़ मूल से समाप्त हो जाती है /

अन्गरेजी मे Rapid Puls और Low Puls rate तथा  मेडिकल साइन्स में Tachycardia and Bradycardia जैसे शब्द नब्ज की गति को पहचानने के लिये उपयोग करते है /

लाखों की सन्ख्या में रिकार्ड किये गये ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन के परीक्षण करते समय यह आदत पड़ गयी है कि जैसे ही पहली ट्रेस रिकार्ड होती है , मरीज के बारे में काफी कुछ समझ में आ जाता है कि इसे क्या बीमारी है ? सबसे पहले आबजर्वेशन में यह बात आती है कि इसकी धड़कन प्रति मिनट कितनी है और इसकी रिदम कैसी है/ धड़कन के कम होने से यानी ६० धड़कन से कम बीट होने पर यह मान लिया जाता है कि इस व्यक्ति को ध्ड़कन कम होने की tendency  है अथवा ८५ से अधिक धड़्कन होने पर यह अन्दाजा लग जाता है कि इसे  धड़्कन अधिक होने की Tendency है /  इसके साथ रिदम यानी नाड़ी की चाल अगर घटती बढ़ती है तो इसका मतलब यह होता है कि इसे electrolytic imbalances  की प्रोब्लेम्स है /

आयुर्वेद की निदान ग्यान की इस मेकेनिकल तकनीक से इस पहली ट्रेस के रिकार्ड से ही प्रारम्भिक तौर पर मरीज के बारे मे बहुत कुछ पता चल जाता है , जैसे कि वात पित्त कफ की उपस्तिथि और शरीर में मौजूद intensity की सप्त धातुओं की स्तिथि और आयुर्वेद के मौलिक सिध्धन्तों से जुड़ी बहुत सी जानकारियां /

हलान्कि पूरे निदान ग्यान और इलाज के लिये ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन की पूरी रिपोर्ट बहुत जरूरी है, लेकिन emergent condition मे तुरत फुरत चिकित्सा व्यवस्था के लिये प्रारम्भिक इलाज और केस के मैनेज्मेन्ट के लिये पहली ट्रेस से ही इलाज कन्फर्म करके Ayurvedic Emergency Treatment with management की व्यवस्था शुरू कर सकते हैं /

कम धड़कन में और अधिक धड़कन में जवाहर मोहरा, याकूती और योगेन्द्र रस का उपयोग महत्व पूर्ण है, emergent condition में इसके एक या दो खुराक खिलाने से मरीज की स्तिथि सम्भल जाती है और सामान्य होने लगता है / साथ साथ यदि रिपोर्ट पर आधारित इलाज करते हैं तो शीघ्र लाभ होता है /

ऊपरोक्त बतायी गयी औषधियों में electrolytic imbalance को सुधारने के लिये बहुत कीमती दवाओं का उपयोग किया जाता है, जिससे सोडियम, पोटैसियम, कैल्सियम, आयरन, मैग्नेसियम, सेलेनियम, फास्फेट्स आदि की पूर्ति हो जाती है जिससे दिल की धड़कन कम या अधिक होने वाले फिजियोलाजिकल फेनामेनान को सामान्य स्तर पर ला देती है / इसी स्तर पर आकर मरीज अपने को स्वस्थय समझने लगता है और उसका Basic Metabolic rate भी सुधर जाता है /

मेरे पिता जी स्व० वैद्य शीतला सहांय बाजपेयी आयुर्वेद चिकित्सा के साथ साथ होम्योपैथी की भी चिकित्सा करते थे / आयुर्वेद उन्होने बनारस में रहकर पढा था और होम्योपैथी कलकत्ता में रहकर / बाद में वह बन्गाल मे ही “मैमन सिन्घ” शहर में बस गये और वहीं अपनी रोजी रोटी का जुगाड़ करते रहे / पद्मा नदी के एक छोर की तरफ “मैमन सिन्घ” शहर था तो दूसरी छोर की तरफ “कनाई घाट” बसा था / कुछ दिनों बाद पिता जी कनाई घाट मे आकर बस गये और यहीं पर जगह लेकर खेती बाड़ी कराने लगे, साथ साथ होम्योपैथी और आयुर्वेद की चिकित्सा भी करने लगे / मेरे सभी भाई और बहनों का जन्म यहीं हुआ / कालान्तर में जब पाकिस्तान बना तब कनाई घाट का यह इलाका पाकिस्तान चला गया / मेरे पिता जी सब कुछ छोड़्कर वापस कलकत्ता आ गये और कुछ समय वहां रहने के बाद मे अपने native place उन्नाव , उत्तर प्रदेश मे आ गये / जहां उन्होने दुबारा अपना चिकित्सा कार्य करना शुरू किया / कुछ साल बाद कानपुर आकर बस गये /

हम बचपन से उनको मरीज देखते चले आ रहे थे / वे मरीज का हाल सुनने के बाद कहते कि आपकी बीमारी का बढिया इलाज आयुर्वेद मे है या वे कहते कि आपकी बीमारी का इलाज होम्योपैथी में है / यह ५० का दशक का जमाना था / उन दिनों होम्योपैथी को बहुत कम लोग जानते और समझते थे /

मेरे पिता जी एक उक्ति होम्योपैथी की दवा के सेलेक्शन के बावत हमेशा कहा करते थे कि if you do not know, what is to give, give NUX VOMICA, यानी कि मरीज को देखकर या मरीज की तकलीफ को समझ्कर आपकी यानी चिकित्सक अथवा डाक्टर को समझ में यह नही आता कि इसे कौन सी दवा दी जाय , तो ऐसी परिस्तिथि में नक्स वोमिका का चुनाव करके ३० पोटेन्सी में दे देना चाहिये /

बड़े बड़े होम्योपैथी के चिकित्सकों का यह स्वीकार करना है कि Nux Vomica द्वारा सभी बीमारियों का उपचार किया जा सकता है / ऐसी कोई भी बीमारी हो जिसका कुछ सिर पैर समझ में ना आये तो नक्स वोमिका देना चाहिये / चाहे वह बुखार हो, चाहे वह डायरिया, चाहे वह आन्त या फेफ्ड़ों से सम्बन्धित या दिल या दिमाग से सम्बन्धित तकलीफ हो , नक्स वोमिका का उपयोग सभी स्तिथियों में कर सकते है /

आखिर यह है क्या चीज ? आपने आयुर्वेद्द में “भिलावा” यानी Poison Nut  का नाम सुना होगा / आज भी ग्रामीण क्षेत्र के कपडे धोने वाले धोबी यानी washer man  इसी भिलावा के जूस का उपयोग कपड़ॊ पर निशान या पहचान के लिये लगाते हैं / इसका लगाया निशान इतना पक्का होता है कि यह उबालने या किसी भी साबुन से धुलता नहीं और जैसे को तैसा बना रहता है / एक और खास बात यह है कि अगर इसका रस जो एक तैलीय पदार्थ जैसा होता है , कहीं शरीर की त्वचा में लग जाय तो यह वहां फफोले पैदा कर देता है / इसे उबालते समय अग्र इसकी भाप शरीर की त्वचा पर लग जाय तो वहां पर पानी भरे छाले पैदा हो जाते हैं /

Homoeopathic Materia Medica मे नक्स वोमिका के कई हजार लक्षण दिये गये हैं / इन लक्षणो को पढ़्कर ऐसा लगता है कि शायद ही शरीर का कोई हिस्सा बचा हो, जहां इसका असर न होता हो /

भागम भाग जिदगी को बिताने वाले लोग, दारू पीने वाले लोग, स्त्रियों के साथ रोजाना रात बिताने वाले लोग, खून खराबा करने मे विश्वास करने वाले लोग, अत्यधिक सम्भोग करने वाले लोग, जो खाम खाह बिला वजह जलते भुनते रहते है, अत्यधिक गुस्सा दिखाते है, बेईमानी, लुच्चे, दगाबज, लफन्गों, झूठे, फरेबी, चार सौ बीसिया और चटपटा मसालेदार भोजन करने वाले लोगों , अनियमित दिन्चर्या और रात्रि चर्या वाले लोग, रात में जगने वालों और दिन में सोने वालों को कोई भी बीमारी हो जाय, उसका कोई भी नाम हो, उनको Nux Vomica अमृत के समान हितकारी होती है /

ऐसे लोगों को Nux Vomica 200 potency की एक खुराक रोजाना शाम को या रात को सोने से पहले सेवन करना चाहिये / हलाकि इसके साथ बीमारी के हिसाब से परहेज करना भी जरूरी है /

 

टैग:

Epilepsy या अपस्मार के रोगियों की बीमारी हो जाने की कोई उम्र की सीमा नही होती / यह किसी भी उम्र के लोगों को हो सकती है / इस बीमारी के होने की वजह या कारण बहुत से होते हैं जिन्हे किसी सीमा मे नही बान्धा जा सकता है / ज्यादा उम्र के लोगों को अगर यह तकलीफ है तो उन्हे आटो नर्वस सिस्टम या दिमाग या रीढ की हड्डी से सम्बन्धित बीमारियों की वजह से ऐसे दौरे पड़ सकते हैं / बीच की उमर वालों को भी कमी वेशी मानसिक तनाव, अत्यधिक मानसिक श्रम, शराब का अधिक उपयोग, नशे का आदी होना और नशा न मिलने के कारण प्रतिक्रिया स्वरूप दौरा पड़ जाना आदि बहुत से कारण होते हैं /

उम्र के हिसाब से देखा गया है कि जिन छोटी आयु वाले बच्चों को यह बीमारी होती है , उनमे अधिकान्शत: कृमि रोग की बीमारी पायी जाती है / बड़ी उम्र के किशोरॊं में यह बीमारी उनको होती है जो या तो हस्त मैथुन करते हैं या जो अपने वीर्य को ब्रम्हचर्य द्वारा सुरक्षित नही रख पाते / यह उन किशोरों को भी होती है जिन्हे तम्बाकू खाने या कोई नशा करने की आदत पड़ जाती है / बहुत से किशोरों को रात में जागने या अधिक पढने या अत्यधिक मानसिक श्रम के कारण यह दिक्कत आ जाती है / कई दिन तक न सोने के कारण या रात रात भर जगने और पूरी नींद न लेने और मष्तिष्क से अधिक कार्य करने के कारण भी यह बीमारी हो जाती है / रक्त की कमी से भी दौरा पड़्ने की सम्भवना बनी रहती है / सोडियम या पोटेशियम का blood में imbalance होने से भी यह बीमारी हो जाती है /

अत्यधिक मानसिक परिश्रम करने से भी दौरा पड़ जाता है / यह उन विद्यार्थियों को अधिक सताता है जो रात रात भर पढायी करते हैं और निद्रा बहुत कम लेते हैं /

कुछ बीमारियां ऐसी होती हैं , जिनके प्रभाव से या असर से मिर्गी का दौरा पड़ जाता है / एक बार दौरा पड़ जाने पर फिर यह शरीर का झुकाव या tendency बन जाती है / यह tendency जब एक बार स्थापित हो जाती है तो शरीर इसे बार बार repeat करता है / यही कारण है कि similar circumsatances और similar intensities का जैसे ही तालमेल बनता है , वैसे ही मिर्गी का दौरा पड़ जाता है /

मिर्गी कोई लाइलाज बीमारी नही है / यह ठीक हो जाती है / लेकिन परहेज करने की जरूरत अवश्य होती है / मिर्गी का जैसे ही पहला दौरा पड़े , इसका इलाज शुरू कर देना चाहिये / इलाज करना अथवा कराना व्यक्ति और मरीज के परिजनों के ऊपर निर्भर करता है /

मिर्गी का कोई मुकम्मल इलाज आधुनिक चिकित्सा विग्यान मे नही है / हां, एलोपैथी की दवा खाने से दौरा रुक जाता है अथवा कम हो जाता है और कभी कभी ठीक भी हो जाता है / दवायें लगातार खानी पड़ती है और एक दिन दवा न खाने से मिर्गी का दौरा पड़ जाता है /

आयुर्वेद में मिर्गी का इलाज करने के लिये आयुर्वेद के चिकित्सक की योग्यता और उसके अनुभव के ऊपर सारी चिकित्सा का दारोमदार आश्रित और आधारित होता है / आयुर्वेद की आधुनिक जान्च इलेक्ट्रो
त्रिदोष ग्राफी ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन आधारित डाटा द्वारा किये जाने वाले इलाज से मिर्गी रोग को जड़ मूल से ठीक किया जा सकता है /

आयुष की अन्य चिकित्सा विधियों यथा होम्योपैथी चिकित्सा, यूनानी चिकित्सा आदि में मिर्गी का इलाज करने की क्षमता है / यह मिर्गी के रोगी के ऊपर निर्भर है या उसके परिजनों पर कि वे कौन सी चिकित्सा विधि से इलाज कराना चाहते हैं /

हमने अनुभव किया है कि ETG AyurvedaScan परीक्शण करा कर जिन मिर्गी के रोगियों का इलाज आयुर्वेदिक औषधियों द्वारा और साथ में बताये गये “परहेज” और जीवन शैली मे बदलाव के साथ किया गया है, ऐसे मिर्गी के रोगियों को आरोग्य अवश्य मिला है /

आयुर्वेद मे बहुत सी दवायें मिर्गी रोग के लिये है और आयुर्वेद में इसका आरोग्यकारी उपचार मौजूद है /

स्पैनेच सूप, इसे साधारण सूप समझने की भूल कभी न करियेगा / वर्ना एक हेल्दी रेसीपी से अथवा खादौषधि के लाभ से वन्चित रह जायेन्गे /

इसे बनाने क तरीका बहुत सरल है /

पान्च से आठ पत्तियां पालक की ले, इसे पानी से धोकर साफ कर लें /

सभी पत्तियों को सिल्बट्टा अथवा खरल या मिक्सी में डालकर लुगदी बना लें /

इस लुगदी में डेढ कप पानी डालकर आन्च पर रखाकर उबाल लें /

उबालने के बाद इसे गुन्गुना होने तक ठन्डा होने के लिये रख दें /

जब गुन्गुना हो जाय , तब इस लुगदी को मसलकर कप्डे अथवा छन्नी से छान ले /

इस छने हुये सूप में भूना हुआ जीरा, भूनी हुयी हीन्ग, थोड़ी शक्कर अथवा शहद अथवा गुड़ इच्छा अनुसार, थोड़ा सा नीबू का रस, कला नमक अथवा सेन्धा नमक या दोनों नमक. एक चम्मच अदरख का रस, मिला लें / बतायी गयी सामग्री अपनी रुचि के अनुसार मिला लें /

ऊपर बताये गये सामग्री में यदि कोई वस्तु नापसन्द हो तो उसे हटा सकते है / इसे रुचिकर स्वाद में बना सकते है /

जब इसे पीना चाहें तो इसमें एक चम्मच मक्खन मिलाकर यदि चाहें तो मिला सकते है /

पालक का यह सूप सभी के लिये लाभ दायक है / इस सूप के पीने से मन्दाग्नि, या जिन्हे भूख न लगने की शिकायत हो, जिन्हें पाचन समबन्धी विकार हों और कोई भोजन हजम न हो रहा हो, शरीर कमजोर हो रहा हो , चाहे उसकी कोई भी वजह हो, यह सूप निर्बलता को दूर करने में सहायक है /

जिन्हे यह लगता हो कि बतायी गयी वस्तुयें मे से कुछ उन्हे नुकसान पहुन्चा सकती हैं, वे उन नुकसान करने वाली वस्तुओं को हटा सकते है / जैसे नीबू का रस यदि किसी को नुकसान करे तो वे नीबू का रस न मिलाकर अनार या मुसम्मी या सन्तरा या कोई दूसरा रस मिलाकर सेवन कराना चाहें तो कर सकते है /

यह क लाभ दायक पेय है और इसे सभी सीजन में उपयोग कर सकते है/

आयुर्वेद चिकित्सा विग्यान ने लकवा अथवा इसी तरह की मिलती जुलती बीमारियों के इलाज के लिये कई श्रेष्ठ दवाओं का शाश्त्रों में उल्लेख किया है /

हलान्कि लकवा के रोग के इलाज के लिये आयुर्वेद मे बहुत से योग दिये गये हैं , चिकित्सा के लिये औषधीय प्रयोग के अलावा रक्त मोक्षण, जलूका का प्रयोग, दाह कर्म और पन्चकर्मादि का उपयोग करने का विधान बताया गया है, लेकिन औषधियों मे “एकान्ग वीर रस” का अपना अलग स्थान है /

अधिकान्शतया इस औषधि का उपयोग एक तरफ के पैरालाइसिस की बीमारियों के लिये ही करते हैं, लेकिन इसका उपयोग उन अन्य बीमारियों में भी करते है, जो पैरालाइसिस से मिलती जुलती अन्य रोग की अवस्थायें होती है /

इस औषधि के निर्माण में निम्न प्रक्रिया और सामग्री की आवश्यकता होती है ;

घटक द्रव्य; रस सिन्दूर, शुध्ध गन्धक, कान्त लौह भस्म, वन्ग भस्म, नाग भस्म, ताम्र भस्म, अभ्रक भस्म, तीक्षण लौह भस्म, सोन्ठ, मिर्च, पीपल, सब समान भाग लेकर कूट पीस छानकर पानी के साथ खरल में डालकर अच्छी तरह एक दिन घोण्टे /

बाद में त्रिफला और त्रिकुटा और सम्भालू और चित्रक और भ्रन्गराज और सहजना और कूठ और आवला और कुचला और आक और धतूरा और अदरख के रस अथवा क्वाथ से तीन तीन भावनायें देकर सुखा कर और एक एक रत्ती या १५० मिलीग्राम की गोली बनाकर रख लें /

यह फार्मूला आयुर्वेद शास्त्र बृहत निघन्टु रत्नाकर का है /

इस औषधि की मात्रा १५० मिलीग्राम से लेकर ३०० मिलीग्राम तक है / इसे शहद अथवा किसी वात नाशक अनुपान के साथ देना चाहिये /

यह औषधि पक्षाघात यानी Paralysis, one sided paralysis or complete paralysis, अर्दित, फेसियल परालाइसिस, ग्रध्रसी यानी Sciatica nerve inflammation, एकान्ग वात, अर्धान्ग वात, आदि वात विकारों मे सफलत पूर्वक उपयोग करते है /

यह औषधि शरीर का विकास करती है, शरीर के लिये जीवन दायनी है, कीटाणु नाशक है और शरीर के अन्दर के विजातीय द्रव्य यानी toxines बाहर निकाल देती है /

एकान्वीर रस के बारे में अधिक जानकारी के लिये आयुर्वेद की materia medica का अध्ध्यन करना चाहिये /

जो भी डाक्टर होम्योपैथिक की प्रैक्टिस या चिकित्सा कार्य करता है , वह सही मायने मे होम्योपैथिक चिकित्सा के आविष्कारक डा० क्रिश्चियन फ्राइड्रिख साइमुअल हाहनेमान का एक फालोवर मात्र होता है , जैसे कि डा० बोनिघसन. क्लार्क्स, एलन, बोरिक, कैन्ट आदि आदि अतीत के होम्योपैथिक के चिकित्सक थे और उन्होनें अपने अपने तरीके से हाहनेमान के कार्यों और उनकी फिलोसोफी को अधिक विस्तृत व्याख्या की और अपने अपने अनुभवों को शामिल करके जो भी उनकी समझ में आया , उन्होने लिखा और सबको बताया /

लेकिन सभी ने आधा अधुरा सत्य ही हाहनेमान के कार्यों के बारे में बताया / होम्योपैथी के डाक्टर केवल दवा के चुनाव , दवा की पोटेन्सी, दवा के रेपीटीशन और अन्य बातों की तरफ ही उलझे रहे / कौन सा स्केल की दवा दी जाय, डेसिमल, सेन्टीसिमल या ५० मिलेसिमल कौन सी प्रयोग की जाय इसी मे ही सारी उर्जा बरबाद करते चले गये और इसके अलावा कोई भी अन्य constructive कार्य जो हाहनेमान ने Organon of medicine के अन्तिम १० या १२ पैराज में बताया था , अफ्सोस की बात है , कम से कम अपने देश में तो नही हुआ /

Organon of medicine के अन्तिम कुछ पैराज में हाहनेमान ने लिखा है और सबको निर्देशित किया है और यह इशारा किया है कि………….

[अ] होम्योपैथिक के चिकित्सकों को “इलेक्ट्रोथेरापी” का उपयोग करना चाहिये / उस जमाने में किसी ने गैलवेनिक करेन्ट का एक जेनेरेटर तैयार किया था / चिकित्सा क्षेत्र की therapeutic use के लिये , यह शायद पहली मशीन थी , जो गठिया, वात विकार, musculo skeletal anomalies के treatment के लिये उपयोग में लायी जाती थी / इस मशीन के उपयोग के लिये हाहनेमान ने निर्देशित किया है / आज भी यह मशीन उसी कार्य के लिये उपयोग में लायी जा रही है जैसा कि उस जमाने में करते थे /

यह अवश्य हुआ है कि आज के जमाने में चिकित्सा कार्य के लिये , थेरापेउटिक उपयोग के लिये बहुत सी मशीने आ गयीं हैं, जिन्हे Physiotherapy चिकित्सक आज भी उपयोग मे ला रहे हैं /

सवाल यह है कि होम्योपैथी के चिकित्सकों नें इस विधा को क्यों छोड़ दिया और इस पर क्योण ध्यान नही दिया गया ?

[ब] हाहनेमान ने hydrotherapy यानी जल चिकित्सा के बारे में लिखा है / पानी के चिकित्सकीय उपयोग सदियों से मानव समाज कर रहा है / प्राकृतिक चिकित्सा में जल का उपयोग करते हैं जो सर्व विदित है / जब मै म्यूनिख , जरमनी में Krankenhaus fuer Naturhaeilwissen मे homoeopathy पढ रहा था, उस समय वहां पर जल चिकित्सा, इलेक्ट्रो थेरापी, हर्बल थेरापी, मैगनेट थेरपी, साइको थेरपी [हिप्नोटिस्म] आदि आदि Organon में हाहनेमान द्वारा बताये गये चिकित्सा के उपायों को मरीजों के उपयोग के लिये व्यवहार मे लाया जाता था /

सवाल यह है कि होम्योपैथी के डाक्टर और नीति नियन्ता और होम्योपैथी के लीडरान और धुरन्धर और धाकड़ से धाकड़ तथा कथित academicians ने क्या होम्योपैथिक् चिकित्सा विग्यान की इन उपलब्धियों को इन परिवेश में शामिल न करके ये सब किस अग्यानता का परिचय दे रहे है ?

THE ONE AND ONLY HOMOEOPATHY SCANNNING SYSTEM GLOBALLY, SCANS AND MAPS HUMAN BODY ELECTRICALLY ON THE BASIS OF THE FUNDAMENTALS OF HOMOEOPATHY AND QUANTIFY THE PRESENCE OF MIASMA, VITAL FORCE, IDIOCYNCRACY ETC ETC  INCLUDING PRESENCE OF DISEASES , DIAGNOSIS AND FACILITATES FOR AUTO SELECTION OF INSTANT CORRESPONDING REMEDIES WITH MANY FEATURES

======================================================

यह एक ऐसा सवाल है और यह एक ऐसी पेचीदा स्तिथि है जो होम्योपैथी के डाक्टरों के सामने कुछ मुश्किल खड़ा कर देती है /
ऐसी स्तिथि तब बनती है जब……..

[१] होम्योपैथी चिकित्सक लक्षणानुसार बेहतर से बेहतर दवाओं का चुनाव मरीज के हर एन्गल को लेकर करने के बाद जब दवायें देता है तो जैसा उसको drug response मिलना चाहिये , वह नही मिलता / सवाल यह है कि कब तक दवा के action और reaction का इन्तजार किया जाये ???

चुनी हुयी दवा के response के इन्तजार करने से कई एक रिस्क फैक्टर जुड़ जाते हैं, ऐसे में मरीज के हाल को सुधारने के लिये क्या बेहतर रास्ता हो ?

[२] एक सबसे बड़ी कमी यह है कि डा० हाहनेमान ने होम्योपैथी के चिकित्सा विग्यान की फिलोसफी के बारे में बहुत विस्तृत व्याख्या की है और समय समय पर अपने किये गये experiments से प्राप्त अनुभवों को Organon के विभिन्न सन्सकरणों में उनको परिवरतन के साथ प्रस्तुत किया है / यहां विचार करने की अति आवश्यकता है कि ऐसी क्या वजह रही है जिससे उनको अपना एक बार का established विचार जिसे कुछ साल पहले सही समझा गया और बाद में उसे ही कई बार बदलना पड़ा ?

[३] हलान्कि आज जैसी समस्या होम्योपैथी प्रैक्टिस करने के साथ हम महसूस करते हैं , शायद हाहनेमान और उनके समकालीन को भी रही है तभी उन्होने अपने समकालीन होम्योपैथी के चिकित्सकों को समझाने की कोशिश की है कि वे इस पर experiment कर रहे है, जैसा कि उनके लिखे गये पत्रों के सन्कलन के अध्ध्यन के बाद मिलता है /

[४] यह स्पष्ट नही है कि चिकित्सा में फेल हो जाने के क्या क्या कारण हो सकते है ?

हाहनेमान ने अन्त में यह कह कर विराम लगा दिया कि [अ] अगर रोगी ठीक नही होता तो इसका मतलब है कि उसकी बीमारी one sided है या [ब] चुनी हुयी औषधियों का कोई भी reaction शरीर मे नही हो रहा है या शरीर response नही कर रहा है क्यों कि Vital Force की स्तिथि deranged condition मे है /

यद्यपि मरीज के ठीक न होने के बहुत से अन्य अनेक कारण हो सकते हैं, लेकिन कुछ बातें मेरी समझ मे आयी है, जिन्हे मै यहां कहना चाहता हूं /

पहला यह कि हाहनेमान के जमाने में और आज के जमाने में हम जितना भी अन्न खाते पीते हैं और इसके साथ साथ रहन सहन और जीवन शैली में जी रहे है, उनमें पहले के जमाने से लेकर अब तक के जमाने में बहुत फ्रक और अन्तर आ गया है /

दूसरा खाने के लिये पैदा किये जाने वाले खाद्य पदार्थ की क्वालिटी एक तरफ जहां समाप्त हो रही है वहीं दूसरी तरफ य़ूरिया और अन्य दूसरी खादों के बल पर खेतों में ज्यादा मात्रा मे अन्न यथा गेहूं आदि उगाये जा रहे हैं और वही यूरिया खाद हम सभी खा रहे है / अब शुध्ध वस्तुयें मिल नही रही है , जब अशुध्ध खाना खायेन्गे तो लाजिमी है कि कुछ न कुछ तो शरीर मे होगा /

तीसरा हाहनेमान का दौर दूसरा था और आज का दौर उससे जुदा है , इस दौर में तनाव, भगम भाग, हर काम मे तेजी , अनियमित जीवन शैली सभी एक साथ शामिल होकर मानव समाज को अधमरा बनाये दे रही है / ऐसे में चिकित्सा का सुत्र Treat the CAUSE and not the DISEASE जैसा जुमला कैसे फिट होगा ? यह विचारणीय विषय है /

बहुत से सवाल ऊठते हैं लेकिन जमीनी धरातल पर सवालों के उठने या न उठने से कोई फर्क नही पड़ता / डाक्टर के पास मरीज आता है अपनी बीमारी को लेकर, इस उम्मीद के साथ कि उसकी बीमारी डाक्टर साहब ठीक करेन्गे / अब यह डाक्टर की जिम्मेदारी है कि वह मरीज की बीमारी के लिये क्या करते हैं ?

मेरा तौर तरीका होम्योपैथी की चिकित्सा के बारे मे थोड़ा जुदा है /

[क] जब मुझे definite cause of disease का पता चल जाता है कि मरीज की बीमारी किस कारण से हुयी है , तब मै single medicine का चुनाव करता हूं और उसे २०० पोटेन्सी से शुरू करता हू और १००० पावर तक ले जाता हूं / दवा का रेपीटीशन सुबह शाम या दिन में एक बार से ज्यादा सामन्य्तया नही करता /

[ख] जहां definite cause का पता नही होता, वहां मै मौसम के साथ मरीज के लक्षणों के ऊपर दवा देता हू , ऐसा Acute cases के इलाज के लिये मेडिसिन का चुनाव मौसम + लक्षण + सबसे ज्यादा परेशान करने वाली तकलीफ + अन्य को ध्यान में करके एक , दो या तीन या चार दवाओं का चुनाव करता हूं और इन दवाओं को २०० पावर मे उपयोग करता हूं / जैसे जैसे मरीज के लक्षणों का शमन होता जाता है, इन लक्शणों को दुर करने वाली दवाओं को withdraw करता जाता हूं और धीरे धीरे एक दवाके उपयोग पर आ जाता हूं /

[ग] मै हमेशा मरीज के इलाज करते समय risk factor को न बराबर करने के पक्ष में रहता हूं / आवश्यकता पड़ने पर Mother Tincture का मिक्श्चर बना करके देता हूं, जिसमें मरीज सुरक्षित भी रहता है और उसका इलाज भी हो जाता है /

[घ] मेरा मानना है कि हाहनेमान द्वारा होम्योपैथी की फिलोसोफी जो Organon of medicine मे बतायी गयी है , यह केवल हम डाक्टरों के लिये है / बतायी गयी फिलोसोफी हम होम्योपैथी के डाक्टरों के लिये है , हम हाहनेमान के फालोवर्स के लिये है / यह फिलोसोफी हमारे मरीजों के लिये नही है, इसलिये हमे विचार करना चाहिये कि फिलोसोफी के खातिर हम अपने मरीजों की जान के साथ क्यों खिलवाड़ करें ? मरीज डाक्टर के पास यह भरोसा करके आता है कि वह एक सुरक्षित चिकित्सक के पास जा रहा है जो उस्की तकलीफों को दूर करेगा /

इसके अलावा मै आयुर्वेदिक दवाओं का भी उपयोग करता हूं, जहां आवश्यकता होती है / इस तरह से औषधि व्यवस्था करने से मरीज का सम्पूर्ण उपचार हो जाता है और यह hurdle समाप्त हो जाती है कि चुनी हुयी दवा जब काम न करे तो क्या किया जाय, जैसी आशन्का खत्म हो जाती है और मै पूरे विश्वास के साथ मरीज का इलाज करता हूं और परिणाम स्वरूप मुझको बराबर सफलता मिलती है /

टैग:

ETG AyurvedaScan WORLDWIDE Visitors Count Begins from 17 August 2010

Every Second Count of Visitors

ayurvedaintro.wordpress.com
81/100

Google Page Rank ; Top 10 ; counting starts from 13 February 2011

Instant presence of visitors ; counting starts from 13 February 2011

WELCOME to all of you ; Kindly write your comments ; आपका स्वागत है : कृपया अपने विचार अवश्य लिखें

  • 446,741 hits

E-mail address for CONTACT

kpcarc@gmail.com

इन्हे भी पढ़िये और समझिये

स्वास्थ्य दैनिकी ; Swasthya Dainiki

जून 2012
सो मँ बु गु शु
« मई    
 123
45678910
11121314151617
18192021222324
252627282930  

Aapane Likha, bahut khusi huyi आपने लिखा, बहुत प्रसन्नता हुयी

Top Posts

Thanks Visitors

Follow

Get every new post delivered to your Inbox.

Join 72 other followers