मानसिक रोगी का ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन का ट्रेस रिकार्ड ; Psychosomatic Disorders of a patient , studies of ETG AyurvedaScan Traces


लगभग ३०० किलोमीटर दूर से आये एक पुरूष रोगी का नीचे दिया गया ट्रेस रिकार्ड है, जो दिनान्क १८ अक्टूबर २०११ को अन्कित किया गया / मरीज ने अनुरोध किया कि उसे अपने घर वापस जाने के लिये कानपुर सेन्ट्रल स्टेशन से चार पान्च घन्टे बाद रेल गाड़ी मिलेगी , इसलिये वह चाहता है कि उसकी रिपोर्ट बनाकर दवा आदि की जैसी व्यवस्था हो सके , सीमित समय के अन्दर करके दे तो बहुत अच्छा होगा, ताकि वह वापसी की गाड़ी पकड़ कर अपने घर वापस जा सके /
मैने उसका अनुरोध मान लिया और कहा कि अर्जेन्ट रिपोर्ट बनवाने में उसे रूपये ४०० अतिरिक्त और अधिक लग जायेन्गे और लगभग तीन घन्टे के अन्दर रिपोर्ट मिल जायेगी /

मैने रोगी की यह बात सुनकर कहा कि पहले आप अपना तुरन्त ETG AyurvedaScan करायें और फिर बाद में जब रिपोर्ट बन जायेगी तब देखून्गा कि क्या क्या आपके शरीर के अन्दर बीमारियां निकली हैं / मैने इस रोगी का पहले ई०टी०जी० रिकार्ड किया फिर उसके बाद जितनी जल्दी हो सका step by step सारे procedure निपटा करके लगभग ३ घन्टे बाद उसकी रिपोर्ट बन पायी /

इस व्यक्ति के निम्न रोगों का निदान ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन के अध्ध्यन के पश्चात निर्धारित हुआ/

१- रोगी को लेटने [on lying position] की स्तिथि में High Blood Pressure की tendency है जिसके कारण उसे रात में नीन्द न आने की तकलीफ है /
२- रोगी का रक्त का प्रवाह सिर की ओर अधिक है , ऐसा ट्रेस रिकार्ड ‘ई’ मे देखने में आया है / जब भी इस तरह की पाजिटिव ट्रेसेस होती है , यह मानसिक रोग यानी psychological disorders दर्शाती हैं /
३- ३- ‘ई’, ‘एफ’, ‘जी’ ट्रेसेस रिकार्ड देखने में पाजिटिव और निगेटिव डिफ्लेक्सन एक जैसे नेचर के हैं / ‘जी’ ट्रेस के ट्रेस अन्र्तराल को देखने से पता चलता है कि इस व्यक्ति को “डायबिटीज” की बीमारी है / लगभग २८० पीका की नाप से यह स्थापित हुआ कि, जिस समय इस व्यक्ति का ट्रेस रिकार्ड किया गया था, उस समय इस व्यक्ति के रक्त में रक्त शर्करा को इसी सीमा में उपास्तिथि होना चाहिये / इसी समय तुरन्त ही Glucometer से जान्च करने में पता चला कि व्यक्ति की रक्त शर्करा Blood sugar level 268 mg per dilution उपस्तिथि है /

४- इसे हाई ब्लड प्रेशर की तकलीफ है, ट्रेस ‘a’ को देखने से पता चला कि रोगी को ब्लड प्रेशर की बीमारी है /

इसे अन्य बीमारियां भी निकली, जो उसकी रिपोर्ट बनने के बाद बतायी गयी /

रोगी ने बाद मे सारी बात बतायी कि उसकी पत्नी पागल है और उसका पारिवारिक जीवन सुखी नहीं है / उसे खाना भी हॊटलों में जाकर खाना पड़ता है /

मैने उसे प्रेस्क्रिप्सन लिख कर आयुर्वेदिक दवाये खाने के लिये कहा और उससे कहा कि उसे शारीरिक बीमारी कम है और मानसिक अधिक / इसलिये मानसिक दबाव जितना ही कम से कम होगा , उसकी तकलीफ उतनी ही तेजी से ठीक होगी /

Similarly another one case of Psychosomatic disorders case came for the treatment on 18th October 2011. His ETG AyurvedaScan Trace rcords are  having  similar pattern as to earlier. Although he have some other PSYCHOLOGICAL PROBLEMS , which tends him sick, below is his trace records  to evaluate in view of AYURVEDIC TREATMENT.

ETG AyurvedaScan , which examines the whole body for purpose of AYURVEDIC TREATMENT and management , have major diagnostic value for physical ailments detection.

External Application on LEUCODERMA WHITE PATCHES triggers more violent effects and boosts metastasis of WHITE PATCHES in other parts of body


External Application on LEUCODERMA WHITE PATCHES triggers more violent effects and boosts metastasis of WHITE PATCHES in other parts of body

Our observational study shows that external applications like anti-vitiligo creams and oils for use in the treatment of the LEUCODERMA / VITILIGO, which are instructed by phyrician to apply on the white patches, causes suppressive effects and as a result, the metastasis of the hypomelinosis migrates to the other parts of the body, where the expression of the white patches becomes more prominent and strong.

Many cases treated by the other physician, using external application, patient history reveals the fact that external application causes suppression and more white patches grown in other parts within few hours to few days time rapidly.

After invention of ELECTRO TRIDOSHA GRAPHY ; ETG AyurvedaScan technology, treatment of the bodily disorders are totlly dependent on the findings of the ETG report. The development of the idea of the treatment bases on the ETG findings was successful, when AYURVEDIC MEDICINES were selected on the ground of the measured intesnsity of the Organs / parts of the body including AYURVEDIC FUNDAMENTALS.

In many LEUCODERMA cases, we have not used any external application of any kind and the treatment procedure was lend on the report and findings of the ELECTRO TRIDOSHA GRAPHY ; ETG AyurvedaScan totally. The Internal medicine were given according to the obtained pathophysiological measured intensity of the VISCERAS and other parts. These medicines were AYURVEDIC classical preparation over all.

Our study concludes that when internal organs beomes slowly and gradually normal in their own physiological activities, the pathophysiology of the organs normalizes, and as a result , pigmentation channel becomes free from any inhibition and hurdles and thus abnormal function of the skin becomes normal. This way again melenin pigments the skin with the normal functioning.

In my opinion, while treating LEUCODERMA, no external application should be used, either in any form of Oil or in cream.

“आयुर्वेद का इलाज कितने दिन तक करना चाहिये या किया जाये”,यह सवाल हर मरीज पूछता है What is duration of Ayurvedic Treatment ?


आज से लगभग चालिस पचास साल पहले तक लोग यह सब जानते थे कि आयुर्वेद का इलाज कितने दिन तक किया जाये, क्योंकि उस समय तक चिकित्सा के लिये केवल यही एक्मात्र चिकित्सा विग्यान था , जिसका लगभग सभी भारतीय परिवार उपयोग करते थे / होम्योपैथी अधिक उन्नत अवस्था में नहीं थी और इसे केवल बच्चों के इलाज तक ही सीमित था / यह इसलिये कि बच्चे एलोपैथी या आयुर्वेद की कड़वी दवा खाना पसन्द नहीं करते थे / मजबूरन बच्चों के इलाज के लिये होम्योपैथी की दवाओं का उपयोग करना पड़्ता था /

पुराने समय मे लोग आयुर्वेद के महत्व को समझते थे / इसलिये उनको जानकारी थी कि बीमारी के इलाज में कितना समय लगेगा , बड़े बूढे भी अपने अनुभव से बता देते थे और बता देते थे कि ” हर मर्ज के ठीक होने की एक मियाद होती है” या ” ये तो असाध्य या कष्ट साध्य या याप्य रोग है” या ” यह तो जिन्दगी भर चलने वाला रोग है और अब तो दवाओं के सहारे ही जीवन बिताना पड़ेगा” /

आज के जमाने में यह बताने वाला कोई है ही नहीं, न समझाने वाला कोई है, वजह साफ है , इन सब बातों के बारे मे ग्यान रखने वालों का एक दम अभाव / नतीजा अब यह है कि लोगो को पता ही नहीं कि जब वे बीमार हों तो उनको क्या करना चाहिये ?

मेरे यहां आने वाले मरीज मुझसे पूछते है कि वे कितने दिन आयुर्वेदिक दवा खायें , जिनसे उनकी बीमारी का ठीक ठीक इलाज हो सके / सवाल हर मरीज पूछता है और उसका सवाल पूछना भी जायज है /

आयुर्वेद का इस सम्बन्ध में क्या कहना है, उसे मै सार भाग में और अपने अनुभव को जोड़ कर आप सबके साथ अपने अनुभव को जोड़ने की कोशिश कर रहा हूं /

आयुर्वेद में ऐसा निर्देशित किया गया है कि किसी भी बीमारी का इलाज उसके पैदा होने, देश, काल और वातावरण तथा अन्य अनुकूल या प्रतिकूल परिस्तिथियों के ऊपर निर्भर करता है / इसलिये किसी भी बीमारी का इलाज कुछ घन्टे से लेकर एक दिन या कुछ दिन तक की मियाद मे हो सकता है और कुछ अन्य बीमारियां कुछ दिन से लेकर कई महीने या कई कई साल तक हो सकती है या फिर जीवन पर्यन्त तक /

मैने मानव शरीर में होने वाली बीमारियों का वर्गीकरण निम्न सात कैटेगरी में किया है / मेरे हिसाब से सारी दुनिया के लोग इन्ही सात कारणो से बीमार होते है / ये कारण है ;

१- भौतिक यानी Physical
२- मानसिक यानी Mental
३- इन्फेक्सियस यानी Infections
४- जेनेटिक यानी Genetics
५- ट्राउमैटिक यानी Traumatic
६- ईयट्रोगेनिक यानी Iatrogenic
७- अन्य कारण Others

उपरोक्त श्रेणी को देखने के बाद इस बात का अन्दाजा लगाया जा सकता है कि बीमारियों का निदान किस श्रेणी के अन्तरगत आता है / फिर इसमें यह तलाश करनी होगी कि जो भी बीमारिया है वे [a] Acute है या [b] Semi acute है या [c] Chronic है या [d] Long lasting Disease condition है /

कितने समय तक आयुर्वेद का इलाज कराना चाहिये, यह इस बात पर निर्भर करता है कि तकलीफ कैसी है /

१- अगर तकलीफ acute है तो यह कुछ घन्टे में ही दवाओं से response कर जाती है जैसे पेट का दर्द, सिर का दर्द, दान्त का दर्द, वमन होना, हिचकी आना, पेट में ऐठन होना आदि / लेकिन यहां इन सबमे एक फर्क है / अगर दर्द कैन्सर का है, अगर सिर दर्द स्पान्दिलाइटिस या माइग्रेन का है, अगर दान्त का दर्द सड़े  हुये दान्त का है तो फिर मूल रोग की चिकित्सा ही करना एक मात्र उपाय है, / अब इसमे कितना समय लगेगा यह बताना बहुत मुश्किल होता है /

२- अन्य सभी बीमारियों मे आयुर्वेद का निर्देश है कि कम से कम ३० दिन तक दवा करना चाहिये / अगर ३० दिन में लाभ न मिले तो ४० दिन या ६० दिन या ९० दिन या १२० दिन या १८० दिन तक इलाज कराना चाहिये /

३- कुछ बीमारियों ऐसी होती हैं जिनमे समय सीमा सही सही निर्धारित नहीं की जा सकती / इसलिये इनमे देश , काल, परिस्तिथि के अनुसार दवाओं तथा परहेज का निर्धारण किया जाता है, जिसे वैद्य / आयुर्वेदिक चिकित्सक के बिना करना सम्भव नहीं होता है / इस श्रेणी में कष्ट साध्य, अति कष्ट साध्य रोग और असाध्य रोग आते है /

४- सुख साध्य रोग के लिये ऊपर बताई गयी [कालम सन्ख्या -२ ] समय सीमा ठीक और सही अन्कित की गयी है / 

कुछ हद तक Homoeopathic चिकित्सा में भी यही समय सीमा तथा बतायी गयी परिस्तिथियां लागू होती है,  ऐसा मैने अनुभव किया है /

ई०टी०जी० आधारित एक आरोग्य प्राप्ति का केस ; रक्त की प्लेट्लेट्स का अत्यधिक कम हो जाने की बीमारी ; A case of 15000 Fifteen Thousand PLATELETS Blood counts


यह केस एक एलोपैथी के ६० साल की उम्र के चिकित्सक का है, जिनको साढे चार साल पहले अगस्त, सन २००६ में “वाइरल डेन्गू बुखार” हुआ था / इनका कई माह तक एलोपैथी का इलाज चला, जिससे डेन्गू बुखार तो चला गया लेकिन जोड़ो और मान्स्पेशियों का दर्द तथा दूसरी शिकायतें बनी रही /

रक्त की जान्च करने पर पता चला कि इनके रक्त की प्लेट्लेट्स १५ हजार और हीमोग्लोबिन ६ मिलीग्राम प्रतिशत तक पहुन्च गया है / इस हालत में इनको रक्त चढवाना पड़ा और चिकित्सकों ने इनको ४० मिलीग्राम स्टेरायड प्रतिदिन लेते रहने के लिये कहा / लगभग चार साल से रक्त चढवाने और Steroid खाने का सिल्सिला चल रहा था / SGPGI, Lucknow मे तीन माह भर्ती रह कर इलाज करवाया लेकिन हालात में कोई सुधार नहीं हुआ /

किसी मरीज ने इन डाक्टर साहब को आयुर्वेद की नई आविष्कृत की गयी तकनीक ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन के बारे मे बताया / दिनान्क ०६ अक्टूबर २०१० को यह चिकित्सक महोदय मेरे पास consultation के लिये आये / मैने उनसे कहा कि आपको एक ई०टी०जी० परीक्षण करना पड़ेगा तभी पता चल पायेगा कि आपके शरीर के अन्दर क्या गड़्बड़ी है /

उनका परीक्षण इसी दिन किया गया जिसमें निम्न फाइन्डिन्ग्स आयीं /

[१] त्रिदोष ; [समस्त पैरामीटर्स की सामान्य वैल्यू 95 e.v. से लेकर 99 e.v. तक]

कफ १३४.३१ ई०वी० प्रतिशत
पित्त १११.०९ ” ”
वात ६३.५६ ” ”

[२] त्रिदोष भेद ; [समस्त पैरामीटर्स की सामान्य वैल्यू 95 e.v. से लेकर 99 e.v. तक]

{सभी मान ई०वी० में e.v. means ETG value}

भ्राजक पित्त १४५.८७
लोचक पित्त १०४.८६
पाचक पित्त ८५.५५
साधक पित्त ८३.९४
अवलम्बन कफ ७८.०५
रन्जक पित्त ७६.१९
रसन कफ ७१.४४
उदान वात ६९.५९
श्लेष्मन कफ ६४.१७
व्यान वात ५९.२२
समान वात ४०.१५

[समस्त पैरामीटर्स की सामान्य वैल्यू 95 e.v. से लेकर 99 e.v. तक]

[3] सप्त धातुये ; [समस्त पैरामीटर्स की सामान्य वैल्यू 95 e.v. से लेकर 99 e.v. तक]
मेद १२२.१३
मान्स १२०.९३
रस ११४.८०
शुक्र १११.१३
मज्जा १०८.३४
रक्त १०५.८२
अस्थि १०४.५३

[४] शरीर में व्याप्त कार्य विकृति Pathophysiology और विकृति Pathology की उपस्तिथि की स्तिथियां [समस्त पैरामीटर्स की सामान्य वैल्यू 95 e.v. से लेकर 99 e.v. तक]
Autonomic Nervous system 157.14
Thoracic region/spine/cage 140.00
Body Fat 122.13
Liver/Pancrease/spleen 117.50
Metabolism 114.00
Blood Anomalies 105.80
Skin ailments 106.00
Thyroid pathophysiology 61.67
Spleen pathophysiology 60.00
Thymus pathophysiology 57.14
Liver pathophysiology 54.00
Epigastrium pathophysio 46.00
Abdomen/Intestines/colon 44.00
Prostate pathophysio 37.21
Intestines pathophysiology 35.56

[5] रोग निदान / Diagnosis of disease conditions
a- Blood anomaly
b- Bowel’s pathophysiology
c- Colon Inflammatory condition with swelling and hardness
d- Dull mental behaviour
e- Enlarged Liver with poor function
f- Hormonal anomalies
g- Pancreatic pathophysiology
h- Renal anomalies
i- Spleenomegaly ? Hepatospleenomegaly
j- Swelling in whole body

ई०टी० जी० आधारित रोग निर्धारण और औषधियों का चयन

रोगी जब परामर्श और चिकित्सा व्यवस्था के लिये आया तो ई०टी०जी० रिपोर्ट के आधार पर निष्कर्श निकाला गया कि इस रोगी को “कफ़ज पित्तज” व्याधि है / त्रिदोष भेद में यही बात सामने आयी /

सप्त धातुयें भी सामान्य से अधिक की ओर अपना झुकाव दर्शा रहीं है / इसका अर्थ यह निकला कि इस रोगी का मेटाबालिज्म की प्रक्रिया अधिक की ओर और तेज है / यह मरीज की Pathological condition को इन्गित कर रहा है /

इलेक्ट्रो त्रिदोष ग्राफी की पुरी रिपोर्ट का अध्ध्यन करने के पश्चात conclusion में तीन बातें समझ में आयी/

१- मरीज की आन्तों में सूजन है यानी Bowel’s Pathophysiology है /

२- यकृत और प्लीहा दोनों का बढा होना

३- रक्त की दुष्टि यानी Blood Anomaly

उक्त निष्कर्ष को ध्यान में रखते हुये इस मरीज को निम्न औषधियां prescribe की गयी /

अ- कुटज घन वटी १ गोली ; आन्तों की सूजन और विकृति के लिये
आरोग्य वर्धिनी वटी १ गोली ; यकृत प्लीहा के विकार के लिये
गन्धक रसायन १ गोली ; रक्त दुष्टि के लिये

सभी गोलियां एक साथ सुबह और शाम दिन में दो बार सादे पानी से खाने के लिये निर्देशित किया गया /

ब- सारिवद्यासव २५ मिलीलीटर बराबर पानी मिलाकर दोपहर और रात भोजन करने के बाद ; सप्त धातुओं की पुष्टि के लिये

रोगी से कहा गया कि वह इन सब दवाओं को लगातार ९० दिन तक सेवन करे , बाद मे प्रामर्श करे /

दिनान्क ०६ जनवरी २०११ को मरीज दिखाने आया / उसके सारे शरीर की सूजन एक्दम ठीक थी / मरीज रोजाना ४० मिलीग्राम steroid खाता था, वह अब उसने खाना बन्द कर दिया है , क्योंकि उसको steroid खाने की अब जरूरत नही लगी / उसका platelets count १५ हजार से बढ कर ८० हजार हो गया है, सामन्य तया शरीर में platelets की सन्ख्या रक्त में १ लाख पचास हजार से लेकर ४ लाख तक होती है / उसे बार बार हर पन्द्रह दिनों में रक्त चढवाना पड़्ता था, वह दो महीने से नही करना पड़ा / जो अन्य तकलीफें थी जैसे शरीर में फुन्सियां निकलना और शरीर में काले चकत्ते पड़ना, वह सब ठीक है /

चिकित्सक महोदय से मैने कहा कि आप अभि यही दवा खाते रहिये और मार्च २०११ में एक दूसरा ई०टी०जी० परीक्शण करा ले, उसके बाद जो भी फाइन्डिन्ग्स आयेंगी , तदनुसार दवा परिवर्तन कर दिया जायेगा /

Comments; आधुनिक चिकित्सा विग्यान में इस बीमारी  के इलाज के लिये केवल Steroid दवा के अलावा अन्य कोई दूसरी दवा है ही नहीं / सभी को पता है कि Steroid  का उपयोग शरीर के लिये कितना खतरनाक है / आयुर्वेद के इलाज के लिये ई०टी०जी० तकनीक आधारित चिकित्सा हमेशा फायदा देती है / 

Ayurveda Eight fold’s among is RASAYANA ; an overview of this THERAPY


AYURVEDA is divided in eight folds to understand and cover over all in view of every corner coverage of the treatment. The olden practitioners never left any corner that could be said uncover the treatment of diseases. These eight folds are ;

1- Shalya that means Surgery. The Surgical procedures are narrated in classical books of Ayurveda
2- Salaakya that means Treatment including surgical procedures of ENT Ophthalmology etc.
3- Kaumar Bhritya that means Midwifery, Gynecology and pediatric
4- Kaay chikitsa that means General and specific practice of medicine
5- Agad tantra that means Toxicological treatment including environment, infections etc
6- Bhut vidya that means Psychiatry and mental health
7- Rasayan that means treatment of pathological disorders originated disease conditions, Geriatric, maintenance of health conditions etc etc
8- Bajikaran that means maintenance of health physically and mentally to achieve the goal of Long life

Here RASAYANA part is taken for discussion. The fact is that Rasayan is closely related to one of the fundamental basics of Ayurveda medical system SAPTA DHATU.. Sapta dhatus are seven in numbers and are recognized below;

1- RAS
2- RAKTA
3- MANS
4- MED
5- ASTHI
6- MAJJA
7- SHUKRA

The above mentioned titles are closely related with the PATHOLOGY of the Modern Western Medicine. It seems to us that our ancestors had recognized and perceived the disease phenomenon right from the beginning to the end. That’s why it looks they had categorized the pathology in seven section as they had conceived.

RAS dhatu is actually closely related to METABOLIC DISORDERS. RASAYANA word is divided in two words RAS + AYAN. If we see Charak samhita and read the RASAYANA chapter, we observe that this chapter covers the over all seven segments of SAPTA DHATU. The mentioned medications and formulae are covering the RAS and other anomalies of AYURVEDIC PATHOLOGY.

Ancestor Practitioner of Ayurveda observed that whatever we eat that is digested and assimilated and thus makes BLOOD, again this blood nourishes FLESH and FAT and BONES and BONE MARROW and lastly the vital part SEMEN, which provides body building and stamina. The systematic evaluation like this, can be treated easily by RASAYANA medicine, mentioned in the classical books of AYURVEDA.

We have evaluated the above mentioned statements in the light of Electro Tridosha Graphy ; ETG AyurvedaScan system’s findings and we have perceived that certain medicine work satisfactorily. We are working on this line and we are getting good results. Further research work is still in progress.

BRAIN TUMOUR CASE ; Recording of the ETG AyurvedaScan Tracings of a patient, suffering from ‘’ BRAIN TUMOUR ‘’ for the observation to Ayurvedic and other system’s practitioners……..treatment based on the data of ETG AyurvedaScan and Ayurvedic remedies saved the life of patient..


Below is the trace record of a BRAIN TUMOUR patient , done by the Electro Tridosha Graphy ETG AyurvedaScan system.

Electro Tridosha Graphy ; ETG AyurvedaScan  trace record of a BRAIN TUMOUR Patient

Electro Tridosha Graphy ; ETG AyurvedaScan trace record of a BRAIN TUMOUR Patient

The trace record no. 1 is showing the tendency of HIGH BLOOD PRESSURE, which was confirmed after Blood pressure reading.

The trace record no.3 is showing the presence of BRAIN ANOMALY. All the elven waves , a,b,c,d,e,s,h,l,m,n,o both vertically and Horizontally are depressed and not well elevated.

The trace record no.3 is badly bending towards clockwise direction and is filing wide gap in between d & e waves, The interpretation is showing inflammatory condition of the BRAIN PARTS.

The ETG report data of NERVOUS SYSTEM is ;
• Autonomous Nervous system 364.29
• Cerebral medulla brain 90.00
• Temporal Brain 90.00
• Frontal Brain 66.67
• Pareital Brain 45.00
• Occipital Brain 58.33

CTScan and MRI scan confirmed the diagnosis of the BRAIN TUMOUR.

Below is the reports of the patient, done by the physician.

The Nerosurgeons left the case untreated and then patient came to me for his treatment.

FOLLOW-UP;

On request of patient’s  family members, I took  this case for treatment. Though  Allopathic Doctors said them that they have no treatment for this condition.

Now I am giving him AYURVEDIC MEDICINES. The patient condition improved after  one week treatment. Earlier he could not walk smoothly, on walk , his lower limbs was not coordinating and goes to either sides. His appetite was not well. He could not sleep well.

After one week of Ayurvedic treatment , he improoved in these problems. I have given him another one week medicines. I am collecting data, how he got this condition?

FOLLOW-UP ;  on date 05,09,2010

Patient well responded with the Ayurvedic medicine. His General physical condition improved well. Generally he have no problem and doing his routine work well. He is a shop keeper and he is doing his routine work as usual.

I instructed him , to not to do any vigourous work and he should take  sufficient rest both physical and mental.

His blood pressure is comming down slowly and gradually and is 135/98 mm Hg, which was earlier 198/124 mmHg,  his pulse rate was high but  now it is 92 per minute.

His physical condition is better comparatively than before at present. He is advised to continue Ayurvedic medicine.

FOLLOW-UP OF THE CASE / on  dated 18.09.2001

Patient  is not feeling any physical or mental  problem. He is carrying AYURVEDIC MEDICINE regularly. I have instructed him that he should change his life style and should not wake in night. He should take atleast 7 hours complete sleep. He should keep his diet acording to the diet Card, which I provide to patient. He should avoide strictly copulation at least six month.

SPECIAL NOTES TO DOCTORS / COLLEAGUES ;

Any Physican , Ayurvedic doctors, any branch of Medical practitioner, if want to see or check the patient, they can go directly to patient’s home  and they can examine the patient in his home. I will provide the address of the patient on request.

Any person, any similar patient, if desire to see and like to meet the patient in treatment in his home for query, the address of the patient is available on request.

 

Electro Tridosha Graphy ETG AyurvedaScan Report’s Eighth page


The Eighth page of the ETG Report presents the following features;

 

  • Evaluation SECTORWISE SCANNED AREAS FROM Head to Feet
  • Evaluation BODY SIDES – RIGHT SIDE &  LEFT SIDE
  • Evaluation  UPPER PARTS OF BODY
  • Evaluation LOWER PARTS OF BODY

 

 

The presentation is shown in a sketch of body for easy understanding.

 The Obtained Data are very important in view of establishing diagnosis &  establishing undeviated treatment and finally to understand, which part of the body is creating most problems.

 

Electro Tridosha Graphy ETG AyurcedScan Report’s Eighth page

Electro Tridosha Graphy ETG AyurcedScan Report’s Eighth page

ETG AyurvedaScan Report’s Sixth page


ETG AyurvedaScan Report’s Sixth page

ETG AyurvedaScan Report’s Sixth page

This page contains the following important data ;

 

  • Estimation of MISLLANEOUS DIAGNOSTIC IMPORTANT
  • Evaluation of ANATOMICALLY SCANNED BODY SECTORS

 

In this page, electrically scanned & counted “Heamoglobin percentage Hb%,” which is approximately given. “Serum Calcium” is also estimated and is approximately given. This is a unique feature of the ETG AyurvedaScan.

 

Besides these dignosis ETG AyurvedaScan diagnose the followings;

 

  1. Tendency of Blood pressure, whether it is High or Low
  2. Tendency of Diabetes, whether it is Low or High

 

FACTS ABOUT PULSE READING OR NARI PARIKSHAN OR NARI EXAMINATION OR PULSE EXAMINATION


Pulse reading is an essential part of the practice of Ayurveda medical science. In Ayurveda it is directed that Pulse reading / pulse examination provides a lead to Ayurvedic vaidya for correct diagnosis of the Dosha, which tends to correct selection of remedy for a sick individual. Besides these, the pulse examination tends to physician to know about the prakruti and deviated dosha, which are basically three in numbers.

Early description of Pulse reading or pulse examination is not mentioned in the classical works of Charak samhita or Sushrut samhita. The first mention of the Pulse reading is seen in the classical work of Bhav Mishra , who have written the book “Bhav Prakash”. In this book , a very short description of the pulse reading and pulse examination is given. It is not in detail, only few lines in Sansakrit Language is given, mentioning the methods of examination in very short.

It is presumed that Bhav Prakash is composed and written by Bhav Mishra , round about 700 to 800 years back in between 1200 to 1300 century, that means Pulse reading was a part of Ayurvedic practice , developed slowly and gradually round about 1000 years back.

Prior to Bhav Prakash, no other writer or composer of Ayurveda Text have mentioned Pulse reading, therefore it shows that Pulse reading should not be said that it is as old as Ayurveda. In my opinion , it should be maximum 1200 years old and should not be more than that.

As I guess and thus conceive the idea of PULSE READING , that How Ayurvedicians of that time perceived the idea of pulse reading ? The answer could be in this way that in olden time , Ayurvedicians were related to Astrology and practicing Ayurveda both.

Process of Ayurvedic style of Radial Pulse Examination, First finger denotes to VATA, second finger to PITTA and Third finger to KAPHA Dosha

Process of Ayurvedic style of Radial Pulse Examination, First finger denotes to VATA, second finger to PITTA and Third finger to KAPHA Dosha

A special group of studious persons were involved in the preacing, teaching and healing areas. It is believed that the group transferes their knowledge by shruti (listening) and smrati (memorizing) and by repeatition of shlokas methods. Later when script becomes in existence, then the knowledge transferred to written words.

The practitioner of Ayurveda were involved in Astrological works besides the healing job. In Astrology, it is mentioned in Horoscope of a person that which NADI he is belonging. The NADI in Astrology is mentioned AADI, MADHYA & ANTA. The Three Nadi is matched by the Astrologer at the time of marriage. The male nadi or female nadi should not be same. If male nadi and female nadi is same / similar / equal, then this is called NADI DOSHA. Astrologers believe that same NADI DOSHA couples may not be able to conceive and thus can not born any baby or child. Due to this reason, NADI DOSHA have an important features in the marriages.

In my opinion, this concept of NADI DOSHA might be correlated to AYURVEDA TRIDOSHA and PRAKRUTI.

It is presumed that Radial Pulse examination was the easy way to confirm about the life or death of a person. Even today, every person cheks the radial pulse for confirmation of life or death, instead of respiration. We see every day , when we ask a person, whether he have fever or not. The person will immediately check his radial pulse by keeping palm/grip of fingers/ tying radial arm around by hand or by one or two or three or four  fingers to acknowledge the throbbiung of the pulse.

It seems that NADI DOSHA concept  of Astrology convrted  into NADI TRIDOSA. The practitioners of Ayurveda tried to grasp the TRIDOSHA findings in this simple way by matching the similarity of persons constitution, prakruti etc because description of  DOSHAS was already given in the classical works of Ayurveda.

After long  term experimenting, exercising , matching with the theory of Ayurveda Fundamentals TRIDOSHA,  Ayurvedicians established their observations in regards to pulse reading and its rhythum, speed and motion. The correlation of pulse rhythum with the motion and walk of the certain creatures and animals are given to the open observation to learn pulse reading more easy to understand.

Latest INVENTION for determination of AYURVEDIC FUNDAMENTALS ;

 

Recognition of Ayurvedic fundamentals is very essential for Ayurvedic treatment purposes. It is not very easy to establish the Prakruti and Tridosha of a sick individual by PULSE Examination  for an Ayurvedician. The Latest invention is ELECTRO TRIDOSHA GRAPHY ; ETG AyurvedaScan, which provides data of AYURVEDIC FUNDAMENTALS in data sheet and report form, including the features of NARI PARIKSHAN.

   

Electro Tridosha Graphy ; ETG AyurvedaScan Report’s Third page


The third page of the ETG AyurvedScan is consists of the “Organ’s Pathophysiology / Pathology”. The computer generated analysed data of various organs are shown with their intensities.

Some datas are shown by marking *PNA, that means * Parameters Not Applicable. PNA datas are those datas, which are not fully confirmed, as what should be normal value established. It is due to their sensitivity, which varies according to the age, activities and sensitive nature of the patient / individual.

For example Auto Nomic Nervous system evaluation is in *PNA section. The reason is that it is very high observed in youngestors say 300 to 600 e.v.

The e.v. means “etg value, which is differ from scan to scan areas. [1] some e.v. is observed 95 to 99 e.v. as a normal level. Some e.v. [2] is in between 90 to 105 e.v. as a normal level. Some [3] e.v. are inbetween 80 to 115 e.v. considers normal level.

Electro Tridosha Graphy ; ETG AyurvedaScan  Report's Third Page

Below 50 e.v. is observed that body parts are pathologically affected. If parameters are inbetween 80 to 50 e.v. it is considered that condition is of pathophysiological.

Above than 120, the condition is observed that parts are going towards the inflammatory and painful stage. Blow level shows that parts are going to towards hardness and painless development of the disease condition.

The third page of the ETG Report shows the [1] intensity, [2] functioning, [3] health condition of the visceras and other sections of the body for evaluation in view of the comprehensive treatment , which is an unique concept of the Ayurved medical system.

This page have a short evaluation & also for quick observation of the scanned parts, provides instant picture of the patient to Ayurvedic Doctor for quich analysis and selection of medicine accordingly.