गर्मी से कफ दोष के पीड़ित रोगियों को कैसे राहत मिलती है ? ETG AyurvedaScan studies shows , how KAPHA dosha is cured by PITTA dosha, at the commencement of SUMMER SEASON

CONTACT ; Dr D.B.B.ajpai, Ayurvedic Diagnostician and Inventor & Chief ETG AyurvedaScan Investigator, KANPUR Mobile; 09336238994

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आयुर्वेद चिकित्सा विग्यान बताता है कि किस सीजन में कौन सा दोष कुपित होता है अर्थात बढता है और यह बढे हुये दोष किस सीजन में कम हो जाते हैं /

जाड़ा अथवा ठन्डक के दिन “कफ” दोष को बढाते हैं , ऐसा आयुर्वेद का सिध्धान्त कहता है / कफ दोष चूकि जल और आकाश के योग से मिलकर बना है, इसलिये यह शरीर में ठन्ड अथवा शीत के कारण बढता है और शरीर में कुपित होता है / ठन्ड अथवा शीत का प्रभाव गर्मी से कम होता है अथवा गर्म पदार्थ अथवा गर्म मिजाज के खाद्य पदार्थों के खाने से ठन्डक का प्रभाव शरीर को बचाता है / इसीलिये ठन्डक वाले शीत प्रधान देशों में गर्म पदार्थ खाने का रिवाज है जैसे विभिन्न प्रकार के मान्स खाना या शराब पीना ताकि शरीर को ठन्डक से बचने के लिये जरूरी उष्मा मिलती रहे /

रहन सहन के स्तर पर शरीर को गर्म रखने के लिये रहने के स्थान को गर्म बनाये रखने का रिवाज है / इसी कारण ठन्ड पड़ने वाले मुल्कों मे लोगों के मकान शीत प्रतिरोधी होते हैं / भारत में जहां जहां शीत अधिक पड़ती है जैसे हिमान्चल प्रदेश अथवा उत्तरान्चल प्रदेश अथवा काश्मीर जैसे इलाकों में ठीक वही स्तिथि है जैसी कि ठन्ड पड़ने वाले देशों में है /

फिल हाल बात करते हैं कफ दोष की / लुब्बेलुआब यह है कि ठन्ड से कफ दोष बढता है तो उसकी काट करने के लिये गरंम पदार्थॊ का सेवन , गरम जगह रहने और सोने का इन्तजाम करना होता है जिससे “क्फ” दोष शान्त होकर स्वास्थय को नार्मल कर देता है / लेकिन जिनको बहुत अधिक कफ की तकलीफ हो जाती है जैसे बृध्धावस्था का कफ की बीमारी, तब गर्मी का सीजन आरोग्य प्राप्ति के दॄष्टिकोण से सबसे अच्छा होता है / जितनी ही अधिक गरमी पडेगी कफ सम्बन्धित विकार शान्त होते है / इसका कारण यह है कि ठन्ड से पित्त की गर्मी उतनी नहि हो पाती जितने मे वह शरीर को गर्म रख सके / गर्मी के सीजन में कम्जोर पित्त सबल हो जाता है और इसी कारण से कफ सम्बन्धी रोग दूर हो जाते है /

चूकि रन्जक पित्त दोष-भेद लीवर और तिल्ली को प्रभावित करता है ्तथा इसके साथ ही भ्राजक पित्त सम्पूर्ण शरीर को प्रभावित करता है इससे कफ दोष को शान्त करने मे मदद मिलती है /

ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन के डाटा के अध्ध्यन से यह पता चला है कि जब भ्राजक पित्त सामान्य से अधिक हो जाता है और Nervous system में Parietal Brain का measurement कम होता है तो व्यक्ति को “Exposure of Cold” अधिक होता है और उसे Thermal Sensitivity का जिस intensity का mesurement डाटा प्राप्त होता है उसी हिसाब से उसको Cold अथवा Heat का exposure होता है /

कमर दर्द अथवा Lumber region pain or Back ache ; Ayurvedic Homoeopathic treatment

Back ache तकलीफ देने वाला रोग है / अपने अध्ध्य्यन मे मैने observe किया है कि यह कई कारणों से होता है और जब तक कारण का निवारण नही हो जाता , यह बहुत मुश्किल से ठीक हो पाता है /

कमर दर्द के होने के बहुत से कारण होते हैं / लिन्ग के अनुसार इसके कारंण भी बहुत अजीबो गरीब से है /

पुरुषों में इसका कारण मुख्य रूप से कार्य विभाजन के साथ जुड़ा हुआ है / जैसे आजकल मोटर साइकिल या स्कूटर चलाने वाले लोगों को गलत posture के कारण नवयुवक इसके शिकार होते हैं / ऐसा होना मॊटर साइकिल चलाने और सड़्क की स्तिथि और स्पीड और उम्र और दूरी तथा बीच बीच में विश्राम कितना करते है , आदि आदि इन सभी फैक्टर्स पर आधारित होता है /  एयर कन्डीशनिन्ग के अन्दर काम करने वाले लोगों को ठन्डक की वजह से शरीर की काम करने वाली मेजर मान्श्पेशियां  अकड़्ती हैं / बैअठे बैठे काम करने से यह मान्श्पेशियां एक निश्चित movement  मे कार्य करने की आदी हो जाती हैं और यह एक लिमिट सेट हो जाती है / अचानक उठने बैठने से यह limit टूटती है इसलिये मान्श्पेशियों के टीश्यूज में अचानक बदलाव आ जाते हैं , जिससे दर्द होना शुरू हो जाता है / ऐसा बदलाव हल्के से लेकर अधिक गहरायी तक हो सकता है / जैसे superficial skin से मान्शपेशी और मान्शपेशी से लीगामेन्ट्स और टेन्डन्स  तक , फिर यहां से रीढ की हड्डियों को जोड़ने वाले अन्य अवयव तक affected हो जाते हैं /

ऐसा प्राय: विकृति या pathological phenomenon सभी तरह के कमर दर्द में होता है / दूसरे अन्य कारण भी है जैसे कमर के हिस्से में thrust या injury या किसी चीज या वस्तु से hit हो जाना या गिर जाना या कोई accident हो जाना , इनसे भी होता है और यह एक कारण है / कभी कभी बवासीर के रोगियों मे या भगन्दर के रोगियों में कमर का दर्द हो जाता है / कमर की मान्शपेशियों के सिकुड़ने के कारण यह तकलीफ हो जाती है /

महिलाओं में यह तकलीफ बहुधा देखी जाती है / ऐसा इसलिये है, क्योंकि महिलायें गर्भावस्था के समय में गर्भाशय में पल रहे और दिन प्रतिदिन भ्रूण के साइज के बढते रहने की वजह से पेट तथा spine तथा कमर की हड्डी यानी pelvis bone का आकार सामन्य  से अधिक होता है जिसके कारण इन अन्गों मे आवश्यकता से अधिक जोर पड़्ता है और आकार भी ब्ढ जाता है / बच्चा पैदा होने के बाद यह धीरे धीरे सामन्य अवस्था में आते है और मान्स्पेशियों का ढीलापन धीरे धीरे दूर होता है / अगर किसी कारण से यूटेरस या मासिक की कोई विकृत बची रह जाती है तो यह सब विकृति मिलकर PID पी०आई०डी० यानी Pelvic Inflammatory Disorders पैदा कर देते है / इस कारण से कमर में दर्द होने लगता है /

बृध्धावस्था में कमर का दर्द मान्स्पेशियों की कार्य क्षमता का कम हो जाने, मान्श्पेशियों में कुदरती सिकुड़न होने यानी contraction Tendency पैदा होने के कारण होती है  /

कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह है कि कमर का दर्द एक प्रकार की Musculo-skeletal problem है और इसे इसी सन्दर्भ में देखा जाना चाहिये /

आयुर्वेद में कमर दर्द का सही और सटीक और परिपूर्ण इलाज है / आयुर्वेद की औषधियां, management, पन्चकर्म की विधियां, पथ्य , परहेज, रहन सहन  और जीवन शैली में बदलाव आदि के धारण करने से कमर दर्द ठीक हो जाता है /

अगर ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन की सहायता लेकर रोग निदान और मौलिक सिद्धान्तों का आन्कलन करके इलाज किया जाय तो कमर दर्द मे शीघ्र फायदा होता है /

मानसिक रोगी का ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन का ट्रेस रिकार्ड ; Psychosomatic Disorders of a patient , studies of ETG AyurvedaScan Traces

लगभग ३०० किलोमीटर दूर से आये एक पुरूष रोगी का नीचे दिया गया ट्रेस रिकार्ड है, जो दिनान्क १८ अक्टूबर २०११ को अन्कित किया गया / मरीज ने अनुरोध किया कि उसे अपने घर वापस जाने के लिये कानपुर सेन्ट्रल स्टेशन से चार पान्च घन्टे बाद रेल गाड़ी मिलेगी , इसलिये वह चाहता है कि उसकी रिपोर्ट बनाकर दवा आदि की जैसी व्यवस्था हो सके , सीमित समय के अन्दर करके दे तो बहुत अच्छा होगा, ताकि वह वापसी की गाड़ी पकड़ कर अपने घर वापस जा सके /
मैने उसका अनुरोध मान लिया और कहा कि अर्जेन्ट रिपोर्ट बनवाने में उसे रूपये ४०० अतिरिक्त और अधिक लग जायेन्गे और लगभग तीन घन्टे के अन्दर रिपोर्ट मिल जायेगी /

मैने रोगी की यह बात सुनकर कहा कि पहले आप अपना तुरन्त ETG AyurvedaScan करायें और फिर बाद में जब रिपोर्ट बन जायेगी तब देखून्गा कि क्या क्या आपके शरीर के अन्दर बीमारियां निकली हैं / मैने इस रोगी का पहले ई०टी०जी० रिकार्ड किया फिर उसके बाद जितनी जल्दी हो सका step by step सारे procedure निपटा करके लगभग ३ घन्टे बाद उसकी रिपोर्ट बन पायी /

इस व्यक्ति के निम्न रोगों का निदान ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन के अध्ध्यन के पश्चात निर्धारित हुआ/

१- रोगी को लेटने [on lying position] की स्तिथि में High Blood Pressure की tendency है जिसके कारण उसे रात में नीन्द न आने की तकलीफ है /
२- रोगी का रक्त का प्रवाह सिर की ओर अधिक है , ऐसा ट्रेस रिकार्ड ‘ई’ मे देखने में आया है / जब भी इस तरह की पाजिटिव ट्रेसेस होती है , यह मानसिक रोग यानी psychological disorders दर्शाती हैं /
३- ३- ‘ई’, ‘एफ’, ‘जी’ ट्रेसेस रिकार्ड देखने में पाजिटिव और निगेटिव डिफ्लेक्सन एक जैसे नेचर के हैं / ‘जी’ ट्रेस के ट्रेस अन्र्तराल को देखने से पता चलता है कि इस व्यक्ति को “डायबिटीज” की बीमारी है / लगभग २८० पीका की नाप से यह स्थापित हुआ कि, जिस समय इस व्यक्ति का ट्रेस रिकार्ड किया गया था, उस समय इस व्यक्ति के रक्त में रक्त शर्करा को इसी सीमा में उपास्तिथि होना चाहिये / इसी समय तुरन्त ही Glucometer से जान्च करने में पता चला कि व्यक्ति की रक्त शर्करा Blood sugar level 268 mg per dilution उपस्तिथि है /

४- इसे हाई ब्लड प्रेशर की तकलीफ है, ट्रेस ‘a’ को देखने से पता चला कि रोगी को ब्लड प्रेशर की बीमारी है /

इसे अन्य बीमारियां भी निकली, जो उसकी रिपोर्ट बनने के बाद बतायी गयी /

रोगी ने बाद मे सारी बात बतायी कि उसकी पत्नी पागल है और उसका पारिवारिक जीवन सुखी नहीं है / उसे खाना भी हॊटलों में जाकर खाना पड़ता है /

मैने उसे प्रेस्क्रिप्सन लिख कर आयुर्वेदिक दवाये खाने के लिये कहा और उससे कहा कि उसे शारीरिक बीमारी कम है और मानसिक अधिक / इसलिये मानसिक दबाव जितना ही कम से कम होगा , उसकी तकलीफ उतनी ही तेजी से ठीक होगी /

Similarly another one case of Psychosomatic disorders case came for the treatment on 18th October 2011. His ETG AyurvedaScan Trace rcords are  having  similar pattern as to earlier. Although he have some other PSYCHOLOGICAL PROBLEMS , which tends him sick, below is his trace records  to evaluate in view of AYURVEDIC TREATMENT.

ETG AyurvedaScan , which examines the whole body for purpose of AYURVEDIC TREATMENT and management , have major diagnostic value for physical ailments detection.

विटामिन की गोलियां खाने से कोई फायदा नहीं

यह हम नहीं कह रहे है, यह कह रहे है ब्रिटॆन के चिकित्सा शोध कर्ता / प्रकाशित खबर को पढ ले , आपको जानकारी हो जायेगी /

हम पहले भी कई बार कह चुके है कि विटामिन के अधिक उपयोग से शरीर मे “हाइपर विटमिनोसिस” की स्तिथि पैदा हो जाती है, जिसके परिणाम स्वरूप बहुत सी ऐसी बॊमारियां हो जाती है, जो बाद में असाध्य रोगॊ की श्रेणी में शुमार होने लगता है /

External Application on LEUCODERMA WHITE PATCHES triggers more violent effects and boosts metastasis of WHITE PATCHES in other parts of body

External Application on LEUCODERMA WHITE PATCHES triggers more violent effects and boosts metastasis of WHITE PATCHES in other parts of body

Our observational study shows that external applications like anti-vitiligo creams and oils for use in the treatment of the LEUCODERMA / VITILIGO, which are instructed by phyrician to apply on the white patches, causes suppressive effects and as a result, the metastasis of the hypomelinosis migrates to the other parts of the body, where the expression of the white patches becomes more prominent and strong.

Many cases treated by the other physician, using external application, patient history reveals the fact that external application causes suppression and more white patches grown in other parts within few hours to few days time rapidly.

After invention of ELECTRO TRIDOSHA GRAPHY ; ETG AyurvedaScan technology, treatment of the bodily disorders are totlly dependent on the findings of the ETG report. The development of the idea of the treatment bases on the ETG findings was successful, when AYURVEDIC MEDICINES were selected on the ground of the measured intesnsity of the Organs / parts of the body including AYURVEDIC FUNDAMENTALS.

In many LEUCODERMA cases, we have not used any external application of any kind and the treatment procedure was lend on the report and findings of the ELECTRO TRIDOSHA GRAPHY ; ETG AyurvedaScan totally. The Internal medicine were given according to the obtained pathophysiological measured intensity of the VISCERAS and other parts. These medicines were AYURVEDIC classical preparation over all.

Our study concludes that when internal organs beomes slowly and gradually normal in their own physiological activities, the pathophysiology of the organs normalizes, and as a result , pigmentation channel becomes free from any inhibition and hurdles and thus abnormal function of the skin becomes normal. This way again melenin pigments the skin with the normal functioning.

In my opinion, while treating LEUCODERMA, no external application should be used, either in any form of Oil or in cream.

Electro Tridosha Graphy ETG AyurvedaScan Report’s Eighth page

The Eighth page of the ETG Report presents the following features;

 

  • Evaluation SECTORWISE SCANNED AREAS FROM Head to Feet
  • Evaluation BODY SIDES – RIGHT SIDE &  LEFT SIDE
  • Evaluation  UPPER PARTS OF BODY
  • Evaluation LOWER PARTS OF BODY

 

 

The presentation is shown in a sketch of body for easy understanding.

 The Obtained Data are very important in view of establishing diagnosis &  establishing undeviated treatment and finally to understand, which part of the body is creating most problems.

 

Electro Tridosha Graphy ETG AyurcedScan Report’s Eighth page

Electro Tridosha Graphy ETG AyurcedScan Report’s Eighth page