IDENTIFICATION OF SOME CHEMICAL SUBSTANCES, WHICH CAN HELP IN STATUS QUANTIFICATION OF AYURVEDA FUNDAMENTALS AND SEVEN DHATUS BY COLORIMETRIC METHODS BY DR D.B.BAJPAI ; AYURVEDA NEW LABORATORY INVETION


It is for the first time, the inventor and chief ETG AyurvedaScan Investigator of Ayurveda High diagnostics technology ”E.T.G. AyurvedaScan” has identified some chemical substances, who can represent to Ayurveda Fundamentals VATA, PITTA and KAPPHA, three tridosha and SAPT [SEVEN] DHATU detection in human body by examining Blood serum by the help of COLORIMETER.

                      Dr. D.B.Bajpai   with his GREAT Grand-son YUVRAJ belongs to fourth generation

Since ten years, Dr DBBAJPAI is doing work on the line of chemical chemistry at his own lab established for the patient coming for the treatment of AYURVEDA and AYUSH on the basis of the findings of ETG AyurvedaScan exminations and other related tests so far.

रीढ की हड्डियो के विभिन्न भागों की बीमारिया ; आयुर्वेद-आयुष के काम्बीनेशन / इन्टीग्रेटेड उपचार से आरोग्य सम्भव ; SPINAL CORD’S SECTIONS DISORDERS CAN BE WELL TREATED BY AYURVEDA-AYUSH COMBINATION AND INTEGRATED TREATMENT AND MANAGEMENT


रीढ की हड्डी की बीमारियों के उपचार के लिये आधुनिक चिकित्सा विग्यान ने surgery मे जितनी प्रगति की है , उसे सन्तोष जनक कहा जा स्कता है / लेकिन रीढ की बीमारियों का इलाज सर्जरी द्वारा करा डालने से इसमे एक बाधा यह है कि मरीज को पहले से ज्यादा हर बात मे सतर्कता बरतनी पड़्ती है जैसे चलने , बैठने , मुड़्ने, घूमने , लेटने आदि जैसे कार्य भी बहुत धीमे और चेतावनी के साथ करने होते हैं /

जरा सी भी लापरवाही और कोताही शरीर को तकलीफ देने लगती हैं / बहुत से ऐसे मरीज भी अक्सर देखने मे आये है जो हमेशा बिस्तर पर ही पड़े रहते है और करवट बदलने के लिये उनको दूसरों से सहायता लेनी पड़्ती है / दैनिक काम भी बिना किसी दूसरों की सहायता के नही किये जा सकते है /

रीढ की हड्डी के पान्च हिस्से होते है / इन्हे (१} सरवाइकल (२) थोरेसिक (३) लम्बर (४) सैक्रल और (५) काक्सीजियल हिस्सो के नाम से जाना जाता है / रीढ के किसी भी हिस्से मे तकलीफ हो सकती है /

इसमे ”एन्काइलोसिन्ग स्पान्डिलाइटिस” नाम की ऐसी बीमारी है जो रीढ की हड्डी की पुरी की पूरी ही इन्फ्लेम्ड हो जाती है यानी रीढ की हड्डी मे दाह अथवा प्रदाह अथवा सूजन अथवा शोथ पैदा हो जाती है जिसके कारण शरीर जकड़ जाता है , शरीर को मुड़ने मे या इधर उधर या दाये बायें घुमाने मे या चलने फिरने मे या किसी भी मूवमेन्ट मे दर्द और अकड़न और जकड़न हो जाती है जिसके परिणान स्वरूप शरीर कुछ कर नही पाता और असहाय की स्तिथि पैदा हो जाती है /

रीढ शरीर का केन्द्रीय अन्ग है और इसके बीमार या अस्वस्थ होने का मतलब है कि शरीर बिल्कुल काम करने लायक नही रह जायगा / इसकी गुरियों अथवा वेर्टेब्रा VERTEBRA  के जोड़ो से नस और नाड़िया निकल्ती है जो शरीर के अन्गो को कन्ट्रोल करती है , जिस हिस्से से यह सिग्नल कम होन्गे या अधिक होन्गे वही अन्ग अधिक या कम काम करने लगते है / ऊपर के दिये गये चित्र  से  यह देखकर समझा जा सकत है कि रीढ का कितना महत्व है और इसमे हो रही किसि भी तकलीफ की अनदेखी नही करना चाहिये /

ऊपर दिये गये माडल  को देखिये और जैसा कि बताया गया है कि रीढ की हड्डी किस तरह से अनाटामी के हिसाब से शरीर मे उपस्तिथि होती है/ HIP BONES   यानी कमर की हड्डी भी इससे जुड़्ती है और कमर की किसी भी रीजन यथा लम्बर अथवा सैक्रल अथवा काक्सीजियल भाग मे कोई तकलीफ होगी तो वह हिस्सा बीमार होकर कोई गम्भीर रोग का आगाज कर सकती है जिनमे AVASCULAR  NECROSIS एवैस्कुलर नेक्रोसिस जैसी बीमारी पैदा हो सकती है / यह वही बीमारी है जिसमे कूल्हे की हड्डी बदलनी पड़्ती है या पूरा कमर की हड्डी ही बदल दी जाती है /

रीढ की हड्डियो की तकलीफो का बहुत बढिया इलाज आयुर्वेद और आयुष चिकित्सा विधियो मे है / आदि काल से आयुर्वेद और आयुष चिकित्सा विधियो से ऐसी रीढ की हड्डियो की बीमारियों का इलाज सफलतापूर्वक  किया जाता रहा है / आयुर्वेद की अन्य शारीरिक आराम पहुचाने वाली विधियों से भी यथा पन्च कर्म अथवा तैलादि कर्म अथवा वाष्प कर्म आदि आदि विधियो के applications  द्वारा रीढ की हड्डियो का इलाज किया जाता रहा है और अभी भी वही क्रम चालू है / लेकिन जागरुकता लोगो के बीच मे न होने के कारण या बीमारियो के सही इलाज कैसे किया जाय और किस विधि से किया जाय इसके बारे मे जानकारी न होने के कारण लोग पहले गलती करते है और फिर सारा जीवन बिस्तर पर ही गुजार देते है / ऐसा मेरा प्रैक्टिकल अनुभव है /

 

एन्काइलोसिन्ग स्पान्डिलाइटिस सेप ीडित मरीज की पीठ पर हो गयी छोटी छोटी फुन्सियां /

रीढ की हड्डी का रोगी , जिसे एन्काइलोजिन्ग स्पान्डिलाइटिस हो गयी है , लगभग एक साल के इलाज से अब ठीक है /

जैसा कि मै हमेशा कहता हू कि अग्र कोई बीमारी किसी डाक्टर द्वारा ऐसे बता दिया गया हो कि यह ला-इलाज है . तो यह मानकर चलना चाहिये कि हो सकता है यह बीमारी जो डाक्टर साहब बता रहे है भले ही उनके सिस्स्टम मे , जिसमे वह प्रैक्टीस कर रहे हो , उसमे लाइलाज हो , लेकिन यही लाइलाज बीमारी दूसरे सिस्टम मे इलाज करने से ठीक हो सकती है , ऐसा लोगो को  विचार  करना होगा / उदाहरण के लिये यदि पित्त की थैली मे अगर ६ मिलीमीटर से अधिक की पथरी हो तो उसका एक मात्र इलाज सरजिकल आपरेशन ही है , इसका कारण यह है कि पित्त-नली का अन्दर का डायमीटर ६ से लेकर ८ मिलीमीटर तक होता है / ६ मिलीमीटर की पित्त की थैली की पथरी इसीलिये नही निकल पायेगी क्योन्कि पित्त की नली का डायमीटर उतने ही साइज का है , इसलिये पथरी सरक नही पायेगी और नली मे ही फन्स जायेगी , इसलिये दवा से यह काम नही होगा और SURGICAL OPERATION ही एक मात्र उपचार है /

अगर इसी पित्त की थैली मे छॊटी पथरी हो तो आयुर्वेद और आयुष इलाज से यह पिघल कर और साइज मे छोटी होकर निकलने के chances  होते है /

इसलिये सभी लोगो को विचार करना चाहिये कि बीमारी के इलाज के लिये उनके पास विकल्प मौजूद है तो यह अव्श्य आजमाना चाहिये /

YOGA AND AYURVEDA COMBINATION PRACTICE CAN COMFORT AND EASE THE LIFE


YOGA DIVAS

YOGA DIVAS ; this is the third year 2017 of Yoga Divas nd is being celebrated all over the world and globally.

During the interviews of Patients from overseas visited at our research center accepted the facts that in India it is a privilege that some alternative treatment and complementary therapies are in practice in India for example Ayurveda / Homoeopathy / Unani / Yoga / Nature-cure and others like Sidhdha and others. But in their countries , this facility is not possible. In some countries Homoeopathy is banned due to obvious and un-known reasons. Therefore the complaints which are treatable well by Ayurveda / Homoeopathy / Unani and other systems , can not be supported by these therapies and as a result peoples in majority are suffering very badly due to not having any alternative means of the treatment and diagnosis as it is easily available in India as a specialization way of the treatment.

Human body if seen anatomically , major systems are skeletal, then tendons, ligaments , cartilages , muscles makes a group of muscular system, then comes Autonomic Nervous system, which carries signals from mind to some organs and the Circulatory system for flowing the blood over all to body. In yoga this combination of the system works in major share. Thus it can be said that Neuro-musculo-skeletal systems are the major share holder of the YOGA exercises.

Flexion of the joints of the body are a center point of Yoga Postures. Contractions and relaxations practice causes well flow of fresh Oxygenated Blood the muscles and of-course to the joints and thus nourishes these parts by reaching ELECTROLYTES and MINERALS  and essential nutrients supplied by the SPLEEN and LIVER to cover the damages in the parts  due to daily  hard work done  by Human body.

PRANAYAM are beneficial for Lungs. As much as air inhalation is beneficial for Lungs and Lungs exercises including Laryngo-pharyngo-tracheal parts and Chest and Chest-Back muscles and ribs. Air contains Nitrogen gas, Oxygen gas, Carbon di-oxide gas , ozone gas and many others. Inhalation of these gases as much as possible make strong the parts of body which requires these gases for metabolic requirements.

During sick condition, YOGA with AYURVEDA in INCURABLE DISEASE CONDITION , combined treatment helps to maintain the body near to normal level.

Caution should be taken for those persons, who have exhausting disease conditions, like Cardiac problems / Cancer of various parts / loss of blood / enlarged liver / kidney disorders / Pulmonary disorders and other fatal conditions, where vigorous exercises are prohibited, should take great care before starting of Yoga practices. Yoga is not advisable to those who are very weak physically.

For all humans and for all physical disorders, PRANAYAM is advisable because this safe and will not harm in anyway. Simple Pranayam like Anulom vilom is quite sufficient for all ages and can be practiced in morning or in evening. Only Anulom and Vilom Prabayam ecercises most of the parts like larynx, pharynx, trachea, nasal passage, sinus, lungs and chest muscles of front chest and cage, diaphragm, Liver. stomach, spleen and upper and lower digestive tract.

Those persons who are not strong and weak should practice Anulom and Vilom Pranaayam from one or two pranayam paerday and later increase the frequency of exercise.

Physiological studies about YOGA is only seen in Dr. A.K.Jain’s book ”TEXT BOOK OF HUMAN PHYSIOLOGY” and I have quoted and loaded matter in 2015 YOGA DIVAS, readers can see the scientific aspect of Yoga.

In our research center, we are studying the effect of Yoga on human beings on the line of the findings of the latest Ayurveda hi-tech E.T.G. AyurvedaScan and other laboratory examinations.

Care should be taken during the Yoga practice and in problem should consult a physician when feel any uneasiness.

YOGA and AYURVEDA combination treatment should be taken under strict supervision of an expert Ayurvedicians and time to time advise should be taken with the progress of the health condition. Anyone should not try YOGA and AYURVEDA treatment alone and by himself. This can be dangerous to health and may damage seriously the parts. So care is necessary as a precautions.

एच०आई०वी० का एक और केस जिसे हमारे यहा से आयुर्वेदिक और आयुष इलाज से फायदा हुआ ; ONE OTHER H.I.V. CASE WHO GOT RELIEF FROM OUR CENTER BY AYURVEDA -AYUSH COMBINED TREATMENT


हमारे केन्द्र मे एक एच०आई०वी० का मरीज पिछले साल इलाज के लिये अगस्त २०१६ मे आया था / इसके बाद यह एच०आई०वी० का मरीज फालो-अप के लिये हमारे यहा दिसम्बर मे आया था जिसमे कुछ परीक्षण करके उसकी दवाये परिवर्तित कर दी गयी थी /

नीचे दी गयी आधे भाग की  ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन की रिकार्डिन्ग दिनाक 19 August 2016  की है और दूसरे आधे भाग की रिकार्डिन्ग दिनान्क 19 June 2017  की है /

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ऊपर दी गयी सभी रिकार्डिन्ग का अवलोकन करने पर यह पता चल जाता है कि शरीर का इलेक्ट्रिकल बिहेवियर पहले से ज्यादा ठीक है और इम्प्रूवमेन्ट दिखता है / यह इम्प्रूवमेन्त करीब  60 %  फीसदी तक समझ मे आता है /

जब मरीज इलाज के लिये  हमारे पास आया था तब उससे कहा गया था कि वह अपना CD3 / CD4/CD8 Count  करा ले, यह इसलिये जरूरी होता है ताकि भविष्य मे इलाज शुरू होने से पहले की स्तिथि का स्तर क्या था यह establish किया जा सके / मरीज की इलाज शुरू होने से पहले की जान्च रिपोर्ट नीचे दी गयी है / इसे ध्यान से देखिये ताकि आगे वाली रिपोर्ट से इसका मिलान करके प्ता कर ले कि कहां कहां क्या क्या ठीक हुआ है /

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नीचे दी गयी रिपोर्ट ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन की रिपोर्ट का एक हिस्सा है जिसमे आयुर्वेद के दोष -धातु के हिसाब से निदान किया गया है कि रोगी के शरीर मे किस दोष की प्रधान्ता है और उसकी कौन कौन सी धातुये प्रभावित हो गयी है / ”H” का मतलब high level है और यह नीचे तक यानी Down level तक आयुर्वेद के मौलिक सिध्धन्तो को shorting करके बताता है कि शरीर को किस तरह की व्याधि है और इसका उपचार करने के लिये क्या क्या आवश्यक होगा /

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नीचे दी गयी रिपोर्ट RESTING POSITION जान्च के समय की है / इस जान्च मे क्या क्या रोग के सिन्ड्रोम्स मिले है यह बताया गया है , इन सभी से यह पता चलता है कि किस तरह की अनियमितताये शरीर के अन्दर बन रही है / आयुर्वेद और आयुष की चिकित्सा मे इसका बहुत महत्व है / चून्कि ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन परीक्षण आयुर्वेद और आयुष चिकित्सा विधियो को लेकर डेवलप किया गया है इसलिये यह आयुर्वेद  और आयुष चिकित्सा विधियों के इलाज मे बहुत सटीक काम करता है /

 

लगभग आठ महीना आयुर्वेदिक और होम्योपैथिक और यूनानी दवाओं का मिलाजुला  इलाज करने के बाद इस मरीज का दुबारा CD3 / CD4 / CD8 COUNT  दुबारा कराया गया / इसकी रिपोर्ट नीचे दी गयी है /

अगस्त 2016  मे कराये गये रक्त परीक्षण और जून 2017  जिसमे लगभग १० महीना इलाज करने के बाद किस तर्ह के परिवर्तन इन सभी काउन्ट मे आये है , आप सभी इसको तुलनात्मक विवेचना करने के बाद देखेन्गे कि मरीज करीब करीब क्योर की स्तिथि मे आ गया है / क्योन्कि इसके सभी काउन्ट ठीक है सिवाय CD3 + के  /

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हमारे रिसर्च सेन्टर की पैथोलाजी  लैब मे इस मरीज के पैथोलाजिकल परीक्षण किये गये है / जिसमे इसका ई०एस० आर० Erythrocyte sedimentation rate   अधिक निकला है , जिसका मतलब है कि अभी शरीर मे inflammatory condition  मौजूद है, यह किस कारण से है , यह भी पता चल गया क्योन्कि सीरोलाजी टेस्ट मे H.I.V. 1 test POSITIVE निकला है / H.I.V. 2 test NEGATIVE निकला है / हलान्कि यह E.I.V. 1 test  weak positive  है / इससे यह माना जायेगा कि अभी रोगी के शरीर मे एच०आई०वी के वायरस उपस्तिथि हैं /

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………………आप सभी आयुर्वेद प्रेमियो और चिकित्सको ने इस केस के बारे मे introductory रिपोर्ट पढी होगी, इससे आप सभी को यह आन्दाजा अवश्य महसूस हुआ होगा कि आयुर्वेद और आयुष के इलाज द्वारा एच० आई० वी० जैसी लाइलाज कही जाने वाली बीमारियां भी ठीक हो सकती है /

हलांकि  हमारे रिसर्च केन्द्र मे वह सभी परीक्षण की सुविधाये मौजूद है , जो मरीज की जान्च और इलाज के लिये आवश्यक है / एच० आई० वी० के बहुत से रोगियो का इलाज हमारे यहा से चल रहा है और सभी को फायदा है / समय समय पर रोगियो से permission लेकर उनके केसेस आपके सामने प्रस्तुत किये जायेंगे /

ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन आधारित इलाज से एच०आई०वी० के रोगी ठीक होते है , यह जरूर है, लेकिन इसके लिये मरीज को भी सतर्क रहना बहुत जरूरी है / मेरा अनुभव यही रहा है कि जिस रोगी ने दवा करने मे कोताही बरती या लापरवाही की , उसको इस बीमारी के परिणामो से बहुत गम्भीरता से जूझना पड़ा है /

इस बीमारी के रोगियो को जैसे ही शक हो कि उनको एच० आई०वी० इन्फ़ेक्शन होने की सम्भावना है उन्हे बिना इन्तजार किये हुये इलाज शुरू कर देना चाहिये / यह इन्तजार करना कि रोग का पता 6 से एक साल के बाद खून की जान्च कराने के बाद पता चलेगा, तब तक शरीर के अन्दर वायरस बहुत mature अवस्था मे पहुच जाते है और फिर उनको कम करना बहुत मुश्किल हो जाता है / इसलिये सबसे बेहतर तरीका यही है कि जैसे ही इस बात का शक हो कि एच० आई०वी० का इन्फेक्शन होने की सम्भावना है , बचाव के लिये आयुर्वेद और आयुष का इलाज शुरू कर देना चाहिये/

 

E.N.T.O. : Ear, Nose, Throat , Ophthalmic Disorders cure by AYURVEDA – AYUSH Treatment and management ; आन्ख, नाक, कान,गला , दान्त, मसूढे, जीभ, मुख आदि से सम्बन्धित रोग आयुर्वेद और आयुष इलाज और बताये गये परहेज से अव्श्य ठीक होते है


आन्ख, नाक, कान, मुख, दान्त, गला, जीभ, तालू आदि अन्गो से सम्बन्धित सभी रोग आयुर्वेद की चिकित्सा से अवश्य ठीक होते है /

आयुर्वेद मे ऊपर बताये गये सभी भाग अथवा अन्ग यह सभी मिलकर” त्रिक स्थान या उर्ध्व जत्रु ” कहते है / गले से ऊपर यानी THROAT PIT  यानी  गले से लेकर पूरी गर्दन  और सम्पूर्ण सिर  और सिर के पीछे रीढ की हड्डी तक का पूरा भाग जिसमे CERVICAL REGION  आता है / इसमे कुछ आयुर्वेद के ग्यानियो का मानना है कि इसके साथ दोनो हाथ भी शामिल हैं / हलान्कि सम्पूर्ण त्रिक स्थान के निर्धारण के मामले मे आयुर्वेद के विग्यानियों मे कुछ मतभेद है, लेकिन उर्धव जत्रु रोग के बारे मे जैसा आयुर्वेद मे कहा गया है , वही सब स्वीकार करते है / यानी दोनो हाथ और गले से ऊपर के सभी अन्ग जिसमे thyroid glands  भी शामिल होती है /

 

 उपरोक्त  माडल मे देखने से शरीर के आन्तरिक भागो का कैसी बनावट है यह पता

                                 चलता है / इसके अलावा उन अन्गो की बीमारियो का आन्तरिक क्या सम्बन्ध हो

                                                                   सकता है , यह भी देखकर समझा जा सकता है /      

उर्ध्व जत्रु सन्स्कृत भाषा का शब्द है जिसका आयुर्वेद के मतानुसार अर्थ है गले से ऊपर के भाग और अन्ग और इन अन्गो से सम्बन्धित रोग और रोग निदान और चिकित्सा से बोध करता है /

इसलिये यह आयुर्वेद मे व्यापक सन्दर्भ मे लिया जाता है / जैसा कि आधुनिक विग्यान भले ही सुविधा के अनुसार यह मानता हो कि शरीर के सभी अन्ग अलग अलग है और इन सभी अन्गो के सन्योजन से शरीर का निर्माण होता है इसलिये शरीर के अलग अलग अन्गो के हिसाब से अलग अलग इलाज भी होना चाहिये / यह आधुनिक चिकित्सा विग्यान की सोच है कि मानव शरीर को वह अलग अलग एक मशीन की तरह से चिकित्सकीय़ ड्रूष्टिकोण से देखता है , उदाहरण के लिये मानव शरीर को मानव शरीर न समझ कर एक तरह की मशीन समझा जाता है जैसे एक कार के अन्दर की रचना होती है उसी तरह मानव के शरीर की रचना आधुनिक चिकित्सा विग्यान के दृष्टिकोण से की गयी है / कार की पेट्रोल की टन्की को डाय्जेस्टिव सिस्टम के बराबर समझिये ,  कार के इन्जन को  मनुष्य के हृदय की तरह समझिये, पहियो को मानव के हाथ पैर समझिये, गेयर , एक्सीलेटर और ब्रेक को दिमाग का हिस्सा समझिये, स्टार्ट स्विच को मष्तिष्क का मोटीवेशन समझिये , बाहरी हिस्से को त्वचा समझिये / यह कान्सेप्ट ही मानव को एक मशीन का दर्जा देता है / आप यह तो जान्ते होन्गे कि कार जब खराब हो जाती है तब इसे कहां ले जाते है ? सभी कहेन्गे कि गेराज मे या कार बनाने वाले मिस्त्री के पास /

ठीक इसी तरह से जब मनुष्य बीमार होता है तो उसे नर्सिन्ग होम या अस्पताल ले जाते है / कार के लिये गेराज और मनुष्य के लिये नर्सिन्ग होम / कार मे जब कोई खास किस्म की गड़्बड़ी होती है तो उसे उसी विभाग मे भेज दिया जाता है जिस विभाग मे उसके ठीक करने वाले जान्कार होते है / ठीक उसी तरह से इन्सान को उसी विभाग मे भेज दिया जाता है जहां खास किस्म के विशेष्ग्य डाक्टर होते हैं / अब आप समझ गये होन्गे कि इन्सान को क्यो HUMAN MACHINE कहा गया है /

लेकिन इसके ठीक उलट आयुर्वेद  मानव शरीर को एक सम्पूर्ण ईकाई की तरह समझता है / यानी शरीर एक है जिसमे बहुत से अन्ग है और सिस्टम है जो एक दूसरे के पूरक है और एक दूसरे पर आश्रित है और एक दूसरे को सपोर्ट करते है / इसलिये अगर शरीर बीमार है तो उसे एक ईकाई की तरह समझ कर रोग-निदान और तदनुसार  चिकित्सा व्यवस्था करना चाहिये / ऐसा कान्सेप्ट आयुर्वेद का है /

इसलिये अगर उर्ध्व जत्रु के रोग हो तो यह अकेले नही होते है, यह सम्मिलित होते है / उर्ध्व जत्रु के मरीजो के इलाज करने से प्राप्त जैसा अनुभव मुझे हुआ है वह मै आप्के साथ शेयर करना चाहता हूं /

१-  सानुसाइटिस बीमारी के मरीजो मे नाक की तकलीफ के अलावा दूसरे सिन्ड्रोम्स भी मिलते हैं / जैसे कि पेट न साफ होना और कब्ज बना रहना, हल्का निम्न कोटि का बुखार या हरारत , कान मे दर्द और गले मे दर्द, सारे शरीर मे दर्द और सिर दर्द , भूख का न लगना ऐसी बीमारिया साथ मे हो जाती है / किसी किसी को चक्कर आने की बीमारी हो जाती है और कोई कोई तो बेहोश तक हो जाते है जैसे कि उनको मिर्गी का दौरा पड़ गया हो /

२- चेहरे के न्यूरेल्जिक दर्द  यानी फेसियल न्यूरेल्जिया के कुछ रोगियो का इलाज करने के बाद मुझे अनुभव हुआ है कि ऐसा दर्द दान्त की तकलीफों से भी होता है / दान्त की जड़ मे दर्द न होकर यह दर्द डायस्टल एरिया यानी नर्व एन्डिन्ग तक जाता है जो चेहरे कि नर्व सप्लायी को प्रभावित करती है तथा दर्द पैदा करती है / यह दर्द न्य़ूरो-मस्कुलो होता है / इससे चेहरे की पतली मान्शपेशिया प्रभावित होती हैं / पतली मान्शपेशियो के प्रभावित होने के कारण जब ठडक या ठडि हवा या ए०सी० की हवा लगती है तो यह दर्द और अधिक बढ जाता है और बहुत भयन्कर रूप ले लेता है / चेहरे की माशपेशियो मे सूजन आने के कारण यह टीपिकल किस्म की बीमारी बन जाती है जिसे लाइलाज बता दिया जाता है / यह भले ही एलोपैथी के डाक्टरो का मत हो कियह बीमारी लाइलाज है लेकिन ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन आधारित इलाज करने से इस बीमारी से छूटकारा मिल जाता है क्योन्कि उर्ध्व जत्रु रोगो की चिकित्सा सम्मिलित होती है /

३- थायराइड का रोग भी उर्धव जत्रु रोगो की श्रेणी मे शुमार किया जाता है / इसका इलाज भी आयुर्वेद के मतानुसार करने से अवश्य सामान्य अवस्था मे बना रह्ता है /

इसी तरह आन्ख और कान के ऐसे बहुत से रोग है जिनका इलाज आयुर्वेद मे सम्भव है लेकिन व्यापक जागरुकता न होने के कारण लोग बीमारियो को लाइलाज समझ लेते है और इस तरह से जो बीमारी ठीक हो सकती है उसको भी अग्यानता के कारण इलाज न कर पाने से जीवन भर भोगते है /

ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन परीक्षण के अलावा अन्य परीक्षणो से प्राप्त रिपोर्ट्स के निष्कर्ष से आधारित आयुर्वेद -आयुष के काम्बीनेशन और इन्टीग्रेटेड इलाज से ऐसी सभी बीमारियों मे आराम मिलता है जिन्हे लाइलाज बता दिया गया हो /

 

FISTULA CURABLE WITHOUT OPERATION BY AYURVEDA AND AYUSH COMBINED TREATMENT AND MANAGEMENT ; फिस्टुला / फिश्चुला / भगन्दर आयुर्वेद और आयुष इलाज से भी ठीक होता है


फिश्चुला / फिस्टुला / भगन्दर / RECTAL FISTULA की बीमारी आयुर्वेद और आयुष इलाज से ठीक हो सकती है और वह भी बिना आप्रेशन कराये / बड़ी सन्ख्या मे भगन्दर के रोगियो का इलाज करने के बाद मुझे जिस तरह का अनुभव हुआ है , वह आप सभी से शेयर करना चाहता हूं /

१- फिस्चुला जिस तरह की बीमारी है , उसे साधारण किस्म की आम बीमारियो जैसा नही समझा जाना चाहिये , यह एक तरह की अति गम्भीर किस्म की बीमारी है और इसका इलाज सन्जीदगी के साथ और गम्भीरता के साथ करना चाहिये / इसे हल्के मे नही लेना चाहिये / ऐसा मेरे अनुभव मे आया है जैसा कि मरीजो के रोग इतिहास से पता चला कि मरीज भगन्दर की बीमारी को बहुत हल्के मे लेते चले गये और बाद मे यह बीमारी बहुत खतर्नाक स्तर तक पहुन्च गयी / इसलिये इलाज करने मे देरी अथवा लापरवाही ऐसे मरीजो को बहुत भारी पड़ी है /

इसलिये रोगी को जिसको भगन्दर की बीमारी है जैसे ही पता चले फौरन इलाज करना शुरू कर देना चाहिये /

२- आम तौर पर देश और विदेश की जनता यानी GENERAL Public को पता नही होता है कि भगन्दर जैसी बीमारियों में किस तरह का इलाज किया जाय / क्योन्कि सही चिकित्सा और सही रोग निदान और सही दवाओ के द्वारा ही इस बीमारी से छुटकारा पाया जा सकता है / इसलिये सही चिकित्सा का चयन करना जरूरी होता है / आयुर्वेद और होम्योपैथी और यूनानी चिकित्सा के साथ साथ प्राकृतिक और योग चिकित्सा के कम्बाइन्ड और इन्टीग्रेटेड इलाज के द्वारा fistula को ठीक किया जा स्कता है /

मरीजों से प्राप्त जानकारी के आधार से यह पता चला कि 99.99 percent यानी ९९.९९% रोगियों को पता ही नही है कि आयुर्वेद या होम्योपैथी अथवा यूनानी या योग चिकित्सा द्वारा इस बीमारी का इलाज किया जाता है / कहने का मतलब यह को प्रति १००० व्यक्ति मे से केवल एक को ही इस बात का पता है कि आयुर्वेद या होम्योपैथी या यूनानी या प्राकृतिक चिकित्सा मे इस रोग को ठीक करने का मुकम्म्ल इलाज है /

जानकारी का अभाव केवल जनता यानी public मे ही नही है , बहुत से DOCTORS यानी इलाज करने वाले चिकित्सको को ही नही पता है कि वे जिस बीमारी को लाइलाज बताये दे रहे है उसका इलाज भले ही उनके चिकित्सा विग्यान मे न हो लेकिन आयुष चिकित्सा विग्यान मे मौजूद है / ऐसे डाक्टर रोगी को आप्रेशन OPERATION कराने की सलाह देते है /

३- सर्जरी / OPERATION आपरेशन कराने के बाद भी बहुत से मरीजों का फिष्चुला नही ठीक हुआ है / ऐसे रोगी बड़ी सन्ख्या मे आये है जिन्होने एक बार और दो बार और कई बार से लेकर १० या ११ बार आपरेशन करा चुके थे लेकिन उनका फिस्चुला नही ठीक हुआ और उनको आपरेशन कराने के बाद भी फिस्चुला फिर से  हो गया वह भी पहले से ज्यादा, इस्से से यह पता चलता है कि भले ही दावा किया जाता हो कि आपरेशन कराने के बाद फिस्चुला ठीक हो जाता है लेकिन बड़ी सन्ख्या मे आपरेट किये गये फिस्चुला न ठीक होने और कई कई बार फिर से दुबारा हो जाने अथवा  होने की पुष्टि करता है कि आपरेशन कराने के बाद भी फिस्चुला नही ठीक होता और आपरेशन द्वारा इलाज कराने के बाद दुबारा फिर  हो जाता है , ऐसी धारणा बनती है /

मेरे यहा तीन साल पहले एक ऐसा ही मरीज आया था जिसने ११ बार फिस्चुला का आपरेशन कराया था लेकिन उसके बाद भी वह नही ठीक हुआ / यह मरीज दिल्ली के नजदीक के एक जिले का रहने वाला है इसका इलाज चल रहा है /

ऐसे आपरेशन कराये हुये और आपरेशन कराकर फिस्चुला नही ठीक होने वाले मरीजों का इलाज आयुर्वेदिक और होम्योपैथिक और यूनानी और प्राकृतिक चिकित्सा के मिलेजुले इलाज से अवश्य ठीक हुये है /

४- क्षार सूत्र चिकित्सा आयुर्वेद विग्यान का विषय है / ऐसे बहुत से मरीज मिले जिन्होने बताया कि क्षार सूत्र चिकित्सा से उनका भगन्दर /फिस्चुला ठीक हो गया लेकिन ऐसे भी मरीज मिले जिन्होने बताया कि उन्होने क्षार सूत्र चिकित्सा की लेकिन उनको कोई भी फायदा नही मिला / यानी कहने का यह मतलब कि क्षार सूत्र की चिकित्सा से कुछ प्रतिशत फिस्चुला के रोगी ठीक हुये है / आयुर्वेद के शोधार्थियों को इस पर रिसर्च करना चाहिये और इसके परिणामो को सार्वजनिक तौर पर बताना चाहिये / ऐसा मानना है कि क्षार सूत्र पर रिसर्च की गयी होगी और इसके परिणाम भी प्रकाशित किये गये होन्गे लेकिन यह आभास होता है कि यह केवल एकाडेमिक अतर पर ही रह गया और सार्वजनिक / जन्ता के बीच इसका कोई प्रसार नही हुआ है /

हमारे केन्द्र मे ऐसे बहुत से मरीज आये है जिन्होने क्षार सूत्र चिकित्सा करायी लेकिन उनको किसी तरह का फायदा नही मिला और उनकी तकलीफ जस की तस बनी रही है / ऐसे लोगो की चिकित्सा ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन आधारित परीक्षणों  के परिणाम का अध्ध्य्यन करने के बाद कम्कीबाइन्ड / इन्टीग्रेटेद एप्रोच के साथ  आयुर्गवेदिक और होम्यीयोपैथिक और यूनानी और प्राकृतिक चिकित्सा आधारित जीवन शैली और खान पान आधारित मैनेज्मेन्ट के द्वारा की गयी जिसके अपनाने से रोगी ठीक हुये है /

५- फिस्चुला के रोग मे डाय्जेस्टिव सिस्टम के साथ साथ इन्डोक्राइन और इन्टेगुमेन्टरी सिस्टम और लिम्केफैटिक सिस्टम के  अलावा कई तरह की ब्लड केमिस्ट्री एनोमेलीज पैदा हो जाती है / महत्व पूर्ण अन्गो की पैथो-फीजियोलाजी को समझना होता है / इसके अलावा एक बात सबसे महत्व पूर्ण है कि हर मरीज की बीमारी के समीकरण एक जैसे हमेशा नही होते है इसलिये हर मरीज का INDIVIDUALISED ANALYSIS AND STUDY  बहुत आवश्यक होती है / तभी आयुर्वेदिक दवाओ / आयुष दवाओ का चुनाव और उसके अनुसार मैनेज्मेन्ट करने से फिस्टुला की बीमारी अवश्य ठीक होती है /

हमारे रिसर्च सेन्टर मे इसी तरह से इलाज करने की व्यवस्था है / ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन के साथ साथ अन्य दूसरे  परीक्षण करने की व्यव्स्था हमारे केन्द्र मे है / हमारे रिसर्च केन्द्र मे हमारी स्वय्म की  अपनी पैथोलाजिकल लैब है जिसमे सभी तरह के जरूरी परीक्षण करने की व्यव्स्था है / हमारा उद्देश्य रोग की जेनेसिस और उसके पाथ-वे को ढून्ढना है जहा से रोग की उतपत्ति होती है / हम इसी जेनेसिस यानी ROOT CAUSE OF DISEASE   का इलाज करते है और यही कारण है कि कई रोगो के इलाज मे हमे शत-प्रतिशत सफलता हासिल हुयी है, जो वास्तव के आश्चर्य जनक लगता है /

फिस्चुला लाइलाज बीमारी नही है और अधिकान्श्तया यह आयुष इलाज करने से ठीक हो जाती है /

 

कैन्सर के रोगियों का आयुर्वेदिक और आयुष और इन्टीग्रेटेड / काम्बीनेशन इलाज के परिणामों का अध्ध्य्यन ; STUDIES OF THE COMBINATION / INTEGRATED AYURVEDA AND AYUSH TREATMENT OF THE CANCER AFFECTED PATIENTS ;


कैन्सर के मरीजो का इलाज लम्बे समय से करते रहने से मुझे जिस तरह का अनुभव हुआ है वह सब मै आप सभी से शेयर करना चाहता हू /

बहुत बड़ी सन्ख्या मे मुझे कैन्सर के रोगियो का इलाज करने का मौका नही मिला है , लेकिन जितने भी मरीजो का इलाज किया है , भले ही उनकी सन्ख्या कम रही हो, ऐसे मरीजो की चिकित्सा करने से यह धारणा बनी है कि आयुर्वेद और आयुष चिकित्सा के साथ साथ अलोपैथी के पैन किलर्स और विटामिन मिनरल्स का यदि प्रयोह साथ साथ करते है तो कैन्सर के मरीजो को दर्द और घाव और रक्त श्राव को रोकने मे बिना केमोथेरापी और बिना रेडियेशन और बिना सर्जरी के सफलतापूरवक इलाज किया जा सकता है /

लेकिन यह आसान काम नही है और इसे हल्के मे नही लेना चाहिये / कैन्सर के मरीजो के इलाज के लिये और इस तरह की चिकित्सा व्यवस्था के लिये बहुत ही skilled Doctor की जरूरत होती है जिसमे इस बात की स्पेशियलाइज समझ हो जिसे आयुर्वेद के अलावा होम्योपैथी और यूनानी और प्राकृतिक चिकित्सा और इन सबके साथ एलोपैथी चिकित्सा के बारे मे स्पेशियलाइज जान्कारी और ग्यान हो / क्योन्कि दवाओ का आपस मे इन्टिग्रेट करना भी एक तरह की कला है और रोगी मे किस तरह से दवाओ का ताल्मेल बैठाना होगा और किस मात्रा मे देना होगा यह किसी समीकरण बैठाने की कला से कम नही है /

रोगी को कैन्सर की तकलीफ से हलाकि बहुत तरह के सिन्ड्रोम्स से गुजरना होता है / सब रोगियो के सिड्रोम्स अलग अलग किस्म के होते है जो उनके व्यक्तिगत कैन्सर अन्गो के प्रभावित होने के कारण से होते है / लेकिन इनमे कुछ बाते काम्न होती है जो सभी मरीजो मे पायी जाती है /

इसमे पहला सिन्ड्रोम दर्द है जो सबसे ज्यादा दुख दायी होता है / कुछ मरीजो को दर्द नही होता है ऐसा भी देखा गया है लेकिन यह दर्द बहुत भीषण होता है और दर्द से रोगी बहुत परेशान होता है / इस तरह के दर्द के मैनेज्मेन्ट मे आयुर्वेद की की दवाये कुछ सीमा तक कारगर साबित हुयी है, इनके सेवन करने से दर्द मे कमी होती है लेकिन दर्द ठीक नही होता है लेकिन दर्द की इन्टेन्सिटी लेवल कम हो जाती है और राहत बनी रहती है ऐसा अनुभव किया गया है /

दूसरा घाव अथवा व्रण का है / कैन्सर का घाव ठीक नही होता है यह सही है, इसमे सड्न और बदबू आने लगती है, क्रैक्स के कारण खून बहने लगता है जो रुकता नही है और यह बढता चला जाता है इसके रोकने के उपाय भी कम्जोर पड़ जाते है / कम्बाइन्ड और इन्टीग्रेटेद इलाज करने से घाव का बढने की टेन्डेन्सी कम हो जाती है लेकिन यह बाहर के घावो तक ही सीमित है जहा बाहर से यानी external remedies को apply किया जा सके / घाव अगर अन्दर है तो भी सीमित स्तर की राहत हो सकती है /

तीसरा सूजन की तकलीफ होने लगती है / यह सारे शरीर मे या शरीर के कुछ हिस्सो मे हो सकती है / कैन्सर एक तरह से मेटास्टेसिस की बीमारी है जो लिम्फैटिक सिस्टम के काम करने की वजह से सारे शरीर मे फैलने की आशन्का को बढा देती है / इसलिये स्प्लीन और थाइमस ग्लैन्ड्स को सम्भालने की जरूरत होती है / आयुर्वेद मे इस सिस्टम को काबू मे रखने के लिये बहुत सी द्वाये है और इस अवस्था का इलाज समभव है /

कैन्सर के रोग का इलाज बहुत महन्गा है इसलिये इस बीमारी के इलाज के लिये धन की जरूरत होती है / साधारण दवाओ से काम न चलने पर महन्गी दवाओ की जरूरत होती है जो हर मरीज के लिये सम्भव नही होता है /

इस बीमारी से बचने का एक ही उपाय है कि स्वास्थय के बारे मे सतर्कता बरती जाय और स्वास्थय बनाये रकहने के लिये जितने उपाय है वे सभी किये जांय / कहा भी गया है कि PREVENTION IS BETTER THAN CURE यानी ऐसे स्वास्थय रक्षा के उपाय किये जाय कि यह बीमारी ही न हो /

हमारे यहा आयुर्वेद की आधुनिक तकनीक ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन के परीक्षण के आधार पर कैन्सर के रोगियो का इलाज किया जाता है / जैसा कि इस तकनीक की विशेषता हि कि यह सभी सिस्टम के बारे मे किस तरह के बदलाव होते है यह पता चल जाता है और उसी के आधार पर इलाज करने से सफलता मिलती है / जैसा कि मै हमेशा कह्ता हू /

एच०आई०वी० के मरीजो मे काप्लीकेशन्स डिसआर्डर्स ; COMPLICATION DISORDERS IN H.I.V. PATIENT


एच०आई०वी० के मरीजो की बड़ी सन्ख्या मे इलाज करने के बाद मुझे जिस तरह का अनुभव मरीजो के इलाज के साथ साथ हुआ है, उसके बारे मे जिस तरह का अनुभव हुआ है वह मै सबसे शेयर करना चाहता हूं /

पहला अनुभव यह रहा है कि रोगी जितनी जल्दी चिकित्सा के लिये डाक्टर के पास आता है उसे उतनी ही जल्दी बीमारी से बचने का रास्ता मिलता है / जैसे ही यह शक हो कि उसे एच०आइ०वी० होने का खतरा है , उसे तुरन्त ही आयुर्वेदिक और आयुष या कोई भी दूसरा इलाज शुरू कर देना चाहिये / हमारे यहा ई०टी०जी आयुर्वेदास्कैन और अन्य दूसरी पथोलाजिकल जान्चे किये जाने की सुविधा है और एच०आई० वी० से सम्बन्धित वे सभी जान्च की जाती है जिनमे ब्लड और यूरिन और अन्य किसम की जान्च होती है जिन्ससे शरीर के अन्दर होने वाली एनोमेलीज का पता लगाया जा सकता है / सारा डाटा मिल जाने के बाद आयुर्वेद और आयुष का इलाज करने से प्रारम्भि अवस्था का एच०आई०वी सन्क्रमण समाप्त होता है, ऐसा मेरा मना है / हलान्कि मै मरीजो को सलाह देता हू कि वे हर चार महीने या छह महीने के अन्तराल से अपना सी डी ३ और सी डी ४ और सी डी ८ काउन्ट बराबर जान्चते रहे / इस तरह की मानिटरिन्ग करने से एच०आई०वी० का सन्क्रमण बढता नही है बल्कि शान्त अवस्था मे पड़ा रहता है और सक्रिय नही होता है /

दूसरा अनुभव यह रहा है कि ए०आर०टी० इलाज कराने के बावजूद भी बहुत से रोगी अथवा रोगुयों की स्वास्थय की हालत as it is यानी जस के तस बनी रही और उनको किसी तरह का फायदा नही हुआ / बहुत से ऐसे मरीज इलाज के लिये आये है जो १० अथवा १५ साल से ए०आर०टी० की टिकिया खा रहे थे और उनको कोई भी remarkable फायदा नही हुआ / ऐसे मरीजो के उनके सी०डी० काउन्ट भी बढते रहे अथवा घटते रहे और किसी तरह का बुनियादी परिवर्तन नही हुआ / हमारे यहा ऐसे मरीजो की सन्ख्या इलाज के लिय बड़ी सन्ख्या मे आयी है / ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन परीक्शन के अलावा अन्य दूसरे परीक्षण करने के उपरान्त आयुर्वेद और आयुष का इलाज किया गया उससे बड़ी सन्ख्या मे मरीजो के सी०डी० काउन्ट सामान्य स्तर पर आ गये अथवा बार्डर लाइन पर स्थापित हुये हैं / इससे यह निष्कर्ष निकाला जा स्कता है कि दिया गया इलाज एच०आई०वी० मे प्रभाव शाली है / यह जरूर है कि हमारे यहा आयुर्वेदास्कैन परीक्षण और अन्य दूसरे परीक्षण के बाद ही इलाज किये जाने की व्यव्स्था है,इसलिये जरूरी होता है कि पहले परीक्षण करके सब पता किया जाय कि किस तरह की problems और anomalies शरीर के अन्दर जन्म ले रही है / उसी अनुसार इलाज करने से H.I.V. की बीमारी पर नियन्त्रण करने का प्रयास किया जा स्कता है / बहुत से मरीजो मे सफलता मिली है लेकिन ऐसे भी मरीज है जिनमे सफलता तो नही मिली लेकिन उनकी तकलीफे बढी नही, उनके स्वास्थय मे सुधार हुआ, उनको किसी तरह की परेशानी का अनुभव नही हुआ लेकिन सी०डी० काउन्ट परीक्षण कराने मे बहुत महत्वपूर्ण बदलाव भी नही हुये है / ऐसा भी देखने मे आया है , हलान्कि यह सभी मरीज आयुर्वेद और आयुष का इलाज बाकयदा ले रहे है और अपना जीवन का कार्य सामन्य व्यक्ति की तरह से ही कर रहे है /

तीसरा अनुभव H.I.V. मरीजों के साथ यह रहा है कि जब एच०आई०वी का सन्क्रमण बढता है , यह हमेशा मरीज की लापरवाही की आदत और दवाओ के ठीक ठीक सेवन न करने और डाक्टर की राय न follow करने की वजह से होता है / ऐसे सन्क्रमण के बढने से पहला रियक्शन यह होता है कि रोगी को मलेरिया जैसा बुखार आने लगता है या टायफायड जैसा बुखार आने लगता है / यह बुखार आना इस बात का सन्केत होता है कि रोगी का इन्फेक्शन का लेवल बढ रहा है / H.I.V. CARD से टेस्ट करने पर hiv 1 – hiv2 दोनो ही positive मिलते है / ऐसे लक्षण होने पर खून की जान्च करने पर Heamoglobin का प्रतिशत सामान्य से बहुत कम और ESR का लेवल सामान्य से ज्यादा यानी दोनो ही घटे और बढे हुये मिलते है / किसी किसी रोगी को टेस्ट कराने पर typhoid या malaria या tuberculosis की बीमारी का पता चलता है और ऐसे मरीजो मे कभी कभी एच०आई०वी० पाजिटिव नही मिलता है जब्कि वे पहले से h.i.v. positive होते हैं /

ऐसे रोगियों के बारे मे मेरा मानना है और इस बात मे शक की गुन्जायश भी शामिल है कि कही यह auto-immunity का मामला तो नही बनता है ? ठीक उसी तरह से जैसे सभी डाक्टर मरीजो को देखते देखते और उनकी जान्च करते करते auto-immune हो जाते है / एक बात और है जो समझने लायक है वह यह कि जब हर साल बरसात के दिनो मे या मौसम बदलने के समय , बीमारी फैलाने वाले वायरस अपना चोला यानी आकार बदल कर कोई नये किस्म की बीमारी फैला देते है , इसलिये कही यह तो नही होता कि h.i.v. का वायरस typhoid अथवा malaria अथवा tuberculosis के वायरस या बैक्टीरिया के साथ मिल जाता हो या convert करता हो और फिर टेस्ट करने पर hiv का वायरस न पकड़ मे आने के बजाय टेस्ट में यह बताये कि tubercular infection है ? ्नतीजा बहुत confusion पैदा करता है कि मरीज को टी०बी० का इलाज किया जाये या एच०आई०वी० का / क्योन्कि अगर एच०आई० वी० का इलाज करते है या टी०बी० का इलाज करते है तो सन्शय इस बात का बना रहेगा कि मरीज को बीमारी जिसका इलाज कर रहे है वह है भी या नही है / ऐसे मे चिकित्सा कार्य सही नही हो सकता है /

चौथी बात यह अनुभव मे आयी है कि hiv के मरीजो को खून की कमी के साथ साथ serum creatinine बढने की बीमारी पैदा होती है / हीमोग्लोबिन पेर्सेन्टेज एक तरफ कम होने लगता है और दूसरी तरफ सिरम क्रियेटीनाइन बढता चला जाता है / हलाकि यह अचानक नही होता है यह धीरे धीरे बढता है और गर मरीज सावधान रहे और मुकम्म्ल इलाज करता रहे तो फिर क्रियेटीनाइन लेवल एक स्तर तक बना रह्ता है / म्रीज द्वारा की गयी एक भी साधारण सि गलती या जरा सी भी गलती उसके लिये जान लेवा साबित हो सकती है / इसलिये एच०आई० वी० के रोगी को हमेशा हर महीने हीमोग्लोबिन और क्रियेटीनाइन दोनो का परीक्षण कराते रहना चाहिये /

पान्चवी बात यह समझ मे आयी है कि hiv के रोगी को अगर डायबिटीज हो जाती है तो यह बहुत खतरनाक साबित होता है / ऐसी स्तिथि मे मरीज दिन पर दिन कम्जोर होता जाता है और उसका शारीरिक पतन होता चला जाता है /

एक बात जो सबसे महत्व पूर्ण है , वह यह कि जैसे ही मरीज को पता चले कि उसको एच०आई०वी० सन्क्रमण होने की आशन्का है , मरीज को आयुर्वेद या आयुष का इलाज बिना देर किये शुरू कर देना चाहिये / शरीर की Physiology मे pathological परिवर्तन होने से पहले अगर यह सब करते है तो इससे फायदा ही होगा / अगर इनफेक्शन नही भी है तो शरीर का detoxification हो जायेगा और अगर infection है तो सन्क्रमण का इलाज होकर शरीर detoxify हो जायेगा / ऐसा मैने अनुभव किया है /

H.I.V. के मरीजों के complications और दूसरे disorders को देखने और समझने मौका मुझे मिला है और इसके अलावा मुझे और भी अनुभव HIV के मरीजो के काम्पलीकेशन्स के बारे मे हुये है , उनको मै फिर कभी आप सबके साथ शेयर करून्गा /

INTRODUCTION TO E.T.G. AYURVEDASCAN TECHNOLOGY ; IN HINDI LANGUAGE ; FREE BOOK DOWNLOAD ; FIND THE LINK TO SLIDESHARE.COM/DRDBBAJPAI ; ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन टेक्नोलाजी का परिचय, पुस्तक का हिदी सन्स्करण इन्टर्नेट पर मुफ्त मे उपलब्ध है ; जानिये आयुर्वेद की आधुनिक हाई टेक्नोलाजी ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन टेक्नोलाजी के बारे मे विस्तार से कि यह क्या है ?


LONG AWAITED BOOK ON THE INTRODUCTION OF E.T.G. AYURVEDASCAN TECHNOLOGY ; is now available free on internet. The internet edition can be downloaded free of cost from the following given  link.

So many requests from the Ayurveda lovers to know about the E.T.G. AyurvedaScan Technology as a primary as well as advance level  introduction desired by the practitioners. Although much have been published about the technology  in Ayurveda journals about the technology along with publication of  research papers in Ayuveda Journals and several magazines.

It is felt by me that majority of Ayurvedic doctors and Ayurveda lovers do not know  even the least about the ETG AyurvedaScan technology, so therefore it is a difficult task to understand the technology for them. Narration about the technology to each and every one is a difficult job for me, therefore I thought to write a small book as a introductory material for all and for those who can use it.

The following link is given ;

Thjs book is in HINDI LANGUAGE and  contains the essential information about  E.T.G. AyurvedaScan and its procedures and theory and practices.

This book is a first attempt to give the information and technique of the technology in a place.

मस्कुलर डिस्ट्राफी ; मान्श्पेशियों का मोटा होना ; लाइलाज बीमारी का इलाज आयुर्वेद और आयुष चिकित्सा विग्यान मे सम्भव है


मस्कुलर डिस्ट्राफी यानी शरीर की मान्श्पेशियो मा मोटा होना और उनका आकार बढना ; यह एक तरह की आधुनिक चिकित्सा विग्यान के हिसाब से लाइलाज बीमारी है /

लेकिन यह भले ही लाइलाज बीमारी बता दी गयी हो और इसका कोई इलाज नही है ऐसा समझना गलत है / यदि आधुनिक चिकित्सा विग्यान मे इस बीमारी का इलाज नही है तो इसका मतलब यह नही निकाला जाना चाहिये कि बीमारी लाइलाज हो गयी है /

आधुनिक आयुर्वेद मे ऐसी तमाम बीमारियो का इलाज है जिनको अधिकान्श्त: चिकित्सक लाइलाज बता देते है / अभी तक चिकित्सक गणो को पता ही नही था कि इन सभी बीमारियो का इलाज आयुर्वेद मे है / आयुष चिकित्सा विग्या जिसमे आयुर्वेद और होम्योपैथी और यूनानी और सिध्ध और प्राकृतिक चिकित्सा के मिले जुले कम्बाइन्ड और इन्टीग्रेटेद तरीके से इलाज करने और मैनेज्मेन्ट करने से ऐसी तमाम बीमारियो का इलाज सम्भव है जिनको लाइलाज बता दिया गया है /

मस्कुलर डिस्ट्राफी भी ऐसी ही श्रेणी की बीमारी बता दी गयी है जिसका कोई इलाज नही है / लेकिन अब ऐसी बीमारी का इलाज सम्भव है /

नीचे दिया गया केस एक 5+ साल के लड़्के का है / जब यह तीन साल का था तब इसको पी०जी०आई० चन्डीगढ मे दायग्नोस किया गया था कि इसे मस्कुलर डिस्ट्राफी है / इसके पैरेन्दोट्स को बताया गया कि  इस बीमारी का कोई इलाज नही है और यह लाइलाज बीमारी है , इसको जीवन भर ऐसे ही गुजारना होगा / बच्चे के पैरेन्ट्स ने बहुत जगह अन्ग्रेजी इलाज कराया लेकिन बीमारी ठीक होने मे किसी भी तरह की कोई  सफलता नही मिली  / २ साल तक इलाज कराने के बाद किसी ने मेरे यहा आकर इलाज कराने की बात बतायी /

मरीज का ई०टी०जी० आयुर्वेदास्क्लैन परीक्षण किया गया / उसमे प्ता चला कि इसे किस किस सिस्टम की कितने लेवल की और कितनी इन्टेन्सिटी की कार्य विकृति और विकृति मौजूद है / इस बच्चे के जितने भी सम्भव टेस्ट थे वह सब किये गये /

नीचे दी गयी टेस्ट रिपोर्ट मे लम्बे समय तक किये गये आब्जर्वेशन और रिकार्डिन्ग से पता चला कि इसे अन्दर शरीर मे किस तरह के परिवर्तन टाइम टु टाइम होते रहते है , यहइलाज करने और   चिकित्सा के लिये जानना बहुत जरूरी होता है /

 

 

ऊपर की रिपोर्ट देखने पता चला कि इस बच्चे को हमेशा बुखार बना रहता है और यह घटता बढता रहता है / ई०टी०जी०  आयुर्वेदास्कैन  वेव्ज भी एक समान नही है और इनमे हारीजेन्टल और वर्टीकल दोनो ही वेव्ज अनियमित है / इस तरह की अनियमित वेव्ज से रोग निदान करने मे और इसके हिसाब से सटीक द्वाओ का चुनाव करने मे सफलता मिलती है और किसी तरह की गलती की गुन्जायश नही रहती है /

इस बच्चे का रोग निदान करके और इसकी बीमारी का कारण खोज लेने के बाद इसे आयुर्वेदिक और होम्योपैथिक और यूनानी और अन्य दवाओ का प्रेस्क्रिप्शन १२० दिन तक खाने के लिये बता दिया गया है /

हमारे यहा जितने भी मस्कुलर डिस्ट्राफी के रोगी इलाज के लिये आये है  सभी को आरोग्य मिला है /