0001 AYURVEDA e-BOOK ON E.T.G. AYURVEDASCAN : PRINTABLE VERSION ; FIRST EDITION : 2017 ; TITLE – ”आयुर्वेद सिध्धान्तो का आधुनिक हाई-टेक्नोलाजी इलेक्ट्रो त्रिदोष ग्राफ ; ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन आधारित वैग्यानिक अध्ध्य्यन” SCIENTIFIC STUDIES OF AYURVEDA FUNDAMENTALS ON THE BASIS OF E.T.G. AYURVEDASCAN LATEST HI- TECHNOLOGY

आयुर्वेद सिध्धान्तो का

आधुनिक हाई-टेक्नोलाजी इलेक्ट्रो त्रिदोष ग्राफ ;

ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन आधारित

वैग्यानिक अध्ध्य्यन

आयुर्वेद की आधुनिक निदान ग्यान समाधान की

अत्याधुनिक तकनीक द्वारा प्राचीन तथा अर्वाचीन  विग्यान के

सह-सम्बन्धों का  समन्वित दृष्टिगत विवेचना

लेखक और सम्पादक ;

डा० देश बन्धु बाजपेयी

B.M.S. [Lucknow],   Ayurvedacharya [Delhi],   D.P.H. [ Germany]

M.I.C.R. [Mumbai],  C.R.C. [ Cardio-vascular ]

M.D. [ Medicine],   Ph.D. [ E.T.G. Technology]

अन्वेषक और मुख्य ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन इन्वेस्टीगेटर,

 

 

 

कनक पालीथेरापी क्ळीनिक एवं रिसर्च सेन्टर,

६७ / ७०,   भूसाटोली रोड, बरतन बाज़ार,

कानपुर २०८००१ , U.P., India

मोबाइल ;07376301730 फोन; 0512 2367773

 

 

 

 

 

 

 

सन्स्करण ; प्रथम आवृत्ति ; जनवरी,  सन २०१७

 

 

 

 

 

 

 

मूल्य ; ३००/- तीन सौ रुपये प्रति पुस्तक

 

 

 

 

 

कापीराइट ( C ) ; सर्वाधिकार प्रकाशक द्वारा सुरक्षित

 

 

 

 

 

मुद्रक और प्रकाशक ;

 

कनक पालीथेरपी क्लीनिक एवम रिसर्च सेन्टर प्रकाशन,

६७ / ७०, भूसाटोली रोड, बर्तन बाज़ार,

कानपुर – २०८००१, उत्तर प्रदेश, भारत

 

 

 

 

 

Web site : ayurvedaintro.wordpress.com

E-mail : drdbbajpai@gmail.com

 

 

 

 

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विषय सारिणी ;

  • पहला अध्ध्याय ; भारतीय चिकित्सा विग्यान की चिकित्सकीय प्ध्ध्यति पेज सन्ख्या ;

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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DEDICATED TO

 

 

 

 WHOM I LOVE TOO

bandhu

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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Preface ; प्राक्कथन

आयुर्वेद के नाड़ी परीक्षण के मूल सिध्धान्तों को एक तरफ  आधार मानकर  तथा दूसरी तरफ आधुनिक वैग्यानिक दृष्टिकोण को स्वीकार करते हुये और इसके साथ साथ आधुनिक वैग्यानिक खोजों तथा प्राचीन ग्यान के बीच मे अन्त: सम्बन्ध यानी को-रिलेशन को केन्द्रीय विचार मानते हुये  आयुर्वेद के अन्य तमाम मौलिक सिध्धन्तो को वैग्यानिक सामन्जस्य को साथ लेते हुये  और तारतम्य और एकरूपता को एक सूत्रीय  बनाये रखते हुये ऐसे विचार को लेकर प्रस्तुत पुस्तक की  रचना की गयी है /

 

आयुर्वेद के आदि रचित शास्त्रीय ग्रन्थो मे आयुर्वेद के मौलिक सिध्धन्तो का प्रतिपादन किया गया है / इन सिध्धान्तो और नियमो को  लेखको और व्याख्याकारों द्वारा कई तरह से समझाने की कोशिश की गयी है / आयुर्वेद के सिध्धान्त यथा दोष, त्रिदोष, त्रिदोष भेद, सप्त धातुयें, मल, उप-धातुयें और कार्य विकृति और दोष विकृति और स्थापित दोषो के शरीर मे स्थान आदि की व्याख्या चरक, सुश्रुत, वाग्भठ्ठ, भाव मिश्र , शारन्गधर आदि के द्वारा  की गयी है /

 

नाड़ी परीक्षण के द्वारा त्रिदोषो का ग्यान करने का परिचय भाव प्रकाश ग्रन्थ मे मिलता है / वैग्यानिक दृष्टिकोण से देखा जाय तो यही एक आयुर्वेद मे परीक्षण विधि है जिसके द्वारा शरीर के त्रिदोषो का अन्कलन किया जा सकता है / आयुर्वेद के ग्रन्थों में पन्च विधि और अष्ट विधि और दश विधि परीक्षण के अलावा आकृति परीक्षा और मल तथा मूत्र और स्वेद परीक्षा का भी वर्णन ग्रन्थों में मिलता है , जिनके द्वारा भी त्रिदोष का अन्कलन किया जा सकता है , ऐसा आयुर्वेद के महर्षियो ने बताया है /

 

यद्यपि वैग्यानिक दृष्टिकोण से और आधुनिक प्रत्यक्ष और प्रमाण की दृष्टि से साक्ष्य आधारित विधि का नूतन आविष्कार, जिसको ” इलेक्ट्रो त्रिदोष ग्राफ ; ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन ” का नाम करण लेखक द्वारा किया गया है, इस विधि द्वारा आयुर्वेद के लगभग समस्त मुख्य मौलिक सिध्धन्तो का मूल्यान्कन किया जा सकता है, जिन्हे आयुर्वेद मे बताया गया है / यह परीक्षण आधुनिक डिजिटल कम्प्यूटेराइज़्ड मशीनो द्वारा किया जाता है, इसलिये अब आयुर्वेद साक्ष्य आधारित चिकित्सा विग्यान यानी इवीडेन्स बेस्ड मेडिकल साइन्स हो गयी है /

 

ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन सिस्टम को भारत सरकार द्वारा परीक्षित किया जा चुका है / प्राचीन विग्यान और अर्वाचीन विग्यान दोनों के समन्वयन के द्वारा आयुर्वेद को आधुनिक वैग्यानिक स्वरूप देने का प्रयास  लेखक और सम्पादक द्वारा किया गया है /

बसन्त पन्चमी                                     देश बन्धु बाजपेयी

सम्वत २०७३                                                       4

 

 

 

 

भारतीय चिकित्सा विग्यान की चिकित्सकीय  पध्यति

 

 

आयुर्वेद, जिसे भारतीय चिकित्सा विग्यान की चिकित्सकीय  पध्यति कहते हैं , लगभग पान्च हज़ार साल पुराना औषधि चिकित्सा विग्यान है / ऐसा आयुर्वेद के विद्वानो और विशेषग्यों का मानना है /

 

सम्पूर्ण आयुर्वेद  इस विचार धारा पर आधारित है कि मानव जीवन अगर इस प्रकृति ने दिया है तो उसके जीवन को कैसे और किस तरह से सुरक्षित किया जाये ताकि मानव को लम्बी उम्र मिले और इस धरा पर आबाध गति से जीवन बना रहे और जब तक यह धरा है तब तक यही सिल्सिला चलता रहे / ताकि पृथ्वी जीवित रहे और इस धरा पर वीरानी न हो /

आयुर्वेद भारतीय मनीषियों के कठिन और सतत दृष्टि आकलन और मानसिक विवेचनाओं के

परिणाम स्वरूप प्राप्त ग्यान है जिसे स्वस्थय और स्वास्थय और रुघ्ण चिकित्सा से जोड़ा गया है /

प्राचीन काल से चले आ रहे इस विग्यान का महत्व वर्तमान मे अधिक तर्क सन्गत हो गया है /

 

इस धरा पर प्राप्त और स्थापित और मिलने वाले ग्यात और अग्यात प्रकृति के मूल तत्वो यथा जल और वायु और पृथ्वी और ताप-प्रकाश और आकाश जैसी प्राकृतिक शक्तियो के द्वारा निर्मित इस पृथ्वी के ऊपर विचरने वाले सभी जीव जन्तुओ और वानस्पतियों को जीवन देने और जीवन नाश करके पुन: इन्ही तत्वों मे विलीन होने की अद्भुत शक्ति निहित है  / इसीलिये इस पृथ्वी पर सभी वनस्पतिया और जीव और जन्तु अन्त मे इन्ही सब तत्वो मे विलीन हो जाती है /

 

ऐसा दार्शनिक विचार शताब्दियों से हमारे चिन्तको और विचारकों ने व्यक्त किये है / चिन्तकों ने इसी विचार धारा को आगे बढाते हुये ‘’सान्ख्य दर्शन ‘’ की रचना की है, जिसके मूल तत्वों मे प्रकृति और पुरुष केन्द्र बिन्दु हैं / प्रकृति के इन तत्वो को पन्च महाभूत का नाम दिया गया है / ऐसा माना गया है कि यही पन्च महाभूत और इनमे निहित शक्तियां ही इस धरा पर रहने वाले प्रत्येक जीवित या निर्जीव पदार्थो को प्रभावित करती हैं /

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पृथ्वी पर पाये जाने वाले पान्च तत्वों का किस तरह से आयुर्वेद मे बर्णित त्रिदोष सिध्धान्त का

सान्ख्य दर्शन से को-रिलेशन ( सह सम्बन्ध )  किया गया है और इसके मूल तत्व क्या है और

किस तरह योग बनाकर उत्पन्न हुये है और ये क्या हैं ?

 

आयुर्वेद के बारे मे आयुर्वेद के महर्शियो और विद्वानो द्वारा  बताया गया है कि यह भारतीय दर्शन शास्त्र जिसे “सान्ख्य” कहते है , इसी  ” सान्ख्य दर्शन ” पर आधारित है /

 

भारत वर्ष मे आनादि काल से  ग्यान और विग्यान और गूढ़  विषयों पर यहा के रहने वाले मानव हमेशा ही अपने मष्तिष्कीय  विचारों का सर्वोच्च उपयोग मानव कल्याण के लिये और सम्पूर्ण मानव जाति के कल्याण के लिये करते रहे हैं / ” वसुधैव कुटुम्बकम ” यानी इस पृथ्वी पर रहने वाले सभी मानव  और मानव जाति और पशु पक्षी और वनस्पतिया आदि आदि सभी हमारे परिवार है और हमारे परिवार के सदस्य है, ऐसा विशाल हृदय की अवधारणा भारत के रिशी मुनियो और विद्वानो ने की थी / ऐसी भावनाओ का विकास उस समय किया गया था जिस समय आने जाने के साधन नही थे और और न ही सम्वाद कायम करने के लिये कोई साधन जैसा कि आज हमारे लिये उपलब्ध है / यह धारणा और ऐसी विलक्षण सोच जिसमे मानव जाति के कल्याण के लिये इस तरह से विचार किया गया हो , शायद ही इस पृथ्वी के किसी देश मे या देश के लोगो ने सोचा हो /

आयुर्वेद चिकित्सा विग्यान  बहु-उद्देश्यीय मानव कल्याण और मानव स्वास्थय

के विभिन्न पहलुओं को लेकर जुड़ा हुआ है /

 

रिशी मुनियों की ऐसी  सोच के कारण और इसी तरह की मानव कल्याण की भावनाओ के साथ साथ प्राप्त

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ग्यान को सत्यता की कसौटी पर उतारा गया और जो भी सत्य मिला चाहे उस सत्य को पाने के लिये

कितने ही प्रयास किये गये हो और अन्त मे जिस सत्य की प्राप्ति हुयी उसे अन्गीकार कर लिया गया और पठन पाठन के लिये इस ग्यान को सुरक्षित रखने के लिये ”श्रूति” और ”स्मृति”  जैसी विधाओं का सहारा लिया गया /

 

जब अन्को और अक्षरो का लिपि करण अथवा लेखन कार्य द्वारा अभिव्यक्ति का  आविष्कार नही हुआ था तब अर्जित ग्यान को पीढी दर पीढी और आगे आने वाली पीढियो को अर्जित ग्यान को देने के लिये और इस ग्यान को आने वाली जेनेरेशन यानी पीढियों को बढाने के लिये सुनने के द्वारा  यानी ”श्रुति” और मन और मष्तिष्क द्वारा याद करने और याद रखने की क्षमता यानी  ”स्मृति” द्वारा रिशी मुनियो द्वारा प्राप्त किये ग्यान को सुरक्षित रखा गया ताकि यह नष्ट न हो सके और पीढी दर पीढी  हमेशा जीवित रहे /

 

ऐसा कार्य लगातार और अनवरत बिना किसी बाधा के  पीढी दर पीढी  हजारो साल तक चलता रहा जब तक कि अन्को और अक्षरों की लिपि का आविष्कार नही हुआ / लिपि का किस तरह विकास हुआ , इसके बारे मे केवल कयास अथवा अनुमान लगाया जा सकता है / ऐसा विकास क्रम कच्ची मिट्टी से लेकर पत्थरो और फिर लकड़ी से लेकर भोज पत्र और दूसरी वनस्पतियो के टिकाऊ अन्गो. जिन पर कुछ लिखा जा सकता हो और फिर  धातुओ यथा लोहा और ताम्बा  की स्लॆट से लेकर आधुनिक कागज तक का सफर और फिर डिजिटल तक यह ग्यान उत्तरोत्तर विकास की दशा और दिशा मे बढता चला जा रहा है / आज विश्व गुरू होने के नाते जिस तरह से इस स्तर तक हमारे पूर्वजो का ग्यान सारी दुनियां के लोग उठा रहे है उसके पीछे हमारे पूर्वजो का अथक परिश्रम और मानव जीवन के कल्याण का क्या मार्ग हो सकता है और उस सत्य को पहचानने और इस पृथ्वी पर जन्म लेने का उद्देश्य क्या है ? यह प्रश्न हमेशा से ही  मानव जाति को आइना दिखाती है /

समूचे विश्व मे वेदों की रचना भारत देश मे हुयी है / वेद देव भाषा सन्स्कृत मे लिखे गये है और लिपि बध्ध किये गये है /

 चारो वेद भारत देश की सर्वोत्तम पहचान है / ’”वसुधैव कुटुम्बकम”यानी सारी धरती हमारा परिवार है

और सत्य मेव जयते यानी सत्य की हमेशा जीत होती है, जैसे सूत्र वाक्य वेदो से ही हमारे बीच मे आये हैं /  

 

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आदिकाल से रिषी-मुनियो और विद्वान और ग्यानी लोगो ने प्रकृति से और इस धरा की शक्तियो से जिस तरह का ग्यान अर्जित किया उसे वेद के स्वरूप मे प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है /

 

वेदों के बारे मे बताया गया है और जिसे आज भी सारी दुनिया मानती है कि यह सम्भवता अति प्राचीन दुर्लभ लिपि-बध्ध रचना है जो प्राचीन देव अथवा वेद भाषा सन्स्कृत मे लिखा गया है  / सन्स्कृत भाषा परिमार्जित होकर लिपि स्वरूप मे लायी गयी और सभी वेदों का लिपी करण इसी भाषा मे किया गया /

 

मुख्यतया चार वेद लिपि बध्ध है /

 

१- अथर्व वेद

२- साम वेद

३- यजुर्वेद

४- रिग वेद

 

इनके अलावा अन्य बहुत सी रचनाये काला्न्तर मे आयी जिनका ता्ल्लुक मूल रूप से पृथ्वी और इसके अन्दर सन्चित और पायी जाने वाली वस्तुओ और ग्यात अग्यात शक्तियों और परा-शक्तियो और अलौकिक शक्तियो से सन्कलित थी / इन सबको देखकर यह क्यो होता है ? क्यो हुआ ? किसलिये हुआ ? कैसे होता है ? इसके पीछे क्या उद्देश्य है ? यह छिपी हुयी शक्तिया हमारे ऊपर क्या अच्छा और क्या खराब प्रभाव डालती है ? ऐसे सैकड़ों और हजारों प्रश्न जिग्यासु मानव के मन मे और मष्तिष्क मे उठते होन्गे और इन सब प्रश्नो का उत्तर ढून्ढने के लिये उसने जितने भी प्रयास किये यह केवल उस सत्य को जान लेने की दिशा मे उसके मन की उत्कट आकान्क्षा का परिणाम है /

 

इसी तरह मानव की आयु को लेकर जिस शास्त्र का अध्ध्य्यन हमारे रिषी मुनियो ने किया , उसे आयुर्वेद का नाम दिया गया यानी वह ग्यान जो आयु से सम्बन्धित हो /

 

आयुर्वेद को हमारे रिशी मुनियो ने दो भागो मे मूल रूप से विभाजित किया / पहला मार्ग दर्शन रिषी मुनियो का यह था कि मानव ऐसा आचरण करे कि वह बीमार न हो या अस्वस्थ्य न रहे / इसके लिये “स्वस्थ्य वृत्त” के नियम बनाये गये / यह नियम दिन चर्या, रात्रि चर्या, मास चर्या, रितु चर्या के साथ साथ बताये गये है / यानी वर्ष भर बदलते हुये मौसम और दिन प्रतिदिन और हर मास मौसम मे होने वाले बदलाव  के परिणाम स्वरूप और इस बदलाव से होने वाले दबाव के कारण  शरीर पर होने वाले प्रभाव से उत्पन्न बीमारियो से बचाने के लिये किये जाने वाले दिन प्रतिदिन के आचरण यथा सोना, खाना पीना आदि के बारे मे जानकारी बतायी गयी है / ताकि मानव स्वस्थय रहे और इस धरा अथवा पृथ्वी पर मानव जाति का रिप्रोडक्शन [REPRODUCTION] बराबर होता रहे / क्योन्कि अगर इस पृथवी पर मानव अगर अपने वन्शज नही पैदा करेगा तो यह पृथ्वी मानव रहित हो जायेगी और यहा केवल बन्स्पतिया या जानवर ही विचरण करेन्गे और इसके अलावा दूसरा कोई भी नही /

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रिषी मुनियो द्वारा आयुर्वेद का  बताया गया  दूसरा पहलू यह है कि अगर मानव शरीर बीमार हो जाये तो उसे पुन: स्वस्थय रखने के लिये या स्वस्थय करने के लिये किस तरह के उपाय किये जांय जिससे उसकी अस्वस्थता दूर की जा सके /

 

 

इन दोनो प्रयोजनो के लिये रिषी मुनियों ने आयुर्वेद के सिध्धान्तो का प्रतिपादन किया / सिध्धान्तो के इस तरह के प्रतिपादन को निर्धारित करने मे प्रकृति के अन्दर प्राप्त शक्तियो को ऐसा वैचारिक और तार्किक स्वरूप दिया गया जिसे ’”सान्ख्य’” दर्शन के नाम की सन्ग्या दी गयी /

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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सान्ख्य दर्शन ;

भारतीय दर्शन की इसी विचार धारा पर आयुर्वेद आश्रित है

 

यद्यपि सान्ख्य दर्शन का मूल विषय सर्वथा आयुर्वेद से अलग है और यह आन्शिक रूप से सान्ख्य दर्शन के कई भागो को लेकर आयुर्वेद के मूल सिध्धान्तो की रचना करता है / आइये, समझते है कि सान्ख्य दर्शन के वे मूल तत्व कौन से है जिन्हे आयुर्वेद के सिध्धन्तो के रूप मे समाहित किया गया है  /

 

 

सान्ख्य दर्शन का लेखन महर्षि कपिल ने किया है /

भारतीय सान्ख्य दर्शन को भोतिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से वैग्यानिक विवेचना के समीप

माना जाताहै / विद्वानो का मानना है कि सान्ख्य दर्शन इस पृथ्वी पर मौजूद सभी तत्वों का

प्रतिनिधित्व करता है, इसलिये इसमे सभी वैग्यानिक तत्वो एवम सभी

वैग्यानिक विधाओं का समावेश है /

 

 

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सान्ख्य दर्शन यद्यपि सान्ख्य दर्शन का मूल विषय सर्वथा आयुर्वेद से अलग है और यह आन्शिक रूप से सान्ख्य दर्शन के कई भागो को लेकर आयुर्वेद के मूल सिध्धान्तो की रचना करता है / आइये, समझते है कि सान्ख्य दर्शन के वे मूल तत्व कौन से है जिन्हे आयुर्वेद के सिध्धन्तो के रूप मे समाहित किया गया है  /

 

सान्ख्य दर्शन  के बारे मे निम्न प्रकर से बताया गया है / सान्ख्य दर्शन की रचना निम्न तत्वो से मिलकर बनी है /

 

१- ५ महाभूत FIVE EARTHLY ELEMENTS

२- ५ तन्मात्रायें

३- ५ कर्मेन्द्रियां.

४- ५ ग्यानेन्द्रियां

५- ४ [A] मन [B] बुध्धि [C] चित्त और [D] अहन्कार

६- १ आत्मा SPIRIT

 

सान्ख्य दर्शन में २५ मूल तत्वों को विचार हेतु प्राथमिकता देते है /

यह पच्चीस तत्व कौन कौन से है इनके बारे मे बताया गया है /

 

 

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इस प्रकार जैसा  उपरोक्त मे सन्ख्या रूप मे बताया गया है कि २५ तत्वो की सन्ख्या से मिलाकर ”सान्ख्य दर्शन” का निर्माण हुआ है / आइये समझते है कि ये तत्व कौन कौन से है और आयुर्वेद से किस तरह से को-रिलेट करते है /

 

सबसे पहले पन्च महाभूत को लेते है / ये पन्च महाभूत है क्या क्या , इसे समझते है /

 

 

Earth पृथ्वी

पृथ्वी यानी वह ग्रह जहां जीवन है और जीवित रहने के लिये

वे सभी तत्व मौजूद है जो प्राणियो और जीव और जन्तुओ और वनस्पतियो को

जीवन दायी सन्जीवनी प्रदान करता है /  

 

 

 

पान्च महाभूत पृथ्वी के अन्दर समाहित वे पान्च तत्व है जिन्हे निम्नानुसार कहा जाता है /

 

१- वायु तत्व  AIR  MATTER

२- जल तत्व WATER MATTER

३- आकाश तत्व ETHER MATTER

४- प्रकाश और ताप तत्व LIGHT AND HEAT MATTER

५- मिट्टी / धरा तत्व EARTH MATTER

 

 

इसी तरह पान्च तन्मात्राये है / य्ह पान्च तन्मात्राये निम्न प्रकार से है /

 

१- शब्द यानी साउन्ड  SOUND

२- स्पर्श  TOUCH

३- आकार  FORM

 

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४- सुगन्ध  FLAVOURS

५- गन्ध  SMELL

 

पान्च इन्द्रिय सान्ख्य दर्शन के अनुसार निम्न प्रकार से होती है /

 

१- आन्ख अथवा नेत्र  EYES

२- कान EAR

३- नाक  NOSE

४- जीभ अथवा जिव्हा  TONGUE

५- त्वचा SKIN

 

पान्च कर्मेन्द्रिया सान्ख्य दर्शन के अनुसार निम्न प्रकार से होती है /

 

१- हाथ HAND

२- पैर  FEET

३- बोलना  SPEACH

४- मल मूत्र निष्कासन अन्ग  EXCRETORY SYSTEM

५- प्रजनन अन्ग  REPRODUCTIVE ORGANS

 

इस प्रकार सन्ख्या के हिसाब से पान्च महाभूत और पान्च तन्मात्राये और पान्च इन्द्रिय और पान्च कर्मेन्द्रिया , यह सब मिलकर सन्ख्या मे २० होती है /

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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प्राकृतिक और भौतिक शक्तियो और मनुष्य की मानसिक शक्तियो के बीच ताल मेल को लेकर

जिस तरह की जिग्यासा और गूढ्ता को ग्यात कर लेने की मानव प्रवृति होती है उसे स्वत:

ग्यान की सीमा से बान्ध कर समझने का प्रयास अवैग्यानिक नही कहा जा स्कता है /

 

 

इसके अलावा

१ मन SOUL और

१ चित्त और

१ अहन्कार और

१ बुध्धि WISDOM और

१ आत्मा SPIRIT

मिलकर यह सब पान्च सन्ख्या मे होती हैं /

 

उक्त बताये गये सभी विषय सन्ख्या मे २५ होते है /

 

यह सभी विषय सान्ख्य दर्शन के अनुसार ”प्रकृति” और ”पुरुष” के सन्योग से ही सम्भव है /

”प्रकृति” से तात्पर्य है इस पृथ्वी मे समाहित सभी वस्तुये और ”पुरुष” से तात्पर्य है मानव जीवन जिसमे स्त्री और पुरुष  दोनो ही लिन्ग समाहित है /

 

आयुर्वेद  चिकित्सा शास्त्र  इसी सान्ख्य दर्शन की बेसिक और मूल अवधारणा पर आधारित है /

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आयुर्वेद के  सिध्धान्त  का मूल प्रतिपादन ; सान्ख्य दर्शन आधारित

 

आयुर्वेद के मूल सिध्धान्त अथवा मौलिक सिध्धान्त सान्ख्य दर्शन पर आधारित होने के कारण यानी प्रकृति और पुरुष , इन दोनो का सन्योग अथवा योग होने के कारण आयुर्वेद के मूल सिध्धान्तो की रचना की गयी है /

 

आयुर्वेद के मूल सिध्धान्तो का वर्गी करण निम्न विभागो मे किया जा सकता है /

 

पन्च महाभूतो का योग और सह-योग आयुर्वेद के त्रिदोषो को निर्धारित करता है / प्राकृतिक तत्वों का

जैसा योग और परिमाण मानव शरीर मे व्याप्त होता है वैसा ही मानव के अन्दर सभी भौतिक तत्वों

का समावेश होता है / यही समावेश का अनुपात व्य्क्ति की विशिष्टता बनाती है /

 

 

ऐसी मान्यता आयुर्वेद की है कि यह शरीर सात तत्वो के द्वारा धारण किया गया है / यह सात तत्व मानव को मानव शरीर का रूप देते है / इन तत्वों मे प्राचीन विग्यान द्वारा स्थापित वह सिध्धान्त जिसे आज के विग्यान मे मेटाबालिज्म कहा जाता है , भी समाहित है /

 

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एनाबालिज्म -à मेटाबालिज्म-à केटाबालिज्म इन तीन अवस्थाओं को आयुर्वेद की सप्त धातुओ के लिये सबसे पहले ”रस धातु ” के नाम से जानते हैं /

 

ऐसी मान्यता आयुर्वेद की है कि जो भी खाद्य पदार्थ मानव द्वारा खाये पिये जाते है , वे सब ” रस तत्व ” में परिणित होते है / रस से तात्पर्य आयुर्वेद मे उस तत्व से है , जिसमे मानव के शरीर को वह सभी पौष्टिक पदार्थ मिलते है , जिनसे अथवा जिनके द्वारा शरीर की पुष्टि होती है यानी शरीर को जिन्दा रखने के लिये वे सभी आवश्यक तत्व रस धातु द्वारा बनते है / आधुनिक मेडीकल साइन्स के लिहाज से देखे तो यह तत्व पान्च भागो मे बान्टे जा सकते है /

 

यह पान्च तत्व निम्न प्रकार है /

 

१- कार्बोहाइड्रेट

२- प्रोटीन

३- चर्बी अथवा फैट

४- विटामिन और मिनरल्स

५- पानी

 

उपरोक्त इन पान्च खाद्य पदार्थो मे निहित सार तत्व मानव द्वारा खाये और पिये जाने से मानव शरीर को वह सभी आवश्यक पोषक तत्व मिल जाते है जिससे शरीर को पुष्ट रखने के लिये जरूरी सभी आवश्यकताये पूर्ण हो जाती है / खाद्य पदार्थों के पाच आवश्यक तत्व इस पृथ्वी पर ही प्राप्त होते है / लेकिन इन सबके अलावा एक तत्व ऐसा है जिसके बिना कोई भी मानव कुछ छण के अलावा जिन्दा नही रह सकता है और वह है वायु यानी हवा / हलाकि यह भोजन नही है और इसे खाया भी नही जा स्कता है लेकिन शरीर इसके बिना रह नही सकता है / आधुनिक वैग्यानिक खोज और अध्ध्य्यन से यह पता चला है कि वायु खाद्य पदार्थों को प्रभावित करती है , वायु खाद्य पदार्थो की सतह पर आकर वाष्प यानी भाप बनकर एकत्र होती है और एक पर्त के रूप मे जमती है / इसे आक्सीडेशन की प्रक्रिया कहते है /

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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मानव शरीर मे सप्त धातुयें होती है जिनके बारे मे आयुर्वेद मे बताया गया है / ये धातुये आधुनिक चिकित्सा विग्यान की पैथोलाजी से मुख्य रूप से सम्बन्धित कही जा सकती है / सभी धातुये रस, रक्त, मान्स. मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र इन सात विभागो मे वर्गीकृत की गयी हैं / इस स्वरूप में वर्गीकरण किये जाने से इसे आयुर्वेदिक पैथोलाजी या आयुर्वेदिक विकृति विग्यान की श्रेणी मे रखते हैं /

 

 

 

 

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आयुर्वेद के त्रिदोष विग्यान को समझने के लिये और शरीर को स्वस्थय रखने के लिये आयुर्वेद ने दिन चर्या और रात्रि चर्या और रितु चर्या के नियमो का प्रतिपादन किया है / ऐसा आयुर्वेद का निर्देश मानव शरीर को पूरे वर्ष और वारहो महीने के अनुसार जीवन शैली को अपनाने का है / चर्या के नियमो का उद्देश्य इसीलिये किया गया है ताकि शरीर स्वस्थय रहे और बीमारियो से बचा रहे /

 

 

मानव की प्रकृति का वर्गीकरण ; मानव से तात्पर्य मनुष्य से है और इसमे स्त्री और पुरुष दोनो ही लिन्ग समझे जाते है /

१- सत्व

२- रज और

३- तम

इन तीन विभागो मे मनुष्य की प्रकृति यानी उसकी मन और अन्तस की प्रवृत्तियों को

विभाजित किया गया है ताकि व्यक्तित्व की तुलना दूसरे व्यक्तित्व के चरित्र गत लक्षणो

के आधार पर निर्धारित की जा सके / मानव की इस तरह से तुलना करके उसकी व्यक्तिगत पहचान की जा सके /

 

प्रकृति के इस त्रिगुणात्मक सम्बन्ध सान्ख्य दर्शन के अन्तर्गत आये विषय बिन्दु  ’”अहन्कार’” से लिया गया है /

 

आयुर्वेद के महर्षियों द्वारा पूर्व निर्धारित सिध्धान्तो को सन्ग्यान मे लेकर इस पूर्व सन्चित ग्यान को मानव की स्वस्थयता और रुग्णाता से जोड़्कर देखने और समझने का प्रयास किया गया तब उन्होने प्रकृति के तत्वों का सामन्जस्य करके यह समझने का प्रयास किया कि प्रकृति मे पाये जाने वाले वे सभी तत्व मानव शरीर मे और जीव जन्तुओ और वनस्पतियो मे समान रूप से पाये जाते है / इनमे अनुपात भले ही एक जैसा न हो लेकिन प्रकृति मे पाये जाने वाले  गुण सभी मे होते है /

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आयुर्वेद ने मानव यानी स्त्री और पुरुष के अन्दर व्याप्त  सत्व और रज और तम गुणों की पहचान करके मानव स्वभाव का वर्गी करण किया है और तदनुसार मानव की प्रबृत्तियो का स्थापन किया है /

 

आयुर्वेद के महर्षियो ने वैग्यानिक दृष्टिकोण को अपनाते हुये इस बात की पहचान की कि मानव शरीर के अन्दर भी वही सब कुछ मौजूद है जो इस धरा और प्रकृति मे मौजूद है / महर्षियो ने यह भी पहचाना कि जो भी तत्व इस पृथ्वी पर है उनका असर मानव शरीर पर पड़्ता है और यही वह वैग्यानिक को-रिलेशन है जिससे ’”दोष” का निर्धारण किया गया /

 

“त्रिदोष सिध्धान्त” , “सप्त धातुये” तथा “मल” यानी दोष दूष्य के दर्शन विग्यान एवं मौलिक सिध्धान्त के आधार पर व्यवस्थित है /

 

त्रिदोषों का शरीर मे उपस्तिथि का क्या आन्कलन है ? क्या स्तर है ? यह ग्यात करने के लिये अभी तक परम्परागत तौर तरीकों में केवल नाड़ी परीक्षण ही एक मात्र उपाय है / नाड़ी परीक्षण द्वारा त्रिदोषों  के विषय में प्राप्त जानकारी अकेले आयुर्वेद के चिकित्सक  के नाड़ी ग्यान परीक्षण अनुभव पर आधारित होता है / इस नाड़ी परीक्षण की प्रक्रिया में नाड़ी-परीक्षण के परिणामों को केवल मष्तिष्क द्वारा ही  अनुभव किया जा सकता है, लेकिन भौतिक रूप से देखा नही जा सकता है /

 

इस धरा पर प्राप्त मूल प्रकृति  सन्साधनो के बारे मे यथा हवा और ताप/रोशनी और जल और मिट्टी और आकाश जैसे पान्च तत्वो से मिलाकर बनाये गये त्रिदोषसिध्धान्त के काम्बीनेशन किस तरह से मानव शरीर को प्रभावित करते है और दोष की समावस्था और असमावस्था से किस तरह की स्वास्थय और अस्वास्थय परिणाम पैदा होते है /

………………………

 

 

 

 

 

20

 

दोषो के द्वारा मानव जीवन की आयु के विभिन्न सोपान त्रिदोषानुसार प्रभावित होते है /

बाल्यावस्था और युवावस्था और बृध्धावस्था मानव जीवन की आयु के इन तीन सोपानों पर

आयुर्वेद के दोषो का प्रभाव होता है /  त्रिदोषो के आनुपातिक और असामान्यनुपातिक

प्रभाव से आरोग्यता आदि प्राप्त होती है /

…………………………

 

 

 

आयुर्वेद चिकित्सक त्रिदोषों , त्रिदोषों के प्रत्येक के पान्च, पान्च भेदों, सप्त धातुओं , मल इत्यादि को मान्सिक रुप से स्वयम किस स्तर पर स्वीकार करते हैं अथवा किस प्रकार अपने विवेक का उपयोग  करके दोष-दूश्य-मल का नोर्धारण करते है और इन सब बिन्दुओं को किस प्रकार और कैसे व्यक्त किया जायेगा, यह सब भौतिक रूप में साक्ष्य अथवा सबूत के रूप में  सम्भव नही है. जसे कि आधुनिक चिकित्सा विग्यान के परीक्षण है /

 

 

शरीर मे व्याप्त ”दोष” तीन प्रकार के मूल रूप से निर्धारित किये गये है / ये निम्न प्रकार से जाने जाते है /

 

१- वात दोष

२- पित्त दोष

३- कफ दोष

 

मूलत: यह तीन प्रकार के है लेकिन जब इनका काम्बीनेशन बनता है तक यह सब मिलकर सात  प्रकार के हो जाते है /

 

१- वात दोष प्रकृति के अन्दर पाये जाने वाले दो तत्वो से मिलकर बना है / ये दो तत्व है (अ) आकाश और (ब) वायु , इन दोनो तत्वो से मिलकर वायु दोष बना है /

 

यह उस समय के महर्षियॊ के  वैग्यानिक दृष्टिकोण कॊ पुष्टि करता है जब आज के सन्दर्भ मे इसे देखा

जाता है /                                                                   21

 

 

 

 

 

आकाश और वायु पृथ्वी के महत्वपूर्ण घटक है / आयुर्वेद का वायु दोष इन्ही दो घटको से मिलकर बना है /

 आयुर्वेद मानता है कि मानव शरीर की रचन पृथ्वी पर पाये जाने वाले द्र्व्यो और पदार्थो से ही बना है

और जीवन समाप्त होने पर इसी मे मिल जाता है / वायु के सन्गठन मे नाइट्रोजन्गैस और

आक्सीजन गैस और कार्बन डाई आक्साइड गैस आदि मिली होती है और आकाश का सन्गठन

मे विभिन्न प्रकार की प्रकाश की तरन्गे और ध्वनि की तरन्गो के अलावा सूक्षम धूल कण

आदि रहते है जिनका पृथ्वी पर रहने वलो पर प्रभाव पड़्ता है /

 

 

 

 

 

 

 

अगर वायु का केमिकल कम्पोजीशन देखा जाय तो वायु मे नाइट्रोजन और आक्सीजन और कार्बन डाई आक्साइड के अलावा अन्य गैसेस MOISTURES / HUMIDITY समाहित है / सामान्य अवस्था मे इन गैसो के मिश्रण का एक विषेष प्रकार का   समीकरण है जो देश और काल और परिस्तिथी के अनुसार घटता बढता है / उदाहरण के लिये दक्षिण ध्रुव और उत्तरी ध्रुव की हवा की क्वालिटी हमारे देश की नई दिल्ली शहर  की हवा की क्वालिटी से तुलनात्मक स्वरूप मे केमिकल केमिस्ट्री के हिसाब से बहुत फर्क देखने मे

मिलेगा /

 

 

 

 

 

 

22

Composition of dry atmosphere, by volume
Gas (and others) Volume by various[15][▽note 2] Volume by CIPM-2007[16] Volume by ASHRAE[17]

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 ppmv[▽note 3] percentile  ppmv percentile  ppmv percentile
Nitrogen (N2) 780,800 (78.080%) 780,848 (78.0848%) 780,818 (78.0818%)
Oxygen (O2) 209,500 (20.950%) 209,390 (20.9390%) 209,435 (20.9435%)
Argon (Ar) 9,340 (0.9340%) 9,332 (0.9332%) 9,332 (0.9332%)
Carbon dioxide (CO2) 397.8 (0.03978%) 400 (0.0400%) 385 (0.0385%)
Neon (Ne) 18.18 (0.001818%) 18.2 (0.00182%) 18.2 (0.00182%)
Helium (He) 5.24 (0.000524%) 5.2 (0.00052%) 5.2 (0.00052%)
Methane (CH4) 1.81 (0.000181%) 1.5 (0.00015%) 1.5 (0.00015%)
Krypton (Kr) 1.14 (0.000114%) 1.1 (0.00011%) 1.1 (0.00011%)
Hydrogen (H2) 0.55 (0.000055%) 0.5 (0.00005%) 0.5 (0.00005%)
Nitrous oxide (N2O) 0.325 (0.0000325%) 0.3 (0.00003%) 0.3 (0.00003%)
Carbon monoxide (CO) 0.1 (0.00001% ) 0.2 (0.00002%) 0.2 (0.00002%)
Xenon (Xe) 0.09 (0.000009%) 0.1 (0.00001%) 0.1 (0.00001%)
Nitrogen dioxide (NO2) 0.02 (0.000002%)
Iodine (I2) 0.01 (0.000001%)
Ammonia (NH3) trace trace
Sulphur dioxide (SO2) trace trace
Ozone (O3) 0.02 to 0.07

[▽note 4]

(2 to 7×10−6%)

[▽note 4]

Trace to 30 ppm [▽note 6] (—-) 2.9 (0.00029%)
Dry air total (air) 1,000,065.265 (100.0065265%) 999,997.100 (99.9997100%) 1,000,000.000 (100.0000000%)
Not included in above dry atmosphere:
Water vapor (H2O) ~0.25% by mass over full atmosphere, locally 0.001%–5% by volume.[21]

 

हवा यानी वायु मे कितनी तरह की गैसे और अन्य तत्व मिले हुये होते है , इसके बारे मे इस टेबल का आन्कलन करने के बाद पता चलता है कि पृथ्वी पर मिलने वाली वायु के अन्दर की संरचना किस तरह की है / इसमे कितने तत्व मिले है और कौन कौन से रासायनिक पदार्थ कितने समीकरण मे मिश्रित होकर वायु को प्राणदायनी बनाते है / आयुर्वेद मे वायु दोष का निर्धारण प्रथम श्रेणी मे अति प्रमुखता के साथ किया गया है / बिना वायु की प्रमुखता से ऐसा समझा जाता है कि त्रिदोष का विधान आयुर्वेद मे अपूर्णता पैदा करता है / इसीलिये सभी दोषो मे वायु अथवा वात की सर्वोच्चता प्रमुख है /                               23

इसी प्रकार से आकाश को लेते है / वैग्यानिको ने बताया है कि पृथ्वी के अपनी धुरी पर घूमने से स्पेस SPACE मे जिस तरह का घर्षण होता है और सेलेस्टियल सब्जेक्ट्स CELESTIAL SUBJECTS  की गतियां यानी गृह नक्षत्र की गति से चुम्बकीय आकर्षण पैदा होता है और इसके साथ साथ जिस तरह से अल्ट्रासाउन्ड ULTRA SOUNDS भी पैदा होती है और उनकी तरन्गे पृथ्वी तक आती है उनका असर मानव शरीर पर पड़्ता है /  जैसे पूर्णिमा या अमावश्या या एकादशी के दिन चन्द्रमा का प्रभाव पृथ्वी पर पड़्ता है और ऐसा देखा गया है कि इन दिनो मे मानव शरीर मे रोगो की बढोतरी होती है /

 

आकाश के तत्वों मे एक तत्व विद्युत और शब्द का भी है / आकाशीय बिजली का चमकना और कड़्कना और तूफान का आना  और फिर बरसात होना तथा बरसात के समय बिजली का कड़कना तथा आकाशीय बिजली  का धरती की ओर गिरना जैसी बातो का विचार और इसके चरित्रगत आबजर्वेशन करके आयुर्वेद के मनीशियो को ग्यात हुआ होगा और यह विचार पुख्ता करने के प्रमाण मिले कि वायु तत्व कितना शक्तिशाली है और इसका पृथ्वी पर क्या महत्व है   क्या महत्व है ?

आकाश तत्व मे जल के वास्पित कण जिसे भाप कहा जाता है , के अलावा इलेक्ट्रो-मैग्नेटिक तरन्गें

और प्रकाश की तरह तरह की तरन्गे और शब्दों या साउन्ड की तरन्गे जिसमे

अल्ट्रासाउन्ड / पैरा-साउन्ड भी शामिल हैं और वायु तहा वायु का दबाव जैसी

शक्तियां निहित होती है / आयुर्वेद का वायु दोष इन्ही सबके मिश्रण से मिलकर

 बना है क्योन्कि जिस तरह की मूल बाते आकाश ततव मे पायी जाती है

 वही सब मान और जीव जन्तुओ मे भी पाया जाता है /

 

यह सब आब्जर्व [OBSERVE] करके मनीषियो ने निर्धारित किया कि वात दोष वायु तत्व और आकाश तत्व के मिश्रण से मिलकर शरीर मे रहते है / जिनका चरित्र गत लक्षण वायु और आकाश  के चरित्र के समान है और जो मानव शरीर मे मिलता है /

 

२- पित्त दोष ; आयुर्वेद का यह दूसरा ” दोष ” माना गया है / इसे ”ताप” और ’प्रकाश” से जोड़ा गया है / सूर्य और दूसरे ग्रहों से आने वाली रश्मियो और किरणो और प्रकाश से इसका सम्बन्ध जोड़ा गया है / ताप का सम्बन्ध गर्म और ठ्न्डा दोनो से है /

 

24

यह वैग्यानिक सत्य है कि तापमान जिसे गर्म और सर्द दो भगो मे बान्टा गया है , इस पृथ्वी मे रोजाना महसूस किया जाता है और हर पल देश और  काल और परिस्तिथियो के अनुसार ठ्न्डक  या गर्मी के रूप मे  मानव शरीर द्वारा महसूस किया जाता है /

 

अग्नि और प्रकाश और ताप मान आदि सम्बन्धित तत्व आयुर्वेद के त्रिदोष से सामन्जस्य करते है /

 जिस तरह की प्रकृति और गुण इन तत्वों के होते है ऐसे ही तत्व मान्व शरीर के

साथ साथ धरती के सभी तत्वो मे पाये जाते है / वैग्यानिक परीक्षण और खोजो

ने सिध्ध किया है कि अग्नि और प्रकाश और ताप मान का शरीर पर

 प्रभाव पड़्ता है चाहे वह ठन्डक हो अथवा गर्मी /

 

 

 

आधुनिक वैग्यानिको का कहना है कि सूर्य के प्रकाश मे सात रन्ग होते है /  विश्व कोष इन्साइक्लोपीडिया मे सूर्य के प्रकाश के बारे मे वैग्यानिको का क्या मत है , इसे पढिये ;

 

Sunlight is a portion of the electromagnetic radiation given off by the Sun, in particular infraredvisible, and ultraviolet light. On Earth, sunlight is filtered through Earth’s atmosphere, and is obvious as daylight when the Sun is above the horizon. When the direct solar radiation is not blocked by clouds, it is experienced as sunshine, a combination of bright light and radiant heat. When it is blocked byclouds or reflects off other objects, it is experienced as diffused light. The World Meteorological Organization uses the term “sunshine duration” to mean the cumulative time during which an area receives direct irradiance from the Sun of at least    120 watts per square meter.[1] Other sources indicate an “Average over the entire earth” of “164 Watts per square meter over a 24 hour day”.[2]

The ultraviolet radiation in sunlight has both positive and negative health effects, as it is both a principal source of vitamin D3 and amutagen.

The spectrum of the Sun’s solar radiation is close to that of a black body[8][9] with a temperature of about 5,800 K.[10] The Sun emits EM radiation across most of the electromagnetic spectrum. Although the Sun produces gamma rays as a result of the nuclear-fusionprocess, internal absorption and thermalization convert these super-high-energy photons to lower-energy photons before they reach the Sun’s surface and are emitted out into space. As a result, the Sun does not emit gamma rays from this process, but it does emit gamma rays from solar flares.[11] The Sun also emits X-raysultravioletvisible lightinfrared, and even radio waves;[12] the only direct signature of the nuclear process is the emission of neutrinos.

Although the solar corona is a source of extreme ultraviolet and X-ray radiation, these rays make up only a very small amount of the power output of the Sun (see spectrum at right). The spectrum of nearly all solar electromagnetic radiation striking the Earth’s atmosphere spans a range of 100 nm to about 1 mm (1,000,000 nm). This band of significant radiation power can be divided into five regions in increasing order of wavelengths:[13]

  • Ultraviolet Cor (UVC) range, which spans a range of 100 to 280 nm. The term ultraviolet refers to the fact that the radiation is at higher frequency than violet light (and, hence, also invisible to the human eye). Due to absorption by the atmosphere very little reaches Earth’s surface. This spectrum of radiation has germicidal properties, as used in germicidal lamps.
  • Ultraviolet Bor (UVB) range spans 280 to 315 nm. It is also greatly absorbed by the Earth’s atmosphere, and along with UVC causes the photochemical reaction leading to the production of the ozone layer. It directly damages DNA and causes sunburn, but is also required for vitamin D synthesis in the skin and fur of mammals.[14]
  • Ultraviolet Aor (UVA) spans 315 to 400 nm. This band was once[when?] held to be less damaging to DNA, and hence is used in cosmetic artificial sun tanning (tanning boothsand tanning beds) and PUVA therapy for psoriasis. However, UVA is now known to cause significant damage to DNA via indirect routes (formation of free radicals and reactive oxygen species), and can cause cancer.[15]
  • Visiblerange or light spans 380 to 780 nm. As the name suggests, this range is visible to the naked eye. It is also the strongest output range of the Sun’s total irradiance spectrum.
  • Infraredrange that spans 700 nm to 1,000,000 nm (1 mm). It comprises an important part of the electromagnetic radiation that reaches Earth. Scientists divide the infrared range into three types on the basis of wavelength:
    • Infrared-A: 700 nm to 1,400 nm
    • Infrared-B: 1,400 nm to 3,000 nm
    • Infrared-C: 3,000 nm to 1 mm.

 

इसी प्रकार अग्नि और ताप मान तथा गर्मी के बारे मे वैग्यानिको का क्या कहना है , यह विश्व कोष क्या कह्ता है , इसे पढिये ;

FIRE and HEAT and LIGHT and TEMPERATURE

 

 

In physicsheat is energy that spontaneously passes between a system and its surroundings in some way other than through work or the transfer of matter. When a suitable physical pathway exists, heat flows spontaneously from a hotter to a colder body.[1][2][3][4][5][6] The transfer can be by contact between the source and the destination body, as inconduction; or by radiation between remote bodies; or by conduction and radiation through a thick solid wall; or by way of an intermediate fluid body, as in convective circulation; or by a combination of these.

 

temperature is an objective comparative measurement of hot or cold. It is measured by a thermometer. Several scales and unitsexist for measuring temperature, the most common being Celsius (denoted °C; formerly called centigrade), Fahrenheit (denoted °F), and, especially in science, Kelvin (denoted K).

 

 

27

 

 

अग्नि किसी वस्तु के जलने से पैदा होती है / एक विशेष ताप मान पर जब गर्म का स्तर पहुचता है तभी ज्वलन शील

पदार्थ आग पहड़ लेते है और जलने लगते है / किसी जवलन शील पदार्थ के जलने से ताप पैदा होता है /

 आयुर्वेद मे ताप के गुण को मानव शरीर के ताप क्रम और भोजन तथा पाचन और मानसिक

 गुण यथा क्रोध और गुस्सा और मन की शान्ति से जोड़ कर देखते है / आयुर्वेद का पित्त दोष इन्ही गुणो को समाहित करता है /

 

 

ताप मान नापने के लिये जिस यन्त्र का उपयोग करते है उसे थर्मामीटर कहते है / 

 

 

यह एक प्रकार के केमिकल रियक्शन से पैदा होती है जो इस पृथ्वी मे पाये जाते है / ऐसा हमेशा दो केमिकल द्रव्यों के योग का फ्यूजन होने से पैदा होता है / इस तरह से वातावरण मे मानव द्वारा ताप मान को महसूस किया जाता है /

 

मानव शरीर मे ताप मान मान्व के शरीर के उम्र और आयु के अनुसार व्याप्त रहता है /                          28

आज के विग्यान को यदि पित्त दोष से  को-रिलेट करते है तो यह ताप मान सूर्य से आने वाली रश्मियो अथवा किरणों  के पृथ्वी  के  वातावरण  मे प्रवेश अथवा आने की वजह से जिस तरह का घर्षण और पृथवी के वातावरण के अन्दर पाये जाने वाली गैसों और जल की सूच्छ्म बून्दों के वातावरण मे मौजूद  होने वाले केमिकल और गैसेस के अणुओं के आपस मे  रियक्शन के कारण ताप मान और प्रकाश मे बदलाव पैदा करता है

 

वैग्यानिको ने इस तथ्य का पता लगाया है और यह पाया है कि प्रकाश कई रन्गो से मिलकर बना हुआ सम्मिश्रित तत्व है / प्रकाश मे तीन मूल रन्ग है और बाकी के  रन्ग इन तीन रन्गो के मिश्रण से बने है / तीन मूल रन्गो को (अ) लाल (ब) पीला (स) नीला के रूप मे चिन्हित किया गया है / वाकी अन्य रन्ग यथा हरा और गुलाबी और बैन्गनी और नारन्गी और काला यह सब रन्ग मूल रन्गों के सम्मिश्रण से मिलकर बने हैं /

 

आधुनिक शोधॊ से पता चला है कि प्रत्येक रन्ग की अपनी एक गति होती है जिसे वेव लेन्ग्थ कहते है / इसे नैनो मीटर मे मापा जाता है / वैग्यानिकों ने पाया है कि लाल रग की चलने की गति ५५० नैनो मीटर प्रति सेकन्ड है / इसी तरह से पीले रन्ग की गति       नैनो मीटर है और नीले रन्ग की गति     नैनो मीटर है /

 

सूर्य से सीधे पृथ्वी पर पड़ने वाली सूर्य की किरणें पृथ्वी पर एक जैसा प्रभाव नही डालती हैं /

पृथ्वी के मध्य भाग मे सूरज की किरणें वातावरण को गरम बना देती है /  मध्य भाग मे

यही दर्शाया गया है कि गर्म होने से पृथ्वी का ताप मान कैसा हो जाता है जबकि

तुलनात्मक दृष्टिकोण से पृथ्वी का ऊपर का भाग और नीचे का भाग ठन्डा और

ठन्डक से भरपूर होता है / इसीलिये पृथ्वी के दोनो ध्रुव नार्थ पोल और साउथ पोल में

ठन्डक हमेशा बनी रहती है और बर्फ जमी रहती है /

 

पृथ्वी पर आने वाली किरणों के एक साथ आने के कारण इन किरणों के व्याप्त  तत्वों मे आपस मे घर्षण होते है क्योन्कि एक रन्ग की किरण का वेव लेन्ग्थ दूसरी किरण के वेव लेन्ग्थ के कम या अधिक या  ज्यादा होने के कारण किरणो के आपस मे ही समानान्तर घर्षण होते है /आपस मे एक दूसरे से रगड़ने के कारण और पृथ्वी मे व्याप्त केमिकल सब्स्टेन्स के इनमे मिल जाने के कारण  ताप मान पैदा होता है /  29

मेरा मानना है कि विभिन्न रन्गो की किरणों के आपस मे रगड़ने से वातावरण की आक्सीजन तथा दूसरी गैसें के अणु आपस मे गर्म होते है / यह गर्मी या ताप मान वातावरण की नमी या मोइश्चर या हवा मे कितना पानी का अन्श मिला है उस पर निर्भर करता है /

 

आधुनिक विग्यान कहता है कि ऐसा सूर्य की किरणो के पृथ्वी पर भूमध्यरेखा अथवा कर्क रेखा पर सूर्य के आने से और प्रूथ्वी पर सीधे सीधे ९० डिग्री के अन्श पर किरणों के सीधे पड़ने के कारण अथवा किरणो के तिरछा पड़ने के कारण होता है /

 

आयुर्वेद के महर्षियो ने इस तथ्य को समझा और प्रकृति के इस तत्व को आब्जर्व करके इसे  मानव या पुरुष से कोरिलेट करके देखा और यह पाया कि मनुष्य  जो भी खाता पीता है और भूख लगने या जगाने या खाने की इच्छा पैदा करने वाला मानव अन्ग और

 

खाये हुये  भोजन को पचाने और शरीर को पुष्ट करने और शरीर को गर्मी देने के लिये मानव का पाचन तन्त्र ही जिम्मेदार है / इसीलिये इसे ”पित्त” दोष का नाम दिया गया /

चिकित्सा विग्यान इसे डाय्जेस्टिव सिस्टम और इसके अन्य स्वरूप एनाबालिज्म और मेटाबालिज्म और केटाबालिज्म की सम्पूर्ण प्रक्रिया से जोड़ते हैं /

 

३- कफ दोष ; आयुर्वेद मे ”कफ दोष”  प्रकृति मे व्याप्त दो तत्वों से मिलकर बनता है / यह दो तत्व है जल और धरती की मिट्टी /

 

सभी जानते है कि जल का मानव जीवन और इस धरा मे ्क्या महत्व है / बिना जल के कोई भी इस धरती मे नही जी सकता है / सभी वनस्पतियां और जीव जन्तु इस पृथ्वी पर जल के बिना नही रह सकते है /

WATER

From a biological standpoint, water has many distinct properties that are critical for the proliferation of life. It carries out this role by allowing organic compounds to react in ways that ultimately allowreplication. All known forms of life depend on water. Water is vital both as a solvent in which many of the body’s solutes dissolve and as an essential part of many metabolic processes within the body.

Metabolism is the sum total of anabolism and catabolism. In anabolism, water is removed from molecules (through energy requiring enzymatic chemical reactions) in order to grow larger molecules (e.g. starches, triglycerides and proteins for storage of fuels and information). In catabolism, water is used to break bonds in order to generate smaller molecules (e.g. glucose, fatty acids and amino acids to be used for fuels for energy use or other purposes). Without water, these particular metabolic processes could not exist.

Water is fundamental to photosynthesis and respiration. Photosynthetic cells use the sun’s energy to split off water’s hydrogen from oxygen. Hydrogen is combined with CO2 (absorbed from air or water) to form glucose and release oxygen. All living cells use such fuels and oxidize the hydrogen and carbon to capture the sun’s energy and reform water and CO2 in the process (cellular respiration).

Water is also central to acid-base neutrality and enzyme function. An acid, a hydrogen ion (H+, that is, a proton) donor, can be neutralized by a base, a proton acceptor such as a hydroxide ion (OH) to form water. Water is considered to be neutral, with a pH (the negative log of the hydrogen ion concentration) of 7. Acids have pH values less than 7 while bases have values greater than 7.

 

 

Water Reservoir

 

 

 

 

 

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इसी प्रकार मानव जीवन का संरक्षण धरती की मिट्टी पर ही सम्भव है / यह सभी को पता है कि इस पृथ्वी पर जो भी जन्म लेता है और मृत्यु को प्राप्त होता है वह सब इसी धरा पर रह जाता है /

 

जल के सन्घटको को आधुनिक विग्यान ने यह माना है कि यह हाइड्रोजन और आक्सीजन गैस के सन्योग से बना हुआ पदार्थ है / इस पदार्थ मे जिसे जल कहते है , एक तरह का केमिकल  पदार्थ  है / सामान्य अवस्था मे यह जल तरल पदार्थ होता है और गर्म करने या उबालने से  उडनशील और अधिक ठन्डा करने पर ठोस पदार्थ जिसे बर्फ कहते है , इस तरह की अवस्थाओं को प्राप्त कर लेता है / इस जल को यदि इलेक्ट्रान माइक्रोस्कोप द्वारा स्लाइड बनाकर  देखा जाय तो इसमे सैकड़ो तरह के जीवाणु देखने को मिलते है / इस जल मे बहुत तरह के केमिकल देश और काल और परिस्तिथियो के अनुसार मिलते है जो केमिकल अनालाइसिस करने से ही पता कर सकते है / यूरेनियम जैसे पदार्थ पानी मे ही मिलते है /

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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Polarity and hydrogen bonding

Model of hydrogen bonds (1) between molecules of water.

 

Since the water molecule is not linear and the oxygen atom has a higher electronegativity than hydrogen atoms, it is a polar molecule, with an electrical dipole moment: the oxygen atom carries a slight negative charge, whereas the hydrogen atoms are slightly positive. Water is a good polar solvent, that dissoves many salts and hydrophilic organic molecules such as sugars and simple alcohols such as ethanol. Mostacids dissolve in water to yield the corresponding anions. Many substances in living organisms, such asproteinsDNA and polysaccharides, are dissolved in water. Water also dissolves many gases, such as oxygen and carbon dioxide—the latter giving the fizz of carbonated beverages, sparkling wines and beers.

On the other hand, many organic substances (such as fats and oils and alkanes) are hydrophobic, that is, insoluble in water. Many inorganic subtances are insoluble too, including most metal oxidessulfides, andsilicates.

Because of its polarity, a molecule of water in the liquid or solid state can form up to four hydrogen bondswith neighboring molecules. These bonds are the cause of water’s high surface tension[19] and capillary forces. The capillary action refers to the tendency of water to move up a narrow tube against the force of gravity. This property is relied upon by all vascular plants, such as trees.[20]

The hydrogen bonds are also the reason why the melting and boiling points of water are much higher than those of other analogous compounds like hydrogensulfide (H2S).                                    page 33
They also explain its exceptionally high specific heat capacity (about 4.2 J/g/K), heat of fusion(about 333 J/g), heat of vaporization (2257 J/g), and thermal conductivity (between 0.561 and 0.679 W/m/K). These properties make water more effective at moderating Earth’s climate, by storing heat and transporting it between the oceans and the atmosphere.

 

 

मिट्टी के सन्घटको मे बहुत तरह के केमिकल पदार्थ मिलते है / इसमे गन्धक और लोहा और ताम्बा और कैल्सियम और यूरिया और नाइट्रोजीनस पदार्थ और अमोनिया के अलावा भौतिक शास्त्र और रसायन शास्त्र मे बर्णित धातुओ और रासायनिक पदार्थो की

अणु टेबल मे टैबुलेट किये गये द्रव्य  पाये जाते है /

Earth’s mass is approximately 5.97×1024 kg (5,970 Yg). It is composed mostly of iron (32.1%), oxygen (30.1%), silicon (15.1%),magnesium (13.9%), sulfur (2.9%), nickel (1.8%),  calcium (1.5%), and aluminium (1.4%), with the remaining 1.2% consisting of trace amounts of other elements. Due to mass segregation, the core region is estimated to be primarily composed of iron (88.8%), with smaller amounts of nickel (5.8%), sulfur (4.5%), and less than 1% trace elements.

 A little more than 47% of Earth’s crust consists of oxygen.The most common rock constituents of the crust are nearly all oxides: chlorine, sulfur, and fluorine are the important exceptions to this and their total amount in any rock is usually much less than 1%. The principal oxides are silica, alumina, iron oxides, lime, magnesia, potash, and soda. The silica functions principally as an acid, forming silicates, and all the most common minerals of igneous rocks are of this nature. 99.22% of all rocks are composed of 11 oxides, with the other constituents occurring in minute quantities.

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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यदि इन सबको आयुर्वेद के ”कफ दोष” से कोरिलेट करे तो यह सब मानव शरीर के अन्दर जल तत्व और मिट्टी तत्व के गुणो के अन्दर व्याप्त केमिकल तत्वो के गुणो और अवगुणो के केमिकल रियक्शन का प्रभाव होगा /

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सन्क्षेप में सान्ख्य दर्शन मे वर्णन किये गये कुछ सूत्रो का यहां उल्लेख किया गया है ताकि पाठको को सान्ख्य दर्शन और आयुर्वेद के बीच के समन्वय और विकास-पथ का विचार कैसा है इसको समझा जा सके /

 

आयुर्वेद के लिये महर्षियो द्वारा प्रतिपादित किये गये वात पित्त कफ इन तीन दोषों का विचार और सत्व रज और तम इन तीन प्रकृति के  गुणो  का विचार बाद मे आयुर्वेद के मौलिक सिध्धन्तो की रीढ बनी है /

 

सम्पूर्ण आयुर्वेद इन तीन प्रकृति और तीन दोषो पर आधारित है /

 

यह बहुत आश्चर्य जनक है कि हमारे पूर्वज और आयुर्वेद के मनीषियो ने जिस तरह की मौलिक सिध्धन्तो की कल्पना आयुर्वेद के लिये की वह कितनी सत्य है यह आधुनिक आयुर्वेद की हाई टेक्नोलाजी ई०टी०जी० आयुर्वेदा स्कैन के द्वारा प्रमाणित की जा चुकी है /

 

बताते चलें कि ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन आयुर्वेद की आधुनिक निदान ग्यान की तकनीक है जो सारे शरीर के आयुर्वेद के तथ्यानुसार परीक्षण करती है और आयुर्वेद के मौलिक सिध्धान्तों का आन्कलन और शरीर मे व्याप्त रोगों का निदान करती है /

 

रासायनिक पदार्थो अथवा भौतिक शक्तियो के मूल मे अणुओं और अणुओं ATOMS के मूल मे

न्य़ुट्रान  और पाजिट्रान और न्यूक्लियस जैसे इलेक्ट्रान  की उपस्तिथि

 

पृथ्वी पर व्याप्त सभी शक्तियां और इन शक्तियों में निहित सभी पदार्थो के मूल मे अणु है. जिन्हे वैग्यानिक भाषा मे “’एटम” कहते है / एटम का मतलब वह अणु पदार्थ जिसमे तीन तत्व मौजूद हो जिन्हे (अ) न्यूट्रान और (ब) पाजीट्रान और (स) न्य़ुक्लियस कहते है /

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

अणुओ के सन्गठनो मे कई तरह की विवेचनाये भौतिक और रासायनिक विग्यानियो ने की हैं / कोई बताता है कि न्यूट्रान चक्कर लागाता है  और प्रोटान स्थिर रहता है / इस चक्कर लगाने की गति से उर्जा पैदा होती है जिसे इलेक्ट्रो-मैग्नेटिक वेव्ज कहते है /

 

 

कोई अणु वैग्यानिक कहता है कि न्य़ुट्रान जिसे माइनस कहते है , यह पोजीट्रान यानी

प्लस के विपरीत चक्कर लगाते है और नाभी यानी न्यूक्लियस स्थिर अवस्था मे रहती है

 

/ प्लस और माइनस के अपोजिट अवस्था मे चक्कर लगाने से नाभी मे उर्जा सन्चित होती है जो चार्ज और डिस्चार्ज हुआ  करती है /

 

जिस तरह के एलीमेन्ट्स अणुओ मे मिलते है , इन्हे इलेक्ट्रान्स कहा जाता है /

 

इलेक्ट्रान विद्युतीय चार्जेड पार्टिकिल्स समझे जाते है / जो उर्जा देते है / यह उर्जा बहुत तरह की होती है /

 

हजारो कि सन्ख्या मे जब इलेक्ट्रान्स मिलते है तो यह बिद्युत वितरण करते है / जैसे की एक बैटरी जब चार्ज होती है तब यह उर्जा देती है और जिस काम के लिये इसे उपयोग करना होता है उसे यह उपयोगी बना देती है /

 

इसी प्रकार मानव शरीर मे उर्जा क श्रोत मान्व शरीर के अन्दर पाये जाने वाले केमिकल और उनके बीच होने वाले केमिकल रियक्शन का परिणाम होता है / इससे शरीर को गर्मी मिलती है /

 

आधुनिक चिकित्सा शास्त्रियो का मानना है कि मान्व शरीर सुच्छ्म सेलो से बना है / सेल से टिस्सू बने और टिस्सू से अन्ग और फिर इन सब अन्गो से मिलकर सारा शरीर बना है /

 

 

सेल की बनावट केमिकल के अणुओ की तरह है लेकिन इसमे कुछ भिन्नता है / लेकिन हर सेल मे इलेक्ट्रान्स मौजूद होते है , इसलिये यह मनुष्य शरीर एक प्रकार से एक बैटरी की तरह भी है जो बहुत कम पावर की इलेक्ट्रिक पैदा करता है /

 

वैग्यानिक प्रयोगो द्वारा यह सिध्ध किया जा चुका है कि मानव शरीर मे कम पावर की इलेक्ट्रिक करेन्ट पैदा होता है / यह शरीर मे पैदा विद्युत सारे शरीर मे होती है और इसके उपस्तिथि होने से शरीर के सभी अन्ग कार्य करते है और स्वस्थय अवस्था मे रहते है / वैग्यानिको ने पाया है कि मानव शरीर मे माइनस ५० माइक्रो वोल्ट  से लेकर प्लस ५० माइक्रो वोल्ट तक विद्युत रहती है /

 

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ह्य़ुमन फीजियोलाजी के अनुसार इस तरह की विद्युत शरीर के अन्दर पाये जाने वाले केमिकल तत्व यथा सोडियम और क्लोराइड और पोटैसियम और फास्फेट्स और आयरन और कैल्सियम के आयन के आपस मे रियक्शन के कारण होता है / इस तरह से केमिकल्स के आपस मे और बीच मे  होने वाले रियक्शन को मेटाबालिज्म की प्रक्रिया के अन्तर्गत शुमार किया जाता है /

 

इस तरह से शरीर के मेटाबालिक प्रक्रिया से प्राप्त उर्जा से मानव शरीर कार्य करता है / शरीर के सभी अन्गो की क्रियाये सन्चालित होती है /

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आयुर्वेद यह मानता है कि वात और पित्त और कफ के शरीर मे सम अवस्था मे रहने से स्वास्थय सुरक्षित रहता है / वात और पित्त और कफ के बारे मे बताया जा चुका है कि भौतिक दृष्टिकोण से यह किन किन तत्वो से मिलकर बने है और मानव शरीर को कैसे रेप्रेजेन्ट करते हैं / यह कहा जा सकता है कि भारतीय चिकित्सा विग्यान उस दर्शन विग्यान पर आधारित है जो सीधे सीधे प्रकृति और इस पृथ्वी के अन्दर व्याप्त शक्तियो को मानव शरीर से जोड़्कर देखती है और अनुभव करती है /

 

मानव शरीर मे विद्युत की उपस्तिथि और कार्य

 

आधुनिक बायोलाजिस्ट का मानना है कि मानव शरीर मे विद्युत के निर्माण की भूमिका उसी समय से शुरू हो जाती है जब पुरुष के शुक्राण और स्त्री के अन्डाणु दोनो का फ्यूजन गर्भाशय के अन्दर हो जाता है /

 

मानव शरीर मे विद्युत की उपस्तिथि के बारे मे मेरा यह मानना है कि मानव मे विद्युत का प्रवाह होना और शरीर मे मौजूद होने की शुरुआत उसी समय से हो जाती है जब मानव पुरुष के ”शुक्राण” और मानव स्त्री के ”अन्डाणु” स्त्री के गर्भाशय के अन्दर पहुंचकर आपस मे फ्यूजन की प्रक्रिया सम्पन्न करते है /

 

यह फ्यूजन की प्रक्रिया होने से पहले का कार्य निम्न प्रकार से सम्पन्न होता है /

 

जब पुरुष और स्त्री दोनो ही सम्भोग करते है और पुरुष का वीर्य,  जिसमे शुक्राण होते है , स्त्री की योनी के अन्दर स्तिथि गर्भाशय के मुख के बाहर जिसे सर्विक्स कहते है, वहां पर पुरुष-लिन्ग द्वारा स्खलित करके छोड़ दिया जाता है , उसी समय लाखों की सन्ख्या मे शुक्राणु गर्भाशय के मुख के अन्दर प्रवेश करते है / जैसे ही यह प्रक्रिया शुरू होती है , ठीक उसी समय स्त्री के जननान्गो मे स्तिथि ओवरी से अन्डाणु निकल कर फैलोपियन ट्यूब के माध्यम से   गर्भाशय मे आने का प्रयास करता है / उधर जहा एक तरफ शुक्राणु महिला के गर्भाशय के अन्दर पहुचने का प्रयास करते है वही दूसरी तरफ महिला का अन्डाणु भी गर्भाशय  की दीवाल के सहारे सहारे खिसकता हुआ पुरुष के शुक्राणु से फ्यूजन करने के लिये  इन्तजार करता है / शुक्राणुओ की फौज अन्डाणु के अन्दर प्रवेश करने के लिये तेजी से उसी ओर भागती है जिधर की ओर अन्डाणु गर्भाशय के इन्डोमेट्रियम की दीवाल से चिपका हुआ होता है और सबसे पहले पहुचने वाले शुक्राणु जैसे ही अन्डाणु के अन्दर प्रवेश करता है , शुक्राण का न्य़ुक्लियस और अन्डाणु का न्य़ुक्लियस दोनो ही FUSION  होकर एक हो जाते है और न्य़ुलियस के अलावा वे सभी अन्य तत्व आपस मे मिल जाते है / इस क्रिया को फर्टीलाइजेशन FETILIZATION   कहते हैं /

 

इस प्रकार दोनो के अणुओ के साथ साथ इनमे व्याप्त विद्युतीय तत्व भी मिल जाते है /

 

मेरा मानना है कि जैसे ही शुक्राणु और अन्डाणु दोनो ही मिलते है , उसी समय विद्युत के निगेटिव यानी न्य़ूट्रान आपस मे यानी शुक्राणु का निगेटिव और अन्डाणु का निगेटिव जैसे ही आपस मे छूते है उसी समय अन्डाणु की बाहरी परत मे छेद हो जाता है और शुक्राणु को अन्डाणु के अन्दर प्रवेश करने का रास्ता मिल जाता है / बाद मे आपस मे शुक्राणु और अन्डाणु के सभी तत्व आपस मे एसीमिलेट assimilate / fusion  हो जाते है /

 

इसे इस तरह के उदाहरण से समझा जा सकता है /जैसे हमारे घरों में आने वाली बिजली जिसमे फेज और न्य़ूट्रल दो तरह के तार होते है और जिनमे बिद्युत की धारा बहती है और इन दोनो के बीच मे जब कोई बिद्युत का उपकरण होता है तब वह कार्य करने लगता है जैसे बिजली द्वारा चालित पानी का पम्प अथवा रोशनी के लिये बल्व का प्रयोग /

 

लेकिन जब असावधानी से फेज या न्य़ूट्रल तार के बजाय फेज और फेज दोनो का मिलना होता है और जैसे ही यह मिलते है बहुत शक्तिशाली विस्फोट जैसा होता है, चिन्गारी निकलती है अथवा ऐसा न होने की स्तिथि मे अत्यधिक गरम होकर धातु पिघलने लगती है अथवा सारा का सारा तार गरम होकर जलने लगता है और यह क्रिया तब तक चलती रहती है जब तक कि फेज से फेज का कनेक्शन एक्दम अलग न हो जाये /

 

मेरा मानना है कि इसी तरह की क्रिया और प्रतिक्रिया मानव पुरुष के शुक्राणु और अन्डाणु के मिलने से होती होगी / जैसे ही शुक्राण और अन्डाणु आपस मे एक दूसरे को छूते होन्गे वैसे ही क्रिय़ा प्रतिक्रिय़ा होती होगी और अन्डाणु मे एक महीन छेद बनता होगा और उसके द्वारा शुक्राणु प्रवेश करता होगा /

 

बाद मे जब एक दूसरे के न्य़ुक्लियस का फ्यूजन आपस मे हो जाता है तब गर्भाशय के अन्दर की अनुकूल परिस्तिथियो के अनुसार जीवन और अन्गो का निर्माण वोम्ब मे होने लगता है /

 

यहां इस बात का विचार करना होगा कि जितनी भी क्रियायें इन सभी के बीच मे होती है , उनमे हर पायदान पर विद्युत का क्रियान्य्वयन अवश्य होता है , इन सभी क्रियायो के बीच होने वाले क्रियागत कार्य सारे शरीर के अन्गो के बीच के विद्युतीय ताल मेल और अन्य रासायनिक आयन की आवश्यकता के अनुसार सम्पन्न होते है /

 

इसलिये यह कहा जा सकता है कि मानव शरीर के मूल मे जहां से शरीर की रचना प्रक्रिया शुरू होती है , वहां विद्युत का प्रभाव अव्श्य होता है / यदि यह विद्युत न हो तो जीवन सम्भव नही होगा /

 

 

 

मानव हृदय और मानव विद्युत का  शरीर मे सन्चरण

 

मानव शरीर मे विद्युत का सन्चरण हृदय के माध्यम से होता है / हृदय ही वह शरीर का हिस्सा है जो विद्युत की तरन्गों द्वारा  सन्चालित होता है /

 

आधुनिक चिकित्सा शास्त्रियों द्वारा यह स्थापित किया जा चुका है कि मानव हृदय एक प्रकार के विद्युत करेन्ट के पैदा होने से ही धड़्कता है और अपना कार्य सम्पन्न करता है /

 

चिकित्सा वैग्यानिकों का समझना है कि मानव हृदय मे विद्युत धारा एस० ए० नोड (साइनो आरीकुलर नोड )  से पैदा होती है जो हृदय की एक मान्सपेशी मे जेनेरेट होती है / इसे मानव शरीर मे विद्युत पैदा होने का पहला स्थान कह सकते है अथवा यह कहा जा सकता है कि यह स्थान करेन्ट जेनेरेटर है /

 

पहले स्थान से जेनेरेट की गयी  विद्युत धारा इस स्थान से समाहित होती है /  यह एकत्रित और समाहित विद्युत धारा  एस० ए० नोड से एक तेज धड़्का ए० वी० नोड ( आरीकुलर वेन्ट्रीकुलर नोड ) मे तेज करेन्ट के रूप  मे पहुन्चता है , यह दूसरा स्थान है जहां तेज करेन्ट समाहित होता है / चिकित्सा वैग्यानिकों का समझना है कि मानव हृदय मे विद्युत धारा एस0 ए0 नोड से पैदा होती है जो हृदय की एक मान्सपेशी मे जेनेरेट होती है / एसo एo नोड से यह विद्युत का धड़्का एo वीo नोड मे तेज करेन्ट के रूप  मे पहुन्चता है , यह दूसरा स्थान है जहां पर मानव शरीर मे जेनेरेट विद्युत का प्रवाह बहुत तेज शक्ति से होता है / यहां से यही विद्युत का  शक्तिशाली प्रवाह तीसरे स्थान पर पहुचता है जो अपेक्षाकृत पहले और दूसरे स्थान से ज्यादा अधिक विस्तारित स्थान लेता है और इसका दायरा भी हृदय के अन्ग मे अधिक दूर तक होता है , इस तीसरे स्थान को ” बन्डल आफ हिज” कहते है  /

 

पहले स्थान मे विद्युत का प्रवाह बहुत शक्ति शाली होता है जो दूसरे स्थान पर आते आते और अधिक शक्ति शाली हो जाता है, लेकिन इसकी शक्ति की तीव्रता तीसरे स्थान मे आते आते अपेक्षाकृत कुछ कमजोर हो जाता है और चौथे स्थान मे आते आते यह सारे शरीर मे ड्म्प हो जाता है यानी यह करेन्ट एक तरह से माइनस से होकर शरीर के पाजिटिव आयन्स की तरफ चला जाता है / चौथे स्थान को ”पर्किन्सन फाइबर” कहते है / वास्तव मे यह फाइबर बहुत महीन सूत्र के बने हुये होते है, जिनसे मानव विद्युत का प्रवाह महीन हिस्सों मे बन्टकर सारे शरीर मे फैल जाते है /

 

इस तरह से शरीर के अन्दर पैदा हुयी विद्युत धारा सारे शरीर मे फैल जाती है और  मानव शरीर के सभी सेल्स और टीशूज और मानव के अन्गो को इनेगाइज कर देती है / यह एक तरह से कहा जाय कि शरीर की बैटरी चार्ज करने का प्राकृतिक तरीक कुदरत की तरफ से  मानव जाति और जीवित पदार्थो को मिला हुआ है /

 

 

पान्चवां कार्य सम्पन्न होने के लिये मेरा मानना है कि चौथे स्थान के विद्युतीय फैलाव को समेटने के लिये शरीर की अति सूच्छ्म रक्त वाहिनियां जो लिम्फैटिक सिस्टम और आटोनामिक  नरवस सिस्टम और सर्कुलेटरी सिस्टम से आपस मे जुड़ी हुयी होती है , इन के द्वारा सामूहिक रूप से विद्युत के मालीक्यूल्स और एटम तथा आयन्स अन्गो और दूसरे शरीर के प्रत्यन्गो के सेल्स और टिशूज मे पहुचते होन्गे, ऐसा मेरा विचार है /

 

मेरा मानना है जैसा कि मैने ऊपर कहा है, यह उन प्रयोगो पर आधारित है , जो मेरे द्वारा पिछले कुछ दशको से किये जा रहे है / यह प्रयोग आयुर्वेद के सिध्धान्तो पर आधारित होकर किये गये है /

 

इन प्रयोगो को करने के बाद जिस तरह के निष्कर्ष निकाले गये है, उनसे यह सिध्ध करने का प्रयास किया गया है कि मानव शरीर के अन्दर मे व्याप्त विद्युत ही मानव का जीवन और मृत्यु का निर्धारण करने मे बहुत बड़ा योगदान है /

 

आयुर्वेद के विग्यान मे वर्णन किये गये सिद्धान्तों का इलेक्ट्रिकल स्कैन का अविष्कार जिसे ” इलेक्ट्रो त्रिदोष ग्राफी / ग्राम आयुर्वेदास्कैन” या ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन” के नाम से जानते है / यह तकनीक मानव शरीर की  विद्युतीय रिकार्डिन्ग की तकनीक पर आधारित है /

 

ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन तकनीक के ग्यान के  बारे मे विवेचना पुस्तक के अलग भाग मे विस्तार से बतायी गयी है / जानकारी के लिये इसे वही रिफेरेन्स पेज पर अवलोकन करें /

 

मानव शरीर मे यानी बायो इलेक्ट्रिक का शरीर मे वितरण और

आयुर्वेद के मौलिक सिध्धान्तों के अनुसार शरीर का वर्गीकरण

 

 

अब यह स्थापित हो चुका है कि मानव शरीर मे विद्युत का जेनेरेशन होता है / मूल रूप से यह जेनेरशन हृदय की मान्शपेशियो से ही शुरू होता है, जिन्हे कार्डियक मसल्स यनी हृदय की मान्शपेशी कहते है / इसे दूसरी भाषा मे फेज / फेस भी कहते है / जैसा कि पिछले अध्ध्यायो मे यह बताया जा चुका है कि मानव शरीर मे विद्युत पैदा होने का किस तरह का फिनामिना काम करता है , उससे यह सम्भव प्रतीत होता है कि मानव शरीर एक तरह की बैटरी की तरह कार्य करता है / जो विद्युत की तरन्गों  को और विद्युत की लहरों को बराबर शरीर से बाहर फेकता रहता है यानी एमिशन करता रहता है / यह एक तरह की सामूहिक प्रक्रिया होती है जो शरीर के विभिन्न्न अन्गो के द्वारा बाहर की ओर एमिट की जाती है /

 

 

 

 

 

 

 

शरीर की इस प्रक्रिया को जान्चने के लिये जिस यन्त्र का उपयोग करते है , उसे इलेक्ट्रो त्रिदोष ग्राफी कहते है / चून्कि यह आयुर्वेद के सिध्धन्तो पर आधारित है , इसलिये आयुर्वेद से इसका सम्बन्ध होने के कारण इसे शार्ट मे ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन कहा जाता है / यह एक तरह का विद्युतीय रिकार्डर है जो शरीर की विद्युतीय तरन्गो को रिकार्ड करता है /

 

आयुर्वेद का यह रिकार्डर उसी तरह के रिकार्डर की श्रेणी मे आता है जैसा कि आधुनिक चिकित्सा विग्यान मे उपयोग किये जाने वाले रिकार्डर रोगो को या बीमारियों के निदान ग्यान के लिये उपयोग करते है / ऐसे रिकार्डरों को “’ इलेक्ट्रिकल रिकार्डर ’” कहा जाता है /

 

ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन मशीन शरीर के सारे उन स्थानो को जान्चती है जहां और जैसा आयुर्वेद के अनुसार  बताया गया है और शरीर को आयुर्वेद के दोषों के अनुसार विभाजित किया गया है / ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन मशीन शरीर के सारे उन स्थानो को जान्चती है जहां और जैसा आयुर्वेद के अनुसार  बताया गया है और शरीर को आयुर्वेद के दोषों के अनुसार विभाजित किया गया है /

 

ऐसा विभाजन आयुर्वेद के शास्त्रोक्त ग्रन्थो मे बताया गया है / आयुर्वेद के महान ग्रन्थ चरक सन्हिता और सुश्रुत सन्हिता और भाव प्रकाश ग्रन्थो मे स्पष्ट रूप से बताया गया है कि आयुर्वेद के यह सभी दोष यथा वात पित्त और कफ शरीर मे कहां कहां और किस स्थानो पर रहते है और शरीर की सभी क्रियायो का नियन्त्रण करते है /

 

ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन परीक्षण प्रणाली द्वारा सारे शरीर की मैपिन्ग आयुर्वेद के सिध्धान्तो पर आधारित है / आयुर्वेद के मत के अनुसार शरीर के हिस्सो की लाजिकल मैपिन्ग की गयी है और उसी अनुसार इन हिस्सो का इलेक्ट्रिकल ग्राफिन्ग की जाती है /

 

इलेक्ट्रिकल रिकार्डर का चिकित्सा कार्य अथवा रोग निदान मे उपयोग

 

इलेक्ट्रिकल रिकार्डर शरीर के कई अन्गो का परीक्षण करते है और फिर उसके बाद प्राप्त डाटा का अध्ध्य्यन करने के बाद बीमारियो का निदान करते है / ऐसे रिकार्डर जो चिकित्सा कार्य मे उपयोग करते है , ये नीचे दिये गये है /

 

१- इलेक्ट्रो इन्सिफेलोग्राम / ग्राफ ; यह इलेक्ट्रिकल स्कैन दिमाग  यानी ब्रेन को जान्चती है और इस जान्चे गये अन्ग को सामान्य अथवा असामान्य बताती है / असामान्य अवस्था मे ब्रेन से और इससे सम्बन्धित रोगो का निदान कर देती है जिससे पता चलता है कि रोगी को किस तरह का ब्रेन से सम्बन्धित रोग है / इलेक्ट्रिक इन्सिफेलोग्राम से दिमाग के अन्दर की विकृति और मिर्गी के दौरो तथा दिमाग मे ट्यूमर आदि बीमारियो की जान्च करते है /

 

२- इलेक्ट्रो मायलो ग्राम ; यह इलेक्ट्रिकल स्कैन शरीर की मान्सपेशियों की सामान्य अथवा असामान्य अवस्था को बताता है / मानव शरीर मे तमाम प्रकार की मान्सपेशियां होती है / इलेक्ट्रो मायलो ग्राम से शरीर की मान्सपेशियों की जान्च करके पता करते है कि शरीर की किस मान्सपेशी मे विकृति है / मान्सपेशियो का सूखना अथवा मान्सपेशियो का सामान्य आकार बढना अथवा पैरालाइसिस की स्तिथि मे मान्सपेशियो की शक्ति और उनकी विकृति का आन्कलन करके रोग निदान करते हैं /

 

३- इलेक्ट्रो कार्डियो ग्राफी ; यह इलेक्ट्रिकल स्कैन हृदय अन्ग का स्कैन करता है / इसके द्वारा हृदय के सामान्य अथवा असामान्य होने और हृदय से सम्बन्धित रोगों का निदान करता है /

 

४- इलेक्ट्रो गैस्ट्रोग्राम ; इस इलेक्ट्रिकल स्कैन के द्वारा मान्व शरीर की अन्तों के पैरेस्टेलिटिक मूवमेन्ट का अध्ध्य्यन करते है / इससे यह पता चलता है कि मान्व शरीर की आन्तो की गति कैसी है जिससे आन्त के रोगो का निदान किया जा सके /

 

५- इलेक्ट्रो पैलेटोग्राफी ; इस इलेक्ट्रिकल स्कैन के द्वारा मानव शरीर की पैलेट का अध्ध्य्यन करते है / इससे यह पता चलता है कि मान्व शरीर की पैलेट की स्थिति कैसी है जिससे मुख तथा पैलेट और दान्तो से सम्बन्धि्त रोगो का निदान किया जा सके /

 

५- इलेक्ट्रो रेटीनोग्राफी ; इस इलेक्ट्रिकल स्कैन के द्वारा मानव शरीर की आन्ख के रेटिना का अध्ध्य्यन करते है / इससे यह पता चलता है कि मानव शरीर के आन्ख के रेटिना की स्थिति कैसी है जिससे आन्ख के रेटिना से सम्बन्धि्त रोगो का निदान किया जा सके /

 

 

६- इलेक्ट्रो न्य़ुरोग्राम ;  इस इलेक्ट्रिकल स्कैन के द्वारा मानव शरीर नर्वे से सम्बन्धित अन्गों का अध्ध्य्यन करते है / इससे यह पता चलता है कि मानव शरीर केौन अन्गो के नर्व की स्थिति कैसी है जिससे नर्व से सम्बन्धि्त रोगो का निदान किया जा सके /

 

इस प्रकार से जैसा कि ऊपर बताया गया है कि कितने प्रकार के इलेक्ट्रिकल रिकार्डर चिकित्सा विग्यान के क्षेत्र मे आ चुके है जिनसे रोग निदान मे सहायता मिल रही है / जैसे जैसे वैग्यानिक प्रगति हो रही है उसी तरह से भविष्य मे इस तरह के रिकार्ड्र्स के ईजाद होने की सम्भावनाये बढती जा रही है /

 

ई०टी०जी० आयुर्वेदा स्कैन भी इसी श्रेणी का इलेक्ट्रिकल रिकार्डर है / आयुर्वेद का यह पहला और अकेला इलेक्ट्रिकल रिकार्डर है जो आयुर्वेद के मूल सिध्धान्तों का  ”स्टेटस क्वान्टीफाई ” करता है / यानी शरीर मे कितनी मात्रा मे और किस तरह की स्थिति मे यह बताये गये आयुर्वेद के सिध्धान्त किसी भी मानव मे पाये जाते है , यह नापा जा सकता है /

 

आयुर्वेदास्कैन से मानव शरीर के अन्दर व्याप्त क्या क्या मूल सिध्धान्त नापे जा सकते है, इसका अवलोकन नीचे कीजिये ;

 

१- प्रकृति त्रिगुणात्मक स्थिति यथा सत्व गुण / तम गुण / रजो गुण

२- मानव के जन्म के समय के त्रिदोष / प्रकृति की अवस्था यथा वात प्रकृति / पित्त प्रकृति / कफ प्रकृति

३- रुग्णावस्था मे त्रिदोष की अवस्था

४- त्रिदोषो के अलग अलग  पांच पान्च भेद

५- सप्त धातुयें

६- त्रिदोष प्रभावित सप्त धातुये

७- मल

८- मूत्र

९- स्वेद

१०- ओज

११- दोष आधारित त्रिदोष का काम्बीनेशन

१२- विकृति आधारित त्रिदोष का काम्बीनेशन

 

उपरोक्त के अलावा अन्य बहुत से डाटा प्राप्त होते है जो निदान ग्यान और चिकित्सा मे बहुत महत्व पूर्ण रोल निभाते है /

 

इस तकनीक का दूसरा हिस्सा रोग निदान से जुड़ा हुआ है / चून्कि यह तकनीक सारे शरीर का परीक्षण करती है इसलिये यह शरीर के सभी अन्गो का साथ साथ और सभी सिस्टम का डाटा पथोफिजियोलाजिकल और पथोलाजिकल दोनो रूपों मे उपलब्ध करा देती है / इससे यह पता चल जाता है कि शरीर के कौन कौन से अन्ग और सिस्टम सामान्य है या सामान्य से कम काम कर रहे है या सामान्य से अधिक काम कर रहे है /

 

ऐसे डाटा प्राप्त होने से और उनका स्पष्ट रूप से चिकित्सा कार्य मे उपयोग करने से आयुर्वेद चिकित्सा विग्यान सम्पूर्ण रूप से इवीडेन्स बेस्ड मेडिसिन की श्रेणी मे आकर पहुच जाता है /

 

 

यहां इस पुस्तक मे मुख्य विचार आयुर्वेद से सम्बन्धित विषयों का है अत: अयुर्वेद की आधुनिक निदान ग्यान की तकनीक ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन का विचार करना मुख्य उद्देश्य है ताकि आयुर्वेद के साथ आधुनिक ग्यान विग्यान और तकनीक का प्रयोग के सा कम्बाइन की गयी विधियो क सन्ग्यान लेना भी है / इसी विचार को अगे विस्तारित किया जा रहा है /

 

ईलेक्ट्रो त्रिदोष ग्राम / ग्राफ का आयुर्वेद चिकित्सा मे उपयोग

 

आधुनिक आयुर्वेद की हाई टेक्नोलाजी ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन भारतीय प्राचीन स्वास्थय चिकित्सा विग्यान के आदि स्वरूप को आधुनिक स्वरूप मे ट्रान्सफर करने का वैग्यानिक दृष्टिकोण से विवेचित करने का प्रयास है /

 

आयुर्वेद के आलोचकों का कहना है कि आयुर्वेद के मौलिक सिध्धान्त की रचना के पीछे किसी तरह का वैग्यानिक प्रमाण नही मिलता है और जितने भी सिध्धान्त दिये गये है , वे कल्पना मात्र पर आधारित है और इसमे किसी तरह की सत्यता नही है /

 

ऐसा कहना और इस तरह की आलोचना करना कि आयुर्वेद विग्यान ही नही है और यह एक तरह की स्यूडो साइन्स है / यह किस तरह का चिकित्सा विग्यान है जिसके बुनियादी उसूल केवल कल्पना पर आधारित है / आयुर्वेद मे कोई विग्यान नही है और न ही कोई वैग्यानिक आधार है ?

 

इस तरह के प्रश्न उठने स्वाभाविक है और आज के युग मे जब हर बात का वैग्यानिक आधार खोजने का प्रयास किया जा रहा है और उसे साइन्स के नजरिये से देखा जा रहा है , तब यह स्वाभाविक है कि ऐसे प्रश्न उठे और उनका उत्तर खोजा जाये /

 

जैसा कि पहले कहा जा चुका है कि मानव शरीर के अन्दर वही सब तत्व और केमिकल पाये जाते है जो इस धरा पर उपलब्ध है / वही सब मिजाज, वही सब करेक्टर, वही सब दशाये मानव शरीर के नदर पायी जाती है जो इस धरती पर उपलब्ध है / वैग्यानिक भी यह मानते है कि शरीर मे वही सब तत्व है जो इस धरती पर उपलब्ध है /

 

इन सबका विवेचन दुबारा करना ठीक नही होगा क्योन्कि इन सबका विवेचन पुस्तक के प्रारम्भिक पाठो मे पहले ही किया जा चुका है /

 

 

इसलिये यहां पर आयुर्वेद के नवीनतम आविष्कार इलेक्ट्रो त्रिदोष ग्राम आयुर्वेद स्कैन के बारे मे बताने का प्रयास किया जा रहा है /

 

जैसा ऊपर बताया गया है कि ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन आयुर्वेद की आधुनिक निदान ग्यान की तकनीक है / जिसके द्वारा ऊपर बताये गये आयुर्वेद के मौलिक सिध्धान्तों का आन्कलन किया जाता है /

 

प्राचीन काल मे नाड़ी परीक्षण ”  द्वारा  आयुर्वेद के

मौलिक सिध्धन्तो  को जानने का तरीका

 

प्राचीन काल से वर्तमान काल तक, आयुर्वेद के मौलिक सिध्धन्तो को  जान लेने की क्रिया प्रक्रिया को निदान ग्यान से जोड़्ते है / प्राचीन आयुर्वेद के ग्रन्थो यथा चरक सम्हिता और सुश्रुत सम्हिता और वाग्भट्ट और शारन्गधर सम्हिता और अष्टान्ग हृदय और भाव प्रकाश जैसे ग्रन्थो मे वात और पित्त और कफ को मानव शरीर मे उपस्तिथि को जानने और समझने के लिये आयुर्वेद के आचार्यो ने मनुष्य के शरीर की बनावट और मनुष्य के चरित्र गत लक्षणो को पहचान कर कुछ आबजर्वेशन लिखे है, जिनको आब्जर्व करके यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि जिस मनुष्य का परीक्षण किया जा रहा है उसके शरीर मे किस त्रिदोष की प्रधानता है जिससे दोषानुसार आयुर्वेद की चिकित्सा व्यवस्था की जा सके /

 

जैसा कि आयुर्वेद के जानकार और विशेष्ग्य बताते है कि आयुर्वेद लगभग ५००० साल पुराना चिकित्सा विग्यान है / इसलिये यह माना जा सकता है कि उस समय से लेकर वर्तमान तक त्रिदोषो को पहचानने का ऐसा एक तरीका चिकित्सको के पास है जिसके द्वारा यह पता किया जा स्कता है कि रोगी मनुष्य के शरीर मे किस प्रकार का दोष विद्यमान है /

 

त्रिदोषों के इस तरह के परीक्षण के अलावा एक और विधि आयुर्वेद मे प्रचिलित है और वह है ”नाड़ी परीक्षण ” / लगभग ७०० साल पहले लिखे गये आयुर्वेद के शास्त्रीय ग्रन्थ भाव प्रकाश मे इसका उल्लेख मिलता है / इससे पहले के लिखे गये ग्रन्थो मे नाड़ी परीक्षण का उल्लेख नही मिलता है / इसलिये यह अन्दाजा लगाया जा सकता है कि नाड़ी परीक्षण इस ग्रन्थ के लिखने से पहले १०० अथवा २०० साल के बीच मे प्रचलन मे आया होगा, क्योन्कि इसके पहले के आयुर्वेद के रचित ग्रन्थो मे किसी भी लेखक  ने नाड़ी परीक्षण का जिक्र नही किया है /

 

नाड़ी परीक्षण की प्रैक्टिस के बारे मे यही कहा जा सकता है यह आयुर्वेद मे १००० एक हजार साल पहले ही आयी है / भारतीय इतिहास बताता है कि मुगलो और मुगल शासको द्वारा पोषित यूनानी चिकित्सा विग्यान भारत / हिन्दोस्तान मे फला फूला और ऐसा कहा जाता है कि यूनानी  और आयुर्वेदिक दोनो विधियों के  चिकित्सक अपने रोगियो का नाड़ी परीक्षण करते थे / इसलिये यह कहा जा सकता है कि नाड़ी परीक्षण सम्भवतया १००० एक हजार साल पुराना हो सकता है / हलाकि भाव प्रकाश ग्रन्थ मे जिसमे सबसे पहले नाड़ी परीक्षण का जिक्र किया गया है , वह सम्भवत: आज से ७०० साल पहले की रचना है /

 

इससे पहले के रचित किसी भी आयुर्वेद के ग्रन्थ मे नाड़ी परीक्षण का उल्लेख नही है / इसलिये ग्रन्थ के रचनाकार ने नाड़ी परीक्षण विग्यान के बारे मे जिस समय लिखा होगा , उस समय जिस तरह का नाड़ी ग्यान का विवेचन किया गया है उससे यह आभास होता है कि यह नाड़ी परीक्षण की पैक्टिस और इस प्रैक्टि्स से प्राप्त ग्यान को मैच्योर करने मे बहुत समय लगा होगा और यह अनुमान के हिसाब से तीन सौ साल का समय हो सकता है , इसलिये कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि नाड़ी विग्यान आयुर्वेद मे लगभग एक हजार साल पहले आया है /

 

भाव प्रकाश ग्रन्थ मे नाड़ी के परीक्षण के बारे मे बताया गया है जो सन्स्कृत भाषा के सूत्रो मे दिये गये है / मानव शरीर के अन्दर की बीमारियो के हिसाब से भी नाड़ी की चाल का वर्णन किया गया है / नाड़ी का स्थान और नाड़ी का परीक्षण कैसे किया जाता है , यह सब विधि और विधान इस ग्रन्थ मे बताया गया  है / नाड़ी परीक्षण का यह ग्यान गुरु मुख से और गुरु के सानिध्य मे रहकर सीखने की बात भी कही गयी है / देखा जाय तो शास्त्र यही कहता है कि नाड़ी परीक्षण करना एक प्रकार की साधना और रियाज है जो प्रैक्टिस करने से आती है , अन्यथा यह बहुत गूढ़ और कठिन साधना वाला ग्यान है /

 

इसके अलावा आयुर्वेद मे दोषो के निदान के लिये मूत्र की परीक्षा और मल की परीक्षा और पसीना की परीक्षा का भी विधान बताया गया है जिसके द्वारा रोगी मानव शरीर का दोष विवेचन किया जा सके / आयुर्वेद मे रोग निदान के लिये पन्च विधि परीक्षा और अष्ट विधि परीक्षा और दश विधि परीक्षा का भी विधान बताया गया है / इस प्रकार से दोषो का निदान करने की अभी तक यही विधियां आयुर्वेद मे प्रचिलित रही है / आयुर्वेद के चिकित्सक इन्ही सब विधियो का उपयोग करके रोगी व्यक्ति का दोष और रोग निर्धारण करके चिकित्सा की व्यवस्था  अदिकाल से  करते चले आ रहे है /

 

आधुनिक काल की हाई टेक्नोलाजी ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन

द्वारा त्रिदोष और आयुर्वेद के दूसरे अन्य सिध्धन्तो का मूल्यान्कन

 

आयुर्वेद की आधुनिक निदान ग्यान की हाई कम्प्य़ूटराइज़्ड टेक्नोलाजी ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन का आविष्कार इस पुस्तक के लेखक और आयुर्वेद के चिकित्सक डा० देश बन्धु बाजपेयी द्वारा सन १९८८ से शुरु किया गया था / उस समय से लेकर  अब तक निरन्तर इसका विकास किया जा रहा है और इस तकनीक के आधार लेकर आयुर्वेद के मौलिक सिध्धान्त और रोग निदान और रोग चिकित्सा के अलावा शरीर की कार्य प्रणाली का इलेक्ट्रिकल आधारित दृष्टिकोण से अध्ध्य्यन का कर्य किया जा रहा है /

 

इस तकनीक से आयुर्वेद को एक वैग्यानिक आधार मिल गया है और अब यह ‘’ एवीडेन्स बेस्ड मेडिसिन’’ की श्रेणी मे आ गयी है / यह तकनीक चरक और सुश्रुत और भाव प्रकाश मे दिये गये आयुर्वेद के तत्वों और सिध्धन्तो का मूल्यान्कन प्रत्यक्ष और प्रमाण के साथ कर रही है / आयुर्वेद के शास्त्रोक्त ग्रन्थों में बताया गया है कि वातादि दोषॊ और इसके भेद मानव शरीर मे कहां कहां रहते है , यह एक प्रकार से आयुर्वेद के महर्षियों ने गुण दोष और कार्य के आधार पर विचार करके शरीर की शास्त्रोक्त  ”मैपिन्ग” की है /

शास्त्रो मे वर्णित शरीर की मैपिन्ग को आधार बनाकर इस तकनीक का विकास किया गया है / इस तरह से बतायी गयी मैपिन्ग को आधार बनाकर इसमे तकनीकी सुधार करके और तकनीकी इनोवेशन तथा तकनीकी ताल मेल  करके आयुर्वेद के निर्देशानुसार वर्णित बावों को समाहित करके एक उन्नत किस्म की आधुनिक कम्प्य़ूटेराइज़्ड  तकनीक विकसित की गयी है / जैसा कि पहले ही बताया जा चुका है कि यह एक तरह का इलेक्ट्रिकल रिकार्डर है / जिसके जरिये शरीर के चुने हुये हिस्सों की रिकार्डिन्ग करते है /

 

यह रिकार्डिन्ग शरीर मे प्लेस किये गये इलेक्ट्रोड के माध्यम से की जाती है / मशीन की स्क्रीन पर रिकार्ड किये जाने वाले हिस्से के ग्राफ बनते है / यह ग्राफ प्रिन्टर द्वारा छापे जा सकते है / बाद मे यही ग्राफ आवश्यकता के अनुसार नापे जाते है / यह नाप हारीज़ोन्टल अथवा वर्टीकल होती है / जब  सारे शरीर के चुने हुये हिस्सों की ग्राफिकल रिकार्डिन्ग होकर तथा अन्य सब तरफ की नाप आ जाती है, तब इसे रिपोर्ट बनाने वाले साफ्ट्वेयर मे भेजा जाता है / रिपोर्ट बनाने वाला साफ्ट्वेयर निर्देशानुसार रिपोर्ट बना देता है और अन्त मे प्रिन्टर द्वारा रिपोर्ट को रिकार्ड रखने के लिये छाप लिया जाता है /

 

आयुर्वेद की यह अत्याधुनिक तकनीक आयुर्वेद की चिकित्सा मे सटीक उपचार के लिये काम आती है लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि इसके द्वारा आयुर्वेद के मौलिक सिध्धान्तों का आन्कलन करने का काम भी किया जा स्कता है जिसे अभी तक असम्भव सा समझा जाता है /

 

इस तकनीक के और अधिक विकास से आयुर्वेद को नई दिशा और नई बग्यानिक सोच के साथ एक न्या मुकाम मिलेगा ऐसा विश्वास कर सकते है /

 

ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन के आन्कलन के हिसाब से ई०टी०जी० के परीक्षण कई तरीको से किये जाते है / ऐसा मरीज के शरीर के अन्दर की अधिक से अधिक स्वास्थय सम्बन्धी जानकारी प्राप्त करने के उद्देश्य के साथ है /

 

सामान्यतया परीक्षण का पहला तरीका पीठ / रीढ की हड्डी के आधार पर लेटकर और शरीर की मैपिन्ग के निर्धारण के अनुसार  ई०टी०जी० मशीन से जुड़े इलेक्ट्रोड प्लेसमेन्ट द्वारा किये जाते है ताकि शरीर द्वारा एमिट की जा रही विद्युत तरन्गो को जितना साफ सुथरा रिकार्ड किया जा सके / इसे हारिज़ोन्टल पोजीशन ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन रिकार्डिन्ग कहते है / इस स्तिथि मे शरीर का आकार और शरीर के सभी अन्ग की स्थिति रिलैक्स होकर चपटी होकर धरती के समानान्तर फैलता है और इस स्तिथि मे शरीर और शरीर के अन्गो द्वारा एमिट की गयी इलेक्ट्रिकल वेव्ज मशीन द्वारा रिकार्ड की जाती है / इसे रेस्टिन्ग पोजीशन रिकार्डिन्ग कहते है /

 

रिकार्डिन्ग करने का ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन का दूसरा तरीका मूवमेन्ट अथवा मोशन अथवा शारीरिक मेहनत कराकर यानी एक्सर्साइजिन्ग पोजीशन से जुड़ा है / आयुर्वेद मानता है कि बहुत सी तकलीफे अधिक श्रम या शारीरिक मेहनत से पैदा हो जाती है / चून्कि ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन परीक्षण तकनीक आयुर्वेद के सिध्धान्तो पर आधारित है और इस तकनीक का विकास इन्ही बताये गये शास्त्रोक्त सिध्धान्तो को आधारित करके विकसित किया गया है इसलिये शरीरिक मेहनत कराकर यानी वेर्टिकल पोजीशन मे शरीर की मैपिन्ग के अनुसार इलेक्ट्रोड का प्लेसमेन्ट करते है और फिर रिकार्डिन्ग करते है /

 

रिकार्डिन्ग करने का तीसरा तरीका मरीज को लम्बे समय तक मानीटरिन्ग करने का है और उसी अनुसार उसके पैरामीटर्स परिस्थितियो के अनुसार देखे जाते है / मानीटरिन्ग करने का समय चार घन्टे से लेकर एक दिन या अधिक दिनो तक हो सकता है / सारे शरीर मे मैपिन्ग के हिसाब से इलेक्ट्रोड का प्लेसमेन्ट किया जाता है / इसके अलावा शरीर का वह हिस्सा जो मरीज को अधिक तकलीफ देता है और मरीज चाहता है कि उस हिस्से का परीक्षण विशेष तौर पर किया जाय या चिकित्सक द्वारा  यह तय किया जाता है कि मरीज को किस तरह की तकलीफ है और दिन के २४ घटे मे किस किस समय तकलीफ होती है / उसी अनुसार रोगी की चिकित्सा व्यवस्था और रोग निदान के लिये कन्टीनुअस मानीटरिन्ग करने का यह  ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन सिस्टम का तीसरा तरीका है /

 

इसके अलावा शरीर की मानीटरिन्ग करने के लिये ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन के परीक्षण के साथ साथ शरीर के अन्य पैरामीटर्स का समयानुसार लम्बे समय तक देखने के लिये अन्य विधाओ का उपयोग करते है / यह सभी ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन की विकास की गयी तकनीके है जिनका उपयोग किया जाता है जैसा कि  पहले बताया जा चुका है /

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

Earth’s mass is approximately 5.97×1024 kg (5,970 Yg). It is composed mostly of iron (32.1%), oxygen (30.1%), silicon (15.1%),magnesium (13.9%), sulfur (2.9%), nickel (1.8%),  calcium (1.5%), and aluminium (1.4%), with the remaining 1.2% consisting of trace amounts of other elements. Due to mass segregation, the core region is estimated to be primarily composed of iron (88.8%), with smaller amounts of nickel (5.8%), sulfur (4.5%), and less than 1% trace elements.

A little more than 47% of Earth’s crust consists of oxygen.The most common rock constituents of the crust are nearly all oxides: chlorine, sulfur, and fluorine are the important exceptions to this and their total amount in any rock is usually much less than 1%. The principal oxides are silica, alumina, iron oxides, lime, magnesia, potash, and soda. The silica functions principally as an acid, forming silicates, and all the most common minerals of igneous rocks are of this nature. 99.22% of all rocks are composed of 11 oxides, with the other constituents occurring in minute quantities.

 

 

 

 

 

 

“त्रिदोष सिध्धान्त” , “सप्त धातुये” तथा “मल” यानी दोष दूष्य के दर्शन विग्यान एवं मौलिक सिध्धान्त के आधार पर व्यवस्थित है /

 

त्रिदोषों का शरीर मे उपस्तिथि का क्या आन्कलन है ? क्या स्तर है ? यह ग्यात करने के लिये अभी तक परम्परागत तौर तरीकों में केवल नाड़ी परीक्षण ही एक मात्र उपाय है / नाड़ी परीक्षण द्वारा त्रिदोषों  के विषय में प्राप्त जानकारी अकेले आयुर्वेद के चिकित्सक  के नाड़ी ग्यान परीक्षण अनुभव पर आधारित होता है / इस नाड़ी परीक्षण की प्रक्रिया में नाड़ी-परीक्षण के परिणामों को केवल मष्तिष्क द्वारा ही  अनुभव किया जा सकता है, लेकिन भौतिक रूप से देखा नही जा सकता है /

 

आयुर्वेद चिकित्सक त्रिदोषों , त्रिदोषों के प्रत्येक के पान्च, पान्च भेदों, सप्त धातुओं , मल इत्यादि को मान्सिक रुप से स्वयम किस स्तर पर स्वीकार करते हैं अथवा किस प्रकार अपने विवेक का उपयोग  करके दोष-दूश्य-मल का नोर्धारण करते है और इन सब बिन्दुओं को किस प्रकार और कैसे व्यक्त किया जायेगा, यह सब भौतिक रूप में साक्ष्य अथवा सबूत के रूप में  सम्भव नही है. जसे कि आधुनिक चिकित्सा विग्यान के परीक्षण है /

 

सम्भवत: आयुर्वेद के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है कि इलेक्ट्रो त्रिदोषा ग्राफ मशीन की सहायता से ई०टी०जी० आय्रुवेदास्कैन तकनीक का आविष्कार किया गया है /

 

ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन की इस तकनीक में [1] ई०टी०जी० रिकार्डिन्ग मशीन [2] मशीन केबल और शरीर के अन्गों तक रिकार्डिन्ग के लिये वायर [3] लिम्ब थोरैसिक इलेक्ट्रोड [4]  ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैनर कम्प्यूटर साफ्ट्वेयर [5] कम्प्य़ूटर  [6] प्रिन्टर आदि आदि की आवश्यकता होती है /

 

यह तकनीक Department of AYUSH- Ayurveda, Ministry of Health and Family Welfare, Government of India , New Delhi  द्वारा और आयुर्वेद की शोध कार्य कार्य को बढावा देने वाली भारत सरकार स्वास्थ्य मन्त्रालय की स्व्वायत्त सन्स्था Central Council for Research in Ayurveda and Sidhdha , New Delhi तथा इस तकनीक के practical परीक्षण Central Research Institute Ayurveda, Ministry of Health and Family welfare, Government of India, New Delhi तथा Department of Physiology, All India Institute of Medical Sciences, New Delhi तथा Department of  Physiology, Lady Harding Medical College, New Delhi द्वारा तथा जर्मनी के Department of Neuro Sciences,  Ruhar University, Bochum द्वारा जान्ची और परिक्षित की जा चुकी है /

 

Central Council for Research in Ayurveda and Sidhdha, Ministry of Health and Family Welfare, New Delhi द्वारा ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन तकनीक Approved और Recognised है /

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

  MY INTRODUCTION

Name: डा० देश बंधु बाजपेयी   Dr. Desh Bandhu Bajpai,

I [born 01.09. 1946] belongs to Kanpur city, Uttar Pradesh, India.

*Graduate and Post graduate in Homoeopathy, studied HOMOEOPATHY at KRANKENHAUS FUER NATURHEILWEISSENMUNCHEN, Germany in year 1973, also studied Homoeopathy at INSTITUTE OF CLINICAL RESEARCH, MUMBAI in year 1980 at POST GRADUATE level. 

Photo; From Left Dr Desh Bandhu Bajpai, an Unknown person who inserted himself for photography, Dr. med. Walther Zimmermann, Chefartz, Krankenhaus fuer Naturheilweissen, Harlaching, Munich, Germany and Dr. K.N. Khanna , Kanpur. The Photo was taken in 1977 at Vigyaan Bhavan, New Delhi at the occassion of Word Conference of Homoeopathy, organised by International Homoeopathy League, Switzerland.

*Graduate, Post graduate and Post Doctoral in AYURVEDA

*Practicing Allopathy, Ayurveda and Homoeopathy, simultaneously along with Acupuncture, Magneto therapy, Nature cure, Dietetics, Physiotherapy etc. since 40 years in Kanpur

*Deals in Ayurvedic Cardiology and chronically disease conditions.

*Inventor: Electrotridoshagraphy  [ETG] technology, Electrohomoeography [EHG] technology and 4 dimensional  Electrocardiography [ECG] machine

*Inventor: Shankhadrav Based Medicine

*Inventor: Clinical trial of Ayurvedic medicine in Penta scale potency

*Inventor: Blood serum flocculation test for diagnosing Ayurvedic and Homoeopathic medicines

*Inventor: Bandhu Slips and Card repertory of Ayurvedic and Homoeopathic remedies

*Some of the inventions are well appreciated by the National Innovation Foundation,  Ahamedabad, India.

 

*Visited: Afghanistan, Iran, Turkey, Bulgaria, Yugoslavia, Czechoslovak, Poland, Holland,Germany, Austria, Nepal etc.

 

*Hobbies; Writing, Reading, Electronics, Touring, Visiting new places, Classical Music, Art, Paintings, Journalism, Photography etc.

*Formerly Lecturer in HomoeopathicMedicalCollege and examiner of Homoeopathy in few Universities

*Language: () Foreign-English, German # read /understand -French, Russian () Indian: Hindi, Sansakrit, Urdu, Punjabi # read/understand: Bengali, Gujarati, and Marathi

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* can  be contacted  at following address by phone /  mobile or personal visit:

 

यहां सम्पर्क करें :

Vaidya Desh Bandhu Bajpai, 

मोबाइल : ९३३६ २३८९९४

Mobile:  9336238994

E-mail; drdbbajpai@gmail.com

E-mail; kpcarc@gmail.com