महीना: नवम्बर 2008

Garlic यानी लहसुन के ऒषधीय उपयोग


लहसुन के बारे में ऎसा  शायद ही कोई भारतीय हो , जिसने इसके बारे में न सुना हो । हलांकि बहुत से लोग इसको नहीं खाते है, यह एक अलग बात है, लेकिन इससे परिचित सभी है ।

वैसे यह साग तरकारी के साथ मसाले के रूप में भोज्य पदार्थ के रुप में सेवन की जाती है। इसकी खेती सारे भारत में की जाती है । इसका पौधा प्याज के पौधे की तरह ही होता है और इसकी जड़ें ही गठान की तरह होती है, यही गठान या गांठे लहसुन कही जाती हैं और इन्हे ही उपयोग करते है ।

आयुर्वेदिक मतानुसार लहसुन ५ प्रकार के रसों से युक्त होता है । इसमें खट्टा रस नहीं होता है । इसकी जड़ में चरपरा रस, पत्तों में कड़्वा रस, नाल में कसॆला रस, नाल के अगले भाग में लवण रस, और बीजों में मधुर रस रहता है ।

 

लहसुन पौष्टिक, कामोद्दीपक, स्निग्ध, उष्ण, पाचक, सारक, रस और पाक में चरपरी, तीक्ष्ण, मधुर, टूटी हड्डी को जोड़नेवाला, गले की तकलीफों को ठीक करने वाला, पचने में भारी, रक्त पित्त को बढाने वाला, बल्कारक, कान्तिवर्धक, मष्तिष्क को शांति देने वाला, नेत्रों को हितकारी और रसायन होता है । यह ह्रदय रोग, जीर्ण ज्वर, कुक्षि शूल, कब्जियत, वायुगोला, अरुचि, खांसी, सुजन, बवासीर, कोढ, मन्दाग्नि, क्रमि, वात, श्वास, और कफ़ को हरने वाला गुण्युक्त वनस्पति है ।

इसके सेवन से सभी प्रकार की वात दर्द या शरीर में होने वाली सभी तरह के दर्द, चाहे वे कैसे हों, दूर होते हैं । यह बुढापे की व्याधियों को दुर करने में अति लाभ्कारी है ।

 

लहसुन के उपयोग का सबसे अच्छा तरीका यह है कि लहसुन की २ कलियां और इसके बराबर वायविडन्ग लेकर एक साथ पीस लें । इसमें आधा कप दुध और आधा कप पानी मिलाकर ३ मिनट तक उबालें । फिर इसमें शक्कर मिलाकर गुन्गुना रहते पी लें । ऐसी एक खुराक सुबह और एक खुराक शाम को पी लें । यह प्रयोग ठन्ड्क के दिनों में करना श्रेष्ठ है । गर्मी के दिनों में लहसुन और वायविडन्ग की मात्रा आधी कर देना चाहिये तथा इसकी एक खुराक केवल सुबह एक बार ही सेवन करना चाहिये ।

 

यह लहसुन के चिकित्सकीय उपयोग का सबसे अच्छा तरीका है । इसे सभी रोगों में प्रयोग कर सकते है । यह रसायन औषधि है, इसलिये इसे सभी रोगो की अवस्थाओं मे यदि उपयोग किया जाये तो लाभ अवश्य होता है ।

 

 

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AIDS , एड्स का इलाज आयुर्वेद में मॊजूद


भारतीय भाषा तमिल में १६ वीं शताब्दी में “वल्लभाचार्य” नाम के एक सिद्द सम्प्रदाय के चिकित्सक ने एक पुस्तक लिखी है, जिसका शीर्षक “वैद्य चिंन्तामणि” है । अभी तक यह पुस्तक तमिल भाषा में थी, लेकिन एक हिन्दी भाषी आयुर्वेद के अधिकारी , जो आन्ध्र प्रदेश में स्ररकार के आयुर्वेद विभाग में मुलाजिम थे, उन्होंने यह पुस्तक तमिल से सन्सकृत और हिन्दी भाषा में अनुवादित करके तथा अपने स्वयं के प्रयासों से इसे सन २००४ में प्रकाशित करके हिन्दी भाषी जन मानस के पास पहुचाने का बहुत सुन्दर कार्य किया है ।

 

इस पुस्तक के बारे में मैने बहुत कुछ सुन रक्क्खा था, लेकिन कभी देखने का अवसर नहीं मिला था । जनपद उन्नाव के आयुर्वेद के चिकित्सक डा० ओम वीर सिन्घ के पास यह पुस्तक मुझको देखने को मिल गयी ।

 

इस पुस्तक के ” क्षय ” प्रकरण में एक विवरण दिया गया है, जो “महाक्षय” शीर्षक से है, इसमें AIDS की बीमारी के जितनें भी लक्षण हैं , वे सब के सब दिये हये हैं, इतना ही नहीं मुझे यह देखकर बहुत ताज्जुब हुआ कि इस बीमारी का बहुत सटीक इलाज भी दिया गया है ।

 

यह एक उल्लेखनीय बात होगी, कि भारतीय चिकित्सकों ने एड्स जैसी बीमारियों को हज़ारों साल पहले पहचान लिया था और उसका इलाज भी ढूंढ निकाला था ।

National Confrence of AYUSH 2008, Dr. D.B. Bajpai’s participation, चित्रकूट , उ०प्र० में आयुष सन्गठन की राष्ट्रीय कान्फ्रेन्स के दो दिन दिनांक १५ और १६ नवम्बर २००८


आयुष सन्गठन की राष्ट्रीय स्तर पर चित्रकूट में आयोजित दिनांक १५ और १६ नवम्बर २००८ की सेमिनार में डा० देश बन्धु बाजपेयी ने हिस्सा लिया ।

यह सेमिनार AYUSH चिकित्सा विग्यान से सम्बन्धित चिकित्सा विधियों के वैज्ञानिक और अकादमिक स्तर पर शोध पत्र पढने तथा आयुष के चिक्त्सकों की समस्यायों को जानने और समझने के लिये आयोजित की गयी थी ।

डा० देश बन्धु बाजपेयी ने २२ विभिन्न राज्यों से आये आयुष चिकित्सा के उपस्तिथि डाक्टरों और लोगों के बीच में इलेक्ट्रो त्रिदोष ग्राफी ई० टी० जी० Electro Tridosh Graphy ETG के आविष्कार के बारे में विस्तार से बताया, जिसे सभी चिकित्सकों ने बहुत आश्चर्य के साथ , डा० बाजपेयी को इस आविष्कार के लिये बहुत बधायी दी और इस विषय में work shop आयोजित करने के लिये आग्रह किया ।

Bradycardia ब्रेडीकार्डिया यानी Radial Pulse का अथवा नाड़ी का सामान्य से कम धडकना


 

Bradycardia ब्रेडीकार्डिया  यानी Radial Pulse का अथवा नाड़ी का सामान्य से कम धडकना

 

 

इसे इस तरह से भी कह सकते हैं कि नब्ज का सामान्य से कम धडकना और सामान्य से कम गति से चलना ।

 

सामान्यतया प्रत्येक मानव चाहे वह नर हो या नारी, स्त्री हो या पुरुष, उसली नब्ज या Pulse एक मिनट में , यदि बैठे हुये हैं या आराम कर रहे हैं या लेटे हुये हैं, तो यह ६० से  लेकर ७० संख्या बार तक धडकती है ।कुछ चिकित्सा विज्ञानी यह मानते है कि ६० से लेकर ८४-८५ तक प्रति मिनट धडकन यदि है, तो यह सामान्य है और इसे सामान्य समझा जाना चाहिये ।

 

लेकिन इससे अधिक यानी ८६ सन्ख्या धड़कन प्रति मिनट यदि है तो यह असामान्य है यानी इसे तेज़ नाड़ी गति कहेंगे ।

 

इसके ठीक उलट यदि नाड़ी की गति ६० संख्या प्रति मिनट से कम हो जाये तो यह असामान्य समझा जाता है । नाड़ी की यह गति जितनी ही कम संख्या में नीचे की ओर जायेगी , उतनी ही नाड़ी की गम्भीरता का आंकलन किया जाता है ।

 

य़ानी आंकी गयी सामान्य ६० सन्ख्या प्रति मिनट नाड़ी की गति  यदि कम होती है तो इसे Bradycardia यानी नाड़ी की कम धड़्कन  होने की बीमारी समझते है ।

 

यह बीमारी क्यों होती है, इसे समझना चाहिये । सधारणतया इस बीमारी को जानने समझने के लिये शरीर में कुछ लक्षण पैदा हो जाते है ।

 

जैसे कि निद्रा का अधिक आना , हर समय सुस्ती  बनी रहना, कमजोरी, उठते बैठते सांस फूलना, अत्यधिक कमजॊरी, थोड़ा चलते ही दिल धड़कना, चक्कर आना,  आंखों के आगे अंधेरा छाना, चलते चलते गिर जाना इत्यादि लक्षण पैदा हो जाते हैं ।

 

ये केवल लक्षण हैं , जो बीमार व्यक्ति महसूस करता है । लेकिन यह बीमारी स्वतन्त्र रूप से नहीं होती । प्राय: यह बीमारी शरीर के किसी महत्व पूर्ण अंग की विक्रती के कारण होती है । शरीर के Vital parts यथा ह्रूदय, मस्तिष्क, गुर्दा, यकृत, आदि की किसी associate बीमारी की वजह से धड़कन कम होने की शिकायत हो जाती है ।

 

इनके अलावा और दूसरे कारण होते है, जिनसे यह तकलीफ़ हो सकती है ।

 

*  Genetic reasons

*  Heart/cardiac disorders

*  Harmonal imbalances – Thyroid, Thymus, Adrenalin

*  Psychopathology, Emotional etc.

*  Nutritional

*  Electrolytic imbalances

*  कोई  लम्बे समय से चली आ रही बीमारी

 

यह कुछ प्रमुख कारण Bardycardia बीमारी के हो सकते हैं । फिर भी , यह शरीर है, कुछ कहा नहीं जा सकता कि शरीर में यह गड़्बड़ी कहां से पैदा हो रही हैं ?

 

जो भी हो, मेर अनुभव यही है कि यदि किसी को Bradycardia की बीमारी हो, तो उसे Ayurvedic और Homoeopathic , इलाज लेना चाहिये । इस बीमारी का बहुत अच्छा इलाज Allopathy में नहीं है ।

 

होम्योपैथी में बहुत से मदर टिंक्चर , ट्राइटुरेशन तथा शक्तीकृत औषधियां हैं, जिनके उपयोग से नब्ज धीमें चलने की बीमारी शांत हो जाती है ।

 

आयुर्वेद में भी बहुत सी रस, रसायन, वटी, आसव, घॄत, चूर्ण, क्वाथ, इत्यादि बहुत बड़ी सन्ख्या में हैं, जिनके उपयोग से यह बीमारी जड़ से ठीक हो जाती है ।

 

इस बीमारी की चिकित्सा कराने से पहले एक ई०सी०जी० Electrocardiogram  करा लेना चाहिये । इसके साथ  ही Heamogramm के साथ साथ Liver, Kidney इत्यादि के भी टेस्ट करा लेना चाहिये । यह इसलिये जरूरी है ताकि यह पता चल जाय कि शरीर में गडबड़ी कहां पर है और कितने स्तर तक की है ।

 

यदि Electro Tridosha Graphy E.T.G.  की सुविधा है तो यह सबसे अच्छा है । आयुर्वेद के इस स्कॆन के बाद किसी भी Scan  की जरूरत नहीं होती, यही परीक्षण बहुत काफी होता है ।

 

इलाज कराते समय बीच बीच में परीक्षण कराते रहना चाहिये । कुछ हफ़्ते से लेकर कुछ माह तक Bradycardia  की बीमारी ठीक होने में लग जाते हैं । तब तक धैर्य पूर्वक इलाज कराते रहना चाहिये ।

 

बहुत अपवाद स्वरूप कुछ ऐसे मरीज होते हैं , जिनको दवाओं से फायदा नहीं होता, तब Pace maker  पेस मेकर लगाने की जरूरत पड़ जाती है ।

Osteomyelitis यानी जोड़ों की हड्डियों और मान्सपेशियों तथा इनके अन्दर की बनावट की सूजन


अधिकतर यह बीमारी बच्चों तथा किशॊर वय के लोगो को होती है । ३ या ४ साल की उम्र के बच्चों से लेकर १३ – १४ साल के उपर तक के किशोरों को जब elbow joints, wrist joints, knee joints, ankle joints आदि में दर्द और सूजन होती है तथा इसके साथ हल्का बुखार , भोजन में अरुचि, बदन में हल्का दर्द, आदि आदि लक्षण होते हैं, तब differential diagnosis  या  provisional diagnosis को  conclude करके रोग निदान विनिश्चय करते है । बीमारी के निदान के confirmation के लिये x-ray और  heamatological examination की सहायता लेते है ।

 

क्या करें ?

 

 

१- इस बीमारी का सबसे अच्छा इलाज Homoeopathy  होम्योपॆथी  में है । मॆनें कई रॊगी Homoeopathic दवा से ही  ठीक किये है ।

 

२- कुछ रोगियॊं के साथ रक्त विकार, यकृत रॊग आदि अन्य विकार भी होते है । इन विकारों की चिकित्सा के लिये साथ में Ayurvedic medicines prescribe की गयीं ।

 

इस प्रकार से की गयी चिकित्सा से यह बिमारी अवश्य ठीक हो जाती है और फिर जीवन में दुबारा  नहीं होती है ।

 

बहुत से रॊगी Orthopeadic surgeon के पास सलाह लेकर आये थे जिसमें बीमार जोड़ॊ में प्लास्टर बांधने या जोड़ों कि surgery करने की सलाह दी गयी थी । ये रोगी plaster  और surgery  की डर की वजह से Homoeopathy और Ayurved  का इलाज क्राने के लिये आये थे । 

 

ऐसे सभी रोगी Ayurvedic   और Homoeopathy की दवा खाकर ठीक  हो गये । तीस , पॆंतिस साल पहले जिनका इलाज किया गया था, वे आज भी स्वस्थ्य हैं और इन सभी को दुबारा कभी परेशानी नही हुयी ।