Bradycardia ब्रेडीकार्डिया यानी Radial Pulse का अथवा नाड़ी का सामान्य से कम धडकना


 

Bradycardia ब्रेडीकार्डिया  यानी Radial Pulse का अथवा नाड़ी का सामान्य से कम धडकना

 

 

इसे इस तरह से भी कह सकते हैं कि नब्ज का सामान्य से कम धडकना और सामान्य से कम गति से चलना ।

 

सामान्यतया प्रत्येक मानव चाहे वह नर हो या नारी, स्त्री हो या पुरुष, उसली नब्ज या Pulse एक मिनट में , यदि बैठे हुये हैं या आराम कर रहे हैं या लेटे हुये हैं, तो यह ६० से  लेकर ७० संख्या बार तक धडकती है ।कुछ चिकित्सा विज्ञानी यह मानते है कि ६० से लेकर ८४-८५ तक प्रति मिनट धडकन यदि है, तो यह सामान्य है और इसे सामान्य समझा जाना चाहिये ।

 

लेकिन इससे अधिक यानी ८६ सन्ख्या धड़कन प्रति मिनट यदि है तो यह असामान्य है यानी इसे तेज़ नाड़ी गति कहेंगे ।

 

इसके ठीक उलट यदि नाड़ी की गति ६० संख्या प्रति मिनट से कम हो जाये तो यह असामान्य समझा जाता है । नाड़ी की यह गति जितनी ही कम संख्या में नीचे की ओर जायेगी , उतनी ही नाड़ी की गम्भीरता का आंकलन किया जाता है ।

 

य़ानी आंकी गयी सामान्य ६० सन्ख्या प्रति मिनट नाड़ी की गति  यदि कम होती है तो इसे Bradycardia यानी नाड़ी की कम धड़्कन  होने की बीमारी समझते है ।

 

यह बीमारी क्यों होती है, इसे समझना चाहिये । सधारणतया इस बीमारी को जानने समझने के लिये शरीर में कुछ लक्षण पैदा हो जाते है ।

 

जैसे कि निद्रा का अधिक आना , हर समय सुस्ती  बनी रहना, कमजोरी, उठते बैठते सांस फूलना, अत्यधिक कमजॊरी, थोड़ा चलते ही दिल धड़कना, चक्कर आना,  आंखों के आगे अंधेरा छाना, चलते चलते गिर जाना इत्यादि लक्षण पैदा हो जाते हैं ।

 

ये केवल लक्षण हैं , जो बीमार व्यक्ति महसूस करता है । लेकिन यह बीमारी स्वतन्त्र रूप से नहीं होती । प्राय: यह बीमारी शरीर के किसी महत्व पूर्ण अंग की विक्रती के कारण होती है । शरीर के Vital parts यथा ह्रूदय, मस्तिष्क, गुर्दा, यकृत, आदि की किसी associate बीमारी की वजह से धड़कन कम होने की शिकायत हो जाती है ।

 

इनके अलावा और दूसरे कारण होते है, जिनसे यह तकलीफ़ हो सकती है ।

 

*  Genetic reasons

*  Heart/cardiac disorders

*  Harmonal imbalances – Thyroid, Thymus, Adrenalin

*  Psychopathology, Emotional etc.

*  Nutritional

*  Electrolytic imbalances

*  कोई  लम्बे समय से चली आ रही बीमारी

 

यह कुछ प्रमुख कारण Bardycardia बीमारी के हो सकते हैं । फिर भी , यह शरीर है, कुछ कहा नहीं जा सकता कि शरीर में यह गड़्बड़ी कहां से पैदा हो रही हैं ?

 

जो भी हो, मेर अनुभव यही है कि यदि किसी को Bradycardia की बीमारी हो, तो उसे Ayurvedic और Homoeopathic , इलाज लेना चाहिये । इस बीमारी का बहुत अच्छा इलाज Allopathy में नहीं है ।

 

होम्योपैथी में बहुत से मदर टिंक्चर , ट्राइटुरेशन तथा शक्तीकृत औषधियां हैं, जिनके उपयोग से नब्ज धीमें चलने की बीमारी शांत हो जाती है ।

 

आयुर्वेद में भी बहुत सी रस, रसायन, वटी, आसव, घॄत, चूर्ण, क्वाथ, इत्यादि बहुत बड़ी सन्ख्या में हैं, जिनके उपयोग से यह बीमारी जड़ से ठीक हो जाती है ।

 

इस बीमारी की चिकित्सा कराने से पहले एक ई०सी०जी० Electrocardiogram  करा लेना चाहिये । इसके साथ  ही Heamogramm के साथ साथ Liver, Kidney इत्यादि के भी टेस्ट करा लेना चाहिये । यह इसलिये जरूरी है ताकि यह पता चल जाय कि शरीर में गडबड़ी कहां पर है और कितने स्तर तक की है ।

 

यदि Electro Tridosha Graphy E.T.G.  की सुविधा है तो यह सबसे अच्छा है । आयुर्वेद के इस स्कॆन के बाद किसी भी Scan  की जरूरत नहीं होती, यही परीक्षण बहुत काफी होता है ।

 

इलाज कराते समय बीच बीच में परीक्षण कराते रहना चाहिये । कुछ हफ़्ते से लेकर कुछ माह तक Bradycardia  की बीमारी ठीक होने में लग जाते हैं । तब तक धैर्य पूर्वक इलाज कराते रहना चाहिये ।

 

बहुत अपवाद स्वरूप कुछ ऐसे मरीज होते हैं , जिनको दवाओं से फायदा नहीं होता, तब Pace maker  पेस मेकर लगाने की जरूरत पड़ जाती है ।

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s