महीना: जनवरी 2009

Homeopathy in Emergency आपातकालीन होम्योपैथी चिकित्सा


बेहोश, आधे बेहोश, अत्यधिक चक्कर आने, अचानक कमजोरी आ जाना, बहुत घबराहट, ऐसा लगे कि “अब मर जाउंगा और अब जीवन बचेगा नहीं “, हृदय रोग की अचानक बढ गयी बीमारियों तथा अन्य सभी प्रकार की emergency वाली स्तिथियों में मै Homeopathy का एक mixture रोगियों को देता हूं । इस मिक्स्चर से अमूमन शत प्रतिशत मरीजों को लाभ हो जाता है । इसे मैने हज़ारों बार आजमाया है । इस फार्मूले में थोडी सी हेर्फेर कर लेने से यह बहु उपयोगी बन जाता है ।

इस फार्मूले की दवायें निम्न हैं । यह सभी Mother Tincture फार्म में हैं ।

Crateagus Oxycantha Q
Avena Sativa Q
Alfalfa Q
Ashwagandha Q

इसे बराबर बराबर मात्रा में मिला लेते है । कोई भी इमर्जेंसी की स्तिथी हो इसका एक चम्मच मिश्रण चार चम्म्च पानी में मिलाकर पिला दें । इसे ५ मिनट के अन्तराल से लेकर एक घन्टे के अन्तराल से रिपीट कर सकते हैं । यदि रोगी को नींद न आये तो इसमें Passiflora incarneta Q की १२० बूंद मिलाकर दें । यदि कोई इन्फेक्सन हो, तेज़ बुखार हो तो इसमे Echinesia ang Q की ५ से १० बूंद दवा मिला दें । यदि Brain Heamorrhage की स्तिथि हो और रक्त चाप ज्यादा हो तो इसमें Raulfia Serpentina Q ,20 drops के साथ Ficus religiosa Q की २५ बूंद मिलाकर देना है । हृदय के रोग में Terminalia Arjuna Q की २० बूंद दवा मिला देना चाहिये । फेफड़ों से समबन्धित कोई रोग हो, तो इसमें Aspidosperma Q की १५ बूंद दवा मिला कर दे ।

इस दवा का मिश्रण किसी भी Nebuliser के द्वारा नाक के जरिये सुन्घाया भी जा सकता है, यदि किसी रोगी को दमा या तेज़ खांसी का अटैक पड़ गया हो । इस मिश्रण की vapour से भी बहुत फायदा होता है ।

इलेक्ट्रो त्रिदोष ग्राफी ई०टी०जी० की विकास यात्रा का तृतीय वृतान्त


 

sj-panchakarma

 

मैं अपना ई०टी०जी० के रिसर्च का कार्य जारी किये हुये था । मै चाहता था कि इस तकनीक को अधिक से अधिक explore और innovate किया जाये । अब यह research work किसी न किसी रूप में daily life दैनिक जीवन का एक अन्ग बन गया । रोग निदान तथा मौलिक सिद्दान्तों को अधिक से अधिक सही और सटीक ज्ञात कर लिया जाये , इसको जान लेने की सनक मुझे सवार हो गयी ।

mystic-indiaarticle11mysticindiafront1

मैने विचार किया कि इस खोज की जान्कारी सम्पूर्ण आयुर्वेद समाज को देना चाहिये । मैने कई आयुर्वेद की पत्रिकाओं को इस शोध कार्य से समबन्धित एक लेख प्रकाशन हेतु भेजा । लेकिन अफसोस के साथ कह रहा हूं कि किसी भी आयुर्वेद की पत्रिका ने इस शोध कार्य के बारे में लेख भी नही छापा और न इससे सम्बन्धित समाचार का प्रकाशन ही किया । एक पत्रिका के सम्पादक ने तो फोन करके यहां तक कह दिया कि इस तरह के लेख को प्रकाशन करके वे अपनी पत्रिका की बेइज्जती नही कराना चाह्ते । कुछ दैनिक अखबारों के खबरनवीसों, representative , correspondent से भी मिला, उन्हें शायद इसमें कोई थ्रिल, कोई अजूबा नहीं नज़र आया, इसलिये किसी ने इसे ज्यादा तरज़ीह नहीं दी ।

बहरहाल मैने हौसला नहीं छोड़ा । मेरे एक मित्र है पन्डित शिव शरण त्रिपाठी जी, जो एक साप्ताहिक अखबार ” दि मारल ” का हिन्दी भाषा में प्रकाशन करते हैं , मैं उनसे मिला और पूरी बात बतायी ।

 

 

moralweklyhead1

etgmoralsep05

etgmoral11oct05

etgmoraldec05

etgmoraldecember05

श्री त्रिपाठी जी ने कहा कि वे सहर्ष इस लेख को छापने के लिये तैयार हैं । मैने विचार किया कि “कुछ नहीं” होने से तो अच्छा है कि कुछ हो रहा है । मैने लगभग १५० वैद्यों की सूची उनको सौपी , जो देश के विभिन्न भागों में थे । उनके अखबार के अपने लगभग ४००० चार हज़ार पाठक थे । पहला लेख प्रकशित होते ही , अखबार के पाठकों की प्रतिक्रियायें मुझे पत्र और टेलीफोन द्वारा मिलनी शुरू हो गयीं । यह प्रतिक्रियायें उन लोगों की मिल रहीं थीं , जो आयुर्वेद के चिकित्सक नहीं थे, बल्कि आयुर्वेद विज्ञान में रुचि मात्र रखने वाले लोग थे ।

इस प्रकार से दि मारल के पाठकों द्वारा प्राप्त हौसला आफ्जाई से मुझे बहुत बल मिला और मैने दूसरे महीनें इस शोध के बारे में फिर एक दूसरा लेख लिखा । इससे इस तकनीक के बारे में लोगों को अधिक जान लेने की रुचि जाग्रत हुयी । इसी बीच उज्जैन से प्रकाशित होने वाली एक आयुर्वेद पत्रिका Scientific Journal of Panchakarma नें जुलाई २००५ के अन्क में इस तकनीक के बारे में एक लेख प्रकाशित कर दिया । इस पत्रिका मे ई०टी०जी० शोध के बारे में किये गये प्रकाशन के बाद कुछ आयुर्वेद के चिकित्सकों ने पत्र और फोन द्वारा इसकी मशीन को खरीदने के लिये इच्छा जतायी ।

मैने हर माह इस तकनीक के बारे में “दि मारल” साप्ताहिक अखबार में लेख प्रकाशित कर इसकी उपयोगिता आयुर्वेद चिकित्सा विज्ञान के लिये कितनी लाभ दायक सिद्ध होगी, बतानें की चेष्टा की ।

इसके बाद Mystic India पत्रिका ने इस तकनीक के बारे में लेख छापा । लेकिन अफसोस और मलाल अभी तक इस बात का मन में भरा हुआ है कि किसी आयुर्वेद की पत्रिका ने इस तकनीक के बारे में लेख छापना तो दूर की बात, इसके बारे में एक लाइन तक नहीं छापी और न इससे सम्बन्धित समाचार ही कभी छापा गया ।

इलेक्ट्रो त्रिदोष ग्राफी की विकास यात्रा वृतान्त : दुसरा चरण


copyayushnif

यह दिसम्बर २००४ के आखिरी हफ़्ते की बात है । मैं सुबह ९:३० बजे आयुष विभाग, स्वास्थय मन्त्रालय, नई दिल्ली , जो रेड क्रास बिल्डिंग, रेड क्रास रोड, संसद भवन के सामने, गेट नम्बर तीन और चार के बीच को जोड़ने वाली सड़क पर स्तिथि है, पहुंच गया । मेरे साथ में मेरा बेटा डा० अनुराग बन्धु बाजपेयी भी था । आयुष विभाग के कुछ अफ़सरो ने मुझे डिप्टी एडवाइजर डा० डी० सी० कटोच के कमरे में बैठा दिया । कुछ देर बैठने के बाद लगभग १०:३० बजे चपरासी ने बताया कि आपको डा० एस०के० शर्मा जी ने मिलने के लिये बुलाया है । डा० एस०के० शर्मा जी, भारत सरकार के आयुर्वेद के सलाह्कार Ayurveda Adviser, Government of India हैं । चपरासी के साथ मैं तुरन्त उठकर चल पड़ा । मै डा० शर्मा के सामने बैठा, उनसे अभिवादन किया । थोड़ी देर बाद, बातचीत का सिल्सिला शुरु हुआ ।कुछ देर बाद चार बड़े अधिकारी वहां और आ गये । फिर जबर्दस्त सवाल जवाब का सिल्सिला शुरू हुआ । मेरी जगह कोई और होता तो सवालों की बौछार सुनकर घबरा जाता और तुरन्त ही वहां से भाग खड़ा होता । लेकिन मै उन अफ़सरों के हर सवाल का जवाब देता जा रहा था । यह कोई डेढ घन्टा तक चलता रहा । मेरे तर्क और उनके हर सवाल का जवाब देने से अधिकारी कुछ सन्तुष्ट नज़र आये । उन्होंने बहुत थोड़े अन्श में स्वीकार किया कि इस तकनीक में कुछ दम लगती है ।

कुछ देर बाद डा० शर्मा जी ने कहा कि डा० बाजपेयी , अपरान्ह ३:३० बजे आपको एक प्रेजेन्टेशन देना है, जिसकी तैयारी कर लें ।

मुझे पता चला कि आज के दिन मैं भारत सरकार का Guest हुं ।

drdbbajpaitrace-with-record-and-machine

डा० देश बन्धु बाजपेयी ई०टी०जी० मशीन से रेकार्ड किये गये कागज की पट्टी को दिखाते हुये प्रसन्न मुद्रा में, साथ में ई०टी०जी० मशीन

अपरान्ह ३:३० बजे मुझे कमेटी हाल में बैठा दिया गया । यहां डा० एस०के० शर्मा जी, डा० डी०सी० कटोच,डिप्टी एड्वाइजर, डा० जी०एस० लावेकर, डाइरेक्टर, केन्द्रीय आयुर्वेद एवं सिद्ध अनुसन्धान परिषद, डा० बनवारी लाल गौड़, पूर्व डाइरेक्टर और प्रधानाचार्य, National Institute of Ayurveda, Jaipur और अब कुलपति, राजस्थान आयुर्वेद विश्वविद्यालय, क्रिया शारीर के head of department, NIA, Jaipur , डा० डी०एम० त्रिपाठी, मेडिकल अफ़सर, दिल्ली सरकार के अलावा National Physical Laboratory, AIIMS All India Institute of Medical Sciences,  NRDC National Research Development Corporation , ICMR, Indian Council of Medical  Research, CSIR Council for Scientific and Industrial Researchके अलावा कुछ अन्य वैज्ञानिक सन्सथानों के एक्स्पर्ट experts वहां उपस्तिथि थे । लगभग 18 experts वहां मौजूद थे ।

 

मैने अपना presentation दिया । इसके बाद सवाल जवाब का सिल्सिला शुरू हुआ, जो रात ६:३० बजे से अधिक समय तक चला । इतना भीषण Interview मैने अपने जीवन काल में तो कभी नहीं दिया होगा । बाद में वहां मौजूद बहुत से अधिकारियों नें अपना E.T.G. परीक्षण कराया ।

कुछ भी हो, यह मेरे लिये गर्व की बात है कि मैने भारत सरकार के स्वास्थय एवं परिवार कल्याण मन्त्रालय के अधिकारियों का ई०टी०जी० परीक्षण उसी कमेटी हाल में किया , जहां भारत सरकार के स्वास्थय मन्त्री बैठकर अधिकारियों से मन्त्रणा करते हैं । एक बात और, मै इस presentation के दर्मियान उसी कुर्सी पर बैठा हुआ था, जहां हमारे वर्तमान स्वास्थय मन्त्री डा० राम दौस अधिकारियों से विचार विमर्श के लिये बैठते हैं ।

इलेक्ट्रो त्रिदोष ग्राम / ग्राफ की विकास यात्रा


मुझे याद है कि २९ अक्टूबर २००४ को शाम लगभग चार बजे अहमदाबाद से मनीश वैद्य और योगेश श्रीवास्तव का टेलेफोन आया , जिसमें उन्होने बताया कि उनके साथ स्पीकर फोन पर एक टीम बैठी है, जिसमें इंजीनियर, कुछ डाक्टर भी शामिल हैं , ई०टी०जी० के बारे में विस्तार से जानना चाह्ते है । मैने अपनी स्वीकॄति दी । उधर से सवाल पूछे जाने लगे । ….कि इसका आइडिया कैसे आया … कि इसे कैसे डेवलप किया …. कि आपने किसी की सहायता ली….. कि इसे किस तरह से करते हैं, पचासों तरह के सवाल लगभग ४० मिनट तक करते रहे । इस तरह का इन्टरव्यू देने का यह पहला मौका था । आखिर में मुझसे कहा गया कि जिस तरह का आपका रिसर्च वर्क है, यह हमारे स्तर से अधिक का है, इसलिये इसे प्रतियोगिता में शामिल नहीं कर सकते हैं। यदि आपकी स्वीक्रूति हो तो हम इसे अपने दूसरे स्पांसर्स को भेज देंगें , वे इसमें कुछ मदद आपकी कर सकते हैं । मैने अपनी स्वीकृति दे दी ।

नेशनल इनोवेशन फाउन्डेशन की तरफ़ से मुझे कुछ दिनों बाद एक पत्र मिला, जिसमें उन्हीं सब बातों का जिक्र किया गया था । साथ में स्पांसर्स को भेजे गये चार पत्रों की फोटो कापी भी नथ्थी थी । यह पत्र देखकर मुझे जरूर दुख और निराशा हुयी । यह स्वाभाविक भी था ।

dbbrecord-pitta-sthaan

डा० देश बन्धु बाजपेयी एक रोगी के पित्त स्थान की ट्रैस रिकार्ड करते हुये

आपको बताता चलूं कि Electro Cardio graph machine ECG machine को खरीदने के लिये मेरे पास पैसे तक नहीं थे । मैं पहले ही कह चुका हूं कि मेरी आर्थिक स्तिथि बहुत अच्छी नही है । मुझे नई मशीन खरीदने के लिये GE Finance से २०, ००० बीस हज़ार रुपया का लोन लेना पड़ा । १५०० ड़ेढ हज़ार रुपये की हर महीने किश्त देनीं होतीं थीं , जिसे मै नहीं जुटा पाता था । १८ अठारह किश्तें मैने उधार लेकर, कुछ सामान बेच कर मुझको चुकाना पड़ा । यह सन २००० की बात है । मेरे बैंकर ने कहा कि वे सिर्फ़ एलोपैथी के डाक्टरों को ही लोन देते हैं । इस कारण मुझे नई मशीन के लिये प्राइवेट फाइनेन्सर के पास जाना पडा । नई मशीन से पहले मेरे पास एक पुराने माडल की कई साल पुरानी मशीन थी, जिसे मैने अपने एक मित्र डाक्टर से ले ली थी । मुझे डेढ हज़ार रुपये किश्त देने के लिये अपने बहुत से खरचे बन्द कर देने पड़े । बहर हाल इन सबका कोई मलाल नहीं था, क्योंकि मै हर चुनौती का सामना sportman’s spirit की तरह से लेता हूं ।

मैने विचार किया कि जो भी मुझे करना था मैने कर दिया, अब इस विषय पर एक किताब लिख दूंगा और इस तरह से अपने शोध कार्य को सबको परिचित करने का मौका मिल जायेगा ।

कुछ दिनों बाद मुझे आयुष विभाग, स्वास्थय और परिवार कल्याण मन्त्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली से पत्र मिला कि अमुक दिन आकर अपने शोध कार्य का प्रेजेन्टेशन मन्त्रालय में आकर करें ।

मैं निश्चित दिन नई दिल्ली गया और आयुष विभाग, जहां मुझे बुलाया गया था, पहुंचा, और मैने अपनी तकनीक का प्रदर्शन एक सर्वोच्च कोटि के specialist pannel के सामने किया ।

निश्चय ही यह दिन मेरे जीवन के यादगार दिनों में से एक है । शायद यह मेंरी शादी के बाद का , जिसे मैं पहला दिन कहूंगा और यह दिल्ली में स्पेशियलिस्ट पैनेल के सामने बिताया दिन, जिसे मै दूसरा दिन कहूंगा ।

आयुर्वेदज्ञ / आयुर्वेद के चिकित्सक / आयुष चिकित्सक स्वयम नहीं चाह्ते कि आयुर्वेद में कुछ नया हो


“गुरूजी,चिकित्सा शास्त्र की इस महानतम उपलब्धि को लोग यदि बला समझ रहे हैं तो ये उनका दुर्भाग्य है। मैं सतत प्रयत्नशील हूं कि चिकित्सा संबंधी ब्लागिंग करने वाले सभी ब्लागर इस विषय पर लिखने का साहस जुटाएं और अपने नैतिक उत्तरदायित्व का निर्वाह करें। आज मेरे आदरणीय गुरुवर्यसम शास्त्री श्री जे.सी.फिलिप जी ने मुझे फोन करके कहा कि वे इस विषय पर sarthi.info पर लिखेंगे। काश ये लकीर के फकीर बने हिंदी के चिकित्सा शास्त्र पर ब्लागिंग करने वाले इस महान अविष्कार का सम्मान करें अपनी लेखनी से तो कितना आनंद हो…….”

                                                                  Dr. Rupesh Srivastawa comments in

इलेक्ट्रो त्रिदोष ग्राफी ई०टी०जी० तकनीक है क्या बला ? आइये इसे भी समझिये

 

nifletter2

 

इसे पढ करके चौंकियेगा नहीं, सही बात और सत्य वचन यही हैं कि आयुर्वेद के नेता, आयुर्वेद के धुरन्धर विद्वान , आयुर्वेद के कर्ताधर्ता, आयुर्वेद के धाकड़ और जड़ीले भाई लोग,  बिल्कुल नहीं चाहते कि कोई नया आविष्कार आयुर्वेद जैसे विज्ञान के लिये किया जाय । Electro Tridosha Graphy,  ETG जैसी तकनीक को सामन्य जन और आप लोग भले ही महान आविष्कार बता रहे है , इन आयुर्वेद के नेताओं को यह सब “कूड़ा” नजर आ रहा है, जिसका मूल्य “दो कौड़ी” भी नही है और यह तकनीक “कूड़े कचरे के डिब्बे मे फेकने लायक” है । और तो और यह कोई वैज्ञानिक तकनीक भी नहीं है तथा इसका कोई वैज्ञानिक महत्व भी नहीं है और इससे विज्ञान जगत को कोई फायदा भी नहीं होने वाला ।

इलेक्ट्रो त्रिदोष ग्राफी ई०टी०जी० तकनीक है क्या बला ? आइये इसे भी समझिये


इधर पिछले कई महीनों से मुझे आये दिन ई-मेल मिलती रहती है कि ई०टी०जी० क्या बला है, कभी इसे भी समझाइये ।

drdbbajpaishowingtracerecord3

( Dr. Desh Bandhu Bajpai is showing the trace record obtained from ETG machine. ETG system is consisting of  [1] ETG machine [2] ETG software [3] Desktop / Laptop computer [4] Printer [5] other accessories )

 

यह तकनीक मेरे ही द्वारा आविष्कृत की गयी है । लगभग २० वर्ष पहले जब मेरे पास अच्छी सन्ख्या में हृदय रोग से पीड़ित मरीज आने लगे, जिनका उपचार मैं Ayurvedic अथवा Homoeopathic दवाओं द्वारा करता रहता था , उनकी स्वास्थय की दशा की monitoring के लिये मुझे इलेक्ट्रो कार्डिओ ग्राफ मशीन ECG machine की जरूरत पड़ी । रोगियों का इलाज करता भी था , जिनमें ऐसे रोगी भी थे, जिनको बाई पास सर्जरी के लिये एड्वाइज किया गया था, लेकिन उन्के पास इतना धन नहीं था कि वे आपरेशन करा पाते । ऐसे लगभग एक दर्जन मरीज मेरे पास आ गये । इसके अलावा वे मरीज भी आये जो एलोपैथी दवा खाना नहीं चाह्ते थे । कुछ ऐसे रोगी भी आ गये, जिनको एक Cardiologist ने यह कहकर भेज दिया कि इसका इलाज होम्योपैथी में है । बहरहाल ई०सी०जी० मशीन से मुझे बहुत मदद मिली और मै हृदय रोगियों का इलाज सफ़लता पूर्वक करने लगा ।

एक बार, शायद मई का महीना था, दोपहर में अचानक एक मरीज आ गया । तीमारदारों नें बताया कि इसे दमा का अटैक पड़ा है । जांच करने पर मुझे समझ में आया कि इसे हृदय रोग है । मैने उसके electrode बान्धे और लेट जाने को कहा । उसे बहुत बेचैनी हो रही थी, इस कारण बार बार उठ कर बैठ जाता था । इस अवस्था में ECG करना ठीक नहीं होता है । मैं इन्तजार करने लगा कि इसकी बचैनी कुछ कम हो तो काम आगे करूं । इसी समय मुझे याद आया कि इसकी Pulse देखी जाय कि इसके कौन सा आयुर्वेदिक दोष है ।

जब मै मरीज की pulse देख रहा था, उसी समय मेरी निगाह ECG machine के Stylus पर पड़ी, जो ठीक उसी तरह फड़क रहा था , जैसी की नाड़ी फड़क रही थी । Fraction of seconds मे यह सोचा कि नाड़ी और स्टाइलस के फ्ड़कने के अन्दाज बिलकुल एक जैसे है । यह सब कुछ महज तीन चार सेकेंड के अन्दर हुआ । मरीज का जब ई०सी०जी० किया ्तो उसे हृदय रोग निकला, मैने उन्हे सलाह दी कि इसे फिल्हाल मेडिकल कालेज में कार्डियोलाजी मे भर्ती कराकर उपचार करायें तो सबसे अच्छा होगा । यह बात आयी गयी हो चली, मुझे ध्यान भी नही रहा ।

एक दिन मैं फुर्सत से दवाखाने में बैठा था । मुझे नाड़ी और स्टाइलस के समन्वयन का ध्यान आ गया, जो मैने पहले देखा था । इसी समय विचार उठा कि क्या इस समन्वयन से आयुर्वेद के मौलिक सिद्धान्तों को क्वान्टीफाई किया जा सकता है ?

मैने इस पर प्रयास करना शुरु किया । पूरी तकनीक को Develop करते करते लगभग बीस साल लग गये । बहुत से मशीन में परिवर्तन किये गये । ECG में ६ वेब्स होती है, जिन्हें p,q,r,s,t,u waves कहते हैं , comparatively ETG में ११ तरन्गें होती है , जिन्हे a,b,c,d,e,s,g,h,l,m,o कहते हैं । इस तरह से तैयार किया हुआ Electrical scan, जिसे Electro Tridosha Graphy, ETG नाम दिया गया ।

GHOST ATTACKS ; SHAITAN ATTACK ; IMPURE SOUL’S ATTACK PATIENTS ; भूत प्रेत के चढ जाने से पीड़ित रोगी


                      

Since many years, I saw a number of patient, in which GHOSTS and evil sprits were intered and was affected by the impression of the reaction of ghosts and evil spirit. The family of these victims was disturbed due to the reaction and behaviour of patient. They could not understand , what to do ?

The Psychologist Practitioner prescribes tranquelisers and hypnotic drugs and the patient becomes slugiss under the impression of the drugs. Their mental capacity becomes down and thus they were not ina position to do their own jobs and work. If they left medicine, the condition becomes worse, so they have to start again the similar treatment.

पिछले कई  सालों  में मुझे ऐसे रोगी देखने को मिले, जिनके भूत और प्रेत शरीर में घुस गये थे और वे रोगी भूत की वजह से परेशान हाल थे । मरीज तो परेशान था ही, सबसे ज्यादा मरीज के तीमार दार और घर वाले परेशान थे । उनकी समझ में ही नहीं आ रहा था कि क्य़ा किया जाय ? मनोरोग चिकित्सक उन्हें जो भी दवा देता था, उसको खाने से वे दिन भर सोते थे और सुस्ती भरी रहती थी । दवा छोड़ देने के बाद उनकी फिर वैसी ही हालत हो जाती थी । यही हाल कमी वेशी सभी मरीजों का था ।

Bychance some patients of GHOST ATTACK and EVIL SPIRIT ATTACK, who have taken my treatment earlier and was alright physically, when came i contact of these victimised patient , they recommended for the treatment to my concerns.

सन्योग से जो रोगी अपना इलाज कराकर मेरे यहां से गये थे या उनको ठीक होते हुये दूसरे मरीजों या लोगों ने देखा था, उन्होए मेरे पास भेज दिया ।

When I see these patients, I first recommend an Electro Tridosha Graphy ; ETG AyurvedaScan examination. The reason is behind the examination is, that ETG examination provides the physical and mental data of the patient concerned in individual way. It provides the data of the Ayurvedic fundamentals and their status inside the body. It also provides the sensitive parts of the body and organs and their pathophysiology and pathology.

जब भी मै ऐसे मरीजों को देखता हूं तो उनको ETG परीक्षण करा लेने की सलाह अवश्य देता हूं । इसकी वजह है । ETG परीक्षण से यह पता चल जाता है कि आयुर्वेद के दोषादि की क्या स्तिथ है और दूसरे शरीर के कौन कौन से हिस्से sensitive हैं या उनमें किस तरह की और कैसी विकृति है ?

It is observed that many patients are automatically tensive , without any reasons. Some students were in trouble with their studies. They wake in the night and study, therefore the ratio in between mind and body functions disturbes them and could not be maintained. Due to this reason ,  the imbalance was regular and they have got the attack of the ghosts. Mostly in all patients one thing was common that they were suffered from Tachycardia in continuty.

अधिकान्श रोगियों में देखा है कि उन्हें न चाह्ते हुये अपने आप ही Tension बना रहता है । कुछ छात्र अपनी पढाई करने की वजह से परेशान रहते थे, रात रात में जाग कर पढाई किया करते थे, इससे उनके दिमाग और शरीर के बीच का सन्तुलन जिस अनुपात में होना चाहिये था , वह बरकरार नही रह पाया । इस कारण से ठीक नींद और आराम न कर पाने से उन्हें इस तरह के दौरे पड़ गये । लगभग सभी मरीजों मे Tachycardia की शिकायत मौजूद रही ।

When ETG is done , most of the anomalies present in the body comes out. Ayurvedic treatment is a way of the comprehensive treatment and mostly all the complaints are treated simultaneously.

जब ETG परीक्षण कर लेते है तो इसमें जहां जहां विकृतियां शरीर में पायी जाती हैं , उन सभी विकृतियों का इलाज एक साथ करते हैं । इस बात का conclusion निकालते हैं कि वर्तमान में हो रही तकलीफ का कारण क्या है ? इसका phenomenon समझने के बाद औषधियों का चुनाव करते हैं ।

मै ऐसे मरीजों को, यदि मेरी समझ में आता है , तो Homoeopathic medicines के मदर टिक्चर के mixture का उपयोग करता हूं । अन्यथा आयुर्वेदिक दवाओं के प्रयोग से ही कुछ दिनों में आरोग्य प्राप्त हो जाता है । रोगी को मानसिक श्रम कम से कम करना चाहिये, यदि वह विद्यार्थी है, तो सुबह जल्दी उठकर अद्ध्यन करे और दिन २ बजे के बाद कुछ भी न पढे और न मान्सिक श्रम करे । भोजन जल्दी रात ८ बजे तक कर ले, हल्का भोजन करे और १० बजे तक सो जाये । रात मे न जागे और न घर वालों को उसको सोते से जगाना चाहिये । यदि सोते से जगा देंगें तो फिर अटॆक पड़्ने की सम्भावना होती है । जब तक पूरी तरह से न ठीक हो, यह दिन चर्या अपनानी चाहिये ।

भूत और प्रेत भगाने के लिये किसी जन्तर मन्तर वाले के पास, या झाड़ फूंक वाले बाबा या औलिया के पास नहीं जाना चाहिये । आज तक ना तो कोई ठीक हुआ है, ऐसा मुझे देखने में नहीं आया है । हलांकि लोग बताते बहुत हैं लेकिन इसकी कोई scientific evidence मुझे देखने को नहीं मिली ।

भूत प्रेत बाधा से ग्रसित रोगी आयुर्वेद का उपचार लें, उनकी तकलीफ अवश्य दूर होगी ।

      

Infertility / Sterility यानी महिलाओं में बन्ध्यत्व या बच्चे पैदा न होने की क्षमता


uterus

प्रत्येक महिला और प्रत्येक विवाहित पुरुष का सपना होता है कि विवाह के बाद के कुछ वर्षों के भीतर उनके परिवार में बच्चे पैदा हों । यह कामना करना स्वाभाविक है, क्योंकि हर कोई चाहता है कि उसके परिवार में अगली पीढी का आगमन हो । लेकिन इन सब काम्नाओं पर तब तुषारापात हो जाता है , जब विवाह के कई साल बीत जाने के बाद बच्चे नहीं होते । बस यहीं से समस्या की शुरुआत होने लगती है ।

मेरे पास बहुत से मरीज आये, लेकिन इनमें केवल कुछ ही सौभाग्यशाली रहे जिनको उपचार के बाद बच्चे हुये । ऐसे मैने अपने साथी डाक्टरों के मरीजों को भी देखा है । मैने पाया कि जिन विवाहित जोड़ों ने एलोपैथी का उपचार लिया तथा जिन महिलाओं ने डी० एंड सी० कि प्रक्रिया अपनाई , उनको तो Permanent Sterility / Infertility हो गयी और उनके बच्चे ही नहीं हुये । जिन महिलाओं के जननान्गों में किसी प्रकार की छेडछाड़ या अनावश्यक बिला जरूरी सर्जरी की गयी, उनको भी स्थायी बन्ध्यत्व की तकलीफ हो गयी, और फिर कभी बच्चे नहीं हुये ।

इसके विपरीत जिन महिलाओं ने यह सब नहीं कराया और इन सब प्रक्रियाओं से दूर रहीं, उनको देर सबेर बच्चे जरूर हुये । इन्हीं मरीजों के बच्चे हुये जिन्होनें अपने जननान्गों को कुदरती तरीके से सुरक्षित रक्खा । एक महिला को तो शादी के 17 सत्रह साल बाद लड़्का हुआ । एक महिला को शादी के सात साल बाद लड़्की हुयी । एक महिला के शादी के १२ साल बाद जुड़्वां लडके हुये । इन सभी महिलाओं ने अपने जननान्गों के साथ किसी भी प्रकार की छेड़ाछाड़ी नहीं की । इसके विपरीत जिन्होंने कार्य किया , उनको बन्ध्यत्व की शिकायत हो गयी ।

जिन्हें बन्ध्यत्व की तकलीफ़ का जैसे ही पता चले, सबसे अच्छा है कि ऐसी महिलायें अपना उपचार आयुर्वेद से ही करायें । होम्योपैथी के उपचार का भी सहारा ले सकती हैं । लेकिन मेरे हिसाब से प्राथमिकता आयुर्वेद उपचार को ही देना चाहिये । जिन महिलाओं के बच्चे नहीं हैं , वे आयुर्वेद की शरण में जायें और इधर उधर न भटकें ।

Aloe Vera यानी घृत कुमारी या घी कुवांर या ग्वार पाठा : इसे समझ लीजिये, ये है क्या ?


आजकल Aloe Vera का बड़ा प्रचार हो रहा है । जो भी मरीज आ रहा है, वही पूछ रहा है कि ” बताइये ये क्या बला है, मेरे पास फलाने फलाने एलो वेरा की बोतल लेकर आये और कहा कि इसके पीने से आपकी सारी तकलीफ दूर हो जायेगी , वह चाहे जो हो “, मेरे दवाखाने में एक महिला बड़ी उत्सुकता से यह सब वार्तालाप सुन रही थी, उसने भी बताया कि उनके पास भी कोई एलो वेरा को लेकर आया था , लेकिन उसकी कीमत देखकर वे उसे नहीं खरीद सकी । उस महिला ने भी बताया कि जो बेचने वाला उनके पास आया था, उसने भी उनको एलो वेरा के गुण ऐसे समझाया , मानो वह “सन्जीवनी बूटी ” हो ।

इस तरह के सवाल करने वाले जब मुझसे पूछते हैं तो मै उन सबको अपना observation और experience बताता हूं ।

Aloe vera एक Cactus जाति का पॊधा है । जैसे अन्य कैक्टस बिना पानी के केवल नमीं पर जिन्दा रहते हैं, वैसे ही यह भी जिन्दा रहता है । आयुर्वेद , होम्योपैथी, यूनानी चिकित्सा ग्रन्थों में इसके प्रयोग के बारे में बताया गया है । इससे यह अर्थ निकाला जा सकता है कि आयुर्वेद चिकित्सा विज्ञान के practitioners को इसके प्रयोग के बारे में ज्ञान था । यद्यपि आयुर्वेद में इससे दवा बनाने के बहुत से योग तो नहीं दिये गये है, इसका उपयोग कुछ दवाओं में ’भावना’ देने या इसका रस डालकर दवाओं को घोटने के लिये ही उपयोग करते है । इसका रस या गूदा प्रयोग करते है । गूदा में भस्म बनाने वाले द्रव्यों को दबाकर , कपड़् मिट्टी करके , गजपुट में फूंकते हैं । इसके रस में मूली, नींबू, अदरक आदि का रस डालकर तथा अन्य दवायें मिलाकर पाचक या digestive system की बीमारियों के उप्चार के लिये दवाओं का निर्माण करते है । इसके रस का उपयोग कुछ बाहरी बीमारियों के उपचार के लिये भी करते है ।
इस जड़ी का सबसे बढ़िया और सबसे अधिक प्रयोग आयुर्वेद की प्रसिद्ध औषधि “कुमारी आसव” को बनाने में करते हैं । इस औषधि को बनानें में निश्चय ही आयुर्वेद के विद्वानों ने अपनी उत्कृष्ट मेधा का परिचय दिया है । आज एलो वेरा के बारे में चाहे जो भी कहा जाये कि इसमें कितने जरूरी Nutraceuticals कुदरती स्वरूप में विद्यमान हैं , लेकिन इसकी रोग निवारिणी शक्ति का परिचय न जाने कितने वर्षों पहले ग्यात हो चुका होगा । इसीलिये आदिकाल में लिखे ग्रन्थॊं में से एक लेखक ने जिस कुमारी आसव का फार्मूला लिखा है, उसने अपनी अद्वितीय दक्षता का परिचय देते हुये, एक ऐसा फार्मूला दिया जो आज भी उतना ही कार्गर है जितना पहले रहा होगा ।

कुछ वर्ष पहले मैं प्रगति मैदान , नई दिल्ली गया था । वहां किसी स्टाल में मैने अलोवेरा के बारे में किये गये रिसर्च , जो शायद केन्द्र सरकार के किसी विभाग द्वारा की गयी थी, के बारे में जान्कारी प्राप्त की । इसमें बताया गया था कि इसे लगाने से यह LEPROSY यानी गलित कुष्ठ को ठीक करता है । इसके आन्तरिक प्रयोग के लिये मुझे सिवाय आयुर्वेद की कुमारी आसव और कुछ दूसरे योगों के अलावा अन्य का पता नही है ।

यह कैक्टस जाति का पौधा है, इसलिये मुझे लगता है कि इसमे शरीर को नुकसान पहुचाने वाले Toxines जरूर मौजूद होंगे । Aloe Vera का जूस बनाने वाले इसे किस तरह से प्रासेसिग करते हैं, यह तो वही जाने । मै इतना जानता हूं कि मुझे कई लोगों ने बताया कि इसका जूस पीने के बाद उनकी बीमारी में कोई विशेष फायदा नही हुआ ।