दिन: जनवरी 1, 2009

डा० रूपेश श्रीवास्तव : मेरा “एकलव्य” शिष्य Dr. Rupesh Srivastawa : My “Ekalavya” Pupil


कल ३१ दिसम्बर २००८ यानी वर्ष का अन्तिम दिन । सुबह जब मै भोजन करने जा रहा था, तभी मुझे मुंम्बई से डा० रूपेश , जिनका “भडास” www.bharhaas.blogspot.com वेब ब्लांग बहुत प्रसिद्ध है, का फ़ोन मिला । मेरी डा० रूपेश से बात चीत हुआ करती है । रूपेश ने मुझे अपना “गुरु” मान लिया है, मैने भी उनको अपना “शिष्य” स्वीकार किया है । हलाकि मै अभी अपने आपको चिकित्सा विज्ञान का छात्र ही समझता हूं ।मै अपने को छात्र की सीमा में ही रखना चाहता हुं । कभी गुरू बनने के लिये सोचा ही नहीं । मै अक्सर ही आई० आई० टी० कानपुर जाता रहता हूं, जहां मै Prof: P.S.Chauhan से E.T.G. machine के सिलसिले में मिलने जाता हूं । श्री चौहान माइक्रोवेव टेक्नोलाजी के बहुत एक्स्पर्ट इंजीनियर हैं और देश तथा विदेश में अपने रिसर्च पेपर प्रस्तुत कर चुके हैं । ये बहुत एक्स्पर्ट Instrumentation engineer भी हैं । ई०टी०मशीन का prototype fabrication का जिम्मा उन्ही को सौप दिया है । मै कई वर्षों से किसी इन्जीनियर की तलाश में था , जो यह काम कर सके, लेकिन सैकडों इन्जीनियरों से बात करने के बाद मुझे यही अकेले मिले जो यह काम करने के लिये तैय्यार हो गये । मै जब IIT Kanpur जाता हू , तो इस सन्सथान में घुसते ही मेरी उम्र छात्रों जैसी हो जाती है और मै अपने आप को २० -२२ वर्ष की उम्र का समझने लगता हू । यह मेरी छात्रोन्मुखी मानसिक स्तिथि है । ६४ वर्ष की उम्र में मै अपने आप को अभी भी एक छात्र के अलावा और कुछ भी नहीं समझता । मै अपने सभी जूनियर चिकित्सकों से कह देता हूं कि मै आपका सीनियर छात्र हूं और मुझे इसी तरह से समझियेगा । आज भी मै चिकित्सा ग्रन्थों anatomy, physiology, pathology, practice of medicine, surgery, midwifery के अलावा physics, chemistry, Biotechnology आदि आदि विषयों को पढता रहता हू , क्योकि जिस एड्वान्स लेवल की स्ट्डी ई०टी०जी० टेक्नोलाजी के विकास के लिये चाहिये, उसमें यह सब जरूरी है । मझे गुरु होने की न तो पहले चाहत थी न अभी है । मैं छात्र ही बना रहना चाहता हू ।

लेकिन मेरे अकेले चाहने से क्या होता है ? जब लोग मुझे गुरु मानने लगें तो मै कर भी क्या सकता हू ? डा० रूपेश श्रीवास्तव मुझे अपना गुरु मानते है । वे मेरे “एकलव्य” शिष्य हैं । मैं अपने इस अकेले “एकलव्य” शिष्य को अपना शिष्य स्वीकार करता हूं । अब तक मैने किसी को अपना चेला नही बनाया, न किसी को अपना शिष्य स्वीकार किया । पहली बार मैने किसी की शिष्यता स्वीकार की है ।

यह सही है कि मै कर्ज़ के बोझ के तले दबा हूं । मेरी अपनी भी बहुत सी समस्यायें हैं । लेकिन यह सब ऊपर वाले का दिया हुआ है । इसमें कोई क्या कर सकता है ? मै किसी को अपनी कुन्डली नहीं दिखाता, मुझे पता है कि ज्योतिषी आपको अच्छा कुछ भी नहीं बतायेगा, सब खराब ही खराब बतायेगा । अभी कुछ दिन पहले उन्नाव के डा० ओमवीर सिंघ ने मेरी कुन्डली देखकर बताया कि जो भी आपको मिला है , वह सब आपको “भाग्य” से मिला है । अब भाग्य के आगे तो किसी का वश नहीं है । एक उदाहरण देता हूं । Electro Cardio Graphy का अध्य्य्न सबसे पहले १८ वीं शताब्दी में Waller नाम के व्यक्ति ने किया था । वालेर ने सबसे पहले पता किया था कि हॄदय मे विद्युत की तरह की activity होती है । उसने Oscilloscope की मदद से इसे प्रदर्शित करने का सफ़ल प्रयास भी किया । लेकिन इस खोज को तत्कालीन समाज ने कोई महत्व नही दिया और इसे महत्वहीन करार दे दिया गया । वर्षों बाद Holland के एक इन्जीनियर Einthoven ने Galvanometer का आविष्कार किया और वालेर के किये गये काम को आगे बढाया । इस तकनीक को Elektro kardio graphy नाम दिया गया । आइन्थोवेन को बाद में डा० कि उपाधि दी गयी और इन्हें इस खोज के लिये Noble Prize भी मिला । इस उदाहरण से यही भाग्य की बात साबित हो जाती है । मैने महान वैज्ञानिकों की जीवनियां पढी हैं । सबका कमोवेशी यही हाल रहा है ।

मैं जानता हूं कि, मुझे अपने किये गये आविष्कार के बदले में कुछ भी नहीं प्राप्त होने वाला है । इसके न तो बदले में मेंरी कुछ प्राप्त करने की अकान्क्षा है और न ही इस तरफ़ मैने ध्यान ही दिया है । इस तकनीक से तो मुझे कुछ मिला नहीं, लेकिन मैने इसमें गवांया बहुत कुछ है । आज यह तकनीक मेरे पास है, कल सारी दुनिया के लोग इसका फ़ायदा उठायेंगे , बिना किसी जाति भेद, रन्ग, देश आदि के । इस पर इस दुनिया के लोगों का अधिकार होगा, हजारों हजार साल तक पीडित मानवता की सेवा इसके जरिये होगी ।

डा० रूपेश शायद यह समझ गये कि मै financial crisis से गुजर रहा हूं और मुझे धन की आवश्यकता है । वे टेलीफोन पर ही बात करते करते फ़फ़क फ़फ़क कर रोने लगे, मैने उन्हे वास्त्विकता से समझाया, हलाकि वे कहते रहे कि मै आपको गुरु दक्षिणा के तौर पर कुछ धन भेजे दे रहे है, जिसके लिये मैने मना कर दिया । हां , यह जरूर है कि मेरी आर्थिक स्तिथी बहुत अच्छी नही है, फ़िर भी मै रोज कुआं खोदता हू और रोज पानी पीता हूं । इसके लिये मुझे बहुत परिश्रम करना पड्ता है । मै पैदल, सार्वजनिक वाहन, बस, टेम्पॊ, थ्री व्हीलर से चलता हू । काम की तलाश में लम्बी लम्बी यात्रायें करता हू । इतना करते हुये भी मै हमेशा प्रसन्न रहता हूं, कभी निराश नही होता, कभी निगेटिव नहीं सोचता, हमेशा हौसला बनाये रखता हूं, सबके हित के लिये सोचता हू । यह सब अब मेरे जीवन का एक अन्श बन चुका है । न तो इतना सब करने में मुझे कोई तकलीफ़ होती है और न ही मेरे हौसलॊं पर कोई फरक ।

मै चाहता तो काफ़ी पैसा पैदा कर सकता था, अगर यही ठान लेता, लेकिन मैने ऐसा नहीं किया ? क्योंकि मै कभी मनी माइन्डेड रहा ही नहीं । कभी कभी विचार करता हू कि सन्यास ले लूं । बहुत कर लिया अब थोडा आराम भी किया जाय, लेकिन लोग मुझे नहीं छोडते । कई साल पहले मुझे बहुत से लोगों ने सलाह दी कि मैं जो भी रिसर्च कर रहा हूं , उन्हें छोड दूं । मैने किया भी यही, सब छोड दिया, लेकिन क्या करूं, रिसर्च ने मुझे नहीं छोडा, रिसर्च मेरे पीछे पडी है, मै छोडना चाहता हू, लेकिन छूट नही रही ।

मुझे जो करना है, वह कर रहा हू । जो करना था, वह कर चुका । जो किया है, वह सबके सामने है । अच्छा किया या खराब, यह सब आप लोग जानिये।

डा० रूपेश के दुखी होने से , मुझे आन्तरिक तकलीफ तो जरूर हुयी , लेकिन इसके साथ ही बहुत कुछ “जीवन दर्शन” का ज्ञान भी हो गया । इस साल यह जीवन दर्शन भी मेरे लिये प्रेरणा पुन्ज का विषय होगा ।