इलेक्ट्रो त्रिदोष ग्राम / ग्राफ की विकास यात्रा


मुझे याद है कि २९ अक्टूबर २००४ को शाम लगभग चार बजे अहमदाबाद से मनीश वैद्य और योगेश श्रीवास्तव का टेलेफोन आया , जिसमें उन्होने बताया कि उनके साथ स्पीकर फोन पर एक टीम बैठी है, जिसमें इंजीनियर, कुछ डाक्टर भी शामिल हैं , ई०टी०जी० के बारे में विस्तार से जानना चाह्ते है । मैने अपनी स्वीकॄति दी । उधर से सवाल पूछे जाने लगे । ….कि इसका आइडिया कैसे आया … कि इसे कैसे डेवलप किया …. कि आपने किसी की सहायता ली….. कि इसे किस तरह से करते हैं, पचासों तरह के सवाल लगभग ४० मिनट तक करते रहे । इस तरह का इन्टरव्यू देने का यह पहला मौका था । आखिर में मुझसे कहा गया कि जिस तरह का आपका रिसर्च वर्क है, यह हमारे स्तर से अधिक का है, इसलिये इसे प्रतियोगिता में शामिल नहीं कर सकते हैं। यदि आपकी स्वीक्रूति हो तो हम इसे अपने दूसरे स्पांसर्स को भेज देंगें , वे इसमें कुछ मदद आपकी कर सकते हैं । मैने अपनी स्वीकृति दे दी ।

नेशनल इनोवेशन फाउन्डेशन की तरफ़ से मुझे कुछ दिनों बाद एक पत्र मिला, जिसमें उन्हीं सब बातों का जिक्र किया गया था । साथ में स्पांसर्स को भेजे गये चार पत्रों की फोटो कापी भी नथ्थी थी । यह पत्र देखकर मुझे जरूर दुख और निराशा हुयी । यह स्वाभाविक भी था ।

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डा० देश बन्धु बाजपेयी एक रोगी के पित्त स्थान की ट्रैस रिकार्ड करते हुये

आपको बताता चलूं कि Electro Cardio graph machine ECG machine को खरीदने के लिये मेरे पास पैसे तक नहीं थे । मैं पहले ही कह चुका हूं कि मेरी आर्थिक स्तिथि बहुत अच्छी नही है । मुझे नई मशीन खरीदने के लिये GE Finance से २०, ००० बीस हज़ार रुपया का लोन लेना पड़ा । १५०० ड़ेढ हज़ार रुपये की हर महीने किश्त देनीं होतीं थीं , जिसे मै नहीं जुटा पाता था । १८ अठारह किश्तें मैने उधार लेकर, कुछ सामान बेच कर मुझको चुकाना पड़ा । यह सन २००० की बात है । मेरे बैंकर ने कहा कि वे सिर्फ़ एलोपैथी के डाक्टरों को ही लोन देते हैं । इस कारण मुझे नई मशीन के लिये प्राइवेट फाइनेन्सर के पास जाना पडा । नई मशीन से पहले मेरे पास एक पुराने माडल की कई साल पुरानी मशीन थी, जिसे मैने अपने एक मित्र डाक्टर से ले ली थी । मुझे डेढ हज़ार रुपये किश्त देने के लिये अपने बहुत से खरचे बन्द कर देने पड़े । बहर हाल इन सबका कोई मलाल नहीं था, क्योंकि मै हर चुनौती का सामना sportman’s spirit की तरह से लेता हूं ।

मैने विचार किया कि जो भी मुझे करना था मैने कर दिया, अब इस विषय पर एक किताब लिख दूंगा और इस तरह से अपने शोध कार्य को सबको परिचित करने का मौका मिल जायेगा ।

कुछ दिनों बाद मुझे आयुष विभाग, स्वास्थय और परिवार कल्याण मन्त्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली से पत्र मिला कि अमुक दिन आकर अपने शोध कार्य का प्रेजेन्टेशन मन्त्रालय में आकर करें ।

मैं निश्चित दिन नई दिल्ली गया और आयुष विभाग, जहां मुझे बुलाया गया था, पहुंचा, और मैने अपनी तकनीक का प्रदर्शन एक सर्वोच्च कोटि के specialist pannel के सामने किया ।

निश्चय ही यह दिन मेरे जीवन के यादगार दिनों में से एक है । शायद यह मेंरी शादी के बाद का , जिसे मैं पहला दिन कहूंगा और यह दिल्ली में स्पेशियलिस्ट पैनेल के सामने बिताया दिन, जिसे मै दूसरा दिन कहूंगा ।

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