दिन: जनवरी 28, 2009

इलेक्ट्रो त्रिदोष ग्राफी ई०टी०जी० की विकास यात्रा का तृतीय वृतान्त


 

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मैं अपना ई०टी०जी० के रिसर्च का कार्य जारी किये हुये था । मै चाहता था कि इस तकनीक को अधिक से अधिक explore और innovate किया जाये । अब यह research work किसी न किसी रूप में daily life दैनिक जीवन का एक अन्ग बन गया । रोग निदान तथा मौलिक सिद्दान्तों को अधिक से अधिक सही और सटीक ज्ञात कर लिया जाये , इसको जान लेने की सनक मुझे सवार हो गयी ।

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मैने विचार किया कि इस खोज की जान्कारी सम्पूर्ण आयुर्वेद समाज को देना चाहिये । मैने कई आयुर्वेद की पत्रिकाओं को इस शोध कार्य से समबन्धित एक लेख प्रकाशन हेतु भेजा । लेकिन अफसोस के साथ कह रहा हूं कि किसी भी आयुर्वेद की पत्रिका ने इस शोध कार्य के बारे में लेख भी नही छापा और न इससे सम्बन्धित समाचार का प्रकाशन ही किया । एक पत्रिका के सम्पादक ने तो फोन करके यहां तक कह दिया कि इस तरह के लेख को प्रकाशन करके वे अपनी पत्रिका की बेइज्जती नही कराना चाह्ते । कुछ दैनिक अखबारों के खबरनवीसों, representative , correspondent से भी मिला, उन्हें शायद इसमें कोई थ्रिल, कोई अजूबा नहीं नज़र आया, इसलिये किसी ने इसे ज्यादा तरज़ीह नहीं दी ।

बहरहाल मैने हौसला नहीं छोड़ा । मेरे एक मित्र है पन्डित शिव शरण त्रिपाठी जी, जो एक साप्ताहिक अखबार ” दि मारल ” का हिन्दी भाषा में प्रकाशन करते हैं , मैं उनसे मिला और पूरी बात बतायी ।

 

 

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श्री त्रिपाठी जी ने कहा कि वे सहर्ष इस लेख को छापने के लिये तैयार हैं । मैने विचार किया कि “कुछ नहीं” होने से तो अच्छा है कि कुछ हो रहा है । मैने लगभग १५० वैद्यों की सूची उनको सौपी , जो देश के विभिन्न भागों में थे । उनके अखबार के अपने लगभग ४००० चार हज़ार पाठक थे । पहला लेख प्रकशित होते ही , अखबार के पाठकों की प्रतिक्रियायें मुझे पत्र और टेलीफोन द्वारा मिलनी शुरू हो गयीं । यह प्रतिक्रियायें उन लोगों की मिल रहीं थीं , जो आयुर्वेद के चिकित्सक नहीं थे, बल्कि आयुर्वेद विज्ञान में रुचि मात्र रखने वाले लोग थे ।

इस प्रकार से दि मारल के पाठकों द्वारा प्राप्त हौसला आफ्जाई से मुझे बहुत बल मिला और मैने दूसरे महीनें इस शोध के बारे में फिर एक दूसरा लेख लिखा । इससे इस तकनीक के बारे में लोगों को अधिक जान लेने की रुचि जाग्रत हुयी । इसी बीच उज्जैन से प्रकाशित होने वाली एक आयुर्वेद पत्रिका Scientific Journal of Panchakarma नें जुलाई २००५ के अन्क में इस तकनीक के बारे में एक लेख प्रकाशित कर दिया । इस पत्रिका मे ई०टी०जी० शोध के बारे में किये गये प्रकाशन के बाद कुछ आयुर्वेद के चिकित्सकों ने पत्र और फोन द्वारा इसकी मशीन को खरीदने के लिये इच्छा जतायी ।

मैने हर माह इस तकनीक के बारे में “दि मारल” साप्ताहिक अखबार में लेख प्रकाशित कर इसकी उपयोगिता आयुर्वेद चिकित्सा विज्ञान के लिये कितनी लाभ दायक सिद्ध होगी, बतानें की चेष्टा की ।

इसके बाद Mystic India पत्रिका ने इस तकनीक के बारे में लेख छापा । लेकिन अफसोस और मलाल अभी तक इस बात का मन में भरा हुआ है कि किसी आयुर्वेद की पत्रिका ने इस तकनीक के बारे में लेख छापना तो दूर की बात, इसके बारे में एक लाइन तक नहीं छापी और न इससे सम्बन्धित समाचार ही कभी छापा गया ।