महीना: अप्रैल 2009

स्वाइन फ्लू से बिल्कुल न घबरायें : don’t afraid of Swine Flu


मीडिया में स्वाइन फ़्लू की बहुत चर्चा हो रही है । मैं अपने अनुभव के आधार पर सभी लोगों को बताना चाहता हूं कि इस एपीडेमिक या वाइरस इन्फ़ेक्सन से घबराने की कतई जरूरत नहीं है । पिछले कई दशकों में फ़ैलने वाले वाइरस इन्फ़ेक्सन को मैने बहुत सफ़लता, सुरक्षा और प्रभावी तरीके से ट्रीट किया है और शत प्रतिशत सफ़लता मिली है ।

इस वाइरस के इलाज के लिये Homoeopathic Antibiotic Mother Tincture Mixture का, जो इसी ब्लाग में पिछली किसी डेट मे लिखा जा चुका है, उपयोग करें ।

आयुर्वेद की जड़ी -बूटियों का एक फार्मूला लिख रहा हूं । इस फ़ार्मूले की चाय बनाकर प्रयोग करें । यह भी बहुत उपयोगी है और फ़्लू मे बहुत उप्योगी है ।

फार्मूला : गोरख्मुन्डी, अनन्त मूल, गिलोय, चिरायता, काल्मेघ, नागरमोथा, तुलसी, अदरख, ये सब जड़ी बूटी बराबर मात्रा में ले, मोटा मॊटा कूट लें ।

इसका १० [दस] ग्राम मोटा कुटा हुआ दर्दरा चूर्ण, एक कप पानी में मिलाकर, चाय की तरह उबाल लें, फ़िर छान कर गुनगुना पी लें । दिन में कई बार पी सकते हैं ।

सावधानी:

१- इस बात से बिल्कुल चिन्ता न करें कि यह वाइरस आपको कोई नुकसान पहुचायेगा ।
२- मीडिया इस वाइरस के बारे में भ्रम वाली खबरें देकर , देश के लोगों के मन और मष्तिष्क में दहशत भरने का काम कर रहा है ।
३- यह ध्यान रक्खें कि एलोपैथी में इस वाइरस का कोई इलाज नहीं है, इसलिये शुरू से ही Prevention के तौर पर , जब वाइरस का खतरा हो , तो होम्योपैथी के मदर टिन्क्चर की एक खुराक प्रतिदिन खाते रहें । इससे इन्फ़ेक्सन से बचत होगी ।
४- समान्य स्वास्थय रक्षा के नियमों का पालन करें ।
५- एक कप ऊपर बतायी गयी आयुर्वेदिक चाय पीने से भी वायरस से बचत हो जायेगी ।
६- अगर किसी को Swine Flu का अटैक हो जाये, तो यही दवायें और आयुर्वेदिक चाय २ – २ घन्टे के अन्तर से सेवन करें ।
७- सामन्यत: वाइरस इन्फ़ेक्सन पान्च दिन से लेकर पन्द्रह दिन तक परेशान करते हैं । इसलिये हल्का काम करें, हल्का भोजन करें, आराम करें और मन में शान्ति बनाये रक्खे ।

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अधिक गर्मी से बचें ; Save yourself from too Heat


इस साल बहुत अधिक गर्मी पड़ रही है । मेरे अनुमान से जिस इन्टेन्सिटी मे आज गर्मी हो रही है, वह कायदे से दो या तीन हफ़्ते बाद पड़्नी चाहिये । लेकिन यह पहले से ही इतनी अधिक हो चुकी है कि गर्मी का पारा कमरे के अन्दर 35 degree से अधिक महसूस होता है । देश, काल, परिस्तिथि के अनुसार यह मापदन्ड घट बढ़ भी सकता है, लेकिन कानपुर मे आज का ताप्मान बहुत अधिक रहा है ।

इस तरह की गर्मी से बचना चाहिये । मुझे खुद दिन दोपहर में निकलना पड़्ता है, इसके लिये मैं कुछ उपाय करता हुं । अपने अनुभव से आप सबको वाकिफ कराता हूं ।

१- सिर पर टोपी / कैप जरूर पहनें ।
२- एक तौलिया या अन्गौछा या कोई भी दुपट्टा से सिर और गर्दन जरूर ढंक कर रक्खें ।
३- जब घर से बाहर निकलें, पीने के पानी की बोतल साथ में लेकर चलें ।
४- घर से निकलने के पहले पानी पी कर चलें ।
५- बाहर जब हों, तब बीच बीच में पानी पीतें रहें और पेट खाली न रक्खें ।
६- पैदल या मेहनत का काम धूप में न करें ।
७- चाय / पना / शर्बत / गन्ने का रस / नीम्बू पानी/ फलों का रस/ कोल्ड ड्रिण्क्स/ मठ्ठा/ लस्सी आदि तरल पदार्थ , जहां भी मिले , समयानुसार पीते रहें ।
८- बस के सफ़र में, दूर के सफ़र में, रिक्सा या सार्वजनिक वाहन में , यदि चलना पड़्ता हो तो भीड़ से बचें । यदि भीड़ में चलना ही पड़े, तो ग्लूकोज मिला पानी या एलेक्ट्राल मिला पानी बार पीते रहे ।
९- ठॊस आहार कम खायें । हल्का भोजन करें । सुबह नाश्ते के बाद मठ्ठा का सेवन अवश्य करें ।
१०- तेज धूप से बचने के लिये छाता का प्रयोग करें ।

जिनकी रोजाना तेज धूप में काम करने की आदत है या जिनको धूप में निकलना होता है, वे २ चम्मच पुदीना का रस और २ चम्म्च प्याज का रस , थोड़ा सा सेन्धा नमक मिलाकर सुबह शाम सेवन करें , इससे लू, लपट, गर्मी exposure of Heat से बचत होगी और गर्मी या हीट स्ट्रोक से बचे रहेंगे ।

अस्थमा यानी सान्स फूलने की बीमारी ; Asthama, Respiratory tract anomalies


दिल्ली के एक स्कूल की लड़्की की मौत अस्थमा के अटैक से उसके कालेज में ही हो गयी ।

मेरे विचार से और मेरे अनुभव में यह आया है कि पिछले 45 वर्षों में मैने किसी को भी अस्थमा के ऐसे अटैक से मरते हुये नहीं देखा है । दौरा जरूर पड़ा, लेकिन ऐसी मौत तो नही देखी, विषेश कर इस उम्र में , इतनी छोटी उम्र में कोई मरा हो, वह भी दमा से, ऐसा मुझे याद नहीं आता ।

जब मैने Practice शुरू की थी, उस समय मैं एलोपैथी की दवाओं से चिकित्सा कार्य करता था । यह वह जमाना था , जब एलोपैथी में दवायें मिक्सचर करके बनाई जाती थीं और मरीजों को दी जाती थीं । पेटेंट दवाओं का चलन ही नहीं था । डाक्टर मरीज के रोगों का निदान करते थे और उसी हिसाब से नाप तौल कर दवायें और उनकी मात्रा सेट की जाती थीं । तब एलोपैथी का इलाज कुछ कुछ individual मरीज की तकलीफ के हिसाब से हो जाता था ।

जर्मनी से वापस आने के बाद, मैने Homoeopathy की प्रैक्टिस शुरू की । इसका कारण यह था कि मुझे एलोपैथी की प्रक्टीस करने में आनन्द नही आ रहा था । एक तो लिमिटेशन, दूसरा मुझे इस बात का ग्यान हो जाता कि इस मरीज का इलाज यदि होम्योपैथी या आयुर्वेद से किया जाये तो सबसे बेहतर है, क्योंकि इस तकलीफ का एलोपैथी में कोई इलाज नही है । या इस बीमारी का इलाज सर्जरी है । मैं मरीज को उचित सलाह देता कि उसे क्या इलाज करने में फायदा है ।

आज भी इसी तरह की प्रैक्टिस करता हुं, जहां जैसी जरूरत समझता हू, वहां उचित औषधि का उपयोग करता हू ।
Asthama के समबन्ध में मेरा अनुभव शुरू से ही बहुत पाजिटिव रहा है । आज भी अस्थमा के मरीजों का इलाज करता हुं । मेरे अनुभव में कुछ बातें आयीं हैं , जिन्हें मै सबके साथ शेयर करना चाहता हूं । सबसे पहले बच्चों के अस्थमा के बारे में बताता हूं । एक बात सभी को ध्यान करना चाहिये कि 99.9 % बच्चों को Spasmodic Croup की बीमारी की तकलीफ होती है, जो अस्थमा की जैसी लगती है, लेकिन अस्थमा नहीं होता । चिकित्सक अधिकांशत: Spasmodic croup और Asthama में फर्क नहीं कर पाते, इसलिये भ्रम में asthama का इलाज होता रहता है । इस तरह से किये गये इलाज का खामियाजा मरीज को भुगतना पड़्ता है । मेरे पास रोजाना ही गलत चिकित्सा के परिणामॊ को भुगतने वाले मरीज आते रहते है, अब इसे क्या कहा जाये ? मैने पाया कि चिकित्सक Inhalers का उपयोग बिना आगा पीछा सोचे हुये कर रहे है । उन्हे इससे कुछ भी लेना देना नहीं है कि भविष्य में इन बच्चों के फेफड़ों का क्या हाल होगा ? Inhalers में स्टेरायड होता है, जो अपने आप में ही एक खतर्नाक दवा है ।

अधिक दिनों तक steroid के उप्योग से शरीर के वाइटल पार्ट्स यानी दिमाग, हृदय, लीवर, आंते, हड्डियां आदि के साथ साथ फेफड़े भी कमजोर होते है । जाहिर है, फेफड़े कमजोर होन्गे तो आक्सीजन शरीर को जिन्दा रखने के लिये
कहां से मिलेगी ? कभी कभी फेफ्ड़ॊं की बीमारी के साथ साथ Heart Problems भी पैदा हो जाती हैं । एलोपैथी कि दवायें शरीर की जीवनी शक्ति को कम करती हैं ।

मेरे विचार से इस लड़्की की मौत अस्थमा की दवाओं के दुष्परिणाम, शरीर के Vital parts के कमजोर होने और शारीरिक कम्जोरी तथा Pulmonary weakness की वजह से हुयी होगी ।

मैं एक बार फिर सबको आगाह करता हुं कि आस्थमा या दमा जैसी तकलीफ में एलोपैथी की एक आध दवा बहुत जरूरत होने पर खायें, लेकिन इसके साथ साथ आयुर्वेद या होम्योपैथी या यूनानी दवायें अधिक सेवन करें । इससे आरोग्य प्राप्त करने में बहुत मदद मिलेगी । इन्हेलर के सहारे ना रहें , तो ज्यादा अच्छा है । बहुत कष्ट होने पर अवश्य प्रयोग करें, लेकिन ऐसा खान पान , आहार, झीवन शैली अपनायें, जिससे बचाव होता रहे । आरोग्य प्राप्त करने के रास्ते बहुत हैं, इन्हें ढून्ढना आपका काम है ।

आयुर्वेद की पेटेण्ट या प्रोप्रायटरी दवाओं की टेस्टिन्ग के बारे में : about testing of Ayurvedic Proprietory medicines


अपने देश में जितनीं भी आयुर्वेद की दवायें बनाने वाली फार्मेसियां है, लगभग सभी कोई न कॊई पेटेण्ट दवायें बना रही हैं । इस समय तो हाल यह है कि सभी उन बीमारियों के इलाज के लिये आयुर्बेद की पेटेण्ट दवायें आयुर्वेद के औषधि निर्माताओं ने उपलब्ध करा दी हैं, जिनको लाइलाज माना जाता है । बहरहाल हालात यह हैं कि आयुर्वेद के चिकित्सक भी बिना समझे बूझे धड़ाधड़ इन दवाओं का उपयोग कर रहे हैं, नतीजा यह निकल रहा है कि नुकसान मरीज का हो रहा है और फायदा उठा रहे है औषधि निर्माता और चिकित्सक बन्धु ।

सबसे बड़ा नुकसान इन औषधियों के कारण आयुर्वेद को उठाना पड़ रहा है । पहली बात यह कि इन दवाओं का निर्माण आयुर्वेद के मूलभूत सिद्धान्तों Ayurvedic Basic Fundamentals पर कतई आधारित नहीं है । दूसरा ये सब दवायें न तो किसी लैबोरेटरी में या अस्पताल में या किसी रिसर्च सन्सथान में टेस्ट की जाती हैं और न किसी दवा की टेस्ट रिपोर्ट उपलब्ध होती है । जो भी विवरण उपलब्ध होते हैं , वे केवल अनुमान या कल्पना पर आधारित होते हैं । तीसरा, इन दवाओं में प्रयोग होने वाले द्रव्यों मे अक्सर विरोधाभासी दवाओं का उप्योग किया जाता है । इसके अलावा अन्य कारण भी हैं ।

ऐसा भी नही है कि इन दवाओं के टॆस्ट करने के लिये साधन उपलब्ध नही है । सभी साधन है । आजकल तो ई०टी०जी० तकनीक के अलावा कई और तकनीक आ गयीं है जैसे मुम्बई आई० आई० टी० के डा० जोशी द्वारा आविष्कृत की गयी “नाड़ी तरन्गिनी” तकनीक, चीन और जापान द्वारा Pulse Diagnosis पर आधारित मशीने इत्यदि आसानी से उपलब्ध हैं ।

कुछ लैबोरेटरीज ने दवाओं के टेस्ट के लिये विशेष प्रबन्ध किये है । जब इतने साधन उपलब्ध है , तो दवा बनाने वाले निर्माताओं को अपने पेटेन्ट योगों को इन तकनीकों द्वारा टेस्ट कराकर देखना चाहिये कि उन्के दावों में कितनी सच्चाई है और उनके योग बीमारियों पर कितने कार्गर साबित होते हैं ।

आयुर्वेद की पैथोलाजी : सप्त धातु : the Pathology of Ayurveda : SAPTA DHATU


आधुनिक चिकित्सा विग्यान भले ही यह कहे कि पैथोलोजी यानी विकृति विग्यान की खोज उनकी अपनी की हुयी है, लेकिन यह उनकी भूल है । हजारॊं साल पहले ही भारतीय चिकित्सकों ने , जो आयुर्वेद का चिकित्सा कार्य करते थे, समझ लिया था कि कार्य विकृति यानी पैथोफीजियोलाजी की अवस्था के पश्चात अन्ग विकृति होती है , जिसे आधुनिक चिकित्सा में पैथोलाजी Pathology यानी विकृति विग्यान कहते हैं ।

महर्षियों नें इस प्रकार से प्राप्त pathological conditions को, इसे “सप्त धातु” का नाम दिया, जिन्हे १- रस २- रक्त ३- मान्स ४- मेद ५- अस्थि ६- मज्जा ७- शुक्र, इन सात विभागों में बान्टा गया । उस जमानें में जब इस pathology को detect किया गया होगा, तो इसे आयुर्वेद का एक महत्व पूर्ण कदम समझा गया होगा । इसकी प्रासन्गिता जितनी उस समय थी, उतनी ही अभी भी है ।

“रस” को आधुनिक चिकित्सा के Metabolic disorders के समकक्ष समझा जाता है । “रक्त” को Heamatological anomalies के समकक्ष समझते हैं । “मान्स” को सभी तरह की Fleshy growth के समान समझा जाता है । “मेद” को Lipid anomalies के समान समझा जाता है । “अस्थी” को Skeletal anomalies के समान समझते हैं । “मज्जा” को Bone marrow anomalies के समान समझते हैं ।”शुक्र” को Reproductive anomalies के समान सम्झा जाता है । इस प्रकार से आयुर्वेद की पैथोलोजी देखने से यह पता चलता है कि हजारों साल पहले ही आयुर्वेद के महर्षियों नें किस प्रकार से यह सब Pathological conditions observe कर डाली थीं ।

यहां यह उल्लेखनीय है और हर्ष का भी विषय यह है कि ई०टी०जी० तकनीक से “सप्त धातुओं” का सटीक और सही आन्कलन कर लेने की तकनीक विकसित कर ली गयी है और इसे चिकित्सा कार्य में पिछले कई सालॊं से प्रयोग में लाया जा रहा है ।

REPLY to “aayurvedam, April,10,2009


aayurvedam
April 10, 2009 at 10:13 PM

गुरूदेव दुनिया का दुर्भाग्य है कि हम जैसे साधारण चिकित्सक अब तक इस चमत्कारी यंत्र का प्रयोग नहीं कर पा रहे हैं लेकिन पूरा यकीन है कि शीघ्र ही ऐसा हो पाएगा कि सारी दुनिया आयुर्वेद का लोहा मानेगी इस यंत्र के द्वारा….
सादर चरण स्पर्श
aayushved@gmail.com

……….Reply by Dr.D.B.Bajpai………. इस [ इलेक्ट्रो त्रिदोष ग्राफी ई०टी०जी० ] तकनीक [यन्त्र] का फायदा और उपयोग देश के लोग बहुत सिद्दत के साथ उठा रहे हैं ।

विश्व का पहला और अकेला ई०टी०जी० केन्द्र, E.T.G. Center, हकीम शरीफ जी, के सहयोग से E-52, खपरा मोहाल, कैण्ट, कानपुर में खुल चुका है । यहां बड़ी सन्ख्या में कानपुर और आसपास के जिलों, दूर दराज के क्षेत्रों, देश के कई राज्यों और विदेशों तक से मरीज आकर अपना ई०टी०जी० करा चुके हैं और आरोग्य लाभ प्राप्त कर रहे हैं ।

ई०टी०जी० करा चुके मरीजों को जब रिपोर्ट से प्राप्त डाटा के आधार पर ” विशुद्ध आयुर्वेद चिकित्सा” दी जाती है, तो रोगी को शीघ्र और निश्चित लाभ होता है । पुरानी बीमारियों से ग्रसित रोगी, असाध्य बीमारियों के मरीज और दीर्घकालीन रोगों से ग्रस्त मरीजों को इस तकनीक और “शुध्ध आयुर्वेद चिकित्सा” से अवश्य लाभ हुआ है ।

इस केन्द्र में रोजाना सुबह ९ बजे से दोपहर २ बजे तक ETG Record किये जाते हैं । अति आवश्यक Emergency condition होने पर दो घन्टे के अन्दर रिपोर्ट दे दी जाती है | अन्यथा दूसरे दिन रिपोर्ट देने का प्रावधान है । कभी कभी बहुत आश्चर्य जनक बीमारियां डिटेक्ट हो जाती हैं , जिनके बारे मे चिकित्सक सोच भी नही सकते । ETG से पता चल जाता है कि क्या बीमारी है और क्या ठीक करना है ।

जैसा आपने कहा है कि यह एक “चमत्कारिक यन्त्र” है और “सारी दुनिया आयुर्वेद का लोहा मनेंगी”, यह एक न एक दिन, शत प्रतिशत सही सिध्ध होगा, ऐसा मेरा विश्वास है । मुझे रोजाना कई कई ETG रिकार्ड करने होते है, उनको देखकर जितना ग्यान मुझे मिल रहा है, वह अनमोल है । इस्की रिपोर्ट पर आधारित होकर जब चिकित्सा व्यवस्था की जाती है तो वह बहुत सटीक और सही होती है और इलाज में भटकाव की गुन्जाइस न के बराबर होती है

विशेष जन्म दिन पर ; होम्योपैथी के आविष्कारक डा० हैनीमेन, उनके सिद्धान्त और इलेक्ट्रो होम्यो ग्राफी ई० एच०जी० तकनीक : On the Birth day of the Inventor of Homoeopathy Dr. Samuel Hahnemann


Dr. Samuel Hahnemann

Dr. Samuel Hahnemann

10 April को होम्योपैथी चिकित्सा विज्ञान के आविष्कारक डा० सैमुअल हाहनेमान का जन्म दिन मनाते हैं । आज १० अप्रैल है, मै उस महान आत्मा को श्रद्द्दान्जलि अर्पित करता हू कि उन्होंने इतना महान काम किया और पीड़ित मानवता की सेवा के लिये बहुत कुछ सहते हुये जो कुछ भी इस दुनिया को दिया, उसे अनन्त काल तक याद किया जायेगा ।

मैने होम्योपैथी का अध्य्यन किया है और अधिक ग्यान प्राप्त करने के लिये सन १९७३ में मैं म्यूनिख, जरमनी मे क्रान्केन हाउज फ़यूर नाटुर्हाइल्वाइसेन, हरलाखिन्ग में होम्योपैथी के अद्य्यन के लिये गया था । डा० वाल्ठेर जीमर्मान मेरे सेफार्त्ज थे । भारत वापस आकर मैने कान्पुर में प्रैक्टिस शुरू की जो आज तक कायम है और अभी भी कर रहा हू । मैने हहनेमान की जीवनी पढी, उनके लिखे गये ग्रन्थ, जितने भी उपलब्ध हैं , कई कई बार पढे हैं, आज भी जब जरूरत होती है, पढता हूं ।

मुझे लगता है कि अभी होम्योपैथी चिकित्सा विज्ञान में बहुत कमियां हैं ।

पहला यह कि हाहनेमान नें Homoeopathic Philosophy को Medicine of Experiences से लेकर Organon of Medicine के छह एडीसन में हर बार कुछ न कूछ बदलाव करते चले गये, उससे यह आशन्का और अधिक बलवती होती है कि यदि हाहनेमान जिन्दा होते तो शायद वह और बदलाव करते जो वह समय मिलते नहीं कर सके । मेडिसिन आफ इक्स्पीरियन्स से लेकर आर्गेनान के सभी एडीसन को पढा जाये तो बहुत से बदलाव नज़र आयेन्गे ।

दूसरा यह कि हाहनेमान ने अपने पत्रों के उत्तर में बहुत कुछ लिखा है जैसे कि उदाहरण के लिये वे चाहते थे कि दो चुनी हुयी सिन्गल दवाओं को आल्टर्नेट करके जरूरत के अनुसार प्रयोग किया जाये, लेकिन वे अपने चेलों के विरोध के करण ऐसा नियम न लिख सके । Life and Letters of Hahnemann में ऐसे ही कई प्रसन्ग मौजूद हैं । एक दो जगहों पर हाहनेमान ने स्वयम दो दवाओं के उपयोग को स्वीकार किया, जब उनकी खुद की तबियत खराब हो गयी थी तो उन्होने दो दवाओं को alternate करके उपयोग किया था ।

तीसरा यह कि शुरू के दिनो में हाहनेमान दवाओं के मदर टिक्चर का उपयोग करते थे । धीरे धीरे उनको पोटेन्सी का ग्यान हुआ, मदर टिक्चर से डेसिमल, फिर शातमिक, फिर एल एम पोटेन्सी । आगे वह क्या बताना चाहते थे और क्या नियम बनाना चाहते थे , यह कोई नहीं जानता ? हम केवल कयास लगा सकते हैं ।

चौथा यह कि आर्गेनान का 6th Edition doubtful लगता है । एक तो यह की हाहनेमान के मरने के काफी वर्षॊ बाद इसका प्रकाशन हुआ । शक की बात यह कि क्या हमें वही पढने को मिल रहा है जो हाहनेमान ने लिखा था ? हमें याद रखना चाहिये कि हम जो भी पढ रहे हैं वह अनुवाद है यानी जरमन भाषा से अन्ग्रेजी भाषा में अनुवाद । मैने जरमन भाषा में Organon को पढा है । जिस सुन्दर भाषा selection of words, flow of
language, लिखने का मूड और लेखन शैली का हाहनेमान नें प्रयोग किया है, वह english language में कहीं से भी प्रभावित नहीं करता ।

कहने के लिये तो बहुत कुछ है । अपनी बात यहीं समाप्त करते हुये अन्त में यही कहून्गा कि हाह्नेमान द्वारा प्रस्तावित किये गये कुछ सिद्धान्तों का मैने Electro Homoeo Graphy E.H.G. Technology द्वारा Evidence Based स्वरूप में सिद्ध करने का प्रयास किया है । अभी यह शोध कार्य प्राम्भिक चरण में हैं, लेकिन इस तकनीक द्वारा प्राप्त किये गये Psora, Sycosis, Syphilis, Vital Force, Ideosyncracy इन पांच बातों का रोगी के शरीर मे व्याप्त status quantification का प्राप्त डाटा बहुत उत्साह्वर्धक है । यह जरूर है कि इस तकनीक द्वारा हाह्नेमान द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त आंशिक ही सही , सिद्द किये जा सकते हैं ।

आयुर्वेद की पैथोफीजियोलाजी “त्रिदोष भेद” : Tridosha Bhed” , the Pathophysiology of AYURVEDA


दुनिया का सबसे प्राचीन चिकित्सा विज्ञान “आयुर्वेद” भले ही अपने जन्म देश में उपेक्षा का शिकार हो, इसे कोई पूछने वाला न हो, भले ही राजकीय संरक्षण न मिल रहा हो, इसे नष्ट करने के लिये न जाने कितना जोर लगाया गया होगा, लेकिन यह अपनी जगह जीवित रहा और अब भी है, आगे भी जीवित रहेगा क्योंकि इसके सिद्धान्त शाश्वत हैं ।

Pathophysiology को कार्य विकृति कहते हैं । यानी इसे इस तरह से समझना चाहिये कि शरीर का कोई भी अंग अपनी पूरी कार्य क्षमता से काम न कर पाये और इसके परिणाम स्वरूप कोई परेशानी पैदा हो । उदाहरण के लिये यदि बड़ी आन्त की काम करने की क्षमता घटती है तो यह पचा हुआ भोजन, जो पाखाना की शक्ल में इक्ठ्ठा होगा, ठीक समय पर न निकल कर क्योंकि इसके सिद्धान्त शाश्वत हैं ।

Pathophysiology को कार्य विकृति कहते हैं । यानी इसे इस तरह से समझना चाहिये कि शरीर का कोई भी अंग अपनी पूरी कार्य क्षमता से काम न कर पाये और इसके परिणाम स्वरूप कोई परेशानी पैदा हो । उदाहरण के लिये यदि बड़ी आन्त की काम करने की क्षमता घटती है तो यह पचा हुआ भोजन, जो पाखाना की शक्ल में इक्ठ्ठा होगा, ठीक समय पर न निकल कर कब्ज पैदा करेगा । यदि इसी प्रकार बड़ी आन्त की क्षमता बिगड़्ती रही तो यह कार्य विकृति बढ्कर पाखाना को एक दिन , दो दिन या कई कई दिन तक रोके रखेगी । यदि बड़ी आन्त की कार्य क्षमता बढ़्ती है तो पाखाना बार बार जाने की जरूरत होगी । शरीर के अन्गों की इस तरह की कार्य विकृति को ही Pathophysiology कहते हैं ।

आयुर्वेद नें कार्य विकृति को हजारों साल पहले ही पहचान लिया था । ताज्जुब की बात यह कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान इसे अभी तक नहीं पहचान पाया है । आधुनिक चिकित्सा विज्ञान तो कार्य विकृति को दरकिनार करके सीधे सीधे “विकृति” यानी Pathology पर आ जाता है । इसीलिये पैथोफिजियोलाजी का Modern Western Medicine में कोई स्थान नहीं है ।

कार्य विकृति के Test या परीक्षण के लिये आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के पास अभी तक कोई कारगर परीक्षण विधियां डेवलप नहीं हुयीं हैं । लेकिन आयुर्वेद के नये डेवलप किये गये परीक्षण Electro Tridosha Graphy या ETG System द्वारा शरीर की कार्य विकृति का पता लगा सकते हैं ।।

आयुर्वेद और भारतीय खानपान तथा भोजन व्यवस्था : Ayurveda , Indian food style and Natural Neutraceuticals


अब यह साबित हो चुका है कि भारतीय लोगों की भोजन व्यवस्था प्राचीन काल से लेकर अब तक पूरे का पूरा आयुर्वेद के सिद्धान्तों पर आधारित रहा है । य्द्यपि यह विषय बहुत विशाल है और इसे समझने और समझाने के लिये एक साथ बहुत थोड़े समय में ज्यादा नहीं बताया जा सकता हैं ।

आयुर्वेद में बताया गया है कि वात दोष को शान्त करने के लिये मीठा, खट्टा और नमकीन खाद्य पदार्थ अनुकूल होता है, पित्त दोष को शान्त करने के लिये मीठा, कडुवा और कसैले खाद्य पदार्थ अनुकूल पड़्ते हैं तथा कफ दोष को दूर करने के लिये कडुवा, कसैले और चरपरे खाद्य पदार्थ अनुकूल पड़्ते हैं ।

यह आधार भूत जानकारी होने से अगर भारतीय भोजन का काम्बीनेशन देखा जाये तो यही मिलेगा कि हल्दी, जीरा, राई,
तेज पत्ता, कलौन्जी, अजवायन, मेथी, लहसुन, दाल्चीनी, काली मिर्च, लाल मिर्च, खटाई आदि का उपयोग क्यों और किसलिये करते रहते हैं ? इन सब मसालों को साग सब्जी में मिलाने के पीछे की लाजिक क्या है ? व्रत, उपवास में घी और घी से बने पदार्थ क्यों खाने की परम्परा है ? पूरी, पराठा आदि घी में पके पकवान के बनाने के पीछे की वैज्ञानिकता क्या है ? यह तमाम सवाल उठने स्वाभाविक हैं, लेकिन इन सबके पीछे आयुर्वेद का महान विज्ञान है, जो हर भारतीय के जीवन से जुड़ा हुआ है और जिसे हमने समझने की कोशिश में कोताही बरती है ।

उदाहरण के लिये अचार बनाने की कल्पना और इस तैयार अचार को सेवन करने के पीछे त्रिदोषो यानी वात , पित्त और कफ को शरीर में समावस्था मे बनाये रखने के लिये उपयोग करते हैं । यद्यपि आज के युग में अचार स्वाद और जिव्हा को तृप्ति देने के लिये उपयोग करते हैं , लेकिन किसी समय इसे न्यूट्रास्यूटिकल के बतौर इस्तेमाल करते थे ।

सम्पूर्ण शरीर का इलाज : आयुर्वेद की एक महान देन Concept of Comprehensive Treatment : An Ayurveda Approach


आयुर्वेद चिकित्सा विज्ञान में सम्पूर्ण शरीर का इलाज करने की प्रथा है । य़ह इसलिये कि आयुर्वेद सारे शरीर को एक इकाई मानता है और यह भी मानता है कि जब शरीर बीमार हो जाये तो पूरे शरीर का इलाज करना चाहिये । पूरे शरीर से मतलब मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक शरीर से है । आयुर्वेद के शास्त्रोक्त ग्रन्थों में इन्ही सब बातों का सार छिपा हुआ है । प्रकृति और पुरुष के समबन्धों को स्वीकार करते हुये, एक दूसरे के पूरक समझते हुये जिस दर्शन विग्यान का सृजन किया गया है, वह अपने आप में बहुत अनूठा है ।

भारत वासियों के बारे में कहा जाता है कि यहां सभी डाक्टर हैं, यहा सभी वैद्य हैं , किसी से भी अपने मर्ज़ के बारे में बतायें, वह आपको कोई ना कोई नुस्खा बता देगा । जो यह कहते है , यह सही है । इसके पीछे कारण हैं । हरेक को यह समझना चाहिये कि आयुर्वेद एक परम्परागत चिकित्सा विज्ञान है, इसीलिये प्रत्येक भारतीय अपने खान पान रहन सहन में परम्परागत प्राप्त स्वास्थय समबन्धी ज्ञान दूसरे के साथ बाट्ता है, यही कारण है कि यदि कोइ व्यक्ति अपनी तकलीफ़ किसी दूसरे से बताता है तो वह एक फ़ार्मूला बता देगा । यह फ़ार्मूला वह अपने व्यक्तिगत ज्ञान के आधार पर प्राप्त अनुभव के आधार पर बताता है ।

इधर मैने देखा है कि भारत की नवीन पीढी को भारतीय आयुर्वेदोक्त स्वास्थय सम्बन्धी ज्ञान बहुत कम है और न के बराबर है । यह जरूर चिन्ता का विषय है कि सधारण स्वास्थय समबन्धी नियम कायदे तक इस नवीन पीढी को पता तक नहीं हैं ।

आयुर्वेद बताता है कि जब शरीर बीमार हो तो उसका सम्पूर्ण उपचार करना चाहिये और इसीलिये इसके चार पाद बताये गये है, हर पाद का महत्व बताया गया है ।