आयुर्वेद की पैथोलाजी : सप्त धातु : the Pathology of Ayurveda : SAPTA DHATU


आधुनिक चिकित्सा विग्यान भले ही यह कहे कि पैथोलोजी यानी विकृति विग्यान की खोज उनकी अपनी की हुयी है, लेकिन यह उनकी भूल है । हजारॊं साल पहले ही भारतीय चिकित्सकों ने , जो आयुर्वेद का चिकित्सा कार्य करते थे, समझ लिया था कि कार्य विकृति यानी पैथोफीजियोलाजी की अवस्था के पश्चात अन्ग विकृति होती है , जिसे आधुनिक चिकित्सा में पैथोलाजी Pathology यानी विकृति विग्यान कहते हैं ।

महर्षियों नें इस प्रकार से प्राप्त pathological conditions को, इसे “सप्त धातु” का नाम दिया, जिन्हे १- रस २- रक्त ३- मान्स ४- मेद ५- अस्थि ६- मज्जा ७- शुक्र, इन सात विभागों में बान्टा गया । उस जमानें में जब इस pathology को detect किया गया होगा, तो इसे आयुर्वेद का एक महत्व पूर्ण कदम समझा गया होगा । इसकी प्रासन्गिता जितनी उस समय थी, उतनी ही अभी भी है ।

“रस” को आधुनिक चिकित्सा के Metabolic disorders के समकक्ष समझा जाता है । “रक्त” को Heamatological anomalies के समकक्ष समझते हैं । “मान्स” को सभी तरह की Fleshy growth के समान समझा जाता है । “मेद” को Lipid anomalies के समान समझा जाता है । “अस्थी” को Skeletal anomalies के समान समझते हैं । “मज्जा” को Bone marrow anomalies के समान समझते हैं ।”शुक्र” को Reproductive anomalies के समान सम्झा जाता है । इस प्रकार से आयुर्वेद की पैथोलोजी देखने से यह पता चलता है कि हजारों साल पहले ही आयुर्वेद के महर्षियों नें किस प्रकार से यह सब Pathological conditions observe कर डाली थीं ।

यहां यह उल्लेखनीय है और हर्ष का भी विषय यह है कि ई०टी०जी० तकनीक से “सप्त धातुओं” का सटीक और सही आन्कलन कर लेने की तकनीक विकसित कर ली गयी है और इसे चिकित्सा कार्य में पिछले कई सालॊं से प्रयोग में लाया जा रहा है ।

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2 टिप्पणियाँ

  1. बहुत ही रोचक जानकारी , अगर आप आकाश और वायु में अंतर समझ नहीं आता

    …………उत्तर…………आकाश और वायु मे बहुत अन्तर है इसे समझने की जरूरत है /

    आकाश से आशय सम्पूर्ण space से है जो sky is no limit की भावना और विचार से मेल खाता है और यही महर्षियो की सोच होगी /

    वायु से मतलब qualities and characteristics of Air से है / वायु का चरित्र्गत लक्षन है एक स्थान से धीमे धीमे और तेज से सबसे तेज गति से एक स्थान से दूसरे स्थान को चलना या गति करना या move करना होता है ऐसा आशय है / वायु हमारे पृथ्वी की एक सीमा तक ही उपस्तिथि होती है इसके बाद सब शून्य होता है / यही वायु की सीमा है और इससे आगे आकाश होता है , यह स्र्व विदित है /

    आयुर्वेद मे वायु [हवा] के चरित्र गत लक्शनॊ को बताया है / बेहत्र यही है कि इसे वही reference books मे ही देखना चाहिये/

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