महीना: जुलाई 2009

बरसात के दिनों में स्वास्थय सुरक्षा ; Prevention in Rainy weather


बरसात के दिनों मे स्वास्थय की रक्षा करना भी बहुत दुश्कर कार्य है । यह मौसम बहुत कच्चे और पक्के दिनों जैसे होते हैं । कभी बादल होकर मौसम में ठ्न्डक, कभी धूप, कभी अधिक तेज़ धूप , कभी मौसम अचानक बदल् कर पानी की फुहार और ज्यादा नमी, कभी उमस, कभी नमी का अचानक बढ जाना, यह सब होता रहता है । जितनी तेज़ी से ताप मान का बदलाव इस मौसम में होते है उतनी तेज़ी से शयद ही कोइ मौसम बदले । इस कारण से शरीर के अन्दर होने वले मेटाबोलिस्म पर बहुत ज्यादा प्रभाव पड़्ता है जिससे न केवल “बैसल मेटाबोलिक रेट बी०एम०आर०” Basal Metabolic Rate BMR प्रभावित होता बल्की शरीर में अचानक इतनी तेज़ी से होने वाले परिवर्तन के लिये शरीर की कार्य प्रणाली भी नहीं तैयार होती । यही वजह है कि इस सीजन में तकलीफें बहुत होती हैं ।

आयुर्वेद बताता है कि इस सीजन में क्या खान पान और रहन सहन की व्यवस्था करना चाहिये ताकि स्वास्थय सुरक्षित बना रहे ।

क्या करें ?

१- बरसात में मौसम का कोई भरोसा नही रहता , कब ज्यादा गर्मी पड़ जाय, कब पानी बरसने लगे, कब आन्धी तूफान आ जाये इसलिये इन सब बातों से निपटने के लिये मानसिक रूप से अपने को तैयार रखें ।
२- घर से बाहर जाना हो तो धूप और पानी से बचने के लिये एक छाता का इन्तजाम कर लेना चाहिये ताकि बचाव किया जा सके ।
३- कच्चे पक्के दिन होने के कारण इस मौसम में “पाचन सन्सथान ” Digestive system के रोग बहुतायत से होते हैं । आन्तो, लीवर, इरीटेबल बावेल सिन्ड्रोम, इन्फ्लेमेटरी कन्डीशन आफ बावेल, बावेल’स पैथोफीजीयोलाजी Colon, Large intestines, Liver , Irritable Bowel Syndromes, Inflammatory condition of bowels, Bowel’s pathophysiologyतथा इसी सन्सथान से जुड़ी दूसरी गम्भीर स्वास्थय समबन्धी समस्यायें इसी मौसम में अधिकतर होती है जैसे कालेरा, डायेरिया, कोलाइटिस, आन्तों की सूजन Cholera, Diarrhoea, Colitis, इत्यादि ।
४- बेहतर यह है कि खान पान में हल्का भोजन करना चाहिये और भोजन के साथ मे आधा निंबू का रस तथा अदरख जरूर खाना चाहिये । नींबू और अदरख बरसात के दिनों में होने वाली तकलीफों का बहुत बड़ा “एन्टीडोट” है ।
४- जिन्हे नींबू या अदरख मुआफिक ना आवे , वे आधा नींबू काट ले और उसमें सेन्धा नमक, काला नमक, काली मिर्च, पीपल का चुर्ण स्वादानुसार बुरक लें और इस नीबू को हल्की आग की आन्च में पका लें । इसे ठन्डा करके धीरे धीरे चूसना चाहिये । बरसात के दिनों में होने वाली बहुत सी तकलीफों से छुटकारा मिल जायेगा ।
५- इस मौसम में पनी से भीगने से बुखार या सर्दी या आम वात की तकलीफ हो सकती है, इसका इलाज स्वयम न करें तो अच्छा है किसी डाक्टर  या वैद्य से सलाह लें ।

क्या न करें ?
१- बिना समझे बूझे अपने आप कोइ दवा न लें और न इलाज करें, ऐसा करना खतरनाक हो सकता है
२- स्वास्थय समबन्धी साफ सफाई का धयान रक्खें यह बहुत जरूरी है, कही पर भी गन्दगी फैलाने की चेष्टा न करें
३- पीनें का पानी साफ हो ऐसी व्यवस्था करें और पानी को दूषित न करे ।
४- बरसात के पानी से अपने शरीर को भीगने से बचायें ।

Advertisements

इपीगैस्ट्रियम की बीमारी “इपीगैस्ट्राइटिस” में आयुर्वेद के सिध्धान्त “त्रिदोष” के “वात, पित्त, कफ” की शरीर में उपस्तिथि का मूल्यान्कन : ई०टी०जी० तकनीक से प्राप्त आन्कड़ों का विश्लेषण ; Evaluation of Ayurveda Principals “Vat, Pitaa, Kaphha” in disease condition of “Epigastritis” ; an overview study from ETG technology obtained Data


बड़ी सन्ख्या मे एकत्र ई०टी०जी० रिपोर्ट्स मे निदान किये गये और तदनुसार इन रिपोर्ट्स पर आधारित होकर रोगियों की चिकित्सा करके उनको शीघ्र आरोग्य करने के पश्चात, “इपीगैस्ट्राइटिस” के रोगियों के इस अध्ध्यन का उद्देश्य आयुर्वेद के चिकित्सकों के इस ओर ध्यान दिलाने का है कि वे किस प्रकार निदान कार्य में फेल हो रहे हैं और मरीजों के जी जान से खिलवाड़ कर रहे हैं ? आयुर्बेदग्यों के इस कार्य से न केवल आयुर्वेद चिकित्सकों की उतकृस्टता पर सवाल उठते हैं बल्कि उनके असफ़ल होने पर आयुर्वेद की बदनामी भी होती है ।

मैने और हकीम मोहम्मद शरीफ अन्सारी जी ने Abdomen के नौ हिस्से में से एक हिस्से Epigastrium का evaluation ETG technology द्वारा जान्च करके तदनुसार प्राप्त किये गये डाटा से यह जान लेने की कोशिश की कि [१] आयुर्वेद के मौलिक सिद्धान्त त्रिदोष यथा वात, पित्त, कफ की क्या अवस्था मरीजों में पायी गयी ? तथा दूसरा यह कि [२] त्रिदोष के एकल दोषों के अलग अलग Status Quantification के साथ त्रिदोषों के अन्य कितने combination बन सकते हैं जैसा कि चरक सम्हिता में महर्षि चरक ने स्वीकार किया है ?, तीसरा सवाल यह कि इस तरह से प्राप्त आन्कड़ों से चिकित्सा कार्य में क्या सहायता मिल सकती है ? चिकित्सक किस प्रकार से इस डाटा का उपयोग कर सकता है ?

हमने अपने केन्द्रों में आने वाले १०० मरीजों का रिकार्ड खन्गाला और उनमे से सभी आयु वर्ग तथा तरह तरह की बीमारियों से त्रस्त मरीजों का Random चुनाव करके Data का चुनाव किया ।

तालिका-१ में दर्शाया गया है कि कितने मरीज सामान्य और असामान्य मिले

tabulation-2
तालिका -२ में त्रिदोषों की क्या अवस्था रही, यह दर्शाया गया है।

tabulation-1

निष्कर्ष :

१- वात दोष की कमी ७६ प्रतिशत रोगियों में मिली
२- पित्त दोष की कमी ४५ प्रतिशत और दोष की अधिकता ३६ प्रतिशत रोगियॊ में मिली ।
३- कफ दोष की कमी ११ प्रतिशत और दोष की अधिकता ५७ प्रतिशत रोगियों में मिली ।
४- कम की ओर जाने वाले डाटा से पता चला कि ३५ प्रतिशत रोगियों में तकलीफ वातज-पित्तज होती है ।
५- अधिक की ओर जाने वाले डाटा से पता चला कि ५० प्रतिशत रोगियों में तकलीफ कफ़ज-पित्तज होती है ।
६- Epigastritis से पीड़ित ४० प्रतिशत रोगी कफ दोष से प्रभावित होते है।
७- शमन और बृन्घण चिकित्सा से रोगियों को शीघ्र लाभ मिला ।

हलांकि यह एक बहुत छोटा सा अध्ध्यन है, लेकिन हम और अधिक यह जान लेने की कोशिश में हैं कि ETG Technology का सहारा लेकर और अधिक क्या किया जा सकता है ?

Congratulations to all Doctors on Doctor’s Day


In Ayurved, the practitioners celebrates “Chikitsak Divas – Doctor’s Day” every year before one day of DIPAWALI ferstival , which is called Dhanateras  and thus Ayurveda celebrates the Doctor’s day.

Homoeopathic practitioners celebrates the Doctor’s Day on 10th April every year, on the birthday of the originator of Homoeopathic science Dr. Samuel Hahnemnann.

I do not know about the Unani system of medicine & Yoga and Nature cure sustem , on which day they gether and celebrates the Doctor,s day.

In Modern western medicine Doctor’s day is celebrated on 1st July every year. I can not say about the tredition and convention of this day appearence, but I appreciate in one sense that for the unity of the medical sciences , it is essential to celebrate the Doctor’s day unanimously by all the practitioners of all healing system at one roof,  in the idea and moto keeping in their minds that they all are healing the sick huminity.