महीना: सितम्बर 2009

इलेक्ट्रो त्रिदोष ग्राफी ई०टी०जी० मशीन का निर्माण कार्य आज दिनान्क २६ सितम्बर २००९ शुभ दिन शनिवार “दुर्गा अष्टमी” के दिन से शुरू : Fabrication of Electro Tridosha Graphy E.T.G. Machine begins from today dated 26 September 2009 on the pious day of “Durga Ashtami”


ईश्वर की कृपा, भगवान धनवन्तरि देव के आशिर्वाद और माता दुर्गा भवानी की अनुकम्पा से आज दिनान्क २६ सितम्बर २००९ को कई वर्षों से लम्बित आयुर्वेद चिकित्सा विग्यान के लिये नवीन आविष्कृत रोगों के निदान ग्यान और आयुर्वेद के मौलिक सिद्धान्तों को साक्ष्य स्वरूप प्रस्तुत करने वाली तकनीक इलेक्ट्रो त्रिदोष ग्राफी ई०टी०जी० मशीन का निर्माण कार्य शुरू कर दिया गया है ।

इसके निर्माण कार्य में लगे हुये हार्डवेयर और साफ़्ट वेयर इन्जीनियरों ने बताया है कि वे इस मशीन का निर्माण एक निश्चित समय सीमा के अन्दर कर देंगें ।

इस मशीन में २१ से अधिक लीड की रेकार्डिंग एक साथ होगी और रिकार्डिंग के साथ ही तत्काल रिपोर्ट मिल जायेगी जिसमे कुछ मिनटॊं का समय लगेगा ।

हमारा प्रयास रहेगा कि इस मशीन को अत्याधुनिक तकनीक से लैस किया जाये । हलाकि इसके साथ एक लैप्टाप कम्प्यूटर तथा एक प्रिन्टर की आवश्यकता होगी । मशीन और साफ्ट वेयर इनके साथ ही यू०एस०बी० पोर्ट से जोड़े जायेंगे । मशीन से जुड़े सेन्सर रोगियों के शरीर में निर्धारित स्थानों पर चिपकाये जायेंगे ।

जैसा कि सभी जानते हैं कि अभी तक इस परीक्षण के लिये हृदय रोग की जान्च के लिये प्रयोग की जाने वाली इलेक्ट्रो कार्डियो ग्राफी ई०सी०जी० मशीन के केवल रिकार्डर का उपयोग आयुर्वेद के इस स्कैन ई०टी०जी० के लिये किया जाता है । इस रिकार्ड किये गये ट्रेस को बाद में कम्प्य़ूटर की मदद से मैनुअली तरीके से रिपोर्ट बनायी जाती थी जिसमें लगभग २ घन्टे लग जाते थे । प्रस्तावित मशीन केवल कुछ मिनटॊ में यह काम पूरी कर देगी ।

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आयुर्वेद और ह्रूदय की बीमारियां : Ayurveda and Cardiac disorders


आयुर्वेद हर व्यक्ति को यह बताता है कि शरीर को स्वस्थ्य कैसे बनाये रखना चाहिये । इस शिक्षा के बाद आयुर्वेद यह बताता है कि यदि कोई व्यक्ति बीमार पड़ जाय तो उसे क्या सावधानी बरतना चाहिये, क्या दवायें उपयोग करना चाहिये जिससे बीमार व्यक्ति शीघ्र स्वास्थय प्राप्त कर ले । पुन: स्वस्थय हो जाये ।

यह नियम सभी प्रकार के बीमारियों से ग्रसित व्यक्तियों के लिये है ।

आयुर्वेद बताता है कि गलत रहन सहन और आद्तों से ओयक्ति बीमार होता है । इसलिये दिल के बीमारों को इस बात का विशेष खयाल करना चाहिये ताकि वे स्वस्थय बनें रहें ।

आयुर्वेद में दिल के रोगों की चिकित्सा के लिये बहुत सी औषधियां हैं जिनके सेवन से दिल के रोगों से बचा जा सकता है और यदि दिल के रोग हो जायें तो उनकी चिकित्सा भी की जा सकती है ।

Regular intake of Ayurvedic medicines LOHASAVA & KUMARIASAV can prevent Cardiac disorders. These medicines can be taken by all heart problem’s sufferers.

कुदरती खानपान और बताये गये तौर तरीकों के अपनानें से दिल के रोगॊं से बचा जा सकता है ।

“गुमनामी के अन्धेरे में ईटीजी आविष्कारक” : इन्डिया न्यूज साप्ताहिक पत्रिका का शीर्षक ;; INDIANEWS Hindi weekly magazine 12-18 Sepetember 2009 issue : publication of khoji news-ARTICLE title “GUMANAMI KE ANDHERE MEIN E.T.G. AVISHKARAK”


A news article is published in INDIA NEWS WEEKLY magazine published from NEW DELHI issue September 12-18, 2009 under title “GUMANAMI KE ANDHERE MEIN ETG AVISHKAARAK”

I am giving here thye photocopy of the article for the readers.

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I personally appreciate the correspondent of this feature writer that she have given the true and correct informations.

Thanks to INDIANEWS magazine and thanks to related team writers.

 

Leucoderma Victim’s e-mail Letter, expressing his views


Letter-dhavan

Today I recieved an e-mail, the photo-copy of the mail is enclosed here. The letter contains the important points and so that I would like to share the contents of letter for the benefits of the others victims of Leucoderma and Vitilago. I want to reply of the letter individually, but some important contents and the experiences of the patient, which I want to share with the other victims. This is a troublesome disease.

I reply here to all concerns that  this condition is totally treatable and curable, but the conditions are with the part of the patient and so also with the physician. Modern western medicine have no deciding role in the treatment of Leucoderma. Homoeopathy have some role in the treatment, but I am afraid to say that it may work and it may not. The treatment with the Homoeopathy is always with the suspence, uncertain and  doubtful, it is because, if the novices Homoeopathic Physician deals the pqtient. I have seen that many case have been spoiled by the new commers of the Homoeopathy and then they came in condition of untreatable. So if you want to take the treatm,ent of Homoeopathy, you should go to experienced Homoeopath of old age. Second the part of the patient is also very important. The management and the treatment should be maintained by the patient including his living style, food habits, climatic conditions etc etc.

Generally , I prefers Leucoderma  patient to take Ayurvedic medicines, which are safe, harmless and very effective. Ayurvedic treatment or Unani treatment are promising cure/ relief  the diseased conditions.

Regarding my way of treatment, my  (1) first step is to go  for  Electro Tridosha Graphy E.T.G. Examination, without this examination , I can not take any further step. (2) After this examination, when I get all the Data, then I physically examine the diseased parts/ailments/syndromes conditions/normal and abnormal organs etc conditions and then after this varification select the medicine according to the findings of Ayurvedic tridosha and diagnosis.

This is afoolproof method of the treatment, without any deviation, doubt or other uncertainity. Because ETG provides the pinpoint diagnosis of the disease, doshas, saptadhau, oj and other conditions.

Management of the case is dependent upon the findings of the ETG , food habits , living styles are also instructed according to the findings of the patient.

सदाबहार फिल्म अभिनेता “देव आनन्द” और मैं : Ever Green Film Artist “Dev Anand” & I


जब से  और जिस उम्र से मुझे समझ आने लगी और मैं सिनेमा और सिनेमा के कलाकारों के बारे मे समझ रखने लगा, तब से  फिल्म स्टार देव आनन्द मुझे सबसे प्यारे लगने लगे । मैं आठ साल का रहा हून्गा, मेरे बहनोई मुझे देवानन्द की फिल्म दिखाने ले गये, फिल्म का  नाम मुझे याद नही, लेकिन हीरोइन का नाम याद है , हीरोइन  “शीला रमानी” थी । मुझे देव आनन्द के हाव भाव बहुत पसन्द आये और मै उनकी नकल करने लगा ।

धीरे धीरे देव आनन्द मेरे प्रिय हीरो हो गये । मैने उनकी सभी फिल्में देखीं है । कोई भी नहीं छूटी । कई कई बार फिल्में देखी, आज भी मेरे अन्दर देव आनन्द का क्रेज़ वैसा ही है जैसा कि आठ साल की उम्र में था ।

परोक्ष और अपरोक्ष यानी चेतन मन और अवचेतन मन में मेरे अन्दर कहीं न कहीं देव आनन्द मौजूद रहते हैं । आज भी मै काम करते करते भूल जाता हूं कि मेरी उम्र ६३ वर्ष की हो गयी है और मुझे ज्यादा मानसिक और शारीरिक काम नहीं करना चाहिये । ळेकिन जब मै काम में जुट जाता हूं तो भूल जाता हूं कि मेरी उम्र क्या है ? अपरोक्ष मन से मुझे समझ में आता है कि मै अभी २० बीस साल का हूं और यही समझ कर मै काम करने में जुटा रहता हू। यह कम उम्र की मान्सिकता मेरे ऊपर हाबी हो जाती है । लेकिन जैसे ही ध्यान आता है मै आराम करने चला जाता हूं ।

लोग मेरी वास्तविक उम्र से १५-२० साल कम समझते हैं । मेरे बाल ३० साल की उम्र में सफेद हो गये थे , जब मै जरमनी में था। भारत वापस आने पर मेरे बाल जयादा तेज़ी से सफेद होने लगे और कुछ साल में एक्दम झकाझक सफेद । मैने कभी डाई नहीं लगायी । एक आध बार मेंहदी लगाने से मुझे सर्वाइकल स्पान्डिलाइटिस का दर्द होने लगा था, तब से फिर कभी कोई बाल रंगने का प्रयास नहीं किया ।

यह सच है कि देव आनन्द मेरे मन में बसते है । सत्तर के दशक में दिल्ली से प्रकशित होने वाली साप्ताहिक पत्रिका “साप्ताहिक हिन्दुस्तान” में देव आनन्द ने एक सेरीज में कुछ लेख लिखे थे । एक लेख में उन्होने अपनी सफ़लता का राज बताते हुये लिखा था कि “मैं पीछे मुड़्कर नहीं देखता कि मैने क्या किया ? ”

यह बात मुझे बहुत इन्स्पायर करती है । मै भी पीछे मुड़्कर नही देखता कि मैने क्या किया ? जो किया सो ठीक किया, गलत हो या सही, यह सुधार तो होते रहते हैं । त्वरित एक्सन न लेने , समय पर काम न करने का खमियाजा वही लोग उठाते हैं जो अकर्मण्य होकर चुप्चाप बैठे रहते हैं । मै पहले सोचता हू फिर करता हू । मेरे काम करने में क्या कमी रही , यह सब सुधार तो होते रहेन्गे । अगर यह सब मस्तिस्क में न होता, तो ई०टी०जी० जैसी जटिल तकनीक कभी जन्म न ले पाती ।

मुझे देव आनन्द की एक फिल्म का सीन कभी नही भूलता, इसे मै दिन में कई बार याद करता हूं । मधुबाला के साथ उनका एक गाना है ” अच्छा जी मैं हारी चलो मान जाओ न, देखी सबकी यारी मेरा दिल जलाओ न ” । इस गाने में मधुबाला कहती है “जीवन के ये रास्ते लम्बे हैं सनम, काटेंगे ये जिन्दगी ठोकर खाके हम, देखो दिल न तोड़ॊ, छोड़ॊ हाथ छोड़ो, छोड़ दिया तो हाथ मलोगे सम्झे ”  इस गाने में दोनों कलाकारों के फेसियल एक्स्प्रेसन्स इतने नेचुरल लगे , मुझे यह भूलता नहीं । शायद गाने का यह हिस्सा मेरे जीवन की किसी घटना के किसी हिस्से से मेल खाता है ।

दिसम्बर सन १९८१, दिसम्बर  १९८२ और दिसम्बर १९८३ में जब मै बम्बई पढायी करने गया था,उस समय मैं देव आनन्द से मिलने उनके आफिस गया था । लेकिन मेरा दुर्भाग्य कि मै उनसे नही मिल पाया । एक बार वे सूटिन्ग के सिल्सिले में देश से बाहर थे । बाकी मुझे याद नहीं कि उन्के आफिस बियरर ने मुझे क्या उत्तर दिया था ?

आज भी मेरी तमन्ना देव आनन्द से मिलने की है, लेकिन मै चाहता हू कि मै जब उनसे मिलूं तो उनका एक ई०टी०जी० परीक्षण करके यह देखूं  कि देव साहब का शरीर आखिर क्यों इतना हिलोरें मारा करता है और  उनके अन्दर की कौन सी ऐसी नस और नाड़ियां है जो उनको हमेशा झक्झोरा करती हैं और चैन से बैठने नही देती ?

आयुर्वेदोक्त शुद्ध काजल का शिशुओं में प्रयोग करने से आन्ख, नाक, कान, गला, दान्त आदि की तकलीफों से बचाव : Prophylactic against ENT & Ophthalmic problems of Children by using Ayurvedic preparation “Kajal”


आयुर्वेद शाश्त्रों में बताये गये तरीके से तैयार किये गये “काजल” के प्रयोग करने से शिशुओं और बच्चों में उपयोग करने से यह अनुभव में आया है कि काजल के प्रयोग करने से बच्चों में गले से सम्बन्धित तकलीफें यथा टान्सिलाइटिस Tosillitis, फैरिन्जाइटिस Pharyngitis, कान बहना Discharges from Ear, कान दर्द Earache, नाक की तकलीफें, सर्दि जुखाम का जल्दी जल्दी होना Sinusitis,cold & coryza या तो जल्दी नहीं होते, अगर हो भी जाय तो जल्दी ठीक हो जाते हैं । बच्चों में सान्स की तकलीफ और दमा Asthama, Upper respiratory tract disorders/ Lower respiratory tract disorders की तकलीफें भी बहुत हद तक कम हो जाती है ।

काजल एक तरह का कार्बन प्रोड्क्ट है । जैसा कि सभी जानते है कि कार्बन के अन्दर किसी भी तरह का इन्फेक्सन डेवलोप नहीं हो सकता है । यह आप सभी रोजाना देखते हैं कि जले हुये कोयले सालों साल चाहें जहां पड़े रहें, उनके अन्दर कभी भी फफून्दी Fungus नही लगती है और न बैक्टीरिया Bacteria डेवलप होते है ।

आयुर्वेद विधी से बने काजल में कई तरह की औशधियां भी मिलाई जाती हैं जिससे यह अधिक प्रभाव कारी हो जाता है । जब काजल आन्खॊं की पलकों में लगाते हैं तो इसके एक्टिव तत्व आन्खों में धीरे धीरे प्रवेश करते है । ये एक्टीव तत्व बहुत सूक्छ्म मात्रा में होते हैं ।