महीना: नवम्बर 2009

आयुर्वेद के “झोलाछाप” डाक्टर ; Quacks of “Ayurveda”


jholachchapayurveda-rastrapati

बहुत अजीब सा लगता है जब कोई यह कहे कि आयुर्वेद चिकित्सा विग्यान में झोला छाप डाक्टर पैदा हो रहे हैं । ऐसा गलत भी नहीं है । मैने कई बार इस ब्लाग में ऐसी ही बहुत सी बातें कहीं है ।

महामहिम परम आदरणीय राष्ट्रपति श्री मती पाटिल जी का कहना बिल्कुल शत प्रतिशत सही है कि आयुर्वेद के नाम पर जिस तरह से झोला छाप वैद्य पैदा हो रहे हैं, उन पर अन्कुश लगाना जरूरी और बहुत जरूरी है । इस बारे में उनकी चिन्ता जायज है क्योंकि एक ऐसा चिकित्सा विग्यान जिसे समय और अनुभव की कसौटी पर प्रकृति के अति निकट होने और तदनुसार भारतीय दर्शन का एक अन्ग होने पर जिस तरह का गौरव महसूस किया जाना चहिये था, उसकी कमी की आन्च महसूस किया जाने लगा है । यह सब गिरावट इसलिये हो रही है क्योंकि आयुर्वेद को लोगों ने व्यवसायिकता से जोड़ दिया है ।

जब तक आयुर्वेद एक प्रकार का दर्शन शाश्त्र बना रहा , तब तक तो ठीक ठाक रहा, इसमें ज्योंही व्यवसायिकता का पुट मिला कि इसमें भ्रस्टता का समवेश होना शुरू हुआ । आज जिस प्रकार से आयुर्वेद को ब्यापार बनाया जा रहा है , यह एक शुभ लक्षण नही है ।

यद्यपि अभी समय है और बहुत कुछ किया जा सकता है, लेकिन यह सब सरकार के भरोसे किया जाय, यह उचित नहीं लगता । बेहतर है वैद्य समाज इस समस्या को समझे और इस क्षेत्र में आ गयी खराबियों को पूरी ईमान्दारी के साथ दूर करने का प्रयास करे ।

महामहिम जी ने जिन अन्य बातों की ओर वैद्य समाज का ध्यान खींचा है , उन बातों पर भी गौर करना अतिआवशयक है ।

उम्मीद है वैद्य समाज के सन्गठन व्याप्त बुराइयों को दूर करने का प्रयास करेंगे ।