महीना: दिसम्बर 2009

एलोपैथी और आयुर्वेद में बुनियादी फर्क : Basic differences of approach in between Allopathy and Ayurveda


एलोपैथी और आयुर्वेद में कुछ बुनियादी फर्क है और इसे एक जैसा समझने की भूल कतई नही करना चाहिये ।

अक्सर लोगों के मस्तिश्क में यह विचार बना हुआ रहता है कि एलोपैथी और आयुर्वेद एक जैसे ही है।

यह समझना बड़ी भूल है ।

एलोपैथी का कन्सेप्ट यह है कि यह मानव शरीर को एक मशीन की तरह से आन्कलन करती है । जैसे एक डीजल इन्जन के बनाने में तरह तरह के पुर्जे लगाये जाते है और तब यह सब पुर्जे मिलाकर एक इन्जन बनान्ते है और तब इससे काम लेते है , ठीक इसी प्रकार एलोपैथी मनव शरीर को समझती है । एलोपैथी का यह भी मानना है कि शरीर का हर अन्ग एक अलग ईकाई है और इसका शरीर के दूसरे अन्गो से कोई रिश्ता नहीं होता । उदाहरण के लिये दिल, गुर्दा, लीवर, मस्तिष्क, गला आदि सब अलग अलग अन्ग हैं और इनका आपस मे कोई सम्बन्ध नहीं है, अगर यह सब अन्ग बीमार हो जायें तो इनका इलाज अलग अलग करना चाहिये ।

लेकिन आयुर्वेद और दूसरी आयुष चिकित्सा विग्यान का कहना है कि ऐसा नहीं है, मानव शरीर एक ईकाई है और इसे ईकाई के तौर तरीकों से समझ कर इलाज करना चहिये । इन सभी चिकित्सा विग्यान में कहा गया है कि जब शरीर बीमार हो तो शरीर की सम्पूर्ण  व्याधियोंक इलाज एक साथ करना चाहिये ।

एलोपैथी जहां रोगों के मूल कारणों में इन्फेक्सन/बैक्टीरिया या अन्य को देखती है वहीं तुलनात्मक तौर पर आयुर्वेद , होम्योपैथी, योग, प्रक्रतिक , यूनानी चिकित्सा इत्यादि के अपने अपने मूल सिद्धान्त है जो प्रकृति से जुड़े हुये है और यह स्वीकार करते है कि मानव शरीर धरती में प्राप्त सभी पान्च तत्वों से मिलकर बना है, इसलिये मनव शरीर के रोगों की चिकित्सा भी इन्ही तत्वों से मिलाकर की जानी चहिये ।

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