महीना: जनवरी 2010

इलेक्ट्रो होम्यो ग्राफी : ई०एच०जी० होम्यो स्कैन तकनीक द्वारा होम्योपैथी के सिद्धान्तों का आंकलन और प्राप्त रिपोर्ट द्वारा सिम्पटम आधारित होम्योपैथी दवाओं का सटीक चुनाव Electro Homoeo Graphy : E.H.G. Homoeo Scan , the technology Quantify the status of Homoeopathic Principals along with the perfect and correct selection of Homoeopathic remedies; E.H.G. Technology Commercially available Now ; E.H.G.


आयुर्वेद की तकनीक इलेक्ट्रो त्रिदोष ग्राफी ई०टी०जी० आयुर्स्कैन में कुछ परिवर्तन करके इलेक्ट्रो होम्यो ग्राफी ई०एच०जी० होम्यो स्कैन तकनीक का आविस्कार किया गया है । इस तकनीक द्वारा होम्योपैथी चिकित्सा विग्यान के आविष्कारक सैमुअल हाहनेमान द्वारा होम्योपैथी के सिध्धान्तों का यथा सोरा Psora, सायकोसिस Sycosis, सिफलिस Syphilis के अलावा वाइटल फोर्स Vital Force और आयडियोसिंक्रेसी Idiosyncracy/ susceptibility के शरीर में उपस्तिथी और बीमारियों के निदान इत्यादि छपी हुयी रिपोर्ट के स्वरूप में प्राप्त हो जाती है ।

होम्योपैथिक औषधियों का चुनाव Selection of Homoeopathic Medicine रेपर्टराइजेशन Repertorisation के द्वारा प्राप्त कर सकते है या प्राप्त लक्षणॊं के आधार पर Symptom based / Disease Diagnosis Based दवाइयों का चुनाव कर सकते है ।

हमारे मुख्य ई०टी०जी० केन्द्र, कनक पालीथेरपी क्लीनिक एवम रिसर्च सेन्टर, ६७/७०, भूसाटोली, बरतन बाज़ार, कानपुर Our Main E.T.G. Center , Kanak Polytherapy Clinic & Research Center, 67/70, Bhusatoli Road, Bartan Bazar, Kanpur में ई०एच०जी० होम्यो स्कैन की सुविधा कामर्सियल facility available commercially स्वरूप में उपलब्ध है । एक स्कैन परीक्षण रुपया Rs. 1200/- तथा होम्योपैथिक दवाओं का प्रेस्क्रिप्सन Prescription of Homoeopathic medicine लेने के लिये रुपया 300/- अधिक extra देने होन्गे । रिपोर्ट तीसरे दिन दी जाती है, लेकिन जो लोग उसी दिन रेपोर्ट लेना चाहते है, उन्हे रुपया 400/- अधिक देने होन्गे और रिपोर्ट ३ या चार घन्टे में दी जायेगी ।

Those , who wanted to seek Homoeopathic Treatment, E.H.G. Homoeo Scanning system will provide them fool proof treatment without any deviation.

रीढ की हड्डियों के रोगों में हो रही बढोतरी : Increasing SPINAL CORD DISEASE CONDITIONS


पिचले कुछ सालों में मैने रीढ के रोगों में हो रही बढोतरी को देखा है । मुझे यह महसूस होता है कि यह बढोतरी कई कारणॊं से होरही है । कुछ प्रमुख कारण यह हो सकते हैं ।

१- उठने बैठने सोने आराम करने के पोस्चर में अनावस्यक तनाव रीढ की हड्डियों की ओर तनाव पैदा होना

२- लम्बी दूरी की यात्राओं का रोजाना लम्बे समय तक बैथे रहने या खड़े होने की स्तिथी में तय करना

३- कार, मोटर साइकिल या वहनों का लमबे समय तक ड्राइव करना

इनके अलाव भी बहुत से करण समझ मे आये है जिनमे कम्प्यूतर मे ज्यादा देर तक काम करने, रीढ की हड्डी में गिर जाने या किसी एक्सीडेन्ट से चोट लग जाने, या अन्य किसी कारण या बीमारी से रीढ में कोई तकलीफ पैदा होने से

और भी वजहें हो सकती है ।

मुझे अधिकतर इस बीमारी से ग्रसित मरीज जो भी मिले , उनकी उम्र २० साल से लेकर ४५ साल की उम्र वाले मिले । इसमे से कै ऐसे थे जिन्होने बिस्तरा पकड रखा था ।

ऐसे सभी मरीज एलोपैथी कि दवायें ले रहे थे जिनमें केवल पेन किलर्स, विटामिन की गोलिया और जरूरत से ज्यादा स्टेरायद ले रहे थे । यह सब दवायें लेते लेते जब इन दवाओं का असर खतम हो गया और इन प्रेस्क्रिप्सन से भी आराम मिलना बन्द हो गया तब बहुत खराब हालात में ऐसे मरीज हमारे पास इलाज के लिये आये ।

हमने इन सभी मरीजों का ई०टी०जी० परिक्शण किया और तदनुसार उनके पूरे शरीर के अन्गों में कहांकहां व्याधियां व्याप्त है और कौन कौन से अन्ग कितना काम कर रहे है ? शरीर में त्रिदोष की क्या स्तिथि है इतयादि इत्यादि बातों को सोच समझ्कर जब इलाज किया गया , तब जाकर लगभग १५ दिन बाद ऐसे मरीजों को आराम मिलना शुरू हुआ ।

हम ऐसे मरीजों के साथ कम्बाइन्ड चिकित्सा का उपयोग करते हैं । जिसमे आयुर्वेद, होम्योपैथी, य़ूनानी दवओं के साथ साथ एलोपैथी के पेन किलर्स का उपयोग करते है, ताकि मरीज को दर्द बिल्कुल न हो और उसे दर्द क अहसा हो तो न के बराबर । कुछ दिनों बाद पेन किलर्स छूट जाते है और मरीज धिरे धिरे आयुर्वेद या होम्योपैथी या पर अधारित हो जाते है। हम इन मरीजों को मैग्नेट थेरप्य, अकूपन्क्चर, प्राक्रतिक चिकित्सा, फीजियोथेर्रेपी, पन्चकर्म आदि का उपयोग करते है ।

हमारा मानना है कि रीड़ की बीमारियों में यदि प्ररम्भिक अवस्थाअमें इलाज ले लिया जाय तो एन्काइलोसिन्ग स्पान्दिलाइटिस जैसी तकलीफें भी दूर की जा सकती हैं ।

लेकिन यह तभी सम्भव है जब इलाज करने वाल चिकित्सक चिकित्सा कर्य में निपुण हो ।

हम नब्बे दिनों के बाद या जब जरूरत होती है तब रोगी के रोग की स्तिथि कि मानीटरिंग ई०टी०जी० परिक्षण से लगतर करते रहते है जिससे इलाज बहुत सटीक , सही और प्रभाव्शाली हो जाता है और किसी प्रकार कि गलती होने की सम्भावना न के बराबर होती है ।

सर्जरी से बचें Avoide Surgical Interventions

रीढ की हड्डियों की बीमारियो में सर्ज्ररी न करायें तो अछ्छा है । जब तक कि बहुत महत्व पूर्ण स्तिथि न आ जाये तब तक नये और कुछ पुराने हो गये रोगों में सर्जरी न करायीं तो अच्छा होगा । मैने बहुत से रोगियों को देखा है कि  वे रीढ की सर्जरी कराने के बाद एक्दम अपन्ग हो गये और फिर उनका सारा जीवन बिस्तरे पर ही लेटे लेटे बीता और कोई भी औषधिया उनको आराम नहीं दे सकीं । ईसलिये बेहतर यही है कि बहुत सोच समझ कर सर्जरी के बारे में विचार करें ।