दिन: फ़रवरी 26, 2010

होम्योपैथी के बारे में भ्रान्त धारणायें : Prejudice ideas about Homoeopathy


मै अक्सर लोगों को बाते करते हुये सुना करता हूं कि होम्योपैथी की चिकित्सा करना खतरों के साथ खेलना है । इमर्जेन्सी के हालात में तो कतई नहीं । बच्चों के इलाज के लिये तो ठीक है, लेकिन बड़े लोगों की इससे सभी बीमारियां दूर हो जायें, यह ना मुमकिन है ।

ये सब बातें मुझे बेवकूफी के अलावा और कुछ नहीं लगतीं । मेरे पिता जी स्वर्गीय वैद्य पन्डित सीतला सहांय बाजपेयी जी आयुर्वेद की चिकित्सा के साथ Homoeopathy की भी दवायें देते थे । मैं बचपन से उनको चिकित्सा कार्य करते हुये देखता रहा और इस प्रकार मेरे मन में होम्योपैथिक चिकित्सा के अनुभव बैठ गये । मैने आयुर्वेद और होम्योपैथी दोनों चिकित्सा विग्यान का अध्ध्य्न किया है । अगर यह अध्ध्यन न किया होता तो शायद ही आयुर्वेद के लिये आधुनिक नाड़ी ग्यान परीक्षण की तकनीक “इलेक्ट्रो त्रिदोष ग्राफी” और इसी तकनीक से निकाली गयी “ईलेक्ट्रो होम्यो ग्राफी” जो होम्योपैथी के मूल सिद्धन्तों का शरीर के अन्दर आन्कलन करने के साथ साथ सतीक होम्योपैथी की दवाओं का चुनाव भी कर देती है, का आविष्कार न हुआ होता ।

वास्तविकता यह है कि जब होम्योपैथी के अच्छे डाक्टर ही नहीं होन्गे और अधकचरे ग्यान वाले डाक्टर चिकित्सा कार्य करेन्गे तो वे अपेक्षित रिजल्ट कहां से देन्गे । इनकी सन्ख्या बहुत ज्यादा है । नतीजा यह होता है कि कठिन बीमारियों के मरीजों की हालत कभी कभी मरणासन्न्न अवस्था में हो जाती है । किसी किसी मरीज का रोग ऐसे डाक्टर इतनी खतर्नाक अवस्था में पहुन्चा देते है कि उनको सिवाय आई० सी० यू० में रख्कर इलाज करने का रास्ता ही नहीं बचता । अब ऐसे हालत से गुजरा हुआ मरीज होम्योपैथी को खरा खोटा नहीं सुनायेगा तो क्या कहेगा ?

होम्योपैथिक चिकित्सकों के अन्दर स्वयम बहुत कमियां है । कालेज से निकला हुआ ताजा तरीन होम्योपैथी का छात्र अपने को महत्मा हह्नेमान का एक्मात्र चेला समझता है । वह यह समझता है कि उसने सारी होम्योपैथी घोल कर पी डाली है । उसने जितनी होम्योपैथी पी डाली है शयद ही उसके किसी साथी ने पी हो । कान्फीडेन्स होना एक अलग बात है, ग्यान होना दूसरी बात है, लेकिन वे रिजल्ट क्या दे रहे हैं, इस पर विचार करना चाहिये ।

अगर ऐसा ही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं, जब सरकार को यह चिकित्सा पध्यति ही कहीं न बन्द कर देनी पड़े जैसा कि ब्रिटेन सरकार ने नेशनल हेल्थ सर्विस से होम्योपैथी को बन्द कर देने का फैसला किया है । कारण बहुत से हो सकते है, यह तो वही जाने, लेकिन यह भी कटु सत्य है कि जब तक रिजल्ट न मिलें तब तक इस चिकित्सा विग्यान को बनाये रखने का औचित्य ही क्या ?

होम्योपैथी को बचाना है तो यह जरूर करना पड़ेगा;
१- हहनेमान की शिक्षा आज के सन्दर्भ में कितनी सही है और कितनी नहीं, इसका निर्धारण करना होगा ?
२- होम्योपैथी की वैग्यानिकता सिद्ध करने के लिये आधुनिकतम तकनीक का उपयोग करके मल्टी डायमेन्शनल शोध कार्य करने की जरूरत है
३- सिन्गल मेडिसिन के साथ साथ मल्टी मेडिसिन के प्रयोग के बारे में विचार किया जाये , जिसमे मदर टिन्क्चर के मिक्सचर, कई पोटेन्टाइज्ड दवाओं के एक साथ आल्टर्नेशन में उपयोग इत्यादि बातें शामिल हों ।
४- हाहनेमान ने आर्गेनान के आखिर में एलेक्ट्रो थेरापी, मैगनेट थेरापी, जल चिकित्सा, हिप्नोटिस्म, मान्सिक चिकित्सा , साइकोथेरपी इत्यादि का उपयोग करने के लिये कहा है ? कितने चिकित्सक यह सब उपयोग करते है?

आवस्यकता आज इस बात की है कि काम ज्यादा किया जाय और बातें बिल्कुल नही, तभी होम्योपैथी कि बचा सकते है ।

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