दिन: जुलाई 10, 2010

“कडवी लौकी का जूस पीने से मौत” ??????? बात कुछ समझ में नहीं आयी


एक दो दिन पहले कुछ टी०वी० चैनलों नें इस बात का कैम्पेन करना शुरू किया कि कड़्वी लौकी का जूस पीने से एक वैग्यानिक की मौत हो गयी /

मुझे यह जानकर बहुत अफ्सोस और दुख हुआ कि इस मौत का ठीकरा लौकी के जूस पर थोप दिया गया / अब यह तो मीडिया है , कुछ भी लिख मारे और कुछ भी टेलेकास्ट कर दे, क्योंकि इनके ऊपर कोई प्रतिबन्ध नहीं है / क्योंकि ये स्वतन्त्र है, इनके ऊपर कोई सरकारी बन्धन इसलिये नही है क्योंकि भारतीय सम्विधान में प्रेस की स्वतन्त्रता की गारन्टी दी गयी है/

लौकी कड़्वी होने के कुछ कारण है/ यदि लौकी की बेल नीम के पेड़ पर चढ जाये तो लौकी कड़्वी हो जाती है / यदि करेले की बाड़ के साथ साथ लौकी भी उगाने लगे तो लौकी कड़्वी हो जाती है, आज कल एक नई प्रजाति के करेला की खेती बान्स के मचान पर बेल फैलाकर की जा रही है / खेतिहर ज्यादा फसल लेने के चक्कर में इस बेड़ के साथ साथ लौकी या तरोई की भी फसल कर लेते है / करेले के कडुये पन का असर लौकी में भी आ जाता है / एक काम और हो सकता है / जल्दी लौकी का आकार बढाने के चक्कर मे खेतिहर आक्सीटोसिन नाम का इन्जेक्शन लगा देते है जिससे लौकी का आकार तो बढ जाता है लेकिन उसके अन्दर खतर्नाक हार्मोन पैदा हो जाते है जो स्वास्य के लिये नुकसान दायक होते है /

लौकी की सब्जी सभी भारतीय खाते है और इसके बहुत तरह के व्यन्जन बनते है / जब भी किसी मरीज को परहेज कराना होता है तो पथ्य के लिहे लौकी की सब्जी का सबसे पहले उप्योग करते है कारण यह है कि यह हजम बहुत जल्दी होती है / यह सभी बीमारियों मे पथ्य है और मै तो सबसे पहले इसे ही मरीज को खाने की सलाह देता हुं /

किसी वस्तु को बदनाम करना बहुत आसान होता है/ मै एक वास्तविक उदाहरण देकर ापको बताना चाहता हू कि सुनी सुनाई बात पर विश्वास ना करें जब तक इसे कन्फर्म ना कर लेण/

वाकया यह है कि मेरे एक मित्र शाम को जब मै दवाखाने में बैठा हुआ था, बहुत तेजी से आये और कहा कि फजल के लड़्के को अभी अभी तेज बुखार आया और वह पान्च मिनत में बेहोश गया और जब तक डाक्टर के पास जाते उसका इन्तकाल हो गया /

यह लगभग २० साल पहले की बात है / यह सुनकर मै बहुत चक्कर में पड़ गया कि ऐसा तो कभी नही देखा कि बुखार का मरीज इतनी जल्दी निपट जाये / मैने अपने मित्र से कहा भी कि ऐसा हो नहीं सकता क्यों कि मैने कभी ऐसा वकया देखा नही है / लेकिन मेरे मित्र अपनी बात पर अड़े रहे / थोड़ी देर बाद वह चले गये /

यह सुनकर मै आत्म मन्थन करने लगा कि मुझे २५ साल प्रक्टिस करते हो गये , न जाने कितने बुखार के मरीज आये और ठीक होकर चले गये, ऐसी कौन सी तड़ापड़ वाला बुखार पैदा हो गया जिसने आनन्फानन में मरीज को निपटा दिया /

मैने फैसला किया कि इस माम्ले की तह तक जाना चाहिये और पता करना चाहिये कि सही क्या है ?

मैने दूसरे दिन अपने मित्र को फोन करके यह जानना चाहा कि यह मरीज कहा रहता है / उन्होने उसके बारे में बताया / मै समय निकाल कर पता करते करते उसके घर पहुन्चा और उनके वालिद से जान्कारी ली /

उनके वालिद ने बताया कि लड़के को दो महीने से बुखार आ रहा था, तमाम टेस्ट कराये गये, परीक्श्ण कराये गये और उन्के आधार पर एलोपैथिक की चिकित्सा शुरू की गयी / डाक्टर आश्वाशन देते रहे की बच्चा ठीक हो जायेगा इस्लिये जितना भी हो सकता था इलाज कराते रहे / बुखार रोजाना आ जाता था और उतरता नहीं था / कभी टाइफाइड बताते थे, क्भी देन्गू, कभी कुछ / दो दिन पहले तेज बुखार आया इन्जेक्शन लगे, दवा खिलायी रात भार और दिन भर बुखार उतरा नही, उसके बाद बेहोशी आ गयी, जब तक डाक्टर को बुलाते बच्चा शान्त हो गया /

यहां मेरा यह बताने का मतलब है कि बात कुछ और होती है और बतन्गड़ कुछ और.

ळौकी के बारे में बात नही बतन्गड़ बनाया जा रहा है /

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