आयुर्वेदीय पन्चकर्म के नकारात्मक पहलू ; Negative Aspect of AYURVEDIC PACHAKARMA


आजकल आयुर्वेदीय पन्चकर्म की बड़ी चर्चा हो रही है / जिस आयुर्वेद के स्नातक को देखो वही पन्चकर्म की चिकित्सा का ढिन्ढोरा पीटे चला जा रहा है / जैसे कि कोई कारूं का खजाना हाथ लग गया हो कि बस अब सब कोई पन्चकर्म कराये और अपने सारे शरीर की तकलीफ से मुक्ती मिल जाये /

यह सब बेकार की सोच है / मुझे सैकड़ों की सन्ख्या मे ऐसे मरीज मिले है जिन्होने पन्चकर्म चिकित्सा करायी और उनको कोई भी लाभ नहीं मिला, उलटे उनकी तकलीफ और अधिक जटिल हो गयी और रोग की जड़े और ज्यादा मजबूत हो गयी /

मैने एक सर्वे करके यह निचोड़ निकाला है / कानपुर शहर के अन्दर के कुछ पन्चकर्म केन्द्र, उत्तर प्रदेश राज्य के अन्य शहरों मे कार्य रत पन्चकर्म केन्द्र और भारत के कई अन्य राज्यों के पन्चकर्म केन्द्रों से इलाज कराकर लौटे मरीजों से प्राप्त जानकारी के आधार पर जो जानकारी उभर कर सामने आयी है, उससे यही निष्कर्स निकला कि पन्चकर्म चिकित्सा व्यवस्था के नाम पर आयुर्वेद के नाम से केवल दुकाने चलायी जा रही है, जिनसे न केवल इस आयुर्वेद की इस चिकित्सा विधि का व्यवसायी करण होने का सच सामने आ गया है /

किसी जमाने में केरल के पन्चकर्म का जिक्र इस बात के लिये किया जाता था कि केरलीय पन्चकर्म के उपयोग के द्वारा शरीर का सुन्दरीकरण किया जा सकता है / केरल का पन्चकर्म विग्यान और पन्चकर्म प्रथा शास्त्रोक्त आयुर्वेद की प्रथा से थोड़ा अलग है / इसका कारण है कि आयुर्वेद चिकित्सा विग्यान जितना उत्तरीय भारत मे विकसित हुआ , वह दक्षिण भारत में नही हुआ / केरलीय पन्चकर्म परमपरागत शरीर सौस्ठव को बढाने और शरीर को मजबूत बनाने की प्रक्रिया का एक भाग मात्र था / यह केरल की मार्शल आर्ट “उट्टापट्टु” से सम्बन्धित हो सकता है / केरल की मार्शल आर्ट को अपनाने वाले अपने शरीर को स्वस्थ, मजबूत और ठोस बनाने के लिये तथा मार्शल आर्ट की प्रैक्टिस से उतपन्न थकावट को दूर करने के लिये पन्चकर्म का सहारा लेते होन्गे / इस प्रकार कालान्तर में यह विधि प्रचिलित होते होते अपने मूल उद्देश्य से भटग गयी और व्यवसायी करण की स्तिथि में आ गयी /

उत्तरीय भारत में शास्त्रीय आयुर्वेद की चिकित्सा का विकास हुआ / इस विकास मे ऐसा लगता है कि आयुर्वेद के तत्कालीन चिकित्सकों को इस बात का पता चला हो कि कफ दोष को वमन द्वारा ठीक किया जा सकता है या कफ दोष कुपित अवस्था को कम अथवा समान्य किया जा सकता है / इसीलिये वमन का उपयोग अनुकूल लगा होगा / चूकि पित्त के स्थान शरीर के एक्दम मिडिल मे होते है, इसलिये आयुर्वेद के चिकित्सकों की धारणा बनी होगी कि इस स्थान से दोष निकालने की प्रक्रिया सहज नही होगी क्योंकि वमन कराना आसान है , जिससे कफ दोष शान्त होगा लेकिन पित्त दोष को निकालने के लिये उनको यही समझ में आया होगा कि विरेचन के द्वारा ही पित्त दोष को शान्त किया जा सकता है, इसलिये विरेचन द्रव्यों का उपयोग विकसित किया गया होगा / वात दोष की शान्ति के लिये वस्ति यन्त्रों का आविस्कार किया गया होगा और इस प्रकार से दो प्रकार की वस्तियों का प्रचलन आयुर्वेद में हुआ होगा / कुल मिलाकर यह चार कर्म हुये / इसमें आयुर्वेद के मनीषियों ने एक कर्म और जोड़ दिया जिसे नस्य कहते है / इसका कारण यह समझ में आता है कि उर्ध्व जत्रु रोगों की शान्ति के लिये तथा कफ दोष के पान्च भेदों में से कुछ की शान्ति के लिये नस्य की प्रक्रिया अपनायी होगी / इस नस्य विधान का एक कारण और समझ में आता है कि जव वमन, विरेचन, वस्ति द्वारा शरीर की शुध्धि कर दी गयी तो यह शुद्धि तो शरीर की हुयी लेकिन मन और विचारों तथा मस्तिष्क की शुध्धि के लिये क्या किया गया ? यह एक यक्ष प्रश्न आयुर्वेदग्यों के सामने आया होगा क्योंकि सत्व, रज और तम इन तीन गुणों को समान्य रखने के लिये क्या किया गया ? इसलिये आयुर्वेद के मनीषियों नें नस्य विधि का विकास किया होगा, जो सर्वथा उचित लगता है / इस नस्य को मिलाकर आयुर्वेद का पन्चकर्म विधान बनता है /

आयुर्वेद कहता है कि सभी बीमारियों और सभी अवस्था या उम्र के लोगों का पन्चकर्म नहीं करना चाहिये / केवल चुने हुये रोगियों का पन्चकर्म किया जाना चाहिये / किन किन लोगों का पन्चकर्म किया जा सकता है यह आयुर्वेद की शाश्त्रीय पुस्तकों में बतलाया गया है /

खेद की बात यह है कि पन्चकर्म का व्यवसायी करण हो गया है,इसका एक मात्र कारण यह है कि इस तरह के पन्चकर्म प्रलोभन से चिकित्सक को मोटी रकम मिलती है जो साधारण तौर पर सामान्य प्रैक्टिस करके कोई भी आयुर्वेदिक चिकित्सक नहीं कमा सकता /

पन्चकर्म का एक एक पैकेज हजारों रुपये का होता है जिसे कोई भी गरीब आदमी अफोर्ड नहीं कर सकता है / इस प्रकार से यह चिकित्सा केवल अमीरों और पैसे वालो के स्तर के लोगों तक सीमित रह जाती है /

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