दिन: मार्च 27, 2011

“होम्योपैथिक कार्ड रेपर्टरी” , जिसे मैने “रेपर्टराइजेशन प्रासेस के एड्वान्टेज और डिसेड्वान्टेजेज” दोनों को समझने के लिये रिसर्च एन्गिल को आधारित करके बनाया


सन १९७० सेमै खत्री धर्मशाला होम्योपैथिक डिस्पेन्सरी, बिरहाना रोड, कानपुर में अपने गुरू जी डा० श्री राम चतुर्वेदी बी०एम०एस० के साथ बैठकर चिकित्सा अभ्यास करता था / हमारे साथ प्रसिद्ध होम्योपैथिक चिकित्सक  डा० श्याम जी मेहरोत्रा भी बैठते थे / मेरा ध्यान और मेरा होम्योपैथिक चिकित्सा का आकर्षण “पुरानी बीमारियों” की चिकित्सा करने मे ज्यादा था / अपने छात्र जीवन में जब मै होम्योपैथी पढ रहा था उस समय मै आयुर्वेद का भी छात्र था / आयुर्वेद की कछायें सुबह ८ बजे से दोपहर १२ बजे तक लगती थी और होम्योपैथी की कछायें दोपहर बाद २:३० बजे से शाम ६ बजे तक चलती थी  / इस तरह मै दिन भर चिकित्सा बिग्यान का अध्ध्यन करता रहता था /

 

मेरे साथ विडम्बना यह थी कि सुबह मै आयुर्वेद हिन्दी और सन्सकृत में पढता था और दोपहर में अन्ग्रेजी में चिकित्सा विग्यान की पुस्तकें पढता था / यह एक तरह का ऐसा घालमेल था, जिसमे चिकित्सा विग्यान का प्राचीन और आधुनिक स्वरूप दोनो के अध्ध्यन का एक साथ मुझे अवसर मिलता था / इस तरह से जाने या अन्जाने में आयुर्वेद , होम्योपैथी और आधुनिक चिकित्सा विग्यान का एक साथ अध्ध्यन बहुत अभूत्पूर्व लगता था / [remaining part will be given soon]