महीना: अप्रैल 2011

IMPORTANT NOTICE


Some Noxious persons
HACKED
my following E-mail address;

drdbbajpai@hotmail.com        X X X X X X X

Now above mentioned E-mail address is closed and I have created new E-mail addressess , which are as follows;

drdbbajpai@gmail.com

Kindly be careful about using correct and accurate E-mail address, while contacting to Dr Desh Bandhu Bajpai

Thanks

शास्त्रोक्त सिद्ध औषधियां ; लौह, मन्डूर


ऐसी बहुत सी बीमारियां है, जिनका इलाज सिवाय आयुर्वेद के और किसी भी चिकित्सा विग्यान में नहीं है / आयुर्वेद शास्त्रों में ऐसे ऐसे योग दिये गये है, जिनके उप्योग करने से और रोगियों को आराम मिलने से या रोग मुक्त होने से , जब परिणाम देखने को मिलते है, ये चिकित्सा के सकारात्मक परिणाम बहुत ही आश्चर्य पैदा करने वाले होते है /

लेकिन इसके लिये यानी चिकित्सा के सकारात्मक परिणाम प्राप्त करने के लिये बहुत परिश्रम की आवश्यकता होती है / ऐसे फलदायी परिणाम के लिये वैद्य को आयुर्वेद शास्त्र की गहरी और ठोस जानकारी होना चाहिये / निदान ग्यान में निपुणता और गहरी पैठ होनी चाहिये तभी शाश्त्रोक्त सिद्ध औषधियों से हमेशा ऐसे परिणाम मिलने की सम्भावना रहती है, जैसा कि हमारे आयुर्वेद के मनीषियों ने अनुभव करके लिपिबध्ध किया है /

आयुर्वेद की आधुनिक निदान ग्यान की तकनीक Electro Tridosha Graphy ; ETG AyurvedaScan के द्वारा आयुर्वेद के मौलिक सिद्धान्तों का आन्कलन तथा शरीर मे व्याप्त रोगों का निदान बहुत सरलता से और सटीक तरीके से हो जाता है / लम्बे समय तक रिसर्च करने और इस तकनीक पर आधारित होकर इलाज करने से अवश्य सफ़लता मिलती है, ऐसा अनुभव किया गया है /

ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन रिपोर्ट पर आधारित निदान की गयी बीमारियों के इलाज के लिये कई आयुर्वेदिक शाश्त्रोक्त योग हजारों मरीजों पर आजमाये गये है / ऐसे योगों का उपयोग मरीजों पर किया गया है और परिणाम बहुत सकारात्मक रहे /

हलांकि ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन की फाइन्डिन्ग्स पर आधारित रोग निदान और बीमारियों के उपचार के लिये विशेष प्रकार की आयुर्वेदिक दवाओं का फार्मूलेशन्स किया गया है / इसका कारण यह है कि जिस तरह से वात, पित्त या कफ के अलावा त्रिदोष भेद, सप्त धातुओं का अन्कलन, मल और अग्नि का आन्कलन करके उनकी इन्टेन्सिटी लेवल की जब तक एप्रोच करने वाली प्रभावशाली दवा की मात्रा नहीं होगी, रोगी को रोग मुक्त होने मे कठिनाइयां आयेन्गी / इसलिये विषेश रूप से तैयार की गयी ये दवायें जब शास्त्रोक्त औषधियों से मिलकर शरीर पर असर दिखाती है तो शाश्त्रोक्त दवाओं के प्रभाव की उपयोगिता समझ में आती है /

अधिकतर निम्न शास्त्रोक्त दवायें उपयोग में ली जाती है ;

अवस्था एक – हाइड्रो मस्कुलोसिस यानी सजल मान्सपेशियां अथवा मान्स्पेशियों मे अतिरिक्त पानी का एकत्र होना /

अभी तक “हाइड्रो मस्कुलोसिस” बीमारी के बारे मे चिकित्सा बिग्यान के किसी भी चिकित्सक को इस बात का ग्यान नही था कि यह क्या बीमारी है ? यह तो आयुर्वेद की आविष्कृत की गयी आधुनिक युग की नवीन्तम तकनीक ई०टी०जी० आयुर्वेदस्कैन विधि द्वारा खोजा गया रोग और निदान दोनों ही इसकी देन है /

आयुर्वेद की नई तकनीक ईलेक्ट्रो त्रिदोष ग्राफी ; ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन ने इस बीमारी का निदान ग्यान आविष्कृत किया है / इस बीमारी मे शरीर की मान्सपेशियों में अतिरिक्त पानी एकत्र होने लगता है / यह सुजन या ड्राप्सी से अलग किस्म की बीमारी है / मरीज यह समझता है कि उसका शरीर मोटा हो रहा है और उसकी सेहत दुसरे को देखने वालों को बहुत अच्छी लगती है / चेहरे पर चमक और हाथ पैरो तथा शरीर की त्वचा बहुत चमक्दार दिखाई देती है / रोगी गोल मटॊल और मोटा दिखाई देता है, लेकिन उसके दम अन्दर से नहीं होती है / रोगी बहुत जल्दी थकता है और कोई भी मेहनत का काम नही कर पाता है / ई०टी०जी० परीक्षण द्वारा ही इस बीमारी का निदान किया जा सकता है / इस बीमारी का निदान किसी और परीक्षण द्वारा फिल्हाल सम्भव नही है /

आधुनिक चिकित्सा विग्यान के सभी परीक्षण सामान्य निकलते है और एलोपैथी का चिकित्सक कहता है कि मरीज को कोई बीमारी नहीं है, जबकि मरीज का कहना होता है कि उसे तकलीफ है /

जैसे ही Hydro Musculosis बीमारी का निदान हो जाता है , वैसे ही उसकी दवा का चुनाव भी हाथॊं हाथ हो जाता है / इस बीमारी मे शास्त्रोक्त औषधि “पुनर्नवा मन्डुर” का चुनाव बहुत उपयोगी सिध्ध हुआ है / “पुनर्नवा मन्डूर” की दो गोली दिन मे दो बार देने से हाइड्रो मस्कुलोसिस तो ठीक होती ही है, इसके साथ की दूसरी anomalies भी सही हो जाती है /अधिकतर यह बीमारी महिलाओं मे अधिक पायी गयी है, लेकिन पुरुष भी इस बीमारी से ग्रसित देखे गये है, परन्तु इनकी सन्ख्या महिलाओं की तुलना में कम होती है /

ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन परिक्षण के दवारा जैसे ही Hydro-musculosis बीमारी का निदान हो जाता है, इसकी सटीक दवा भी “पुनर्नवा मन्डूर” का निदान स्वाभाविक तौर पर हो जाता है / यह Mandur category की दवा लम्बे समय देने से यह रोग ठीक हो जाता है /

अवस्था -दो ; सम्पूर्ण शरीर का शोथ ; Swelling of whole body

ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन परीक्षण से बहुत से रोगियों के बारे मे पता चलता है कि वे शरीर की सम्पूर्ण सूजन से परेशान हैं / मरीजों को इसका ग्यान ही नहीं होता के उनके शरीर के एक या अनेक हिस्सों मे सूजन कम या अधिक मात्रा में उपस्तिथी है /

जब ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन का परीक्षण और इसकी traces का अध्ध्य्यन करने के बाद यह निदान हो जाता है कि मरीज को सारे शरीर की सूजन की शिकायत है, तो उसी समय “शोथारि लौह” पुरूषों के लिये और “शोथारि मन्डुर” महिलाओं के लिये औषधि चुनाव हो जाता है /

शोथारि लौह अथवा मन्डूर देने से सम्पूर्ण शरीर का शोथ दूर हो जाता है / इसके साथ साथ मरीज का Blood pressure भी सामान्य हो जाता है / रिसर्च मे देखा गया है कि शरीर में व्याप्त यह सूजन दूसरी प्रकार की सूजन से एक्दम अलग होती है जैसा कि लीवर या किडनी फेलर बीमारी में देखने में आती है / इस तरह की सूजन शरीर के electrolytic imbalance and mineral defficiency के कारण होती है /

“शोथारि लौह अथवा मन्डूर” के उपयोग से इस तरह के शोथ ठीक हो जाते है /

कुछ अन्य लोह और मन्डुर का उपयोग निम्न रोगों में बहुत आशुफलकारी अनुभव किया गया है /

[अ] यकृत प्ळीहारि लौह ; जब लीवर के साथ प्लीहा की विकृति हो तो इसे प्रयोग करना चाहिये / अधिकतर इस लौह को डायबिटीज के रोगों में उपयोगी पाया है / पैन्क्रियाज की विकृति में इसे उपयोग करने पर अच्छे परिणाम मिले है /

[ब] महाश्वासादि लौह ; इसे फेफड़ॊं से सम्बन्धित विकारों में उपयोग करते है / लेकिन इसे श्वांस और दमा से समबन्धित विकारों में विषेश रूप में उपयोग करते है /

A memorable Photograph of year 1977


[ Introduction to Photo; From Left to right; (1) Dr Desh bandhu Bajpai, Kanpur (2)one unknown gentleman (3) Dr Med Walther Zimmermann , Munich, Germany (4) Dr. K.N. Khanna, Kanpur]

One of my memorable photograph with my German Homoeopathic Teacher Dr.med. Walther Zimmermann, Chefartz [Chief physician/director/CMS], Krankenhaus fuer Naturheilweissen, Harlaching, Muenchen [Munich], Germany, when he visited New Delhi in year 1977 to attend the World Conference of Homoeopathy , organised by International Homoeopathic League with his wife Dr.med.gyn. Y. Zimmermann.

This photograph was taken by Mrs. Zimmermann. While she was shooting the film an unknown gentleman penetrated himself for the Photograph forcibly. I could not say anything at that time because of presence of my respectable teacher and visiting guest Dr Zimmermann.

My father died all of sudden before 14th day of the beginning of the conference. Due to this hurdel, my hair was cutoffed and I attended without hair the conference.

Dr. K.N. Khanna of Kanpur was with me and he is standby Dr. Zimmermann.

गुजराती भाषा में छपा आयुर्वेद का अदभुत ग्रन्थ ; “रसोध्धार तन्त्र” ; A Unique GUJARATI LANGUAGE Ayurveda classics book ‘RASODHDHAR TANTRA”


Below is the copy of the front page of the book RASODHDHAR TANRA, a classic composition of Ayurveda in GUJARATI LANGUAGE. This is a rare book, which I got it from the collection of my maternal Uncle, my mother’s eleder brother, Mahamahopadhyay Shri Kali Prasad ji Shashtri, editor of SANSAKRATAM weekly news paper, published from AYODHYA, U.P.

[details will be given soon]

Among the many  unique features of this book, one  is that it contains the formulea of seasons of a years, as classified by Ayurveda, the RITUS, ras aushadhi formulea known as GRISHMANAND RAS  to be used in summer season, SHISHIRANAND RAS  for Shishir ritu ailments and so on.

The most attractive features of this book is given in RAJYAKSHAMA chapter, where we find the diseases features similar to AIDS, HIV, Hepatitis B and so on and many more.

A Formula of MAHASARSWATI SURA  in chapter RASAYANA is vey attractive to prepare the SURA for Ayushyavardhak purposes. It seems to me that at the time of Monarchy in Gujarat states, the Ayurvedicians at that time formulated the formula for kings and rulers. The uses of this SURA is much mote better descripted in comparison to MRIT SANJIVANI SURA. In this RASAYANA chapter many more Rasayana are formulated for AYU Vardhan and to avoid early Old age. The mentioned formulea are beneficial for the treatment of the OLD AGE problems and in GERIATRICS ailments successfully.

In year 1961 , I was living in GUJARAT in ANKALESHWAR near to Chyota Bazar, a railway station and small city, en route from  BADODARA  to  SURAT railway line. I studied there few months. Therefore , I can read and understand Gujarati Language.

मै डा० हाहनेमान के डिफेन्स में ; In Defence of Dr Hahanemann


आज होम्योपैथी के जन्म दाता डा० सैमुअल हहनेमान का जन्म दिन है / हर साल होम्योपैथी के फालोवर १० अप्रैल को होम्योपैथी दिवस मनाते है / हलान्कि मै होम्योपैथों के किसी कार्यक्रम मे शिरकत कतई नहीं करता, क्योन्कि इसके पीछे का कारण यह है कि मै होम्योपैथों के बीच में व्याप्त राज्नीति को कतई कतई पसन्द नहीं करता / दूसरे लगभग सभी होम्योपैथ एक दूसरे को नीचा दिखाने मे हमेशा लगे रहते है और मौका पड़ने पर एक दूसरे की टान्ग घसीटने से भी गूरेज नहीं करते / तीसरे एकाडेमिक स्तर हर होम्योपैथ का बहुत कमजोर है, और वह आधुनिक चिकित्सकों के सामने कही भी नहीं टिकता / चौथी बात यह कि रिसर्च के नाम पर कुछ भी नहीं है, जो भी है उसे स्तर हीन ही कहा जायेगा / पान्चवा यह कि होम्योपैथी किसी तरह से घिसट घिसट कर सरकार की कृपा और उसके चरणों मे चिरौरी करके जिन्दा रखी जा रही है /

बहुत सी और बाते है , जिनका मै जिक्र फिर कभी करून्गा /

आज मै हाहनेमान के बारे मे अपने विचार बताने का प्रयास करून्गा, जो मै उनके बारे में सोचता हूं /

हाहनेमान ने होम्योपैथी के बारे मे अप्ना दृश्टीकोण समय समय पर बदला है, यह बदलाव उन्होने अपने आबजरवेशन के बदलते स्वरूप के अनुसार किया है / यह कैसे हुआ, इसे मै इस नजरिये से देखता हू /

जब Dr Hahanemann ने Medicine of Experience लेख में अपने द्वारा किये गये observations को एक लेख द्वारा प्रकशित करके सारी दुनिया को यह बताया कि क्विनीन खाने से उन्होने क्या क्या अनुभव किया और किस प्रकार उन्होने क्विनीन के कुछ लक्शणों को लिपिबध्ध किया और इस ए़क्सपेरिमेन्ट से उन्होने क्या नतीजा निकाला ? तब लोगों का ध्यान उनके इस नवीन चिकित्सा शोध की ओर गया / यह कहा जाता है कि जिस समय यह लेख लिखा गया , उस समय हाह्नेमान रोगियों को Mother tincture के रूप में दवाओं का उपयोग कराते थे / बहुत सीमित सन्ख्या में दवाओं का यथा Pulsatilla, Sepia, Bryonia, Rhustox कुछ ऐसी दवाये थीं, जो vegetable और animal sources से थीं / ऐसा लगता है कि हहनेमान को पता चला होगा कि कुछ vegetable और animal सोर्स कि दवायें कम या अधिक toxic होन्गी और उनको कितनी मात्रा में रोगियों को देना चाहिये /

Arsenic, Sulphur, Mercurius, Phosphorus आदि दवाओं के बारे मे उनको स्वयम ही इतना ग्यान था कि ये सब दवाये कितनी जहरीली किस्म की है, इसलिये इन minerals के लिये उन्होने यह विचार जरूर किया होगा कि ऐसे द्रव्यों को मानव उपयोग के लिये क्या तरकीब हो सकती है ?

यह उनकी सकारात्मक सोच का ही परिणाम निकला, जिसे Potentization के नाम से सभी जानते है / शुरू शुरू मे बहुत कम शक्ति की दवाओं का उपयोग किया गया था, ऐसा Organon के प्रथम सन्सकरण मे देखने में आता है /

बाद मे उच्च शक्ति और Organon के छठे सन्सकरण में ५० मिलिस्मल पोटेन्सी का हहनेमान द्वारा बताना , उनके सतत इनोवेशन का परिणाम है /

हहनेमान और होम्योपैथी को यदि समझना है तो हर होम्योपैथ को medicine of experiences लेख से लेकर Organon के सभी सन्सकर्णॊं को बहुत गम्भीरता के साथ पढना चाहिये और समझना चाहिये / इन सभी सनसकर्णों को पढते समय इस बात का तुलनातमक अध्ध्यन करना आवश्यक है कि हाहनेमान ने क्यों और किसलिये अपने ही लिखे पूर्व सिध्धन्तों को बदल दिया और इसकी क्या वजहें या कारण रहे ?

हाह्नेमान की Organon को सभी को इस कोण से देखना और पढना चाहिये कि उनके द्वारा किया गया शोध कार्य समय समय पर Innovate क्यों किया गया और इसके पीचे के क्या कारण हो सकते है ?

सही मायने में यदि हाह्नेमान को और होम्योपैथी की आत्मा को समझना है तो सबसे पहले हाहनेमान को समझना होगा /