महीना: जून 2011

स्वमूत्र चिकित्सा ; मेरा व्यक्तिगत और व्यावसायिक चिकित्सकीय अनुभव


लगभग चालीस साल पहले मुझे एक पुस्तक “स्वमूत्र चिकित्सा” पर लिखी हुयी पढने के लिये मिली , जो हिन्दी भाषा में थी और उसका प्रकाशन पान्कोर नाका, अहमदाबाद, गुजरात कि किसी सन्सथा द्वारा किया गया था, जो “नर मूत्र चिकित्सा” के प्रचार और प्रसार में लगी हुयी थी /

एक और पुस्तक मुझे पढने के लिये मिली जिसका शीर्षक The Water of Life था और यह किसी ब्रिटिश लेखक द्वारा लिखी गयी थी /

चिकित्सा विग्यान की कुछ magazines मे मैने मूत्र चिकित्सा के बारे में पढा था /

मेरे मन में स्वमूत्र पीकर इस पर experiment करना चाहिये, यह बात जोर पकडने लगी / बार बार जब दिन में कई समय हयी विचार जोर मारने लगा, तो मैने भी ठान लिया कि अब मै स्वमूत्र पीकर एक्स्पेरीमेन्ट जरूर करून्गा /

पेशाब जैसी गन्दी वस्तु, जिसे हम छूना भी नहीं पसन्द करते, उसे पीना तो बहुत मुश्किल काम था / मन मे कई बार विचार बदले , लेकिन अनुसन्धानात्मक स्वभाव एक्स्पेरीमेन्ट के लिये बार बार उसी स्थान पर खीन्च लाता / अन्त में एक दिन मैने दृढ निश्चय कर लिया कि मै अमुक दिन से पेशाब पीना शुरू करून्गा /

एक दिन सुबह मैने अपना पेशाब एक कान्च के गिलास में एकत्र किया / इस पेशाब में अपनी उन्गली डालकर उस पेशाब को अपने गालों में मला / फिर माथे मे लगाया /

दूसरे दिन सुबह अपने पेशाब को लेकर अपना मुह धोया / तीसरे दिन मैने अपने पेशाब से मुह धोया और एक चम्मच पेशाब को होठो पर लगाया और एक दो बून्द पेशाब जबान पर दाल ली / अगले दिन मैने एक कुल्ला पेहाब का किया और एक दो दिन बाद मै आधा कप अपना स्वमूत्र, ताज़ा पेशाब पी गया /

यद्यपि मुझे कोई बीमारी नहीं थी , जिसके लिये मुझे स्वमूत्र पीने की आकांछा थी / मै इसे एक्स्पेरीमेन्ट करके अनुभव और समझना चाहता था कि अपना स्वमूत्र पीने से होता क्या है और स्वास्थय बनाये रखने के लिये स्वमूत्र का शरीर पर क्या असर पड़ता है ?

 इसके अलावा स्वमूत्र का रोगों पर क्या असर होता है , इसका भी अनुभव करना था /

 मैने बाद में एक दिन पेशाब से कुल्ला करने के बाद  ३० मिली लीटर अपना स्वमूत्र पी लिया / इसके पहले मै कई बार “गो मूत्र” का सेवन कर चुका था / “गो मूत्र” का स्वाद और उसका अनुभव मुझे पता था / अपना स्वयम का “स्वमूत्र” पीने के बाद मुझे अपने मूत्र और गोमूत्र मे यह फर्क पता चला कि गोमूत्र का स्वाद, तरलता, गन्ध आदि में मानव मूत्र हल्का होता है, स्वाद में हल्का नमकीन तथा थोड़ा सा खारी होता है / जबकि तुलनात्मक रूप में गोमूत्र का स्वाद यूरिया से सन्युक्त जैसा, तरलता मे अधिक गाढा और पित्त युक्त कडुआ स्वाद होता है /

 पहली बार अपना मूत्र पीने के बाद मुझे कोई विशेष परेशानी नहीं हुयी / इसके बाद से मै रोजाना अपना मूत्र सुबह खाली पेट पीने लगा /

 यह सिल्सिला कई साल चला / जितने दिन मैने अपना स्वमूत्र पिया , उतने दिन तक मुझे सर्दी, जुखाम , बुखार जैसी तकलीफॆ बहुत कम  हुयी , अगर हुयी भी तो एक दो दिन में स्वमूत्र पीने से ही ठीक हो गयी / शरीर का  रन्ग बहुत खिल गया और मै अपनी वास्तबिक उम्र से १० या १५ साल छोटा नजर आने लगा /

 स्वमूत्र के इस अनुभव को लिखकर मैने कई प्रतिष्ठित समाचर पत्रों और मैगज़ीन्स मे लेख स्वरूप प्रकाशित कराया , जिसे पढकर बहुत से लोगों नें इस पर अनुभव प्राप्त किया / 

 मेरा अनुभव है कि जो भी स्वमूत्र का सेवन करना चाह्ते है , वे किसी स्वमूत्र चिकित्सा विशेषग्य की देखरेख में चिकित्सा व्यवस्था करें /

 आयुर्वेद में विभिन्न जानवरों और नरमूत्र के गुण और कर्म के , इनके उपयोग के बारे मे ” भाव प्रकाश ” ग्रन्थ में बहुत विस्तार से बताया गया है /

 

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A case of KIDNEY FAILURE ; treatment is given on the line of the findings of AYURVEDA and ETG AyurvedaScan ; Patient is improoving


Below is the trace record of a 20 yrs Muslim unmarried girl, who was declared KIDNEY FAILURE case and was left untreated by Modern western medical practitioners.

She is treating on the line of the findings of ETG AyurvedaScan and medicines are given totally Ayurvedic classical medicines. Her condition is improving day by day.

Observe the trace record, where LEFT KIDNEY is pathologically affected comperaively RIGHT KIDNEY. She have many other problems and for that simultaneous treatment is given for comprehensiveness, which is an Ayurvedic beuty of the treatment and management.

 

सफ़ेद दाग अथवा वीटीलिगो रोग पर इलेक्ट्रो त्रिदोष ग्राफी ; ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन की सहायता लेकर किये गये रोग निदान और रोग चिकित्सा सम्बन्धी अध्ध्यन के बारे में


सफ़ेद कुष्ठ की बीमारी कैसे कैसे शरीर के अन्दर पनपती है , यह नीचे दिये गये फ्लो चार्ट में बताया गया है /

हमारे सन्सथान KERI INDIA द्वारा सफ़ेद कुष्ठ के बारे में बहुत गहरायी के साथ अध्य्यन किया गया है /

इस अध्ध्यन मे यह पाया गया कि शरीर के अन्दर के कई वाइटल अन्गों और कई सिस्टम्स की कार्य विकृति यानी Pathophysiology और विकृति Pathology के कारण से होने वाले असामान्य असर से “श्वेत कुष्ठ” पैदा होता है /

ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन सिस्टम की सहायता से इस रोग के पैदा होने के एकाधिक कारणों को समझने और इन कारणों को एकीकृत करने का प्रयास किया गया है, जिसे अभी तक unexplained समझा जाता रहा है /

अध्ध्यन मे यह पाया गया कि VITILIGO के प्रत्येक रोगी मे उसके रोग से सम्बन्धित कुछ व्यक्तिगत विशेष बातें होती है, जो उसी तरह के दूसरे किसी अन्य रोगी में नही मिलती है / यह एक तरह का individualise peculiarism है जो दुसरे मरीज को अलग करता है / प्रत्येक रोगी का लिया गया डाटा भी अलग अलग होता है / महिला और पुरुष दोनों के डाटा में बहुत फर्क देखा जाता है / प्राप्त डाटा की Intensities में भी बहुत फर्क देखा गया है /

हर रोगी निदान के द्रस्टिकोण से और इस प्रकार चिकित्सा करने के लिहाज से कहीं न कहीं अलग होते है / यही कारण है कि जब रोगी के इन विशेष्ताओं को ध्यान मे रखकर औषधि का चुनाव और पथ्य परहेज का निर्धारन करते है, तो सफेद दाग अवश्य आरोग्य होते है /

नीचे दिये गये फ्लो चार्ट में यही बात समझने की कोशिश की गयी है /

निष्कर्ष; सफ़ेद दाग के रोगियों का ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन परीक्षण के उपरान्त प्राप्त डाटा से [पहला] यह पता लग जाता है कि मरीज के शरीर के कौन कौन से अन्गों में किस प्रकार की विकृति पाई गयी है और उनकी  Intensities कितनी है [दूसरा] Intensities  के हिसाब से उन विकृत अन्गों की  pathophysiology  को सामान्य लेवेल पर पुन: करने का प्रयास किया जाता है / जैसा कि आयुर्वेद में बताया गया है कि “शमन” चिकित्सा की आवश्यकता है या “बृन्हण” चिकित्सा का सहारा लेकर इलाज किया जाय /

Regarding studies on LEUCODERMA / VITILIGO with the help of Electro Tridosha Graphy ; ETG AyurvedaScan system


Below is the flow chart of the LEUCODERMA ANOMALY.

We have studied that LEUCODERMA disorder is happened due to impact of various other anomalies of the organ’s pathophysiology / pathophysiology and the anomalies of the other important body systems.

With the ETG AyurvedaScan system, we have tried to correlate the anomalies in view of comprehensiveness. We have oserved that in each and in every individual patient of VITILIGO / LEUCODERMA, there is some specific marked individual pathophysiological intensities present, which specify to segregate the other similar problem’s patient. Thus two similar problem’s patient have dissimilar intensities in their pathophysiological / pathological conditions. These conditions are most beneficial and helpful in the treatment , doses of Ayurvedic medicine, selection of appropriate and individual Ayurvedic drugs etc. That’s why we have got the best results not only in the treatment of LEUCODERMA / VITILIGO , but all along with the existing ailments treatment like Diebeties, Cardiac Disorders etc etc.

See below the FLOW CHART , how LEUCODERMA finally seen on skin.

सेल फोन Cell Phone के रेडिएशन से बचने का असान तरीका ;


जब से यह रिपोर्ट अखबारों मे छपी है कि सेल फोन के उपयोग से मस्तिष्क का कैन्सर पैदा होने की सम्भावना अधिक होती है, तबसे सेल फोन का उपयोग करने वालों को इस तरह के रेडियेशन के बचने के तौर तरीके सूझने लगे है /

कोई कुछ तरीका बताता है कोई कुछ, अब यह कितने सही है या सटीक है यह तो वही जाने, जिन्होने अनुभव किया है, लेकिन जैसा मेरे साथ होता रहा और उसका बचाव मैने कैसे किया , इसका जिक्र मै यहां कर रहा हूं /

मै सेल फोन का उप्योग करता हूं / पिछले कई सालों से इसका लगातार इस्तेमाल कर रहा हू / मुझे इसके रेडियेशन के बारे में तब पता चला, जब एक दिन मै अपने कम्प्य़ूटर के पास अपना मोबाइल रखकर सन्योग वश कम्प्यूटर पर कोई काम कर रहा था / इसी बीच में किसी मरीज का फोन आ गया / जैसे ही मोबाइल की घन्टी बजी , स्क्रीन पर झिलमिलाहट होने लगी / यह झिलमिलाहट मोबाइल की घन्टी के साथ साथ घट बढ रही थी / मैने इसे केवल मात्र देखा और बात आयी गयी हो गयी /

कुछ देर बाद मुझे इस बीत चुकी घटना का ध्यान आया , कि किस प्रकार मोबाइल की घन्टी के साथ कम्प्यूटर स्क्रीन झिल्मिला रही थी / मै समझ गया कि यह और कुछ नहीं , यह electro magnetic radiation है , जो signal और मोबाइल फोन के द्वारा पैदा हो रहा है, जिसे कम्प्य़ूटर का sensitive screen पकड़ लेता है और इस तरह झिल्मिलाहत पैदा होती है /

बात आयी गयी हो गयी, लेकिन यह प्रश्न छोड़ गयी कि मोबाइल के उपयोग से रेडियेशन होता अवश्य है चाहे उसकी intensity कम या अधिक हो /

पिछले साल २०१० के अक्टूबर माह मे मुझे एक विचित्र अनुभूति हुयी / जब मै कपडे उतारता था तो कपडे उतारते समय जब मेरा हाथ किसी धातु जैसे लोहा, स्टील, ताम्बा के करीब आता या छू जाता तो मेरे हाथ की उन्गली से एक spark यानी चिन्गारी सी निकलती और वह धातु मे चटाख जैसी आवाज से समा जाती / मुझे हल्का सा झटका लगता / पहले तो मै इसे हल्के में लेने लगा, लेकिन जब यह झटका अधिक जोर का लगने लगा, तब मैने विचार किया कि अब इसके लिये कुछ उपाय सोचना चाहिये /

जनवरी २०११ के मध्य में मुझे ध्यान आया कि अगर इस तरह के रेडियेशन से बचना है तो क्यों न एक छोटा सा COINE MAGNET यानी छोटे सिक्के के आकार का मैग्नेट पाकेट / जेब में रख लिया जाय और देखा जाय कि क्या होता है ?

मै मैग्नेट थेरापी के लिये अपने पास बड़े और छोटे सभी साइज के मैग्नेट रखता हू / मैने दो छोटे मैग्नेट अपनी पैन्ट की जेब में दाहिनी तरफ़ रखना शुरू किया / मै अपना मोबाइल फोन पैन्ट की बेल्ट में एक पाकेट पाउच में रखता हू जो बाज़ार मे मिल जाते है और इसी दाहिनी तरफ़ रखता हू जिस तरफ मै मैग्नेत रखता हू /

इस प्रयोग से तुरन्त ही झटके और चिन्गारी समाप्त हो गयी / अब मै पिछले पान्च / छह माह से लगातार अपनी पाकेट में coine shaped magnet अवश्य रखता हूं /

मेरा अनुभव है कि इस प्रयोग से electro magnetic exposure से शरीर का बचाव किया जा सकता है / ्मैग्नेट के अन्दर कुदर्ती गुण होते है जो मग्नेटिक एमीशन को पी लेते है /

यह बहुत सरल और सस्ता प्रयोग है मोबाइल अथवा अन्य सभी प्रकार के एलेक्ट्रो मैग्नेटिक रेडियेशन से बचाव करने का / आप सभी इसे आज्माइये /

सफ़ेद दाग LEUCODERMA बीमारी में बाहर से लगाने वाली दवायें यानी external aaplication से सफ़ेद दाग शरीर में ज्यादा तेजी से फैलने की tendency


सफ़ेद दाग की चिकित्सा करने वाले प्राय: सभी चिकित्सक , मरीज को सफ़ेद दागों के ऊपर औषधियुक्त तेल अथवा औषधियुक्त क्रीम लगाने के लिये देते हैं / यह तेल या क्रीम लगभग सभी चिकित्सा चिधियों में प्रचलित है / मरीज भी जैसा चिकित्सक बताते है , उसी तरह से तेल या क्रीम का उपयोग करता है / कुछ तेल लगाकर धूप में घन्टॊं बैठने के लिये कहते है, कुछ मालिश की तरह से तेल को रगड़ रगड़ कर लगाते है / जैसा चिकित्सक बताता है , वैसा ही मरीज करता है /


पिछले ४५ वर्षॊं से अधिक हो चुके हैं, मै सफेद दाग का इलाज सफ़लता पूर्वक करता चला आ रहा हूं, लेकिन मैने कभी भी किसी भी मरीज को external application की औषधि नहीं दी है /

मेरा External applications यानी त्वचा या सफ़ेद दागों पर बाहर से दवा न देने के पीछे का कारण यह है कि
इससे “Supprressive Disorders” पैदा हो जाते हैं /

इसलिये मेरा अनुभव यह है कि Leucoderma के मरीजों को कभी भी बाहर की दवा यानी external application का उपयोग नहीं करना चाहिये /

विटामिन की गोलियां खाने से कोई फायदा नहीं


यह हम नहीं कह रहे है, यह कह रहे है ब्रिटॆन के चिकित्सा शोध कर्ता / प्रकाशित खबर को पढ ले , आपको जानकारी हो जायेगी /

हम पहले भी कई बार कह चुके है कि विटामिन के अधिक उपयोग से शरीर मे “हाइपर विटमिनोसिस” की स्तिथि पैदा हो जाती है, जिसके परिणाम स्वरूप बहुत सी ऐसी बॊमारियां हो जाती है, जो बाद में असाध्य रोगॊ की श्रेणी में शुमार होने लगता है /

CELL PHONE ; electro-magnetic emission can be nulled by keeping COINE shaped small MAGNETS in pocket


I am keeping two small COINE shaped magnets in my pocket. The reason behind keeping the maganets was, that I was fearing about the electro-magnetic emission of the CELL PHONE, while in use. It happens to me daily , when I wear off my clothes after work, many times a spark liberate from my finger to any metallic substance in contact, with a shock / shot to my extremetiy. It happens several times to me.

I am working on the ELECTRICAL BEHAVIOUR OF THE HUMAN BODY and my subject is related with the electrical activities including development of the technology for scanning whole body electrically.

Sometimes the liberated spark was so powerful that it gave me a powerful shot to my hand, causing immediate shock.

This was the point, which tend me to findout the solution what to do ?

I practiced MAGNETO THERAPY previously and still today. I thought that I should keep one small coine shaped MAGNET in my pocket and I done. Later another one coine shaped smaal magnet, I keep in my pocket.

After keeping this coine shaped magnet in my pocket, the electrical spark is nulled and never happen again since last six months.

In my opinion, keeping a small magnet in pocket could be a solution of the electro-magnetic emission of the CELL PHONE. I think everybody should use this small device to prevent the body from emission.

External Application on LEUCODERMA WHITE PATCHES triggers more violent effects and boosts metastasis of WHITE PATCHES in other parts of body


External Application on LEUCODERMA WHITE PATCHES triggers more violent effects and boosts metastasis of WHITE PATCHES in other parts of body

Our observational study shows that external applications like anti-vitiligo creams and oils for use in the treatment of the LEUCODERMA / VITILIGO, which are instructed by phyrician to apply on the white patches, causes suppressive effects and as a result, the metastasis of the hypomelinosis migrates to the other parts of the body, where the expression of the white patches becomes more prominent and strong.

Many cases treated by the other physician, using external application, patient history reveals the fact that external application causes suppression and more white patches grown in other parts within few hours to few days time rapidly.

After invention of ELECTRO TRIDOSHA GRAPHY ; ETG AyurvedaScan technology, treatment of the bodily disorders are totlly dependent on the findings of the ETG report. The development of the idea of the treatment bases on the ETG findings was successful, when AYURVEDIC MEDICINES were selected on the ground of the measured intesnsity of the Organs / parts of the body including AYURVEDIC FUNDAMENTALS.

In many LEUCODERMA cases, we have not used any external application of any kind and the treatment procedure was lend on the report and findings of the ELECTRO TRIDOSHA GRAPHY ; ETG AyurvedaScan totally. The Internal medicine were given according to the obtained pathophysiological measured intensity of the VISCERAS and other parts. These medicines were AYURVEDIC classical preparation over all.

Our study concludes that when internal organs beomes slowly and gradually normal in their own physiological activities, the pathophysiology of the organs normalizes, and as a result , pigmentation channel becomes free from any inhibition and hurdles and thus abnormal function of the skin becomes normal. This way again melenin pigments the skin with the normal functioning.

In my opinion, while treating LEUCODERMA, no external application should be used, either in any form of Oil or in cream.