महीना: नवम्बर 2011

खान्सी और गले की खरास तथा श्वास नली की साधारण तकलीफें ; Mild problems of Internal Throat, Cough and Respiratory Tract


जाड़े के दिनों मे जब ठन्डक बढती है या घटती है तब सबसे पहले शुरुआत में गले की खरास, खान्सी और श्वास नली की दिक्कते पैदा हो जाती है / ऐसा इसलिये होता है क्योन्कि घर के अन्दर रहने में और घर के बाहर निकल कर आने में मौसम की हवा का प्रभाव शरीर के श्वसन सन्सथान को सबसे पहले प्रभावित करता है / कारण वही है , हवा के अन्दर समाहित ठन्डक का स्तर और शरीर की गर्मी से उसका ताल्मेल ठीक से न बैठ पाना / यह सीधे सीधे cold exposure की स्तिथि होती है / जैसे ही शरीर की conditioning होने का procedure शुरू होता है, वैसे ही दबी हुयी inflamatory condition precipitate होकर अपना inherent effects सतह पर ला देती है और इस स्तिथि में तकलीफ के लक्षण प्रकट हो जाते है / जिन्हे खान्सी, गले की खरास और श्वास नली से सम्बन्धित विकार समझा जाता है /

बेहतर यही है कि सभी लोग उस कहावत को हमेशा ध्यान मे रखे और वह है “Prevention is better than Cure” / थोडी सी सावधानी से सभी लोग बड़ी तकळीफें होने से बच सकते हैं /
इसलिये जब भी घर से बाहर निकलें शरीर को गर्म बनाये रखने वाले कपड़े चाक चौबन्द होना चाहिये / बहुत ठन्दी हवा में ज्यादा देर बाहर न रहें / मैने observe किया है कि जिनको Cervical spondylitis या रीढ की कोई तकलीफ होती है , उनको ठन्डक बहुत महसूस होती है और इसी कारण से उनका शरीर बहुत अकड़ता है और मान्शपेशियों मे तकलीफ पैदा हो जाती है / ऐसे लोगों को Cold air exposure बहुत जल्दी होता है /

जिन्हे खान्सी हो जाय वे आयुर्वेदिक औषधिया या घरेलू उपचार ले / खान्सी के लिये एक चम्मच अदरख का रस लेकर एक चम्मच शहद के साथ मिलाकर दिन में कई बार सेवन करना चाहिये / इसमे यदि आधा चम्मच हल्दी का चूर्ण मिला लें तो अधिक प्रभावकारी औषधि हो जाती है / गले की खरास और शवसन सन्सथान की तकलीपॊं में भी यही फार्मूला कामयाब है / लेकिन इसकी मात्रा अधिक कर लेनी चाहिये /

खान्पान मे परहेज करने और आयुर्वेदिक दवा खाने से ऊपर बतायी गयी तकलीफें एक ही दिन में
ही ठीक हो जाती हैं और आराम मिल जाती है / लेकिन यदि Cold exposure की intensity अधिक होगी तो ठीक होने में की दिन लग जाते है /

आयुर्वेदिक दवाये, जिन्हे खान्सी आदि तकलीफों में उपयोग कर सकते हैं /
१- त्रिभुवन कीर्ति रस
२- गोदन्ती रस
३- आनद भैरव रस
४- तालीशादि चूर्ण
५- सीतोपलादि चूर्ण
६- चित्रक हरीतकी
७- वासावलेह

आयुर्वेद में हजारों की सन्ख्या में खान्सी जैसी तकलीफों के लिये फार्मूले दिये गये है / उक्त दवाये किसी वैध या आयुर्वेद डाक्टर से जानकारी प्राप्त करके प्रयोग करे तो सबसे अच्छा होगा /

Advertisements

सेक्स शिक्षा व्याख्यान माला – दूसरा ; आयुर्वेद का “बाजॊकरण” अन्ग Lectures on Sex Education – part Second ; Astang of Ayurveda “BAJIKARAN”


मुझे कुछ बातों का पता चला कि आज कल के नौजवानों या नवयुवतियों को सही सही सेक्स या सेक्स से सम्बन्धित विषयों के बारे में जानकारी नही है / वे समझते हैं कि सम्भोग करना ही सेक्स है और इसके अलावा कुछ भी नहीं / वास्तविकता यह है कि इस विषय को समझाने की कोशिश भी नहीं कि गयी, जिसके कारण तरह तरह की भान्तियां मन के अन्दर बनती चली गयी / खुलकर भारतीय समाज में सेक्स की बाते करना सिवाय मित्र मन्डली या आपस के दोस्तों तक ही सीमित है / इसकी वजह यह है कि भारतीय समाज एक रूढिवादी समाज है, जहां इस अतरह की बातें करना वर्जित है /

हलांकि आयुर्वेद कहता है कि सेक्स के विषय और सेक्स की कलाओं का ग्यान प्रत्येक बयक्ति को होना चाहिये और इसी भावना के तहत आयुर्वेद के आठ अन्गों में एक अन्ग “बाजीकरण” को जोड़ा गया है जिसका मकसद सेक्स के कार्य कलापों से जुडा है / आयुर्वेद में “बाजीकरण” अध्याय जोड़ने के पीछे आयुर्वेद के मौलिक सिध्धान्त का चिन्तन जुड़े हुये है , आयुर्वेद के दर्शन शास्त्र को समझने के लिये “बाजीकरण” को समझना भी जरूरी है / इसके बारे में किसी अन्य पोस्ट में विस्तार से क्रम् वार चर्चा करने का प्रयास करून्गा /

खेद की बात है कि आयुर्वेद के इस पवित्र विषय को बहुत से लोगों ने व्यावसायिक सवरूप देकर आयुर्वेद चिकित्सा विग्यान को यह बताने का प्रयास किया है कि आयुर्वेद सेक्स का विग्यान है और जहां सेक्स के इलाज के अलाव दूसरा कुछ भी नहीं है / अफसोस और दु:ख और झोभ तब अधिक बढ जाता है जब यह बात समझदार लोग कहते है / मेरे कई आधुनिक चिकित्सा विग्यान के डाक्टर मित्रों ने जब यह बात कहीं तो मुझे बहुत खेद के साथ उनको बताना पड़ा कि ऐसा समझना बहुत बड़ी भूल है और उनको इस भूल का सुधार करना चाहिये /

वास्तविकता और जमीनी हकीकत यह है कि आयुर्वेद एक पूर्ण चिकित्सा विग्यान है / कमियां हर चिकित्सा विग्यान में हैं . चाहे वह जो भी हो / मैने जब चिकित्सा प्रक्टिस सन १९६८ में शुरू की थी उस समय मै “एलोपैथिक” की दवाओं का टोटल उप्योग करता था / यह सिलसिला कई साल चला / बाद में मै सन १९७३ में पश्चिम जरमनी के म्य़ूनिख शहर चला गया जहां मैने होम्योपैथी की शिक्षा पोस्ट ग्रेजुयट लेवेल की ग्रहण की / भारत लौटने के बाद मैने एलोपैथी की दवाओं के प्रयोग को त्याग दिया और होम्योपैथी की प्रक्टिस शुरू कर थी /

कई साल तक होम्योपैथी की प्रक्टिस करने के बाद जब मुझे पता चला कि आयुर्वेद के मौलिक सिध्धान्तों का आन्कलन evidence based presentation द्वारा किया जा सकता है तब मैने एलोपैथी और होम्योपैथी की दवाओं के साथ साथ आयुर्वेद की दवायें भी शामिल करके मरीजों के उपयोग के लिये व्यवहार करना शुरू कर दिया / फिर भी मुझे यह लगा कि चिकित्सा विग्यान में अभी भी बहुत सी कमियां हैं जिन्हे दूर करने के लिये मैने drugless therapies का उपयोग करना शुरू किया /बाद में ETG AyurvedaScan Technology द्वारा आयुर्वेद चिकित्सा विग्यान में तरह तरह के प्रयोग करने से मुझे ्विश्वास हो गया कि ऎट्घ तकनीक का सहारा लेकर यदि किसी भी रोग का इलाज करते है तो उसमें सफलता अवश्य मिलती है / ई०टी०जी० तकनीक का सहारा लेकर आयुर्वेद के आठ अन्गों का प्रारम्भिक आन्कलन करने से पता चला कि आयुर्वेद के सभी सिध्धन्तों के पीछे एक बहुत बड़ी लाजिक है जिसे समझना धीरे धीरे ही सम्भव है /

आज का आधुनिक सेक्स विग्यान और आयुर्वेद के बाजीकरंण अन्ग और आयुर्वेद के मूल सिध्धन्तों के बीच में बहुत सी समानतायें हैं , जिन्हे सेक्स के सम्बन्ध में जानना और समझना हर उस वयक्ति के लिये जरूरी है , जिन्हे सेक्स विग्यान को जान लेने की आकान्छा है /

सेक्स शिक्षा ग्यान माला – प्रथम विचार ; First lecture on Sex Education


बहुत से लोगों को कहते हुये सुना कि आजकल के नौजवानों को SEX के ग्यान के बारे मे अधिकृत जानकारी नही है / कुछ दशक पहले प्रधान मन्त्री श्री राजीव गान्धी ने सेक्स एजूकेशन के लिये अपने विचार प्रकट किये थे कि इसे स्कूलों में पढाया जाना चहिये / लेकिन इसका क्या स्वरूप हो यह तय न होने के कारण इसे लागू नही किया जा सका /

मै इस ब्लाग के माधयम से अपनी भरसक कोशिश करून्गा कि नवयुवकों और नवयुवतियों दोनों को सेक्स की शिक्षा के बारे मे कई स्तर का ग्यान इस तरह से देना चाहिये जिससे उनके मन के अन्दर सेक्स के प्रति व्याप्त धरणायें सही सही स्थान ले सकें / ऐसा मै अपनी नैतिक और चिकित्सकीय जिम्मेदारी समझते हुये समाज के भले के लिये कर रहा हूं / मुझे उम्मीद है कि इस लेखमाला के माध्यम से सेक्स के प्रति सभी को सही मार्ग दर्शन मिलेगा /

Sex को कैसे समझा जाना चाहिये ?

इस धरती पर यदि गहनता पूर्वक observe करें तो इस धरती पर पाये जाने वाले हर कण में , हर वस्तु में , धरती पर पाई जानेवाली हर चीज पर , एक तरह का आकर्षण मौजूद है / यह आकर्षण कुछ भी हो सकता है / चुम्बकीय आकर्षण अथवा विद्युतीय शक्तियां या सागर की लहरों का चन्द्रमा की बदलती कलाओं के साथ उछाल मार कर मौसम की अठखेलियां करना भी तो आकर्षण ही तो है , इसे और क्या कहेन्गे ?

पेड़ पौधे, पशु पक्षी, बड़े या छोटे जानवर, मनुष्य जाति के लिये सेक्स की भावना या सेक्स करना या नर और मादा का मिलना यही बताता है कि सभी के लिये सेक्स एक आवश्यकता है /

यह सेक्स की भावना की आवश्यकता का उद्देश्य इस धरती पर किस लिये है ? इसका एक मात्र उद्देश्य इस धरती को वीरान होने से बचाना है ? कैसे ? सेक्स नर और मादा के बीच होने वाला वह कार्य कलाप है जिससे आगे की generation बढे और उसके ही जैसा नया जीव या नई वनस्पति या नया पौधा या नया फूल जन्म ले / इस धरती की हर वस्तु का एक समय निर्धारित है , एक अवधि निर्धारित है, उतने समय तक वह जिन्दा रह सकता है, इसके बाद वह मृत हो जाता है / कल्पना करें कि कोई ऐसी खतरनाक बीमारी इस पृथ्वी पर फैल जाय जो केवल महिलाओं को ही हो या मादाओं को ही हो जिससे वे पूर्ण वयस्क होने से पहले ही इस दुनियां से विदा हो जायें, तो क्या होगा ? इस्का उत्तर यही है कि यह धरती १०० साल के अन्दर वीरान हो जायेगी / मनुष्य जाति के अलावा बहुत से पशु पक्षियों का नामो निशान मिट जायेगा / इससे क्या निष्कर्ष निकाला जाता है, यही न कि सेक्स की प्रथम जरूरत मानव या अन्य उन सभी चीजों का reproduction यानी बार बार और लगातार उत्पादन करना ताकि इस धरती के सारे कार्य कलाप जिन्दा रहे और बराबर सुचारु रूप से चलते रहे /

SPECIAL POST on BAL DIVAS ; बच्चों के रोगों का विवेचन ; About Infants and children problems


नवजात शिशु, बहुत छोटे बच्चों और एक वर्ष से लेकर बड़ी उम्र के बच्चों मे रोग उसी तरह के होते हैं जैसा कि बड़े लोगों में /

बच्चों के लिये रोग होने के तीन स्थान मुख्य रूप से होते है / पहला श्वास मार्ग अथवा श्वसन सन्स्थान में होने वाली तकलीफें यानी Respiratory Tract / route anomalies , दूसरा पाचन सन्स्थान से होने वाली तकलीफें यानी Digestive system anomalies और तीसरा त्वचा द्वारा प्रविष्ट विष जन्य दोष मुख्यतया होते हैं /

श्वास मार्ग बाहरी नाक से लेकर फेफडे के अन्दर तक जाता है / वास्तविकता यह है कि बिना स्वांस के कोई भी प्राणी जीवित नहीं रह सकता है / जैसे ही मनुष्य जन्म लेता है , बाहरी स्वांस का कार्य तब से शुरू हो जाता है और जीवन पर्यन्त बना रहता है / वायु का तापक्रम, वायु के अन्दर की अर्दता, वायु के अन्दर की गैसों का अनुपातिक मिश्रण और वायु के अन्दर मिल गये अन्य द्रव्य जैसे कार्बन के कण , किसी केमिकल की ड्स्ट इत्यादि के साथ दिन के बिभिन्न भाग यानी सुबह दोपहर शाम रात आठों प्रहर में वायु का मिजाज बदल जाने से और इस वायु को स्वांस के स्वरूप में फेफड़ों द्वारा सेवन करना नित्य का कार्य है / जाहिर है दूषित वायु के सेवन करने से श्वसन सन्सथान से सम्बन्धित तकलीफें बढने की सम्भावना हमेशा बनी रहती है / बच्चों में इसीलिये Spasmodic croup, Laryngitis, Pharyngitis, Tonsilitis, Throat Infection, Bronchitis आदि तकलीफें ज्न्म ले लेती हैं / जो कालान्तर में Asthama के रूप में परिवर्तित हो जाती है / इन्ही तकलीफों के कारण बच्चों को सर्दी और जुखाम तथा बुखार होने की शिकायत जल्दी जल्दी होती है /

दूसरा तकलीफ पैदा करने का रास्ता Digestive system है / बच्चों का गला जैसा कि ऊपर बता चुके हैं जब वायु तथा अन्य दोष मिलकर खराब करते हैं तब कालान्तर में गले मे Streptococcus और Staphilococcus के अलावा अन्य बैक्टीरिया पनपते हैं / ये बैक्टीरिया खाने के साथ साथ छोटी तथा बड़ी आन्त में प्रवेश करते है / लार घून्टने पानी पीने के साथ भी यह क्रम चलता रहता है / एक सीमा तक शरीर इन बैक्टीरिया की सन्खया को बर्दास्त करता जाता है क्योन्कि एक तरफ यह होता है कि आन्तों के अन्दर में व्याप्त बैकटीरिया जो भोजन पाचन में सहायता करते है,

उनकी सन्ख्या कम होती जाती है और गले के सन्क्रमण वाले बैक्टीरिया की सन्ख्या अधिक होती जाती है / इस कारण से रक्त दोष पैदा होकर बच्चों को कई तरह की बीमारियां हो जाती है जैसे डायरिया, कब्ज हो जाना, बुखार रहना, पाचन की कमजोरी, लीवर के रोग, चर्म रोग, मेनिन्जाइटिस, हृदय के वाल्वों की  बीमारियां आदि आदि रोग पैदा होने की सम्भावना बनी रहती है /

तीसरा कारण जैसा की ऊपर बताया गया है affection by SKIN ROUTE  यानी कि चर्म के द्वारा रोगों का शरीर में प्रवेश / इसमें बाहरी दुनिया में रहने वाले बहुत से वाइरस, बैक्टीरिया, पैरासाइट्स, फन्गस आदि शरीर को प्रभावित करते है /

बच्चे बहुत सम्वेदन्शील होते है और जल्दी ही मौसम से प्रभावित होते है इसीलिये उनको CARE करने की अधिक आवश्यकता होती है /  शुरूआत के कुछ महीने और कुछ साल बच्चों की केयर करने की बहुत जरूरत होती है /

आयुर्वेद की ” शास्त्रोक्त घून्टी ” नियमित रूप से देना बच्चों के लिये हितकारी है / इससे उनकी immunity  और शरीर की general health condition  सुधरती है / आयुर्वेद के “शास्त्रोक्त काजल ” का अन्खों मे नियमित प्रयोग करने से बच्चों की गले तथा नेजल साइनस की तकलीफों से छूटकारा मिल जाता है और यह तकलीफें बच्चों को जल्दी जल्दी नहीं होती है /

बहुत से लोगों ने यह ध्यान दिलाया है कि आधुनिक चिकित्सक बच्चों के परिजनों को “काजल” लगाने से मना करते है और आधुनिक चिकित्सक समाज यह कहता है कि बच्चों को काजल नहीं लगाना चाहिये / इस सम्बन्ध मे मैने बहुत खोज की है लेकिन यह आधार मुझे गलत लगा है / अभी तक विश्व के किसी भी देश में ऐसा कोई शोध कार्य नहीं हुआ है जिससे काजल के प्रभाव का किसी भी स्तर पर शोध किया गया हो / इसलिये यह धरणा कि बच्चों को काजल नही लगाना चाहिये , केवल मात्र काजल लगाने को लेकर एक मिथ्या प्रचार है /

” लिन्ग की समस्या ” ; ये आजकल के नौजवानों को क्या हो रहा है ? मुझे शक होता है कि नौजवान पीढी कहीं कुछ सालों में नपुन्सक न हो जाये ?


मुझसे आये दिन बहुत से अविवाहित पुरूष नवयुवक, जिनकी उमर 16 साल से लेकर 27 साल से अधिक तक है, कुछ प्रश्न पूछा करते हैं / ये प्रश्न ऐसे होते हैं, जिन्हे सुनकर मै बहुत विचलित हो जाता हूं / ऐसे सवाल पूछने वाले नौजवानों की सन्ख्या इतनी ज्यादा बढ गयी है कि मुझे यहां कुछ कहने की जरूरत पड़ गयी /

सवाल करने वाले नौजवानों का पहला प्रश्न यह है कि उनको अपने लिन्ग की लम्बाई और मोटाई की फिक्र सबसे ज्यादा हो गयी है / कोई कहता है कि उसका लिन्ग छॊटा है और इस वजह से वे अपने लिन्ग की लम्बाई बढाना चाहते हैं / कोई कहता है कि उसका लिन्ग पतला है और मॊटा करना चाहता है / कोई कुछ कहता है और कोई कुछ / हर नौजवान के अपने लिन्ग के स्वास्थय के बारे मे बहुत चिन्ता है /

कोई तो अपने लिन्ग के उत्थान और इस उत्थान के पतन की चिन्ता से परेशान है / कोई कहता है कि उसका वीर्य कम निकल रहा है और कोई वीर्य न बनने से परेशान हो रहा है / बड़ी अजीब विडम्बना है इन नवयुवकों के साथ में /

कोई कहता है कि सम्भोग करने को नही मिलता और कोई कह्ता है कि सम्भोग करने के प्रयास में उसका मुकदमा दाखिल होने से पहले ही खारिज हो जाता है /

कोई “मुठ्ठ” मारने या “मुठ्ठी” मारने या हस्त मैथुन करने मे अपने को बड़ी शान के साथ माहिर बताता है कि वह कितनी बार रोजाना अपने दोस्तों के साथ सामूहिक मुट्ठी मारो अभियान में हिस्सा लेता है /

सबके अजीबो-गरीब तर्क है / कोई कहता है कि बह चहता है कि उसका लिन्ग १२ इन्च और मोटाई ३ इन्च हो / गोया लिन्ग न हो गया कोई गाय बैल बान्धने का खूण्टा हो गया /

ये सब क्या हो रहा है आज कल के नौजवानों को / अगर यही हाल रहा तो अगले पचास सालों मे नपुन्सकों की भरमार हो जायेगी / इस स्तिथि को रोका जाना चाहिये /

मै ऐसे नौजवानों को सलाह देना चाहता हूं कि वे अपने पास के किसी चिकित्सक के पास जाकर अपनी समस्या बतायें , बिना किसी झिझक या शर्म के अपनी बात बतायें / आपका चिकित्सक आपको सही सलाह देगा /

कुछ ऐसे टी०वी० चैनल है, जैसे – डा० प्रताप चौहान का “सन्जीवनी” कार्यक्रम – या CARE TV का SEX से समबन्धित प्रोग्राम – इन दोनों चैनलों मे बहुत से experts आते है जो आप सबके लिये बहुत मेहनत और दिलचस्पी से विशेषग्यता पूर्ण सलाह देते है, पीडित नौजवानों को इन्की सेवाओं का लाभ उठाना चाहिये /

मेरा नौजवानों से आग्रह है कि वे किसी झोलाछाप या unqualified डाक्टर की सलाह से बचें / उनको अगर सलाह ही लेनी है तो पास के किसी QUALIFIED DOCTOR की सलाह लें /

जाड़े के दिनों अथवा ठन्डक के मौसम में बरतनी जाने वाली सावधानियां ; Winter Season’s precautions


प्राचीन काल से लेकर आज तक बदलते समय और समाज तथा व्याप्त रीति रिवाज तथा रहन सहन को लेकर भले ही जीवन शैली में परिवर्तन आने की बात सभी कर रहे हों लेकिन यह सच नहीं है / सत्य यह है कि हर शताब्दी में भारतीय जीवन शैली में परिवर्तन आते रहे हैं और भारतीय समाज ने अपने आपको उसी तरह की परिस्तिथियों में ढालने की कोशिश की , ऐसा ता्लमेल बैठाने की कोशिश की, जैसा वे चाहते थे / यह परिवर्तन का सिलसिला आज भी चल रहा है /

लेकिन मूल और जड़ की बात सभी लोगों नें एक जैसी ही पकड़ रखी है और वह है व्यक्तिगत / कोई भी व्यक्ति अपने आपको स्वस्थ्य रखने के लिये खुद ही अपने norms तय कर लेता है कि उसे कब क्या करना है ? कब क्या खाना है ? क्या खाना है और क्या नहीं खाना है आदि आदि / यह वह व्यक्ति स्वयम ही तय करता है कि किस समय उसे क्या करना चाहिये, इसलिये सब्के लिये एक जैसा नियम बना दिया जाये यह सम्भव नहीं है /

फिर भी कुछ बाते ऐसी हैं जिन्हे सबके लिये पालन कराना आवश्यक होता है और वह है मौसम में होने वाले बदलाव से बचने का /

ठन्डक यानी जाड़े के मौसम में क्या ऐसा करें जिससे शरीर को अस्वस्थता से बचाव कर सकें /

१- यह मौसम स्वास्थय के निर्माण के लिये सबसे अच्छा माना गया है / इसका कारण यह है कि इस मौसम में पाचन शक्ति बढ जाती है,जिससे खाया पिया हुआ जल्दी पच जाता है / इसलिये खाने पीने में कुछ अधिक खा पी सकते है और पौष्टिक पदार्थ ले सकते हैं /

२- जाड़े की रातें लम्बी होती हैं इसलिये रात का भोजन पचने के लिये अधिक समय मिल जाता है /

३- जिन्हे दूध मफिक आता हो, उनको सुबह नाश्ते में हलुवा, जलेबी, पाक, अवलेह, प्राश, लड्डू आदि पौष्टिक चीजें खाकर ऊपर से दूध पीना चाहिये / मान्साहारी खूब उबले अन्डे, अन्डे आमलेट तथा अन्डे के अन्य व्यन्जन ले सकते है /

४- जाडे के मौसम में खुले स्थान में व्यायाम करना लाभ प्रद है / जो व्यायाम नहीं कर सकते , उन्हे पैदल चलने का या टहलने का विचार करना चाहिये / खुले स्थान में बैठकर गहरी सान्स लेना फायदा पहुचाता है / जिन्हे सर्दी जल्दी लग जाती हो वे सावधान रहे / उन्हे व्यायाम इत्यादि सूर्योदय के पश्चात करना चाहिये जब आबहवा में थोड़ी गर्मी आ जाये /

५- सुबह शरीर में तेल चुपड़ना अथवा हल्की मालिश करना लाभ्दायक है /

६- इस मौसम में ऐसा खान पान अपनाना चाहिये जिससे शरीर में गर्मी बनी रहे / ठन्डे पेय पदार्थ शरीर की उष्मा को कम करते है जो फायदेमन्द नही है /

७- शरीर को ठन्ड से बचाने के लिये गर्म कपडे पहना चाहिये और मोजे तथा मफलर या टोपी से सिर ढका होना चहिये /

८- जिन लोगों को “सर्वाइकल स्पान्डिलाइटिस” सिर के रोग, सिर दर्द, मस्तिष्क के रोग, पैरालाइसिस, मास्पेशियों के रोग, रीढ की हड्डी के रोग, हृदय रोग आदि गम्भीर रोग हों उनको ठन्डक से बचने के लिये विषेश सावधानी रखनी चाहिये / ठन्डक ऐसे रोगियों के लिये खतरनाक साबित हो सकती है /

९- रात के समय , जब सोते हैं , तब शरीर की conditioning होती है, इसमें मान्स्पेशियों मे relax होने की प्रक्रिया में शरीर के सभी अन्ग प्रत्यन्ग हिस्सा लेते है जिससे बहुत से केमिकल परिवर्तन होते हैं / इसके लिये अबाधित ताप की आवश्यकता होती है / इस ताप को मेन्टेन करने के लिये रजाई अथवा कम्बल की जब भी आवश्यकता हो, उपयोग करें /

१०- अधिक ठन्डे पानी से स्नान करना शरीर को shocked कर सकता है / वैसे भी अधिक ठन्डे पानी से स्नान करना खतरनाक साबित हो सकता है / इसलिये स्नान करने के पानी को हलका गुनगुना कर लेना चाहिये ताकि शरीर को स्नान की सुखमय अनुभूति हो /

प्रकृति ने मनुष्यों को शीत रितु का वरदान शरीर को स्वस्थय बनाये रखने के लिये दिया है / इसका सभी को भरपूर उपयोग करना चाहिये /

हरिद्राखन्ड ; एलर्जी के सम्पूर्ण आरोग्य के लिये आयुर्वेद की उत्कृष्ट औषधि; Total cure for ALLERGY and similar condition ; “Haridrakhand” an Ayurvedic remedy


हरिद्राखन्ड आयुर्वेदिक योग का उपयोग शताब्दियों से allergy and allergic reactions के सभी प्रकारों में आयुर्वेद के चिकित्सक रोग मुक्त उपकारार्थ प्रयोग करते चले आ रहे है /

इस योग में हल्दी यानी Turmeric की प्रधानता होने के कारण इसका महत्व अधिक हो जाता है / जैसा कि सभी जानते है कि हल्दी कितनी उप्योगी और निर्दोष खाद्य पदार्थ तो है ही, यह औषधीय गुण युक्त होने के कारण चिकित्सा कार्य में भी प्रयोग की जाती है /

सिध्ध योग सन्ग्रह पुस्तक में प्रसिद्ध आयुर्वेद के चिकित्सक श्री यादव जी त्रिक्रम जी महाराज ने हरीद्रा खन्ड के शास्त्रोक्त पाठ में कुछ परिवर्तन करके इसे इस प्रकार प्रस्तुत किया है /

हल्दी, निशोथ, हरड़ ये सभी तीनों द्रव्य ४८० ग्राम / दारूहल्दी, नागर मोथा, अजवायन, अजमोद, चित्रक की जड़, कुटकी, जीरा सफेद, छोटी पीपल, सोंठ, छॊटी इलायची, दाल्चीनी, तेजपात, वायविडन्ग, गिलोय, अड़ूसा, कूठ, त्रिफला, चव्य, धनिया, लौह भस्म, अभ्रक भस्म, ये सभी द्रव्य १२ ग्राम प्रत्येक / शक्कर या मिश्री ४ किलो ८०० ग्राम /

बनाने का तरीका ;

स्टेप १- सबसे पहले सभी काष्ठौषधियों का महीन मैदा जैसा चूर्ण बना लें /
स्टेप २- इस चूर्ण में सभी दोनों भस्में अच्छी तरह से मिला दें /
स्टेप ३- शक्कर मे पानी मिलाकर इसे इतना पकायें , जब तक कि चार तार की चाशिनी बनने लगे /
स्टेप ४- जब शक्कर पककर चार तार की चाशिनी योग्य हो जाय तब उपरोक्त बनाये गये मिष्रण को इस चाशिनी में अच्छी तरह मिला दे , जैसे कि हलवाई बर्फी बनाने में प्रक्रिया अपनाते है /

स्टेप ५- इस अच्छी तरह बने हुये पदार्थ को बड़ी थाली में फैला दे और फिर बाद में इसके छोटे छोटे टुकड़े काट्कर किसी साफ सुथरे बर्तन में पैक कर्के रख लें /

यह अब दवा के उपयोग के लिये तैयार है

मात्रा और अनुपान ;

इसे तीन से ६ ग्राम तक दिन में तीन बार सुबह दोपहर और शाम गुनगुने जल के साथ दें / जिन्हें गुन गुना जल अच्छा नहीं लगता हो , वे room temperature पर रखे हुये पानी से ले सकते है / इसे रोगानुसार अनुपान के रूप में अथवा एकल औषधि के रूप में सेवन कर सकते है /

हरीद्रा खन्ड का रोगों में उपयोग ;

[१] जिन्हें ALLERGY का रोग हो और किसी भी तरह से न ठीक हो रही हो
[२] यह Eosinophillia इस्नोफीलिया की भी एक उत्कृष्ट औषध है, इसलिये जिन्हें बार बार इस्नोफीलिया होने की बीमारी हो और न ठीक हो रही हो वे इसे उपयोग कर सकते हैं / वैसे भी tropical eosinophilia में हल्दी की आरोग्यकारी शक्ति के उपयोग को स्वीकार किया जा चुका है /

इसे अन्य बीमारियों में भी उपयोग करते है और अन्य दूसरी औषधियों के साथ भी उपयोग करते हैं /

फिर भी हरीद्रा खन्ड का उप्योग करने के साथ साथ यदि अपने नजदीक के किसी आयुर्वेदिक चिकित्सक से सलाह लेकर औषधि का प्रयोग करें तो सर्वोत्तम होगा /