महीना: दिसम्बर 2011

फेफडे़ के कैन्सर के एक रोगी का ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन की फाइन्डिन्ग्स पर आधारित शास्त्रोक्त आयुर्वेदिक चिकित्सा से लाभ ; Cancer of Lungs ; A patient is treated on the base of the findings of ETG AyurvedaScan, get relieved with Classical Ayurveda treatment


फेफडे़ के कैन्सर से ग्रसित एक ७२ साल के रोगी का शास्त्रोक्त आयुर्वेदिक इलाज ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन आधारित फाइन्डिन्ग्स को लेकर किया गया /

इस रोगी का इलाज कानपुर के चिकित्सको द्वारा किया गया , लेकिन उसे आराम नहीं मिली / रोगी को अति कष्टदायक खान्सी , जिसे कुछ चिकित्सकों ने बताया कि ब्रान्काइटीस है कुछ ने कहा दमा या अस्थमा है, किसी ने कहा कि टी०बी० है / खून की जान्च, एक्स रे, अल्ट्रा साउन्ड से कुछ विशेष निदान नहीं हो पाया, न हीं रोगी को दी गयी एलोपैथी की दवाओं से कोई आराम मिली / एक चिकित्सक ने FNAC जान्च कारायी तब पता चला कि मरीज को फेफडे़ का कैन्सर हो गया है / एलोपैथी के चिकित्सक की दवा से लाभ न मिलता देखकर , मरीज आयुर्वेद की चिकित्सा कराने के लिये मेरी क्ळीनिक में आया /

मैने उसके सारे प्रेस्क्रिप्शन, जान्चे और एक्स रे आदि देखने के बाद कहा कि आपको एक ETG AyurvedaScan examination कराना पडे़गा , तभी पता चलेगा कि शरीर में क्या क्या दोष हैं और क्या क्या बीमारियों का स्वरूप है ?

मरीज जब पहली बार आया तो वह चल नहीं पा रहा था और उसे तीन लोग पकड़ कर क्ळीनिक में लाये थे / उसकी सान्स बहुत तेज चल रही थी और वह सान्स के तेज चलने के कारण बोल नहीं पा रहा था , उसे बलगम के साथ खून से सना हुआ कफ निकल रहा था / तेज खान्सी रुकने का नाम नहीं ले रही थी / मरीज बड़ा कमजोर था / उसकी इस दयनीय स्तिथि में मुझे उसका ई०टी०जी० परीक्षण करना पडा / इस रोगी की दशा देखकर मुझे उसकी पीड़ा की गहरायी का अन्दाजा हो रहा था /

परीक्षण के पश्चात फौरी तौर पर मैने उसको दवायें दी और उसे दूसरे दिन बुलाया ताकि उसका सुचारु रूप से इलाज ई०टी०जी० रिपोर्ट पर आधारित किया जा सके /

..[ बाकी अगली पोस्ट में ….शीघ्र ही….. to be loaded further material soon in future ]

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ठन्डक के दिनों में रात को सोते समय सावधानी बरतें


जाड़े के दिनों में रातें बहुत लम्बी होती है / दिन छोटे होते है और सुबह तथा शाम को ठन्ड होने लगना एक कुदरती स्तिथि है / मनव शरीर का बाहरी तापमान ९६.५ से लेकर ९८.५ तक होता है / मानव के अन्दर मरकज का तापमान १०२ डिग्री के आसपास होता है / यह शारीरिक गर्मी शरीर के अन्दर होने वाली मेटाबालिक गतिविधियों के कारण से होती है /

लगातार सर्दी लगते रहने से अन्दर का केन्द्रीय तापमान कम होने लगता है / शरीर के अन्दर के घटते ताप्मान के कारण शरीर का ताप्मान जब घटना शुरू होता है , तब हाइपोथरमिया की स्तिथि बनती है / हाइपोथर्मिया यानी सरीर का तापमान का घटना और घटते जाना होता है / शरीर के अन्दर और बाहर बहुत अधिक ठन्ड का अहसास होना , ऐसा लगना कि शरीर बर्फ जैसा ठन्डा हो रहा है, ऐसा महसूस होना जैसे बहुत ठन्डे पानी से स्नान कर रहे हों / हाथ पैरों के साथ साथ धड़ का बर्फ जैसा ठन्डा हो जाना आदि बातें सामने आती है /

इस तरह की स्तिथि में शरीर का Basic Metabolic Rate बिगड़ता है /

यह स्तिथि तब पैदा होती है, जब ऐसे वाहन से सफ़र कर रहे हों, जिनमें हवा बहुत तेज लग रही हो और शरीर को गर्म रखने के साधन न हों / ऐसी परिस्तिथि हो, जहां शरीर को गर्म रखने के कोई उपाय न हों और ठन्डक में कई घन्टॊं तक बैठना पडे या रात में सोना पडे़ / रात में सोते समय शरीर को गर्म रखने के लिये रजाई जैसे साधन न हों और रात भर ठिठुरना पडे़ /

ऐसे महौल में शरीर को सर्दी expose कर जाती है और हाइपोथरमिया की स्तिथि पैदा हो जाती है /

जिन लोगों को हृदय में रक्त का थक्का बनने की शिकायत हो अथवा Brain Stroke के मरीज हों , जिनको रक्त में थक्का बनने की शिकायत हो , ऐसे रोगी बहुत सावधान रहें / ठन्डक के exposure से उनकी तकलीफें बढ सकती है /

क्या करें ?

१- जहा सोने का स्थान हो , वह वायु के झोन्को से निर्वात हो /
२- सोते समय शरीर को गर्म रखने के लिये उपयुक्त रजाई, कम्बल, ऊनी वस्त्र आदि का इन्तजाम कर ले
३- शरीर को ठन्डक से बचाने के लिये शरीर को गर्म रखने वाले वस्त्रों का उपयोग करे /
४- ठन्डे पानी का उपयोग मत करें / पीने के लिये पानी में थोड़ा सा गर्म पानी मिला ले और तब पानी पियें /
५- अधिक ठन्डा पानी पीने से पेट का सामान्य तापमान कम होता है, जिससे अधिक ठन्डक का अनुभव होता है /
६- कमरे को गर्म बनाये रखने के लिये हीटर आदि का उपयोग करें /
७- ठन्डक लग जाने की स्तिथि में अपने दोनों पैर गरम और गुन्गुने पानी में १० मिनट तक रखे / यह काम बन्द कमरे में जहां हवा का झोन्का न आ रहा हो वहां करें, जिस समय पैर को गरम पानी में सेन्क के लिये रखें, उस समय शरीर को ऊनी शाल से ढक लें /
८- Cold Exposure की स्तिथि में अपने पारिवारिक चिकित्सक से सलाह लें और उचित उपचार लें /

देवानन्द सिने-स्टार ; जिनसे मै हमेशा उर्जा लेता रहा, आज भी ले रहा हूं और भविष्य में भी


फिल्म कलाकार देव आनन्द का मै हमेशा फैन रहा हूं / बचपन में जब मैने पहली फिल्म देखी थी , वह थी “नास्तिक” , जिसमें नालिनी जयवन्त हीरोइन थी / नलिनी जयवन्त का चेहरा और एक्टिन्ग मुझे पसन्द आयी / मै चोरी से फिल्म देखता था / कुछ हीरोइनें मुझे अच्छी लगती थी जैसे, नालिनी जयवन्त, श्यामा, निम्मी / हीरो उस समय मेरा कोई फेवरेट नहीं था / कारण यह था कि उस समय स्टन्ट फिल्में , जो मार धाड़ से भरपूर होती थी, उनके हीरो जैसे सोहराब मोदी, रन्जन, महिपाल, जयराज आदि अधिक जानदार लगते थे / एक बार एक स्टन्ट फिल्म देखने गया, तो टिकट नही मिली / इस कारण से एक दूसरे सिनेमाघर गया और यह वह फिल्म थी,जिसमें शीला रमानी हीरोइन थी और देव आनन्द हीरो / किशोरावस्था थी, इसलिये मार धाड़ वाली फिल्में मुझे और मेरे मित्रों को बहुत अच्छी लगती थी / जिस फिल्म में लड़ाई झगड़ा के सीन न हो, फाइटिन्ग न हो वह फिल्म देखना बेकार समझते थे / मै रोमान्टिक फिल्में कम देखता था, जिस मार धाड़ वाली फिल्म को देखने आये थे उसका टिकट नहीं मिला / घर वापस आना नहीं चाहते थे, लिहाजा साथ के मित्रों के आग्रह पर देवानन्द की फिल्म जिसमें शीला रमानी हीरोइन थी और हीरो देवानन्द थे, देखने के लिये राजी हो गया /

यह पहली रोमान्टिक फिल्म थी, जिसे मैने रुपहले पर्दे पर देखा / देव आनन्द मुझे आकर्षक हीरो लगे / फिर बाद में मैने उनकी फन्टूश फिल्म, जिसमें ऐ मेरी टॊपी पलट के आ, न अपने फन्टुश को सता और दुखी मन मेरे सुन मेरा कहना जैसे आकर्षक गाने थे, मुझे बहुत पसन्द आयी / देव आनन्द का खिलान्दड़ा अन्दाज और उनके शरीर के लटके झटके तथा एक्टिन्ग के अन्दाज को देखकर मै उनका मुरीद हो गया / फिर मैने उनकी लगभग सभी फिल्में देखीं /

मुझे सिने स्टारों मे केवल कुछ हीरो पसन्द आये / नम्बर एक पर तो देवानन्द ही है / इसका कारण यह रहा कि मुझे ऐसे लोग पसन्द हैं जो हमेशा गमगीन रहते हैं, हमेशा अपना दुखड़ा रोते रहते हैं, खुद तो हन्सते हसाते नहीं, जहां बैठते हैं , वहां का माहौल भी गमगीन बना देते है / मेरी आदत है कि मै उन लोगों के बीच बैठना कम पसन्द करता हूं , जो महौल में गमगीनी पैदा कर देते है / नम्बर दो पर मेरी पसन्द के हीरो हैं शम्मी कपूर और नम्बर तीन पर धर्मेन्द्र /

कुछ दशक पहले दिल्ली से प्रकाशित साप्ताहिक हिन्दुस्तान पत्रिका में देव आनन्द ने कई लेखों की एक सिरीज लिखी थी, प्रकाशित हुयी थी / इसमे उन्होने अपने मन की बात कहते हुये लिखा था, [१] कि वे पीछे मुड़्कर नहीं देखते कि क्या हो चुका है [२] कि आगे जो भी करने का विचार होता है , कोशिश करता हूं कि वह पहले से ज्यादा अच्छा हो [३] कि जब मै एक काम खत्म कर लेता हूं तो मै चुप्चाप नहीं बैठता और दूसरे काम की शुरुआत के लिये सपने देखने लगता हूं /

जब लेख मे मैने देवानन्द का लिखा यह पाठ पढा तो इससे मै बहुत inspire हुआ और बहुत प्रभावित भी / आज भी यह बातें मुझे याद आती हैं / उनके लटके झटके, उनकी चाल, उनकी अपनी गरदन बायीं तरफ झुकाकर और बायें हाथ को झटके के साथ बाहर फेंकने का एक्शन, उनकी चाल और चलते समय दोनों हाथों का सामने की तरफ लय बध्ध होकर एक खास अन्दाज में और खास एकशन मे चलना, उनका आन्खों द्वारा विभिन्न भावों का दरशाना और इसके साथ उनकी खास आवाज में डायलागों की डिलीवरी हमे सालों साल तक उनकी याद दिलाती रहेगी / सभी जानते है कि इस भौतिक सन्सार को छोड़कर सबको एक न एक दिन जाना है / ८८ साल की उमर कम नहीं होती / देव आनन्द भले ही इस दुनियां में न हों, लेकिन उनकी फिल्मी कृतियां , उनकी फिल्में उन्हे हमेशा जिन्दा बनाये रखेन्गी / जो भी देखेगा, वह उन्के अल्हड़्पन, मस्त मौला अन्दाज, इश्क करने की फर्माइश और जिन्दा दिली को कभी भी नहीं भूल पायेगा, देवानन्द जैसा कलाकार अब कभी भी फिर नहीं पैदा होगा /

हमे शोक न मनाकर इस बेहतरीन और बेमिसाल कलाकर को देवानन्द के इसी अल्हड़ पन के अन्दाज में अन्तिम विदाई देना चाहिये /