महीना: अप्रैल 2012

मलेरिया का आयुर्वेदिक उपचार ; Treatment of all kinds of MALERIAL FEVER by Ayurvedic Remedies



मलेरिया जिसे विषम ज्वर भी कहते है, सारे विश्व की एक ऐसी बीमारी है जो हर साल करोड़ॊं लोगो को प्रभावित करती है /

आयुर्वेद में इसे विषम ज्वर कहते है क्योंकि शास्त्रों में जितने भी लक्षण और पहचान चिन्ह इस बीमारी के बारे मे बताये गये हैं , निदान ग्यान के द्रूस्टिकोण सब इसी मलेरिया बीमारी की ओर ही इन्गित करते हैं / इस प्रकार से आयुर्वेद के बारे में यह कहा जा सकता है कि Maleria के बारे में आयुर्वेद के चिकित्सकों को ग्यान था और आयुर्वेद के चिकित्सक इस बीमारी का इलाज और उसका management करना जानते थे /

लगभग १०० साल से अधिक हो चुके है, उस समय ब्रिटिश सरकार की फौज मे काम करने वाले एक ब्रिटिश चिकित्सक ने हैदराबाद, भारत [अब] स्तिथि एक अस्पताल में काम करते हुये यह पता लगाया था कि मलेरिया बुखार मच्छरों के काटने से पैदा होता है, उसके बाद उन्होने और भी कई तथ्य इक्ठ्ठा किये और बाद मे की गई कई research में यह पाया गया कि मादा अनोफेलिक्स मच्छर के काटने से मलेरिया बुखार होता है /

ब्रिटिशर्स द्वारा की गयी मलेरिया के बारे मे जानकारी से पहले ऐसा समझा जाता है कि मलेरिया बुखार का इलाज आयुर्वेद के राज वैद्यों द्वारा तत्कालीन ब्रिटिश नागरिकों का किया जाता रहा होगा / क्योंकि आधुनिक चिकित्सा विग्यान के पास उस समय तक “क्वीनीन” के बारे में कोई जानकारी नही थी /

“क्वीनीन” के बारे मे कहा जाता कि एक बार पेरू देश के किसी शहर में कोई ब्रिटिश राज घराने की एक राज कुमारी दौरे पर गयी थी / वहीं उसे मलेरिया के बुखार का अटैक पड़ा / ब्रिटिश डाक्टर उसका इलाज कर रहे थे लेकिन कोई लाभ नही मिला / वहां के नागरिकों से मलेरिया बुखार के उपचार के बारे में पूछने पर पता चला कि वहां की एक जन जाति ऐसे बुखार के उपचार के लिये पहाड़ॊ पर होने वाली एक जड़ी का उपयोग करते हैं, जिससे मलेरिया ठीक हो जाता है /

ब्रिटिश डाक्टरों नें इस जड़ी को मन्गवाकर और जैसे वहां के लोगों ने इसके उपयोग का तरीका बताया , वैस्से ही इसका उपयोग राज कुमारी को कराया / कुछ दिनों के प्रयोग से बुखार ठीक हो गया और राज कुमारी को आरोग्य प्राप्ति हो गयी /

इस घटना के बाद चिकित्सकों का ध्यान इस जड़ी की तरफ गया और उन्हे तब पता चला कि इसका प्रोनान्सिएशन CHINCHONA “खिन्खोना” जैसा वहां के लोग करते है / बाद मे यह शब्द अपभ्रन्स होकर Cincona बन गया और बाद में Quinine कहा जाने लगा /

बहर्हाल बात करते हैं आयुर्वेद चिकित्सा की / आयुर्वेद में सप्त पर्ण और चिरायता और काल्मेघ और कूटकी और नीम जैसी मुख्य औषधियों के साथ सहायक द्रव्यों से बनी हुयी औषधियों के उपयोग से ्मलेरिया बुखार का इलाज सदियों से करते चले आ रहे है / आज भी कर रहे है और आगे भी होता रहेगा /

एक खास बात आयुर्वेद चिकित्सा में यह है कि मलेरिया कभी भी resistent नही होता, बल्कि जड़ मूल से नष्ट होता है और शरीर को कोई नुकसान नही होता /

जिन्हे मलेरिया का रोग हो वे सप्त पर्ण घन सत्व से बनी सप्त पर्ण बटी का सेवन करें / साथ में महा सुदरशन चूर्ण के घन्सत्व से बनी गोलॊ का उपयोग दिन में चार बार करें / मलेरिया अवश्य cure होगा / इस दवाओं के कोई भी साइड एफेक्ट नही हैं /

Ayurveda have many medicine to treat malarial fever in toto. Masters of Ayurveda formulated many remedies to meet out the various nature and sympatomatology available defferently in patients with their maagement.
A Solely chapter on JWAR is created by the Ayurvedicians wth the philosophy in background that at the time of birth and at the time of death humans have fever an in every disease condition the body fever fluctuates and therefore fever is an important place in view of the Ayurvedic treatment.

The classic book BHAV PRAKASH have a separate part specially compilled to FEVER, w2here every kind of fever is widely discussed with their treatment and management including MALARIA.

And at last those cases were not responded and mal treated wit the QUININE and quinine resisted cases are successfully treated and fully cured by Ayurveda treatment.

कमर दर्द अथवा Lumber region pain or Back ache ; Ayurvedic Homoeopathic treatment


Back ache तकलीफ देने वाला रोग है / अपने अध्ध्य्यन मे मैने observe किया है कि यह कई कारणों से होता है और जब तक कारण का निवारण नही हो जाता , यह बहुत मुश्किल से ठीक हो पाता है /

कमर दर्द के होने के बहुत से कारण होते हैं / लिन्ग के अनुसार इसके कारंण भी बहुत अजीबो गरीब से है /

पुरुषों में इसका कारण मुख्य रूप से कार्य विभाजन के साथ जुड़ा हुआ है / जैसे आजकल मोटर साइकिल या स्कूटर चलाने वाले लोगों को गलत posture के कारण नवयुवक इसके शिकार होते हैं / ऐसा होना मॊटर साइकिल चलाने और सड़्क की स्तिथि और स्पीड और उम्र और दूरी तथा बीच बीच में विश्राम कितना करते है , आदि आदि इन सभी फैक्टर्स पर आधारित होता है /  एयर कन्डीशनिन्ग के अन्दर काम करने वाले लोगों को ठन्डक की वजह से शरीर की काम करने वाली मेजर मान्श्पेशियां  अकड़्ती हैं / बैअठे बैठे काम करने से यह मान्श्पेशियां एक निश्चित movement  मे कार्य करने की आदी हो जाती हैं और यह एक लिमिट सेट हो जाती है / अचानक उठने बैठने से यह limit टूटती है इसलिये मान्श्पेशियों के टीश्यूज में अचानक बदलाव आ जाते हैं , जिससे दर्द होना शुरू हो जाता है / ऐसा बदलाव हल्के से लेकर अधिक गहरायी तक हो सकता है / जैसे superficial skin से मान्शपेशी और मान्शपेशी से लीगामेन्ट्स और टेन्डन्स  तक , फिर यहां से रीढ की हड्डियों को जोड़ने वाले अन्य अवयव तक affected हो जाते हैं /

ऐसा प्राय: विकृति या pathological phenomenon सभी तरह के कमर दर्द में होता है / दूसरे अन्य कारण भी है जैसे कमर के हिस्से में thrust या injury या किसी चीज या वस्तु से hit हो जाना या गिर जाना या कोई accident हो जाना , इनसे भी होता है और यह एक कारण है / कभी कभी बवासीर के रोगियों मे या भगन्दर के रोगियों में कमर का दर्द हो जाता है / कमर की मान्शपेशियों के सिकुड़ने के कारण यह तकलीफ हो जाती है /

महिलाओं में यह तकलीफ बहुधा देखी जाती है / ऐसा इसलिये है, क्योंकि महिलायें गर्भावस्था के समय में गर्भाशय में पल रहे और दिन प्रतिदिन भ्रूण के साइज के बढते रहने की वजह से पेट तथा spine तथा कमर की हड्डी यानी pelvis bone का आकार सामन्य  से अधिक होता है जिसके कारण इन अन्गों मे आवश्यकता से अधिक जोर पड़्ता है और आकार भी ब्ढ जाता है / बच्चा पैदा होने के बाद यह धीरे धीरे सामन्य अवस्था में आते है और मान्स्पेशियों का ढीलापन धीरे धीरे दूर होता है / अगर किसी कारण से यूटेरस या मासिक की कोई विकृत बची रह जाती है तो यह सब विकृति मिलकर PID पी०आई०डी० यानी Pelvic Inflammatory Disorders पैदा कर देते है / इस कारण से कमर में दर्द होने लगता है /

बृध्धावस्था में कमर का दर्द मान्स्पेशियों की कार्य क्षमता का कम हो जाने, मान्श्पेशियों में कुदरती सिकुड़न होने यानी contraction Tendency पैदा होने के कारण होती है  /

कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह है कि कमर का दर्द एक प्रकार की Musculo-skeletal problem है और इसे इसी सन्दर्भ में देखा जाना चाहिये /

आयुर्वेद में कमर दर्द का सही और सटीक और परिपूर्ण इलाज है / आयुर्वेद की औषधियां, management, पन्चकर्म की विधियां, पथ्य , परहेज, रहन सहन  और जीवन शैली में बदलाव आदि के धारण करने से कमर दर्द ठीक हो जाता है /

अगर ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन की सहायता लेकर रोग निदान और मौलिक सिद्धान्तों का आन्कलन करके इलाज किया जाय तो कमर दर्द मे शीघ्र फायदा होता है /

भगन्दर यानी Fistula ; Curable by Ayurvedic treatment


fistula

गुदा के मुकाम पर या रेक्टम के मुहाने  पर या near to ANUS wall के आस पास  यह बीमारी या तकलीफ होती है / सबसे पहले जब इस तकलीफ का आगाज होता है तो पाखाने के मुकाम पर पहले बड़ी खुजली होती है , जिसे खुजलाने में बड़ा मजा आता है और खुजलाने की न इच्छा होये हुये भी बार बार हाथ गुदा तक खुजलाने के लिये पहुच ही जाता है / कुछ दिन बाद इसी खुजली वाली जगह पर एक छोटी सी फुन्सी हो जाती है , जो पहले लाल हो जाती है फिर पकती है और पस से भरा हुआ एक छोटा सा बिन्दु बन जाता है / इसमे दर्द भी होता है, किसी किसी को दर्द नही होता है / अर्थात यह बिना दर्द के ्भी होता है , लेकिन ऐसा देखने में कम ही आता है /

दर्द के होने पर लोग उपचार लेते हैं और फिर लापरवाह हो जाते हैं , इसलिये यह छोटा सा घाव धीरे धीरे जगह बना हुआ गुदा के अन्दरूनी छोर तक जा पहुचता है और फिर तकलीफ देन शुरु करता है / कई बार यह देखा गया है कि जैसा इस  घाव का मिजाज बाहर से अन्दर के रुख की वजह से बनता है तो ठीक उल्टा यह गुदा से बाहर की तरफ भी बनता है  / लोग इस स्तिथि मे अक्सर भ्रम में पड़ जाते हैं और वे समझते हैं कि शायद गुदा में दर्द अन्दरूनी बवासीर के कारण हो रहा है , जबकि यह भगन्दर के घाव के कारण होता है /

बहर हाल भगन्दर का इलाज जैसे ही पता चले, शुरू कर देना चाहिये / आयुर्वेद का इलाज और Homoeopathy तथा प्राकृतिक उपचार इस तीनों के समन्वित चिकित्सा व्यवस्था से भगन्दर अवश्य ठीक हो जाते हैं / लेकिन इसके लिये चिकित्सक चाहे वह अकेला हो जिसे तीनों चिकित्सा विग्यान का अनुभव हो या यह न हो सके तो  तीनों चिकित्सा विधाओं के experts से तालमेल करके चिकित्सा व्यवस्था अगर करते हैं तो भगन्दर अवश्य ठीक हो जाता है /

Surgical intervention से भगन्दर ठीक भी होते हैं और नही भी / कई बार कुछ साल ठीक होने के बाद फिर दुबारा तकलीफ हो जाती है , इसलिये सरजरी कराने का निर्णय मरीज की अपनी इच्छा पर निर्भर है /

अगर ETG AyurvedaScan परीक्षण रिपोर्ट पर आधारित डाटा को लेकर “भगन्दर” का औषधि और अन्य तरीके को शामिल करके इलाज करते हैं  , तो अव्श्य फायदा होता है /

आयुर्वेद का क्षार सूत्र अथवा क्षार कर्म द्वारा भी भगन्दर का सटीक इलाज हो जाता है, इसके लिये किसी expert क्षार सूत्र चिकित्सक की सेवायें लेना चाहिये

पुराना जुखाम अथवा Chronic Coryza


नाक की होने वाली यह बहुत प्रसिद्द तकलीफ है / अक्सर जुखाम सभी प्राणियों के होते हैं, ऐसा कोई भी नही है जिसे जुखाम न होता हो / यह बहुत कामन तकलीफ है / आम्तौर पर जुखाम बिना दवा और केवल मात्र परहेज करने से ही ठीक हो जाते हैं और एक दिन से लेकर एक सप्ताह मे ज्यादा से इयादा समय लगता है इसे पूर्ण आरोग्य प्राप्त करने में / लेकिन जब जुखाम बार बार हो और जरा सी भ सर्दी या गरमी या मौसम के बदलाव से जुखाम होने लगे, दवा करते करते कई सपताह लग जायें और एक जुखाम ठीक न हो और उसी बीच में दूसर जुखाम पैदा हो जाये तो इसे बीमारी मानकर निदान करते  है /

बार बार जुखाम होना या एक जुखाम का होना न ठीक हो पाये और इसी बीच में दूसरा जुखाम हो जाये , दूसरा जुखाम भी इलाज करने के बाद जैसे ही ठीक होने की कगार पर आये कि तीसरा जुखाम का दौरा पड़ जाये और यह सिल्सिला चालू रहे तो इसे गम्भीर बीमारीसमझ कर इलाज करना जरूरी हो जाता है /

साल मे मौसम बदलने पर यदि जुखाम ओ तीन बार हो जाये तो इसे सामान्य स्वास्थ्य परिवर्ध्न की प्रक्रिया समझना चाहिए / लेकिन जब यह उग्र रूप ले , बार बार हो तो इसे बीमारी समझना चाहिये  और इसका इलाज बीमारी समझ कर करना चाहिये /

जुखाम सर्दि और गर्नी की प्रतिक्रिया स्वरूक हो जाते है , जैसे अचानक मौसम में परिवरतन, ठ्न्दे स्थान से एक्दम से गरम स्थान पर आ जाना आदि, समय कुसमय ठन्दे पानी से स्नान या नदी मे स्नान करना आदि , यह सबसे बडा कारण होता है /

बहुत पुराना जुखाम इन्फेक्श्न होने से या इन्फ़ेक्सन होने के असर से होता है / इसमे सबसे पहले koch’s infection या tubercular infection हो सकता है / कभी कभी गले के sterptococci या staphilococci के कारण भी हो सकता है / जब तक यह इन्फ़ेक्सन कम नही होता या जाता नही है, तब तक जुखाम ठीक नही होता और बाद मे यह पीनस और ज्यादा जटिल बीमारियों मे तब्दील हो जाता है /

ऐसे जुखाम दूसरी अन्य बीमारियां पैदा कर देते है / जिनमें टोन्सिल्लितिस, यूवेलाइटिस, tracheal, laryngeal, pharyngeal, respiratory tract inflammation और pulmonaru organs related ्बीमारियां शामिल हैं / जल्दी ही इलाज नही क्या गया तो गम्भीर न्बीमारियों की चपेट में आ सकते हैं /

पुराने जुखाम का इलाज अगर बहुत emergent condition है या बहुत complicated स्तिथि है तो कुछ दिन के लिये allopathic medicines  का कोर्स कर लेना चाहिये  जब स्तिथि सामन्य हो जाये तो फिर आयुर्वेद या होम्योपैथी या प्राकृतिक चिकित्सा या यूनानी का इलाज करना चाहिये, इससे जुखाम की तकलीफ धीरे धीरे सामान्य हो जाती है//

आयुर्वेद मे प्रकृति और दोष निर्धारण करके औषधियों का चुनाव करते हैं , जिसके लिये किसी वैद्य या आयुर्वेद चिकित्सक की सहायता लेना चाहिये / लेकिन कुछ सामन्य औषधियां है, जिन्हे सभी लोग उपयोग कर सकते हैं /

१- चित्रक हरीतकी

२- लक्षमी विलास रस नार्दीय

३- वासावल

४- अगस्त्य हरीतकी

५-स्तोपलादि चूर्ण

६- अभ्रक भस्म

सामय तौर पर उपरोक्त औषधियों का एकल प्रयोग या सामिलित प्रयोग रोग की अवस्था के अनुसार किया जाता है / इसे सुबह शाम शहद या सादे पानी या अन्य रोगोचित अनुपान के साथ सेवन कराते है /

आयुर्वेद की चिकित्सा से शत प्रतिशत पुराने और बिगड़े हुये जुखाम ठीक हो जाते हैं / अगर ETGAyurvedaScan का परीक्षण कराकर इलाज करायें तो शीघ्र आरोग्य प्राप्ति के लिये और बेहतर रिजल्ट मिलते हैं /

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खान्सी या कास अथवा Bronchitis / Cough / Bronchial problems


खान्सी यानी cough  yaa bronchitis ,  बहुत तकलीफ देने वाली बीमारी है / जब जुखाम या सर्दि लग जाती है या ठन्डा गरम मौसम में अचानक बदलाव आ जाय तो इसके impact  के कारण खान्सी की दिक्कत हो जाती है / लेकिन इसका मुख्य pathophysiological  कारण यह है कि नाक की श्लैष्मिक कला से लेकर लैरिन्ग्स और  फैरिन्ग्स , ट्रैकिया आदि बनावटे कि mucous surface और mucous secretion  करने वाली  glands  मे किसी कारण से inflammation पैदा हो जाता है या यह स्थान सेन्सिटिव हो जाते हैं तो इसके रियक्शन में खान्सी पैदा हो जाती है / क्योन्कि इस हिस्सों की म्यूकस बाहर निकालने के लिये इस स्थान की मान्स्पेशियां आटो नामिक नर्वस सिस्टम की सहायता लेकर तेज झटका पैदा करती है जिससे प्रतिक्रिया स्वरूप कफ बाहर निकलता है और गले की नली साफ होकर सामन्य कार्य करने की अवस्था में आ जाती है /

सर्दी गर्मी से होने वाली खान्सी ज्यादा से ज्यादा १५ दिन में ठीक हो जाती है /  लेकिन कुछ खान्सी ऐसी होती है जो या तो किसी बीमारी के कारण पैदा हो जाती है, जैसे tubercular infection अथवा koch’ infection अथवा lIvar की किसी बीमारी से या कोई अन्य तकलीफ जैसे महिलाओं में यूटेरस की कोई बीमारी / गले में Vocal cord की कोई बीमारी  पैदा हो रही हो तो भी खान्सी आती है / पुराना जुखाम जब बस जाता है और जाने का नाम नही लेता तब बहुत तेज खान्सी आती है /

कई बार गले की टान्सिल बढ जाने से अथवा UVULA  अधिक लम्बा हो जाने से भी बहुत खान्सी आती है /

कई बार मरीजों की खान्सी का कोई कारण समझ में नही आया, ऐसे मरीज सभी परीक्शण करा चुके थे

/ सभी कुछ सामान्य निकला /

इसलिये खान्सी की चिकित्सा शुरू करने से  सबसे पहले “कारण का पता ” करना बहुत जरूरी है / जब कारण का पता चल जाय तब चिकित्सा करने से बहुत शीघ्र लाभ होता है /

आयुर्वेदमें खान्सी  bronchitis  के उपचार के लिये औषधियों का बहुत विशाल भन्दार है /

वासवलेह, चित्रक हरीतकी, कन्ट्कार्यावलेह, अस्त्य हरीतकी,  कास कुठार रस, रूदन्ती चूर्ण, अभ्रक भस्म आदि दवओं के उपयोग से चाहे जैसी खान्सी हो और किसी भी सीमा की हो, सभी ठीक होती है /

दुर्दम खान्सी और असाध्य खान्सी या वह खान्सी जो लाइलाज    समझ ली गयी हो, ऐसी खान्सी     का इलाज यदि ETG AyurvedaScan आधारित रिपोर्ट का साहार लेकर चिकित्सा ग्रहण करते हैं तो अवश्य लाभ होता है /

चक्कर आने की बीमारी या सिर घूमने की तकलीफ ; Vertigo and Giddiness problems


चक्कर आना या सिर घूमना या आन्खों के आगे गोल गोल घूमती हुयी दिखाई देने वाली स्तिथि को चक्कर आना या vertigo कहते है /

यह बहुत परेशान करने वाली और चिन्तित करने वाली और घबराहट पैदा करने वाली तकलीफ है / कब कहां चक्कर आ जाये सिर घूमने लगे यह किसी को भी पता नहीं होता /

आयुर्वेद में इसे “भ्रम” कहते हैं   /  अन्ग्रेजी में Vertigo /  Giddiness  कहते है /

इस बीमारी के कारणों में बहुत से फैक्टर हैं जिनमें सबसे पहला और आम तौर पर पाया जाने वाला कारण “सर्वाइकल स्पान्डिलाइटिस” का है / गर्दन की कशेरुपाओ अथवा cervicak vertebra  या cervical region  मे बनावट में कोई दिक्कत पैदा हो जाये जैसे वर्टिब्रा में ओस्टियोफाइटिक बदलाव आ जायें या वर्टेब्रा की बीच का गैप कम हो जाये और हद्दियां एक दूसरे से रगड़ने लगे या इन्हे जोड़नेवाली बनावटें यथा तेन्डन, लीगामेन्ट्स आदि कड़े पद जायेम अथवा गर्दन की कोई नस दब रही हो या सुजन आ गयी हो तो चक्कर आने लगते है /

एक दूसरा कारण यह भी है कि अगर खून की कमी होती है तो भी चक्कर आने लगते है लेकि यह हमेशा उठते बैठते होता है /

आन्खों के द्रष्टि दोष के करण भी चक्कर आते है / इसी तरह कान के अन्दर घाव होना ्कान बहना या नाक के अन्दर गोश्त का बढ जाना या जैसे सायनुसाइटिस हो जाय , के कारण भी चक्कर आने लगते है /

मस्तिष्कगत बहुत सी तकलीफे होती है उनके कारण भी चक्कर आने लगते है / हृदय के कई रोगों में भी चक्कर आने लगते है / अगर  मष्तिष्क मे रक्र या खून की मात्रा कम पहुचती तो भी चक्कर आने लगते है / गुर्दे की कुछ तकलीफों में चक्कर आने लगते है / अत्यधिक वीर्य्पात या हस्त्मैथुन करने या अत्यधिक सम्भोग करने से भी चक्कर आने लगते है / शराब का नशा, भान्ग का नशा, कई अन्य नशा करने या तम्बाकू का अधिक सेवन करने से भी चक्कर आते है / किसी कारण से खून की आक्सीजन कम होने लगे तो भी चक्कर आने लगते है /  ब्लड्प्रेशर कम हो जाये तो भी चक्कर आते है और ब्लड्प्रेशर ज्यादा हो जाये तो भी चक्कर आते है / नजर की गड़्बड़ी से भी चक्कर आते है हारमोनल प्रक्रिया मे कोई गद़्बड़ी हो ति उसके प्रभाव से भी चक्कर आ जाते है / रात मे जगने से भी चक्कर आ जाते है /

कहने का मतलब यह कि चक्कर आने का सबसे पहले कारण समझना होगा / जब तक कारण नहि समझेन्गे , तब तक चक्कर का कोई सटीक इलाज नही हो पायेगा , केवल लाक्षणिक इलाज करने से कोई आराम नहि होगा / इसलिये पहले कारण का निवारण करना बहुत जरूर है /

आयुर्वेद की जड़ी “जवासा” का काढा शहद मिलाकर दिन मे दो बार पीने से सभी प्रकार के चक्कर ठीक होते है / लेकिन मुकम्मल इलाज के लिये आयुर्वेदिक चिकित्सक की सलाह लेना चाहिये / चक्कर आना अपने आप मे ब्मारी नही मानी जाती यह किसी दूसरी बीमारी का expression  है , जिसे मूल रूप से उपचार करक ठीक करना चाहिये /

बीमारी के मूल कारण को दूर कर देने या मूल बीमारी का इलाज / उपचार  कर देने से  चक्कर आने की तकलीफ जड़ मूल से समाप्त हो जाती है /

दिल की धड़कन के घटने और बढने की बीमारी ; Tachycardia and Bradycardia


अन्गरेजी मे Rapid Puls और Low Puls rate तथा  मेडिकल साइन्स में Tachycardia and Bradycardia जैसे शब्द नब्ज की गति को पहचानने के लिये उपयोग करते है /

लाखों की सन्ख्या में रिकार्ड किये गये ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन के परीक्षण करते समय यह आदत पड़ गयी है कि जैसे ही पहली ट्रेस रिकार्ड होती है , मरीज के बारे में काफी कुछ समझ में आ जाता है कि इसे क्या बीमारी है ? सबसे पहले आबजर्वेशन में यह बात आती है कि इसकी धड़कन प्रति मिनट कितनी है और इसकी रिदम कैसी है/ धड़कन के कम होने से यानी ६० धड़कन से कम बीट होने पर यह मान लिया जाता है कि इस व्यक्ति को ध्ड़कन कम होने की tendency  है अथवा ८५ से अधिक धड़्कन होने पर यह अन्दाजा लग जाता है कि इसे  धड़्कन अधिक होने की Tendency है /  इसके साथ रिदम यानी नाड़ी की चाल अगर घटती बढ़ती है तो इसका मतलब यह होता है कि इसे electrolytic imbalances  की प्रोब्लेम्स है /

आयुर्वेद की निदान ग्यान की इस मेकेनिकल तकनीक से इस पहली ट्रेस के रिकार्ड से ही प्रारम्भिक तौर पर मरीज के बारे मे बहुत कुछ पता चल जाता है , जैसे कि वात पित्त कफ की उपस्तिथि और शरीर में मौजूद intensity की सप्त धातुओं की स्तिथि और आयुर्वेद के मौलिक सिध्धन्तों से जुड़ी बहुत सी जानकारियां /

हलान्कि पूरे निदान ग्यान और इलाज के लिये ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन की पूरी रिपोर्ट बहुत जरूरी है, लेकिन emergent condition मे तुरत फुरत चिकित्सा व्यवस्था के लिये प्रारम्भिक इलाज और केस के मैनेज्मेन्ट के लिये पहली ट्रेस से ही इलाज कन्फर्म करके Ayurvedic Emergency Treatment with management की व्यवस्था शुरू कर सकते हैं /

कम धड़कन में और अधिक धड़कन में जवाहर मोहरा, याकूती और योगेन्द्र रस का उपयोग महत्व पूर्ण है, emergent condition में इसके एक या दो खुराक खिलाने से मरीज की स्तिथि सम्भल जाती है और सामान्य होने लगता है / साथ साथ यदि रिपोर्ट पर आधारित इलाज करते हैं तो शीघ्र लाभ होता है /

ऊपरोक्त बतायी गयी औषधियों में electrolytic imbalance को सुधारने के लिये बहुत कीमती दवाओं का उपयोग किया जाता है, जिससे सोडियम, पोटैसियम, कैल्सियम, आयरन, मैग्नेसियम, सेलेनियम, फास्फेट्स आदि की पूर्ति हो जाती है जिससे दिल की धड़कन कम या अधिक होने वाले फिजियोलाजिकल फेनामेनान को सामान्य स्तर पर ला देती है / इसी स्तर पर आकर मरीज अपने को स्वस्थय समझने लगता है और उसका Basic Metabolic rate भी सुधर जाता है /

नक्स वोमिका ; होम्योपैथी की मशहूर दवा ; Homoeopathic popular medicine “NUX VOMICA”


मेरे पिता जी स्व० वैद्य शीतला सहांय बाजपेयी आयुर्वेद चिकित्सा के साथ साथ होम्योपैथी की भी चिकित्सा करते थे / आयुर्वेद उन्होने बनारस में रहकर पढा था और होम्योपैथी कलकत्ता में रहकर / बाद में वह बन्गाल मे ही “मैमन सिन्घ” शहर में बस गये और वहीं अपनी रोजी रोटी का जुगाड़ करते रहे / पद्मा नदी के एक छोर की तरफ “मैमन सिन्घ” शहर था तो दूसरी छोर की तरफ “कनाई घाट” बसा था / कुछ दिनों बाद पिता जी कनाई घाट मे आकर बस गये और यहीं पर जगह लेकर खेती बाड़ी कराने लगे, साथ साथ होम्योपैथी और आयुर्वेद की चिकित्सा भी करने लगे / मेरे सभी भाई और बहनों का जन्म यहीं हुआ / कालान्तर में जब पाकिस्तान बना तब कनाई घाट का यह इलाका पाकिस्तान चला गया / मेरे पिता जी सब कुछ छोड़्कर वापस कलकत्ता आ गये और कुछ समय वहां रहने के बाद मे अपने native place उन्नाव , उत्तर प्रदेश मे आ गये / जहां उन्होने दुबारा अपना चिकित्सा कार्य करना शुरू किया / कुछ साल बाद कानपुर आकर बस गये /

हम बचपन से उनको मरीज देखते चले आ रहे थे / वे मरीज का हाल सुनने के बाद कहते कि आपकी बीमारी का बढिया इलाज आयुर्वेद मे है या वे कहते कि आपकी बीमारी का इलाज होम्योपैथी में है / यह ५० का दशक का जमाना था / उन दिनों होम्योपैथी को बहुत कम लोग जानते और समझते थे /

मेरे पिता जी एक उक्ति होम्योपैथी की दवा के सेलेक्शन के बावत हमेशा कहा करते थे कि if you do not know, what is to give, give NUX VOMICA, यानी कि मरीज को देखकर या मरीज की तकलीफ को समझ्कर आपकी यानी चिकित्सक अथवा डाक्टर को समझ में यह नही आता कि इसे कौन सी दवा दी जाय , तो ऐसी परिस्तिथि में नक्स वोमिका का चुनाव करके ३० पोटेन्सी में दे देना चाहिये /

बड़े बड़े होम्योपैथी के चिकित्सकों का यह स्वीकार करना है कि Nux Vomica द्वारा सभी बीमारियों का उपचार किया जा सकता है / ऐसी कोई भी बीमारी हो जिसका कुछ सिर पैर समझ में ना आये तो नक्स वोमिका देना चाहिये / चाहे वह बुखार हो, चाहे वह डायरिया, चाहे वह आन्त या फेफ्ड़ों से सम्बन्धित या दिल या दिमाग से सम्बन्धित तकलीफ हो , नक्स वोमिका का उपयोग सभी स्तिथियों में कर सकते है /

आखिर यह है क्या चीज ? आपने आयुर्वेद्द में “भिलावा” यानी Poison Nut  का नाम सुना होगा / आज भी ग्रामीण क्षेत्र के कपडे धोने वाले धोबी यानी washer man  इसी भिलावा के जूस का उपयोग कपड़ॊ पर निशान या पहचान के लिये लगाते हैं / इसका लगाया निशान इतना पक्का होता है कि यह उबालने या किसी भी साबुन से धुलता नहीं और जैसे को तैसा बना रहता है / एक और खास बात यह है कि अगर इसका रस जो एक तैलीय पदार्थ जैसा होता है , कहीं शरीर की त्वचा में लग जाय तो यह वहां फफोले पैदा कर देता है / इसे उबालते समय अग्र इसकी भाप शरीर की त्वचा पर लग जाय तो वहां पर पानी भरे छाले पैदा हो जाते हैं /

Homoeopathic Materia Medica मे नक्स वोमिका के कई हजार लक्षण दिये गये हैं / इन लक्षणो को पढ़्कर ऐसा लगता है कि शायद ही शरीर का कोई हिस्सा बचा हो, जहां इसका असर न होता हो /

भागम भाग जिदगी को बिताने वाले लोग, दारू पीने वाले लोग, स्त्रियों के साथ रोजाना रात बिताने वाले लोग, खून खराबा करने मे विश्वास करने वाले लोग, अत्यधिक सम्भोग करने वाले लोग, जो खाम खाह बिला वजह जलते भुनते रहते है, अत्यधिक गुस्सा दिखाते है, बेईमानी, लुच्चे, दगाबज, लफन्गों, झूठे, फरेबी, चार सौ बीसिया और चटपटा मसालेदार भोजन करने वाले लोगों , अनियमित दिन्चर्या और रात्रि चर्या वाले लोग, रात में जगने वालों और दिन में सोने वालों को कोई भी बीमारी हो जाय, उसका कोई भी नाम हो, उनको Nux Vomica अमृत के समान हितकारी होती है /

ऐसे लोगों को Nux Vomica 200 potency की एक खुराक रोजाना शाम को या रात को सोने से पहले सेवन करना चाहिये / हलाकि इसके साथ बीमारी के हिसाब से परहेज करना भी जरूरी है /

 

मिर्गी यानी Epilepsy या अपस्मार या दौरा पड़ना


Epilepsy या अपस्मार के रोगियों की बीमारी हो जाने की कोई उम्र की सीमा नही होती / यह किसी भी उम्र के लोगों को हो सकती है / इस बीमारी के होने की वजह या कारण बहुत से होते हैं जिन्हे किसी सीमा मे नही बान्धा जा सकता है / ज्यादा उम्र के लोगों को अगर यह तकलीफ है तो उन्हे आटो नर्वस सिस्टम या दिमाग या रीढ की हड्डी से सम्बन्धित बीमारियों की वजह से ऐसे दौरे पड़ सकते हैं / बीच की उमर वालों को भी कमी वेशी मानसिक तनाव, अत्यधिक मानसिक श्रम, शराब का अधिक उपयोग, नशे का आदी होना और नशा न मिलने के कारण प्रतिक्रिया स्वरूप दौरा पड़ जाना आदि बहुत से कारण होते हैं /

उम्र के हिसाब से देखा गया है कि जिन छोटी आयु वाले बच्चों को यह बीमारी होती है , उनमे अधिकान्शत: कृमि रोग की बीमारी पायी जाती है / बड़ी उम्र के किशोरॊं में यह बीमारी उनको होती है जो या तो हस्त मैथुन करते हैं या जो अपने वीर्य को ब्रम्हचर्य द्वारा सुरक्षित नही रख पाते / यह उन किशोरों को भी होती है जिन्हे तम्बाकू खाने या कोई नशा करने की आदत पड़ जाती है / बहुत से किशोरों को रात में जागने या अधिक पढने या अत्यधिक मानसिक श्रम के कारण यह दिक्कत आ जाती है / कई दिन तक न सोने के कारण या रात रात भर जगने और पूरी नींद न लेने और मष्तिष्क से अधिक कार्य करने के कारण भी यह बीमारी हो जाती है / रक्त की कमी से भी दौरा पड़्ने की सम्भवना बनी रहती है / सोडियम या पोटेशियम का blood में imbalance होने से भी यह बीमारी हो जाती है /

अत्यधिक मानसिक परिश्रम करने से भी दौरा पड़ जाता है / यह उन विद्यार्थियों को अधिक सताता है जो रात रात भर पढायी करते हैं और निद्रा बहुत कम लेते हैं /

कुछ बीमारियां ऐसी होती हैं , जिनके प्रभाव से या असर से मिर्गी का दौरा पड़ जाता है / एक बार दौरा पड़ जाने पर फिर यह शरीर का झुकाव या tendency बन जाती है / यह tendency जब एक बार स्थापित हो जाती है तो शरीर इसे बार बार repeat करता है / यही कारण है कि similar circumsatances और similar intensities का जैसे ही तालमेल बनता है , वैसे ही मिर्गी का दौरा पड़ जाता है /

मिर्गी कोई लाइलाज बीमारी नही है / यह ठीक हो जाती है / लेकिन परहेज करने की जरूरत अवश्य होती है / मिर्गी का जैसे ही पहला दौरा पड़े , इसका इलाज शुरू कर देना चाहिये / इलाज करना अथवा कराना व्यक्ति और मरीज के परिजनों के ऊपर निर्भर करता है /

मिर्गी का कोई मुकम्मल इलाज आधुनिक चिकित्सा विग्यान मे नही है / हां, एलोपैथी की दवा खाने से दौरा रुक जाता है अथवा कम हो जाता है और कभी कभी ठीक भी हो जाता है / दवायें लगातार खानी पड़ती है और एक दिन दवा न खाने से मिर्गी का दौरा पड़ जाता है /

आयुर्वेद में मिर्गी का इलाज करने के लिये आयुर्वेद के चिकित्सक की योग्यता और उसके अनुभव के ऊपर सारी चिकित्सा का दारोमदार आश्रित और आधारित होता है / आयुर्वेद की आधुनिक जान्च इलेक्ट्रो
त्रिदोष ग्राफी ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन आधारित डाटा द्वारा किये जाने वाले इलाज से मिर्गी रोग को जड़ मूल से ठीक किया जा सकता है /

आयुष की अन्य चिकित्सा विधियों यथा होम्योपैथी चिकित्सा, यूनानी चिकित्सा आदि में मिर्गी का इलाज करने की क्षमता है / यह मिर्गी के रोगी के ऊपर निर्भर है या उसके परिजनों पर कि वे कौन सी चिकित्सा विधि से इलाज कराना चाहते हैं /

हमने अनुभव किया है कि ETG AyurvedaScan परीक्शण करा कर जिन मिर्गी के रोगियों का इलाज आयुर्वेदिक औषधियों द्वारा और साथ में बताये गये “परहेज” और जीवन शैली मे बदलाव के साथ किया गया है, ऐसे मिर्गी के रोगियों को आरोग्य अवश्य मिला है /

आयुर्वेद मे बहुत सी दवायें मिर्गी रोग के लिये है और आयुर्वेद में इसका आरोग्यकारी उपचार मौजूद है /

Ayurvedic Nutraceutical ; Spinach soup आयुर्वेदिक खाद्यौषधि ; पालक सूप


स्पैनेच सूप, इसे साधारण सूप समझने की भूल कभी न करियेगा / वर्ना एक हेल्दी रेसीपी से अथवा खादौषधि के लाभ से वन्चित रह जायेन्गे /

इसे बनाने क तरीका बहुत सरल है /

पान्च से आठ पत्तियां पालक की ले, इसे पानी से धोकर साफ कर लें /

सभी पत्तियों को सिल्बट्टा अथवा खरल या मिक्सी में डालकर लुगदी बना लें /

इस लुगदी में डेढ कप पानी डालकर आन्च पर रखाकर उबाल लें /

उबालने के बाद इसे गुन्गुना होने तक ठन्डा होने के लिये रख दें /

जब गुन्गुना हो जाय , तब इस लुगदी को मसलकर कप्डे अथवा छन्नी से छान ले /

इस छने हुये सूप में भूना हुआ जीरा, भूनी हुयी हीन्ग, थोड़ी शक्कर अथवा शहद अथवा गुड़ इच्छा अनुसार, थोड़ा सा नीबू का रस, कला नमक अथवा सेन्धा नमक या दोनों नमक. एक चम्मच अदरख का रस, मिला लें / बतायी गयी सामग्री अपनी रुचि के अनुसार मिला लें /

ऊपर बताये गये सामग्री में यदि कोई वस्तु नापसन्द हो तो उसे हटा सकते है / इसे रुचिकर स्वाद में बना सकते है /

जब इसे पीना चाहें तो इसमें एक चम्मच मक्खन मिलाकर यदि चाहें तो मिला सकते है /

पालक का यह सूप सभी के लिये लाभ दायक है / इस सूप के पीने से मन्दाग्नि, या जिन्हे भूख न लगने की शिकायत हो, जिन्हें पाचन समबन्धी विकार हों और कोई भोजन हजम न हो रहा हो, शरीर कमजोर हो रहा हो , चाहे उसकी कोई भी वजह हो, यह सूप निर्बलता को दूर करने में सहायक है /

जिन्हे यह लगता हो कि बतायी गयी वस्तुयें मे से कुछ उन्हे नुकसान पहुन्चा सकती हैं, वे उन नुकसान करने वाली वस्तुओं को हटा सकते है / जैसे नीबू का रस यदि किसी को नुकसान करे तो वे नीबू का रस न मिलाकर अनार या मुसम्मी या सन्तरा या कोई दूसरा रस मिलाकर सेवन कराना चाहें तो कर सकते है /

यह क लाभ दायक पेय है और इसे सभी सीजन में उपयोग कर सकते है/