महीना: अप्रैल 2012

“एकान्ग वीर रस” एक तरफ के लकवा मार जाने की आयुर्वेदिक दवा ; one sided PARALYSIS curative Ayurvedic remedy “Ekang Vir Ras”


आयुर्वेद चिकित्सा विग्यान ने लकवा अथवा इसी तरह की मिलती जुलती बीमारियों के इलाज के लिये कई श्रेष्ठ दवाओं का शाश्त्रों में उल्लेख किया है /

हलान्कि लकवा के रोग के इलाज के लिये आयुर्वेद मे बहुत से योग दिये गये हैं , चिकित्सा के लिये औषधीय प्रयोग के अलावा रक्त मोक्षण, जलूका का प्रयोग, दाह कर्म और पन्चकर्मादि का उपयोग करने का विधान बताया गया है, लेकिन औषधियों मे “एकान्ग वीर रस” का अपना अलग स्थान है /

अधिकान्शतया इस औषधि का उपयोग एक तरफ के पैरालाइसिस की बीमारियों के लिये ही करते हैं, लेकिन इसका उपयोग उन अन्य बीमारियों में भी करते है, जो पैरालाइसिस से मिलती जुलती अन्य रोग की अवस्थायें होती है /

इस औषधि के निर्माण में निम्न प्रक्रिया और सामग्री की आवश्यकता होती है ;

घटक द्रव्य; रस सिन्दूर, शुध्ध गन्धक, कान्त लौह भस्म, वन्ग भस्म, नाग भस्म, ताम्र भस्म, अभ्रक भस्म, तीक्षण लौह भस्म, सोन्ठ, मिर्च, पीपल, सब समान भाग लेकर कूट पीस छानकर पानी के साथ खरल में डालकर अच्छी तरह एक दिन घोण्टे /

बाद में त्रिफला और त्रिकुटा और सम्भालू और चित्रक और भ्रन्गराज और सहजना और कूठ और आवला और कुचला और आक और धतूरा और अदरख के रस अथवा क्वाथ से तीन तीन भावनायें देकर सुखा कर और एक एक रत्ती या १५० मिलीग्राम की गोली बनाकर रख लें /

यह फार्मूला आयुर्वेद शास्त्र बृहत निघन्टु रत्नाकर का है /

इस औषधि की मात्रा १५० मिलीग्राम से लेकर ३०० मिलीग्राम तक है / इसे शहद अथवा किसी वात नाशक अनुपान के साथ देना चाहिये /

यह औषधि पक्षाघात यानी Paralysis, one sided paralysis or complete paralysis, अर्दित, फेसियल परालाइसिस, ग्रध्रसी यानी Sciatica nerve inflammation, एकान्ग वात, अर्धान्ग वात, आदि वात विकारों मे सफलत पूर्वक उपयोग करते है /

यह औषधि शरीर का विकास करती है, शरीर के लिये जीवन दायनी है, कीटाणु नाशक है और शरीर के अन्दर के विजातीय द्रव्य यानी toxines बाहर निकाल देती है /

एकान्वीर रस के बारे में अधिक जानकारी के लिये आयुर्वेद की materia medica का अध्ध्यन करना चाहिये /

Advertisements

SPECIAL Hahanemann Birth day POST on 10th April 2012 ;; डा० हाहनेमान ने जो Organon of medicine मे बताया , क्या होम्योपैथिक डाक्टर वह सब कर रहे हैं ………?


जो भी डाक्टर होम्योपैथिक की प्रैक्टिस या चिकित्सा कार्य करता है , वह सही मायने मे होम्योपैथिक चिकित्सा के आविष्कारक डा० क्रिश्चियन फ्राइड्रिख साइमुअल हाहनेमान का एक फालोवर मात्र होता है , जैसे कि डा० बोनिघसन. क्लार्क्स, एलन, बोरिक, कैन्ट आदि आदि अतीत के होम्योपैथिक के चिकित्सक थे और उन्होनें अपने अपने तरीके से हाहनेमान के कार्यों और उनकी फिलोसोफी को अधिक विस्तृत व्याख्या की और अपने अपने अनुभवों को शामिल करके जो भी उनकी समझ में आया , उन्होने लिखा और सबको बताया /

लेकिन सभी ने आधा अधुरा सत्य ही हाहनेमान के कार्यों के बारे में बताया / होम्योपैथी के डाक्टर केवल दवा के चुनाव , दवा की पोटेन्सी, दवा के रेपीटीशन और अन्य बातों की तरफ ही उलझे रहे / कौन सा स्केल की दवा दी जाय, डेसिमल, सेन्टीसिमल या ५० मिलेसिमल कौन सी प्रयोग की जाय इसी मे ही सारी उर्जा बरबाद करते चले गये और इसके अलावा कोई भी अन्य constructive कार्य जो हाहनेमान ने Organon of medicine के अन्तिम १० या १२ पैराज में बताया था , अफ्सोस की बात है , कम से कम अपने देश में तो नही हुआ /

Organon of medicine के अन्तिम कुछ पैराज में हाहनेमान ने लिखा है और सबको निर्देशित किया है और यह इशारा किया है कि………….

[अ] होम्योपैथिक के चिकित्सकों को “इलेक्ट्रोथेरापी” का उपयोग करना चाहिये / उस जमाने में किसी ने गैलवेनिक करेन्ट का एक जेनेरेटर तैयार किया था / चिकित्सा क्षेत्र की therapeutic use के लिये , यह शायद पहली मशीन थी , जो गठिया, वात विकार, musculo skeletal anomalies के treatment के लिये उपयोग में लायी जाती थी / इस मशीन के उपयोग के लिये हाहनेमान ने निर्देशित किया है / आज भी यह मशीन उसी कार्य के लिये उपयोग में लायी जा रही है जैसा कि उस जमाने में करते थे /

यह अवश्य हुआ है कि आज के जमाने में चिकित्सा कार्य के लिये , थेरापेउटिक उपयोग के लिये बहुत सी मशीने आ गयीं हैं, जिन्हे Physiotherapy चिकित्सक आज भी उपयोग मे ला रहे हैं /

सवाल यह है कि होम्योपैथी के चिकित्सकों नें इस विधा को क्यों छोड़ दिया और इस पर क्योण ध्यान नही दिया गया ?

[ब] हाहनेमान ने hydrotherapy यानी जल चिकित्सा के बारे में लिखा है / पानी के चिकित्सकीय उपयोग सदियों से मानव समाज कर रहा है / प्राकृतिक चिकित्सा में जल का उपयोग करते हैं जो सर्व विदित है / जब मै म्यूनिख , जरमनी में Krankenhaus fuer Naturhaeilwissen मे homoeopathy पढ रहा था, उस समय वहां पर जल चिकित्सा, इलेक्ट्रो थेरापी, हर्बल थेरापी, मैगनेट थेरपी, साइको थेरपी [हिप्नोटिस्म] आदि आदि Organon में हाहनेमान द्वारा बताये गये चिकित्सा के उपायों को मरीजों के उपयोग के लिये व्यवहार मे लाया जाता था /

सवाल यह है कि होम्योपैथी के डाक्टर और नीति नियन्ता और होम्योपैथी के लीडरान और धुरन्धर और धाकड़ से धाकड़ तथा कथित academicians ने क्या होम्योपैथिक् चिकित्सा विग्यान की इन उपलब्धियों को इन परिवेश में शामिल न करके ये सब किस अग्यानता का परिचय दे रहे है ?

On HAHANEMANN DAY 10th April ; अगर होम्योपैथी की चुनी हुयी या most favourable selected drug मरीज को देने के बाद वाजिब रिजल्ट ना मिले तो क्या करें ……???


THE ONE AND ONLY HOMOEOPATHY SCANNNING SYSTEM GLOBALLY, SCANS AND MAPS HUMAN BODY ELECTRICALLY ON THE BASIS OF THE FUNDAMENTALS OF HOMOEOPATHY AND QUANTIFY THE PRESENCE OF MIASMA, VITAL FORCE, IDIOCYNCRACY ETC ETC  INCLUDING PRESENCE OF DISEASES , DIAGNOSIS AND FACILITATES FOR AUTO SELECTION OF INSTANT CORRESPONDING REMEDIES WITH MANY FEATURES

======================================================

यह एक ऐसा सवाल है और यह एक ऐसी पेचीदा स्तिथि है जो होम्योपैथी के डाक्टरों के सामने कुछ मुश्किल खड़ा कर देती है /
ऐसी स्तिथि तब बनती है जब……..

[१] होम्योपैथी चिकित्सक लक्षणानुसार बेहतर से बेहतर दवाओं का चुनाव मरीज के हर एन्गल को लेकर करने के बाद जब दवायें देता है तो जैसा उसको drug response मिलना चाहिये , वह नही मिलता / सवाल यह है कि कब तक दवा के action और reaction का इन्तजार किया जाये ???

चुनी हुयी दवा के response के इन्तजार करने से कई एक रिस्क फैक्टर जुड़ जाते हैं, ऐसे में मरीज के हाल को सुधारने के लिये क्या बेहतर रास्ता हो ?

[२] एक सबसे बड़ी कमी यह है कि डा० हाहनेमान ने होम्योपैथी के चिकित्सा विग्यान की फिलोसफी के बारे में बहुत विस्तृत व्याख्या की है और समय समय पर अपने किये गये experiments से प्राप्त अनुभवों को Organon के विभिन्न सन्सकरणों में उनको परिवरतन के साथ प्रस्तुत किया है / यहां विचार करने की अति आवश्यकता है कि ऐसी क्या वजह रही है जिससे उनको अपना एक बार का established विचार जिसे कुछ साल पहले सही समझा गया और बाद में उसे ही कई बार बदलना पड़ा ?

[३] हलान्कि आज जैसी समस्या होम्योपैथी प्रैक्टिस करने के साथ हम महसूस करते हैं , शायद हाहनेमान और उनके समकालीन को भी रही है तभी उन्होने अपने समकालीन होम्योपैथी के चिकित्सकों को समझाने की कोशिश की है कि वे इस पर experiment कर रहे है, जैसा कि उनके लिखे गये पत्रों के सन्कलन के अध्ध्यन के बाद मिलता है /

[४] यह स्पष्ट नही है कि चिकित्सा में फेल हो जाने के क्या क्या कारण हो सकते है ?

हाहनेमान ने अन्त में यह कह कर विराम लगा दिया कि [अ] अगर रोगी ठीक नही होता तो इसका मतलब है कि उसकी बीमारी one sided है या [ब] चुनी हुयी औषधियों का कोई भी reaction शरीर मे नही हो रहा है या शरीर response नही कर रहा है क्यों कि Vital Force की स्तिथि deranged condition मे है /

यद्यपि मरीज के ठीक न होने के बहुत से अन्य अनेक कारण हो सकते हैं, लेकिन कुछ बातें मेरी समझ मे आयी है, जिन्हे मै यहां कहना चाहता हूं /

पहला यह कि हाहनेमान के जमाने में और आज के जमाने में हम जितना भी अन्न खाते पीते हैं और इसके साथ साथ रहन सहन और जीवन शैली में जी रहे है, उनमें पहले के जमाने से लेकर अब तक के जमाने में बहुत फ्रक और अन्तर आ गया है /

दूसरा खाने के लिये पैदा किये जाने वाले खाद्य पदार्थ की क्वालिटी एक तरफ जहां समाप्त हो रही है वहीं दूसरी तरफ य़ूरिया और अन्य दूसरी खादों के बल पर खेतों में ज्यादा मात्रा मे अन्न यथा गेहूं आदि उगाये जा रहे हैं और वही यूरिया खाद हम सभी खा रहे है / अब शुध्ध वस्तुयें मिल नही रही है , जब अशुध्ध खाना खायेन्गे तो लाजिमी है कि कुछ न कुछ तो शरीर मे होगा /

तीसरा हाहनेमान का दौर दूसरा था और आज का दौर उससे जुदा है , इस दौर में तनाव, भगम भाग, हर काम मे तेजी , अनियमित जीवन शैली सभी एक साथ शामिल होकर मानव समाज को अधमरा बनाये दे रही है / ऐसे में चिकित्सा का सुत्र Treat the CAUSE and not the DISEASE जैसा जुमला कैसे फिट होगा ? यह विचारणीय विषय है /

बहुत से सवाल ऊठते हैं लेकिन जमीनी धरातल पर सवालों के उठने या न उठने से कोई फर्क नही पड़ता / डाक्टर के पास मरीज आता है अपनी बीमारी को लेकर, इस उम्मीद के साथ कि उसकी बीमारी डाक्टर साहब ठीक करेन्गे / अब यह डाक्टर की जिम्मेदारी है कि वह मरीज की बीमारी के लिये क्या करते हैं ?

मेरा तौर तरीका होम्योपैथी की चिकित्सा के बारे मे थोड़ा जुदा है /

[क] जब मुझे definite cause of disease का पता चल जाता है कि मरीज की बीमारी किस कारण से हुयी है , तब मै single medicine का चुनाव करता हूं और उसे २०० पोटेन्सी से शुरू करता हू और १००० पावर तक ले जाता हूं / दवा का रेपीटीशन सुबह शाम या दिन में एक बार से ज्यादा सामन्य्तया नही करता /

[ख] जहां definite cause का पता नही होता, वहां मै मौसम के साथ मरीज के लक्षणों के ऊपर दवा देता हू , ऐसा Acute cases के इलाज के लिये मेडिसिन का चुनाव मौसम + लक्षण + सबसे ज्यादा परेशान करने वाली तकलीफ + अन्य को ध्यान में करके एक , दो या तीन या चार दवाओं का चुनाव करता हूं और इन दवाओं को २०० पावर मे उपयोग करता हूं / जैसे जैसे मरीज के लक्षणों का शमन होता जाता है, इन लक्शणों को दुर करने वाली दवाओं को withdraw करता जाता हूं और धीरे धीरे एक दवाके उपयोग पर आ जाता हूं /

[ग] मै हमेशा मरीज के इलाज करते समय risk factor को न बराबर करने के पक्ष में रहता हूं / आवश्यकता पड़ने पर Mother Tincture का मिक्श्चर बना करके देता हूं, जिसमें मरीज सुरक्षित भी रहता है और उसका इलाज भी हो जाता है /

[घ] मेरा मानना है कि हाहनेमान द्वारा होम्योपैथी की फिलोसोफी जो Organon of medicine मे बतायी गयी है , यह केवल हम डाक्टरों के लिये है / बतायी गयी फिलोसोफी हम होम्योपैथी के डाक्टरों के लिये है , हम हाहनेमान के फालोवर्स के लिये है / यह फिलोसोफी हमारे मरीजों के लिये नही है, इसलिये हमे विचार करना चाहिये कि फिलोसोफी के खातिर हम अपने मरीजों की जान के साथ क्यों खिलवाड़ करें ? मरीज डाक्टर के पास यह भरोसा करके आता है कि वह एक सुरक्षित चिकित्सक के पास जा रहा है जो उस्की तकलीफों को दूर करेगा /

इसके अलावा मै आयुर्वेदिक दवाओं का भी उपयोग करता हूं, जहां आवश्यकता होती है / इस तरह से औषधि व्यवस्था करने से मरीज का सम्पूर्ण उपचार हो जाता है और यह hurdle समाप्त हो जाती है कि चुनी हुयी दवा जब काम न करे तो क्या किया जाय, जैसी आशन्का खत्म हो जाती है और मै पूरे विश्वास के साथ मरीज का इलाज करता हूं और परिणाम स्वरूप मुझको बराबर सफलता मिलती है /