महीना: मई 2012

Senile PROSTATITIS ; ETG AyurvedaScan Traces and Data Report with Allopathic Examinations reports


Below presented case is a 65 years old male person, who is suffering from Sanile Prostatitis. The patient was admitted to the Government  District Hospital for the syndromes of prostatitis including obstruction of urination. Patient is also suffering from Chronic Obstructive Pulmonary Disorders with allied  complaints.

His attending physician asked him for surgical intervention, but they refused to do surgery , which patient could not tell the reason. We guess only that it might possible that respiratory tract problem may cause any serious condition during or after  surgery or it may possible that after opening of Prostate area, it could be a malignent stage or so on . So Doctors refused for surgery and referred to other physician.

However I am patient’s family Ayurvedic physician and at this movement they consulted me on 24th May 2012. I gave him medicine and advised for  ETG AyurvedaScan examination.

Here both the findings of Allopathic and Ayurvedic are given for comparisons. I have prescribed remedies on the basis of the findings for a week and waiting for response.

Advertisements

दिन और रात के २४ घन्टे मे आयुर्वेद के दोषों का कुपित होना ; Aggravation or Dosha effects within 24 hours a day according to Ayurveda


रात और दिन मिलकर २४ घन्टे होते हैं / यह सभी जानते हैं / एक वर्ष में ३६५ दिन होते है जिसे एक सौर वर्ष कहते हैं / एक पूरा का पूरा सौर वर्ष १२ महीनों में सुविधा के हिसाब से बान्ट दिया गया है / भारतीय मास गणना का तरीका अन्ग्रेजी माह की गणना से अलग है / भारतीय मास चैत्र, बैसाख, जेठ, अषाढ, सावन, भान्दों, कुवार, कार्तिक, अगहन, माघ, पूस, फाल्गुन कहे जाते है / एक माह में दो पखवारे होते है जिसे शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष कहा  जाता है / एक पक्ष लगभग १४ या पन्द्रह दिन का होता है / इस पक्ष के दो सप्ताह होते हैं / जो सात दिन का होता है /

वास्तव में इन माहों का निर्माण प्रकृति के स्वभाव को देखते हुये किया गया है / आयुर्वेद इन बारह माहीनों को चौमासा के हिसाब से चार चार महीने में बान्ट देता है / इस प्रकार से जाड़ा, गर्मी और बरसात मुख्य रितुयें होती हैं / लेकिन इन तीन मुख्य रितुओं को विभाजित करके छह रितुओं में आरोग्य के दृष्टिकोण से बान्ट दिया गया है , जिन्हे शिशिर,हेमन्त,बसन्त के नाम से जानते हैं /

आयुर्वेद ने इन रितुओं मे observe किया है कि शरद रितु में कफ का प्रकोप, गर्मी या ग्रीष्म में पित्त का प्रकोप और वर्षा काल में वात का प्रकोप बह्धा: होता है /

इसी प्रकार आयुर्वेद ने यह observe किया कि दिन के २४ घन्टे में कौन सा दोष प्रकुपित होता है /

कफ का प्रकोप सुबह ६ बजे से लेकर दोपहर पहले १० बजे तक रहता है  और इसी प्रकार शाम ६ बजे से लेकर रात १० बजे तक होता है /

पित्त का प्रकोप दोपहर १० बजे से लेकर दिन के २ बजे तक तथा रात १० बजे से लेकर रात २ बजे तक पित्त का कोप बना रहता है /

वात का प्रकोप दिन २ बजे से लेकर शाम ६ बजे तक रहता है और इसी प्रकार रात २ बजे से लेकर सुबह ६ बजे तक कोप रहता है /

अगर आयुर्वेद की बतायी गयी इस timings को आधुनिक वैग्यानिकों द्वारा खोज की गयी Body Clock से correlate करते हैं तो इन दोनों मे बहुत सी समानतायें मिलती हैं / 

कैन्सर के मरीजों में डायबिटीज ; आश्चर्य जनक तथ्य ; Diabetes in Cancer Patients ; an astonishing facts


अभी कुछ मरीज जिन्हे कैन्सर है , उनका इलाज मै कर रहा हूं / ये सभी मरीज देश के नामी गिरामी अस्पतालों में जाकर अपनी जान्च करा चुके है / जिनमे FNAC और Biopsy जैसी जान्च भी शामिल हैं / इन मरीजों को कैन्सर की बीमारी बतायी जा चुकी है / मरीजों ने आयुर्वेदिक चिकित्सा के लिये मुझसे सम्पर्क किया /

ऐसे मरीजों का इलाज ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन की फाइन्डिन्ग्स और डाटा पर आधारित है , जैसा कि आयुर्वेदिक इलाज करने का यह आधुनिक  वैग्यानिक अचूक और सटीक तरीका है / जब ETG AyurvedaScan की report की analysis और synthesis कि गयी तो पता चला कि इन मरीजों को tendency of High Blood Sugar level  है / मैने जब इन रोगियों को बताया कि उनको blood sugar  की बीमारी भी कैन्सर के साथ साथ है, तो इस सभी मरीजों ने इन्कार कर दिया कि उनको तो जीवन में कभी डायबिटीज की बीमारी हुयी ही नही ?

जब मैने उनकी रक्त शर्करा की जान्च की तो इन मरीजों का blood sugar level देखकर बहुत अचम्भा हुआ / इससे पहले मुझे इस बात की कम जानकारी थी कि कैन्सर के मरीजों में High level blood sugar भी होती है / यह जानकर कि कैन्सर के मरीजों को डायबिटीज भी हो जाती है या हो सकती  है, मुझे यह सब evidence देखकर बहुत आश्चर्य हुआ /

बहरहाल आयुर्वेद की आधुनिक निदान ग्यान की तकनीक ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन से प्राप्त आनकड़ों के आधार पर आयुर्वेद की शास्त्रोक्त औषधियों आदि के उपयोग से डायबिटीज का इलाज करने से  मरीजों की रक्त शर्करा सामन्य लेवल पर आ गयी /

मुख और जीभ के एक कैन्सर रोगी को जिसका इलाज पिछले साल नवम्बेर २०११ से चल रहा था / मै इस रोगी को होम्योपैथी दवाओं से इलाज कर रहा हूं / मुझे समझ मे आया कि जीभ और मुख के कैन्सर में होम्योपैथी की कुछ दवायें बहुत कारगर है और इनके उपयोग से जीभ के कैन्सर में अवश्य आराम मिलती है / इसके साथ आवश्यकता होने पर आयुर्वेद और यूनानी दवाओं का उपयोग भी करता हू यदि यह समझ में आता है कि मरीज को इसकी जरूरत है / यह मरीज होम्योपैथी की दवा Hydrastis Q  का सेवन अन्य औषधियों के साथ साथ कर रहा है / दवा से मरीज को बहुत लाभ हुआ और उसके जीभ के सफेद घाव घटकर लगभग ७० प्रतिशत ठीक हो गये / इससे पहले के एक मरीज में अचानक रक्त शर्करा का परीक्शण करने पर रक्त शर्करा का लेवल अधिक निकला था / इस मरीज को सलाह दी कि वह अपनी सूगर की जान्च कराये / जान्च कराने पर इस मरीज की सुगर  Fasting तथा  Postprandial दोनो ही अधिक निकली / अब इस मरीज को सुगर कम और सामान्य लाने के लिये आयुर्वेदिक औषधियों का उपयोग किया जा रहा है /

लीवर कैन्सर के एक रोगी का ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन फरवरी २०१२ में करने के बाद पता चला कि इसे tendency of High Blood Sugar Level  की तकलीफ है / जान्चने पर पता चला कि इसकी सूगर का लेवल 387 mg/dl है / इसे आयुर्वेदिक दवा  दी गयी  है / इस रोगी का हर माह हर ३० दिन बाद एक ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन परीक्षण किया जाता है और उसी आधार पर आयुर्वेदिक दवाओं का चुनाव करके इलाज करने के लिये औषधि वयवस्था की जाती है / इस रोगी की blood sugar कम करने के लिये आयुर्वेदिक दवायें दी जा रही हैं / अब इस रोगी की ब्लड सुगर सामान्य लेवल पर रहती है /

यह सर्वमान्य तथ्य है कि अगर किसी रोगी को  मान लीजिये एक हज़ार रोग हों या रोग के लक्षण हों और उन सब में एक रोग blood sugar   या blood sugar के लक्शणों का हो तो सबसे पहले 999 रोगों को छोड़्कर blood sugar  का इलाज करे या अन्य रोगों के साथ साथ Blood sugar या  Diabetes का भी साथ साथ मुकम्मल इलाज करें, तभी चिकित्सा पूर्ण होती है /

मैने कैन्सर के इन सभी रोगियों को जिनकी Blood sugar level  अधिक रहा उनको आयुर्वेद की रक्त शर्करा कम करने की औषधि देने के बाद इन मरीजों की तकलीफ में आराम मिला /

गर्मी से कफ दोष के पीड़ित रोगियों को कैसे राहत मिलती है ? ETG AyurvedaScan studies shows , how KAPHA dosha is cured by PITTA dosha, at the commencement of SUMMER SEASON


CONTACT ; Dr D.B.B.ajpai, Ayurvedic Diagnostician and Inventor & Chief ETG AyurvedaScan Investigator, KANPUR Mobile; 09336238994

CONTACT ; Dr D.B.B.ajpai, Ayurvedic Diagnostician and Inventor & Chief ETG AyurvedaScan Investigator, KANPUR Mobile; 09336238994

आयुर्वेद चिकित्सा विग्यान बताता है कि किस सीजन में कौन सा दोष कुपित होता है अर्थात बढता है और यह बढे हुये दोष किस सीजन में कम हो जाते हैं /

जाड़ा अथवा ठन्डक के दिन “कफ” दोष को बढाते हैं , ऐसा आयुर्वेद का सिध्धान्त कहता है / कफ दोष चूकि जल और आकाश के योग से मिलकर बना है, इसलिये यह शरीर में ठन्ड अथवा शीत के कारण बढता है और शरीर में कुपित होता है / ठन्ड अथवा शीत का प्रभाव गर्मी से कम होता है अथवा गर्म पदार्थ अथवा गर्म मिजाज के खाद्य पदार्थों के खाने से ठन्डक का प्रभाव शरीर को बचाता है / इसीलिये ठन्डक वाले शीत प्रधान देशों में गर्म पदार्थ खाने का रिवाज है जैसे विभिन्न प्रकार के मान्स खाना या शराब पीना ताकि शरीर को ठन्डक से बचने के लिये जरूरी उष्मा मिलती रहे /

रहन सहन के स्तर पर शरीर को गर्म रखने के लिये रहने के स्थान को गर्म बनाये रखने का रिवाज है / इसी कारण ठन्ड पड़ने वाले मुल्कों मे लोगों के मकान शीत प्रतिरोधी होते हैं / भारत में जहां जहां शीत अधिक पड़ती है जैसे हिमान्चल प्रदेश अथवा उत्तरान्चल प्रदेश अथवा काश्मीर जैसे इलाकों में ठीक वही स्तिथि है जैसी कि ठन्ड पड़ने वाले देशों में है /

फिल हाल बात करते हैं कफ दोष की / लुब्बेलुआब यह है कि ठन्ड से कफ दोष बढता है तो उसकी काट करने के लिये गरंम पदार्थॊ का सेवन , गरम जगह रहने और सोने का इन्तजाम करना होता है जिससे “क्फ” दोष शान्त होकर स्वास्थय को नार्मल कर देता है / लेकिन जिनको बहुत अधिक कफ की तकलीफ हो जाती है जैसे बृध्धावस्था का कफ की बीमारी, तब गर्मी का सीजन आरोग्य प्राप्ति के दॄष्टिकोण से सबसे अच्छा होता है / जितनी ही अधिक गरमी पडेगी कफ सम्बन्धित विकार शान्त होते है / इसका कारण यह है कि ठन्ड से पित्त की गर्मी उतनी नहि हो पाती जितने मे वह शरीर को गर्म रख सके / गर्मी के सीजन में कम्जोर पित्त सबल हो जाता है और इसी कारण से कफ सम्बन्धी रोग दूर हो जाते है /

चूकि रन्जक पित्त दोष-भेद लीवर और तिल्ली को प्रभावित करता है ्तथा इसके साथ ही भ्राजक पित्त सम्पूर्ण शरीर को प्रभावित करता है इससे कफ दोष को शान्त करने मे मदद मिलती है /

ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन के डाटा के अध्ध्यन से यह पता चला है कि जब भ्राजक पित्त सामान्य से अधिक हो जाता है और Nervous system में Parietal Brain का measurement कम होता है तो व्यक्ति को “Exposure of Cold” अधिक होता है और उसे Thermal Sensitivity का जिस intensity का mesurement डाटा प्राप्त होता है उसी हिसाब से उसको Cold अथवा Heat का exposure होता है /

कट्फलादि चूर्ण : दमा और दमा जैसी खान्सी के लक्षणों मे उपयोगी ; KATPHALADI CHURNA, an Ayurvedic Remedy for Asthma, Bronchial Asthma and Asthma like syndromes and COPD disorders


बहुत ही साधारण से फार्मूले वाली यह आयुर्वेद का चूर्ण जिसे “कट फलादि चूर्ण” कहते हैं, मामूली खान्सी से लेकर दमा जैसी कठिन बीमारियों को दूर करने में सुरक्षित उप्योगी औषधि है /

इसके बनाने मे केवल चार आयुर्वेदिक द्रव्यों का उपयोग करते है / ये चार द्रव्य हैं , कायफल और पोहकर मूल और काकड़ा सिन्गी और पीपल / इन्हे पहले लोहे के खरल में डालकर छोटे छोटे टुकड़े कर ले, फिर मिक्सी में या खरल में डालकर महीन चूर्ण बना लें /

इसकी मात्रा १ ग्राम से लेकर तीन ग्राम तक है / इसे शहद से खाना चाहिये / रोगानुसार अनुपान से भी ले सकते है, जिससे यह औषधि अधिक प्रभाव शाली हो जाती है /

दमा, श्वास, कास और फेफड़ों से सम्बन्धित प्राय: सभी रोगों मे इसे उपयोग कर सकते है / यह बिल्कुल सुरक्षित औषधि है /

कन्ट्कार्यावलेह ; आयुर्वेद की फेफड़ों और गले मे जमा कफ या बलगम निकालने की औषधि ; Expectorant Remedy KANTKARYAVALEH


भारतीय ज़डी-बूटी कन्टकारी solanum nigrum  से तैयार की जाने वाली , जो इस औषधि का मुख्य घटक है, इस औषधि के साथ जब अन्य कार्यकारी औशधियों को मिलाकर अवलेह या प्राश तैयार करते हैं, तब यह आयुर्वेद की एक मगत्व पूर्ण औषधि तैयार हो जाती है /

साधारण भी और विशेष तौर पर इसे सभी तरह की श्वास, दमा, COPD जैसी अवस्थाओं में तथा सभी प्रकार की खान्सी, गले की खराश, गले की खसखसाहट , cough, laryngitis, pharyngitis, tracheal anomalies, pulmonary anomalies  सभी में उपयोग करते हैं / जिन्हे फेफड़ों मे कफ जम जाने की दिक्कत हो, जिन्हे trachea, bronchus, alveoli  आदि आदि अन्गों में कफ पैदा होने, कफ न निकलने, बार बार खखारने के बाद भी कफ न निकले, बहुत मुश्किल से कफ निकले, कफ न निकलने से खानसते खान्सते मरीज बेदम हो जाये, उन्हे यह औशधि सेवन करने से कफ नरम और ढीला होकर निकल जाता है /

कटेली का कवाथ बनाकर इसमें गुर्च, चव्य , चित्रक, नागर मोथा, ककड़ा सिन्घी, पीपल, काली मिर्च,  सुन्ठी, जवसा, भारनगी, रास्ना और कचूर का चुर्ण करके तिल का तेल, घी और शह्द , बन्सलोचन , पीपल का चूर्ण मिलाकर इसे बनाया जाता है /

इसकी सेवनीय मात्रा ६ ग्राम से  लेकर २५ ग्राम तक है / इसे दिन मे दो बार सुबह और शाम को सादे पानी से या रोगानुसार अनुपान से लेना चाहिये /

अनुपान के साथ कनटकारी अवलेह सेवन करने से इसकी आरोग्य कारी शक्ति कई गुना बढ जाती है / जिनको पुरानी खान्सी हो और न ठीक हो रही हो तो अभ्रक भस्म १५० मिलीग्राम, रूदन्ती चूर्ण १ ग्राम, शहद मे मिलाकर पहले सेवन करे बाद में कनटकारी अवलेह ६ ग्राम सादे पानी के साथ सेवन करें / इसे तीन चार बार खाना चाहिये / 

Solanum Nigrum is used since centuries for mucolytic purposes. The expectoration of mucous becomes easy after the use of kantakaryavaleh..

 If this avaleh is used as anupan, it boosts the action of main medicine.

The remedy is indicative in all sorts of repiratory problems and COPD disorders. Kantakaryavaleh have no side effects  and is totaly safe for use of all ages including pregnent womens.

अस्थमा यानी सी०ओ०पी०डी० यानी क्रानिक आब्स्ट्रक्टिव पल्मोनरी डिसोर्डर ; ASTHAMA or C.O.P.D. or Chronic Obstructive Pulmonary Disorders


Dr DBBajpai is working with the ETG AyurvedaScan machine

Dr DBBajpai is working with the ETG AyurvedaScan machine

किसी भी नाम से पुकारे चाहे दम फूलना कहिये या दमा कहिये या सान्स का फूलना या श्वांस या सांस का उखड़ना कहिये अथवा Rapid respiration or Asthama or Dyspnea या कुछ और मतलब यही है कि अगर उठने अथवा बैठने अथवा चलने या कोई थोड़ा  सा भी काम करने से मनुष्य की सांस फूलने लगे और बेदम हो जाय , तो साफ साफ समझना चाहिये कि जिसे यह लक्षण होते है , वह दमा का मरीज है / 

आयुर्वेद के अलावा दूसरी अन्य चिकित्सा विधियों यथा सिध्द और यूनानी चिकित्सा विग्यान मे दमा का बहुत अच्छा इलाज बताया गया है /

दमा श्वसन सन्स्थान से सम्बन्धित बीमारी है / देखा गया है कि जिनके परिवार में श्वास के रोगी होते है उनके बच्चों में भी यही तकलीफ होने की बहुत समभावना होती है / इसलिये कहा जा सकता है कि यह वन्शानुगत बीमारी भी होती है /

लेकिन यह जरूरी नही कि यह केवल मात्र वन्शानुगत हो , यह अन्य कारणों से भी हो जाती है जैसे धूल और धुआं और धूप और कुछ शारीरिक व्याधियां, जो बाद मे श्वांस की बीमारी मे तब्दील हो जाती है /

ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन आधारित दमा के मरीजों के अध्य्यन मे कुछ बातें पता चलीं हैं , जिनसे दमा के अटैक को बार बार पैदा होनें का खतरा बढ जाता है / हमारी टीम  द्वारा किये गये अध्ध्य्यन से निम्न बातें पता चलीं हैं जिन्के कारण दमा की तकलीफ बढती है /

१- दमा के रोगी में “Bowel’s Pathophysiology” की intensity बहुत हाई होती है अथवा बहुत लो होती है / इन्टेन्सिटी हाई होने से बडी और छोटी आन्त में कार्य विकृति के कारण सूजन पैदा होती है और आन्तों की म्यूकस सीक्रीसन में बदलाव पैदा होते है / इन्टेन्सिटी लो होने पर कब्जियत और पेट साफ न होने और कई कई दिन पाखाना न होने जैसी तकलीफें होने लगती हैं / इसके परिणाम स्वरूप शरीर की mucous linings affected  होती हैं और एक स्थान की कार्य विकृति का असर दूसरे अन्गों में भी होने लगता है /

साथ ही आन्तों के parastalitic movement में भी फर्क पड़्ता है, यह अधिक अथवा कम दोनों ही हो सकती है /

२- अध्ध्यन मे एक बात यह भी प्रमाणित होती है कि महर्षि चरक ने “श्रोतो दुष्टि” [ pathophysiology or pathology of the Channels of human body] की बात करके यह बताया है कि “रस धातु” के विकृति होने से “आम” पैदा होता है / हमने अध्य्यन मे यह जानने की कोशिश की है कि यह आम  किस प्रकार से एक अन्ग से दूसरे अन्ग को प्रभावित करता है / यह ठीक उसी तरह से होता है जैसे की metastasis की प्रक्रिया होती है / हमने पाया कि श्वांस के कुछ मरीज alternative problems से परेशान थे / इस मरीजों मे जब Colitis / IBS / ICB उभर कर आन्तों की तकलीफ पैदा कर देती है, तब दमा की तकलीफ एक तरफ कम होती जाती है और ठीक दूसरी तरफ आन्तों की तकलीफें बढती चली जाती हैं / यह एक तरह से alternative sybernative stage होती है /

३- अध्ध्यन मे हमने कुछ बातें विशेष तौर पर नोट की है और इस पर विचार करके जब मरीजों का इलाज किया गया तो उन्हे अवश्य लाभ मिला /

४- मरीजो के ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन में प्राप्त फाइंडिन्ग्स को लेकर सारे शरीर का इलाज करने पर बहुत अच्छे रिजल्ट्स मिले हैं / हमारा मानना है कि जब  पूरे शरीर के विभिन्न अन्गो तथा अन्य अवयवों का evaluation करके इलाज करते है तो दमा की बीमारी दूर करने में अवश्य सफलता मिलती है / क्योंकि शरीर की कोई भी तकलीफ हो, यह पूरा शरीर एक ईकाई स्वरूप में है और इसे ईकाई समझ कर ही इलाज करना चाहिये, क्योंकि सारा शरीर एक दूसरे से जुड़ा हुआ है जैसे कि महर्षि चरक ने चरक सम्हिता में “श्रोतो दुष्टि” द्वारा इन्गित किया है /