दिन: अक्टूबर 19, 2012

वेदों में आयुर्वेद का उल्लेख ; अथर्व वेद और रिग वेद की सूक्तियों में आरोग्य के लिये प्रार्थना ; Hindu Veda “ATHARVA VEDA” and “RIG VEDA” mentions Ayurveda


आयुर्वेद की उतपत्ति के पहले इस विग्यान के बारे में भारतीय वेदों में जिक्र किया गया है / वेदों में आयुर्वेद के विषय में “अथर्व वेद” में रोग निवारण सूक्त दिये गये हैं , जिनसे पता चलता है कि जो लोग बीमार हो जाते थे, वे उस समय रोग-अवस्था से निजात पाने के लिये क्या क्या करते थे और किस पर depend होते थे /

चार वेदों मे सबसे अधिक अथर्व वेद में रोग निवारण सूक्तियां दी गयी है / अथर्व वेद के चतुर्थ कान्ड का १३ वां सूक्त तथा रिग वेद के दशम मन्डल का १३७ वां सूक्त “रोग निवारण सूक्त” के नाम से जानते हैं /

अथर्व वेद में सूक्तों को compile रिषि शन्ताति तथा देवता चन्द्रमा और विश्वेदेवा हैं / जबकि रिग वेद में प्रथम मन्त्र के रिषि भारद्वाज, द्वितीय के कश्यप, तृतीय के गौतम, चतुर्थ के आत्रि , पन्चम के विश्वामित्र, षष्ट के जमदाग्नि, सप्तम के रिषि वशिष्ठ जी हैं और देवता विश्वे देवा हैं /

इस सूक्त के जप पाठ से रोगों से मुक्ति अर्थात आरोग्यता प्राप्त होती है / रिषी ने रोग मुक्त होने के लिये देवताओं से प्रार्थना की है /

उत देवा अवहितं देवा उन्न्यथा पुन : /
उतागश्च्कुषं देवा देवा जीव यथा पुन : //1//

अर्थात हे देवो, हे देवो, आप नीचे गिरे हुये को फिर निश्चय पूर्वक ऊपर उठायें / हे देवों, हे देवो, और पाप करने वाले को भी फिर जीवित करें , जीवित करें /

द्वाविमौ वातौ वात आ सिन्धोरा परावत : /
दक्षं ते अन्य आवातु व्यन्यौ वातु यद्रप : // २ //

अर्थात ये दो वायु हैं / समुद्र से आने वाला पहला वायु है और दूर भूमि पर से आने वाला दूसरा वायु है / इनमे से एक वायु तेरे पास बल ले आये और दूसरा वायु जो दोष है , उसको दूर करे /

आ वात वाहि भेषजं वि वात वाहि यद्रप: /
त्वं हि विश्व भेषज देवानां दूत ईयसे // ३ //
अर्थात हे वायु, औषधि यहां ले आ ! हे वायु जो दोष हैं, वह दूर कर दे / हे सम्पूर्ण औषधियों को साथ रखने वाले वाय ! नि:संदेह तू देवों का दूत जैसा होकर चलता है, जाता है, प्रवाहित है /

त्रायन्तामिमं देवास्वायन्तां मरुतां गणा: /
त्रायन्तां विश्वा भूतानि यथायमरपा असत //४//
अर्थात हे देवो ! इस रोगी की रक्षा करें / हे मरुतों के समूहो ! रक्षा करें / जिससे यह रोगी रोग दोष रहित हो जाये /

आ त्वागमं शन्ताति भिरिथो अरिष्टतातिभि: /
दक्षं त उग्रमाभारिषं परा यक्ष्मं सुवामि ते //५//
अर्थात आपके पास शान्ति फैलाने वाले तथा अविनाशी साधनों के साथ आया हूं / तेरे लिये प्रचन्ड बल भर देता हूं / तेरे रोग को दूर कर भगा देता हूं /

अयं मे हस्तो भगवानयं मे भगवत्तर: /
अयं में विश्व भेषजो~यं शिवाभिमर्शन: //६//
अर्थात मेरा यह हाथ भाग्यवान है / मेरा यह हाथ अधिक भाग्यशाली है / मेरा यह हाथ सब औषधियों से युक्त है और मेरा यह हाथ शुभ स्पर्श देने वाला है /

हस्ताभ्यां दशशाखाभ्यां जिव्हा वाच: पुरोगवी /
अनामयीत्रुभ्यां हस्ताभ्यां ताभ्यां त्वाभि मृशामसि //७//

दस शाखा वाले दोनों हाथों के साथ वाणी को आगे प्रेरणा करने वाली जीभ है / उन नीरोग करने वाले दोनों हाथों से तुझे हम स्पर्श करते हैं /

 

वेदों में व्यक्त की गयी सूक्तियों से यह तो प्रमाणित ही है कि आयुर्वेद की नींव यहीं से शुरू हुयी और इस बुनियाद के बल पर किये गये निरन्तर विकास से “स्वस्थ्य वृत्त” यानी शरीर को स्वस्थय कैसे रखा जाय या रखा जा सकता है , इसके नियम विकसित किये गये जो मनीषियों नें अपने keen observation  से प्राप्त किये थे /

 

हजारों साल के नियमित अभ्यास से आयुर्वेद का विकास हुआ और इसका उदगम अथर्व वेद तथा रिग वेदों की सूक्तियों से हुआ /

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