महीना: नवम्बर 2012

सन्धिवात – कारण और निवारण ; ARTHRITIS, their causes and cure


प्रस्तुत लेख कल्याण मासिक पत्रिका, गोरखपुर के आरोग्य अन्क में प्रकाशित हो चुका है / इस लेख को
“वैद्य पन्डित श्री लक्षमी नारायन पारीक” ने लिखा है /

यहां इस लेख की कापी सर्व जन के हितार्थ प्रस्तुत की जा रही है /

यद्यपि सन्धिवात एक सामान्य व्याधि समझी जाती है, परन्तु इस व्याधि से पीडित व्यक्ति ही जान सकता है कि यह व्याधि कितनी कष्ट दायक है / इसके निदान आदि के विषय में सन्क्षिप्त विचार किया जाता है /

सन्धिवात के निदान ;

आयुर्वेद ने सन्धिवात को वात व्याधि में परिगणित किया है / सन्धिवात में वायु का प्रकोप विशेष रूप में होता है / प्राय: आहार विहार के अनुचित सेवन से यह रोग होता है / ठन्डे, बासी पदार्थ का अधिक सेवन, घी तेल आदि स्निग्ध खाद्य पदार्थों का अल्प सेवन, रुक्ष और लघु आहार का अधिक उपयोग, लगातार लन्घन [उपवास] करना, पन्चकर्म का अनुचित प्रयोग, अधिक रात्रि जागरण, अति मैथुन, अधिक कूदना , अधिक तैरना, चलना, व्यायाम, आदि चेष्टायें उचित रूप से न करना, चोट लगना इत्यादि सन्धिवात के कारण बनते है / साथ ही मल मूत्रादि तथा अधारणीय वेगों का धारण करना, दिवा स्वप्न, चिन्ता, शोक, रस रक्त आदि धतुओं का क्षय होना आदि सन्धिवात रोग के मुख्य कारण हैं / इस रोग का सम्बन्ध उपदन्श और सूजाक आदि से भी है /

सन्धिवात की सम्प्राप्ति ;   

[१] आयुर्वेद में बताया गया है कि अनुचित आहार विहार  आदि उपर्युक्त कारणों से वायु प्रकुपित होकर शरीर की सभी सन्धियों में पहुन्चकर वहां के श्लेष्मक कफ की मात्रा को घटा देती है, जिससे सन्धिवात व्याधि के लक्षण मिलते हैं /

[२] आधुनिक विग्यान [modern science] में सन्धिवात की विकृति – सम्प्राप्ति [pathogenesis] इस प्रकार है /

सन्धियों में सायनोवियल नामक स्तरकला होती है, जो एक द्रव का स्राव करती है /य्ह श्राव सन्धियों का स्नेहन करती है / किसी आघात, सन्क्रमण,प्रतिक्रिया आदि से उत्तेजित होकर प्रतिक्रिया में सायनोवियल द्रव अतिरिक्त द्रव का उत्पादन करता है जो कि शोथ की ओर अग्रसर होता है / कभी कभी विषाणु या जीवाणु भी सन्धियों को प्रभावित करते हैं /

सन्धिवात के लक्षण –

सन्धिवात से पीडित आतुर शरीर की सन्धियों को स्पर्श करने से और आकुन्चन तथा प्रसारण कराने से वायु की आवाज आती है / इसमे सन्धि शोथ का लक्षण पाया जाता है / इस सन्धि शूल में चलने में कठिनाई तथा अल्प कर्म्ण्यता, आकुन्चन तहा प्रसारण-कर्म के करने में वेदना आदि होने के लक्षण मिल सकते हैं /

सन्धिवात के रोगी को सर्व प्रथम जुलाब देकर उसकी कोष्ठ शुध्धि कर देनी चाहिये /

जुलाब के घटक द्रव्य – 

१२ ग्राम सोन्ठ तथा जौकुटी बारह घन्टे मिट्टी के कुन्दे में २५० ग्राम पानी में भिगायी हुयी बराब्र दूध के साथ [सम भाग] मिलाकर उबाले / इसमे गुलाब के फूल ३-४ और सनाय की ५-१० पत्ती उबाल्कर शेष दूध मात्र  रहने से कपड़े से छानकर रख लें तथा ३० से ४० ग्राम एरन्ड का तेल और शक्कर मिलाकर गुनगुना पिला दें /

इस जुलाब से कोष्ठ की शुध्धि एवम आंव की शुध्धि हो जाती है / इसके उपरान्त भीऊ विबन्ध रहे तो निम्न लिखित घटक दे –

हर्ड़ तत्वक २० ग्राम, सनाय पत्ती २० ग्राम, रेवन्द चीनी ५ ग्राम, सोन्ठ १० ग्राम, काली मिर्च ५ ग्राम, सौवर्चल ५ ग्राम और सेन्धा नमक १० ग्राम / इन सबको कूट पीसकर चूर्ण बना ले / रात्रि में सोते समय ३ से ५ ग्राम उष्णोदक [गरम पानी ] से ले / रोगी को कब्ज कतई न रहने दें /

उपदंश और फिरंग जनित सन्धिवात के रोगियों के लिये ;

व्याधिहरण १ रत्ती, अश्वगन्धा नागोरी १.५ ग्राम, चोप चिन्यादि चूर्ण १.५ ग्राम, शुध्ध कुचला आधा रत्ती

ऐसी एक मात्रा प्रात: – सायं [दो मात्रायें ] शहद के साथ चटायें एवम ऊपर से २५० ग्राम दूध में १५ ग्राम ब्राम्ही घ्ह्रूत मिलाकर पिलायें /

भोजन करने के बाद दोनों समय महारास्नादि काढा१५ मिलीलीटर, दशमूल १५ मि०ली० एवम बलारिष्ट १५ मि०ली० और कटेली पन्चान्ग अर्क १५ मि०ली० / ६० मि०ली० पानी के साथ और १ ग्राम त्रियोदशान्ग गूगल मिलाकर पिलायें /

सन्धियों पर सूजन तथा  ललाई अधिक रहने पर निम्न लेप करें –

शत्पुष्पादि लेप – सुबादाना, देवदार, अर्क दुग्ध, कूठ, हींन्ग और सेन्धा नमक सम भाग लेकर चूर्ण बनाकर जल में घोलकर लेप करने से सन्धि वात जन्य शोथ तीन दिन में घटकर लाभ मिलने लगता है /

अथवा

काली मिट्टी [ कुम्हार के घड़ा बनाने की चिकनी मिट्टी] २०० ग्राम, पुराना गुड़ – ५० ग्राम, मेथी दाना – ५० ग्राम, आम्बा हल्दी- ५० ग्राम – अच्छी तरह से भिगोकर , पीस कर, मसल कर, हल्के हाथ धीरे धीरे लेप करें / थोडा लेप सूखने पए गर्म और ठन्दी पट्टी का सेन्क करे / बृहत सैन्धवादि तेल की मालिश करें /  

्द्वितीय योग ;

१- शुध्ध कुचला २ तोला (२० ग्राम) २- जायफल ३ तोला (३० ग्राम ३- काली मिर्च ३ तोला (३० ग्राम) ४- आंवला १ तोला, हरड़ १ तोला, बहेड़ा एक तोला इन सभी द्रव्यों को अच्छी तरह से बारीक कूट पीस कर घृत कुमारी के रस में ३ दिन्तक घोंट कर एक एक रत्ती की गोलियां बना लें / सुबह शाम १ – ३ गोली तक सुषम [शीत-गरम] जल से दें /

चोपचीनी पाक ; १-२ तोला प्रात: सायं दूध के साथ सेवन करना चाहिये /

भोजन करने के बाद महारास्नादि क्वाथ १० ग्राम, बलारिष्ट १० ग्राम, दशमूल काढा १० ग्राम तीनों ३० ग्राम और ३० ग्राम उष्ण [गरम] जल मिलाकर कटेली अर्क [पन्चान्ग] २० ग्राम मिलाकर  एक एक ग्राम त्रियोदशा प्रयोग के साथ दें /

सन्धिवातारि गुटिका ;

हीराबोल, शुध्ध हिन्गुल और शुध्ध गुग्गुल तथा इसमें अश्वगन्धा-सत्व और महा रास्नादि -सत सम भाग लेकर दूध में घोटकर ५० मिलिग्राम की गोली बनाकर २-२ गोली दिन में तीन बार गर्म जल के साथ सेअवन करने से सन्धिवात में लाभ होता है /

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यह लेख कल्याण मासिक पत्रिका के आरोग्य अन्क, २००१ से लिया गया है जिसे कल्याण मासिक पत्रिका कार्यालय, पोस्ट- कल्याण पत्रिका, गोरखपुर, उ०प्र०, भारत द्वारा प्रकाशित किया गया है /

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“दीपावली” ; वर्ष २०१२


दीप-मालिकाओं का त्योहार “दीपावली” ; वर्ष २०१२ आप सभी आगन्तुकों को शुभ हो,

आप सभी के जीवन में धन , सम्पत्ति, सुख, सुविधा, यश का अवतरण हो……..

डा० डी०बी०बाजपेयी

भगवान धनवन्तरि देव ; आयुर्वेद और धन तेरस ; Lord Dhanavantari ; Ayurveda and Dhan teras


दीपावली भारत के लोगों के लिये एक महत्व पूर्ण त्योहार है / इस त्योहार की अपनी विशेषतायें भारत के विभिन्न प्रान्तों में धर्म के आधार पर, प्राचीन काल में घटित विशेष घटनाओं के आधार पर अपने अपने रीति रिवाजों के अनुसार मनाते हैं /

दीपावली के मुख्य त्योहार के पहले छोटी दीपावली मनाते है और उससे पहले “धन तेरस” मनाते हैं / हिन्दू मान्यताओं में बताया गया है कि इस दिन समुद्र मन्थन में स्वास्थ्य और आरोग्य के देवता भगवान धन्वन्तरि देव का पृथ्वी पर पदार्पण हुआ था / यानी इस दिन भगवान धनवनतरि देव एक हाथ में शन्ख, एक हाथ मॆं चक्र और एक हाथ मॆं अमृत कलश तथा एक हाथ मॆं जलूका लेकर समुद्र मन्थन के द्वारा आयुर्वेद का विग्यान लेकर अवतरित हुये /

ठीक दीपावली के दिन धन की देवी लक्षमी जी का जन्म हुआ अर्थात समुद्र मन्थन में  जिस दिन और जिस मुहूर्त में  दीपावली मनायी जाती है उसी  दिन लक्षमी जी का इस पृथ्वी पर आगमन हुआ या अवतरण हुआ / इस कारण से धनवनतरि देव को लक्ष्मी जी का बड़ा भाई  मानते है / धनवन्तरि देव जी का आगमन जहां एक ओर “स्वास्थय और जीवन रक्षा ” से जुड़ा हुआ माना जाता है , वही दूसरी ओर “धन और सम्पदा”  के लिये भगवती लक्षमी जी को जुड़ा हुआ मानते हैं /

मेरा निजी अनुभव है कि स्वास्थय रहने और आरोग्य प्राप्ति के लिये तथा धन और सम्पदा की प्राप्ति और कर्जों से मुक्ति के लिये प्रत्येक  हिन्दू  को भगवान धनवन्तरि देव की पूजा के साथ साथ लक्ष्मी जी की पूजा अर्चना करने से समुचित लाभ अवश्य मिलता है और दरिद्रता से मुक्ति मिलती है / पूजा स्थल में धनवन्तरि देव और माता लक्ष्मी को एक साथ भाई बहन की भावना स्वरूप मानकर साथ साथ पूजा अर्चना करना चाहिये /

Launching of Website “etgayurvedascan.com” on Dhanavantari jayanti 2012 ; Ayurveda Day ; आयुर्वेद दिवस ; धनवन्तरि जयन्ती २०१२ के शुभ अवसर पर “ईटीजीआयुर्वेदास्कैन डाट काम ” वेब साइट का शुभारम्भ


We have launched our Web site www.etgayurvedaintro.com on Dhanavatri Jayanti 2012 with a new objective concept of our services at a place, where all informations about our activities could be placed world wide to help the sick huminity.

आज आयुर्वेद के प्रवर्तक भगवान धनवन्तरि के आशीर्वाद से अपनी वेब साइट www.etgayurvedascan.com ड्ब्ल्यूड्ब्ल्यूद्ब्ल्यू.ईटीजीआयुर्वेदास्कैन.काम धनवन्तरि जयन्ती ; आयुर्वेद दिवस के शुभ दिन सभी विश्व व्यापी जगत के लोगों को सूचनार्थ शुरू कर रहे हैं, ताकि रुग्ण मानवता की सही सही सेवा की जाये, जन जन तक यह सन्देश पहुचे, यह कामना है /

कल्याण मासिक पत्रिका ; आरोग्य अन्क, जनवरी एवम फरवरी 2001 में प्रकाशित लेख शीर्षक “आयुर्वेद भगवान की देन”


आरोग्य अन्क २०१२ मे जनपद गोरखपुर , उत्तर प्रदेश राज्य से प्रकाशित मासिक पत्रिका कल्याण के अन्क के रूप में प्रकाशित की गयी थी / इस अन्क में ब्रम्हलीन जगदगुरू शकराचार्य स्वामी निरन्जन देव तीर्थ जी महाराज ने अपने अनुभूत आयुर्वेदिक फारमूलों को बताया है जिनके उपयोग करने से प्राण घातक बीमारियां भी नियन्त्रित हो जाती है /

पाठको के लिये इस प्रकाशित लेख की कापी प्रस्तुत है /

महर्षि चरक, सुश्रुत एवम वाग्भट्ट के अनुसार आयुर्वेद के मूल प्रवर्तक साक्षात भगवान हैं / भगवान के द्वारा इन्द्र को, इन्द्र से भरद्वाज को और भारद्वाज से अन्य रिशियों को आयुर्वेद की प्राप्ति हुयी / इस प्रकार आयुर्वेद अपने आप में सर्वान्ग सम्पूर्ण ईश्वरीय विग्यान है / आयुर्वेद के प्रवर्तक धनवन्तरि चौबीस अवतारों में से एक अवतार हैं / उनके द्वारा प्रदत्त आयुर्वेद में किसी प्रकार की कमी नही है / इसीलिये कल्प कल्पान्तर, युग युगान्तर के बाद भी आयुर्वेदिक औषधियां पूर्ण सावधानी से और विधि विधान के अनुसार नही बनने पर भी लाभ ही करती हैं / यदि उन्हे आयुर्वेद शास्त्र में निर्दिष्ट विधि के अनुसार उपयुक्त भूमि एवम उपयुक्त मुहूर्त में पूर्ण सम्मन के साथ पैदा किया जाय , मन्त्रादि के प्रयोग से उनकी रक्षाकी जाय, फिर शास्त्रीय विधि से सम्मान पूर्वक पूजन करके निमन्त्रण देकर लाया जाय और शास्त्रीय विधि से उनका निर्माण किया जाय , निदान पूर्वक रोग का निश्चय करके रोगी की अवस्था, शक्ति, क्षमता आदि का विचार करके प्रयोग किया जाय तो वे कभी भी हानि नही करेन्गी तथा सर्वथा लाभ दायक ही होन्गी /

अन्ग्रेजी दवाइयां अनेक यन्त्रों में छान छान कर तैयार की जाती हैं, फिर भी उनकी विपरीत प्रतिक्रिया [रिएक्शन] होने पर भयन्कर हानि होती है / इसके विपरीत देशी दवाइयां विधि पूर्वक न बनने पर भी लाभ भले न करें, पर हानि कारक तो होती ही नहीं /

यह कहते हुये कष्ट होता है कि बहुत कम वैद्य ऐसे हैं, जो आदि से अन्त तक अपनी देख रेख में औषधि का निर्माण कराकर उसका उपयोग करते हैं / देखा तो यह जाता है कि वैद्यराज महोदय के यहां काम करने वाले वैद्यक विद्या से सर्वथा अनिभिग्य सेवक लम्बी चौड़ी लिस्ट लेकर पंसारी की दूकान जाते हैं /

पन्सारी समझता है कि स्टाक में रखा  कूड़ा करकट निकालने का अवसर आ गया है / वह पुडिया बन्धवाकर ले जाता है , कूट छानकर औषधि बना लेता है / यह भगवान की ही देन है कि इस प्रकार की भी औषधि रोगि को लाभदायक भले ही न हो, नुकसान कभी नही करती / आयुर्वेदिक औषधियों में यह बड़ी विशेषता है कि वे धीरे धीरे लाभ करती है, किन्तु उनका प्रभाव स्थायी होता है , जबकि अन्ग्रेजी दवाइयां शीघ्र लाभ करती हैं किन्तु उनका प्रभाव स्थायी नही होता / यह भी दुख: के साथ कहना पडता है कि आज कल के नये वैद्य पाश्चात्य ढन्ग से बन ठन कर अपने आपको डाक्टर कहलाने में गौरव समझते हैं / जब कि शास्त्रों के अनुसार वैद्यों को अनुल्वण-सौम्य वेष धारण करना चाहिये / आयुर्वेद का अध्ध्यन भी आचार्यों के आग्यानुसार उपनयन पूर्वक होना चाहिये / स्पष्ट है कि उपनयन के अधिकारी ही आयुर्वेद विद्या पढने के अधिकारी हैं /

यहां महापुरुषों से प्राप्त कुछ अनुभूत योग दिये जाते हैं / उनको चिकित्सक के निर्देशानुसार काम मे लाना चाहिये /

आधाशीशी [आधा सिर दुखना]

शुध्ध देशी घी एवम चीनी में बनी हुयी जलेबी  रात को कान्से के बर्तन में दूध में भिगोना चाहिये / रात भर उसे  छत पर रखना चाहिये जिससे चन्द्रमा की किरणें उस पर पड़ें / प्रात: स्नान कर अधिकारानुसार सन्ध्या पूजा के पश्चात भगवान को निवेदन करके जितना वह हजम हो सके खाना चाहिये /

सब प्रकार के उदर रोगों [सन्ग्रहणी] के लिये

एक रत्ती शन्ख भस्म, एक रत्ती सिध्ध प्राणेश्वर रस, एक रत्ती रामबाण रस, आधी रत्ती स्वर्ण पर्पटी, आधा रत्ती मकरधवज – इन सबको मिलाकर दो पुड़िया बनानी चाहिये / एक सुबह और एक शाम को भूने हुये जीरे के चूर्ण और शहद के साथ लेना चाहिये /

पुरानी सन्ग्रहणी

सन्ग्रहणी में प्रात: – सायं राम बाण रस सादे पानी के साथ और मध्यान में  दो रत्ती सिध्ध प्राणेश्वर चावल के धोवन के पानी के साथ लेना चाहिये /

पथ्य; प्रात: काल पुराने चावल और मून्ग की खिचड़ी खाये और सायन्काल भूख लगे तो थोड़ा शुध्ध घी और चीनी का हलवा खा लें /

ब्लड सुगर या यूरिन सुगर , खून , पेशाब की चीनी

इस रोग में दूध दही से बचना चाहिये / इसमे न अधिक बैठना चाहिये और न अधिक लेटे रहना चाहिये / अधिक नीन्द भी नही लेना चाहिये/ अधिक से अधिक पुट अभ्रक भस्म शहद के साथ  लेना चाहिओये / रात्रि में सोते समय एक तोला त्रिफला सादे जल के साथ लेना चाहिये /
 बिना दवाई के भी सूगर रोग गर्मी के दिनों में चैत्र से भाद्र पद तक जौ की रोटी खाने से और आश्विन से फाल्गुन तक बाजरे की रोटी, मून्ग की दाल, मेथी पालक, बथुआ एवम चौलाई का शाक खाने से मिट सकती है /

तमक श्वास [इस्नोफीलिया] दमा

इसमें करपूर रस और अभ्रक भस्म एक एक रत्ती लेना चाहिये / सूर्यास्त के बाद भोजन नही करना चाहिये/ घी या तेलों में तली हुयी वस्तुयें नही खानी चाहिये / भारी वस्तु भी नही लेनी चाहिये /

एग्जिमा
कल्पूर एवम नारियल का तेल तथा नीम्बू का रस समान मात्रा में खरल करके मल्हम बना लें / इसका दिन में दो बार प्रयोग करना चाहिये /

आन्ख की दवा
सभी प्रकार के आन्ख  के रोगों में नीम्बू के रस को मिश्री की एक तार की चासनी में डालकर ठन्डा करके , सादे कान्च की शीशी में भर ले / इसे काजल की तरह दिन में दो बार आन्ख में लगायें /

{ प्रेषक ; ब्रम्हचारी सर्वेश्वर चैतन्य }

कल्याण आरोग्य अन्क से साभार ; प्रकाशक ; कल्याण, गोरखपुर , उ०प्र०, भारत