कल्याण मासिक पत्रिका ; आरोग्य अन्क, जनवरी एवम फरवरी 2001 में प्रकाशित लेख शीर्षक “आयुर्वेद भगवान की देन”


आरोग्य अन्क २०१२ मे जनपद गोरखपुर , उत्तर प्रदेश राज्य से प्रकाशित मासिक पत्रिका कल्याण के अन्क के रूप में प्रकाशित की गयी थी / इस अन्क में ब्रम्हलीन जगदगुरू शकराचार्य स्वामी निरन्जन देव तीर्थ जी महाराज ने अपने अनुभूत आयुर्वेदिक फारमूलों को बताया है जिनके उपयोग करने से प्राण घातक बीमारियां भी नियन्त्रित हो जाती है /

पाठको के लिये इस प्रकाशित लेख की कापी प्रस्तुत है /

महर्षि चरक, सुश्रुत एवम वाग्भट्ट के अनुसार आयुर्वेद के मूल प्रवर्तक साक्षात भगवान हैं / भगवान के द्वारा इन्द्र को, इन्द्र से भरद्वाज को और भारद्वाज से अन्य रिशियों को आयुर्वेद की प्राप्ति हुयी / इस प्रकार आयुर्वेद अपने आप में सर्वान्ग सम्पूर्ण ईश्वरीय विग्यान है / आयुर्वेद के प्रवर्तक धनवन्तरि चौबीस अवतारों में से एक अवतार हैं / उनके द्वारा प्रदत्त आयुर्वेद में किसी प्रकार की कमी नही है / इसीलिये कल्प कल्पान्तर, युग युगान्तर के बाद भी आयुर्वेदिक औषधियां पूर्ण सावधानी से और विधि विधान के अनुसार नही बनने पर भी लाभ ही करती हैं / यदि उन्हे आयुर्वेद शास्त्र में निर्दिष्ट विधि के अनुसार उपयुक्त भूमि एवम उपयुक्त मुहूर्त में पूर्ण सम्मन के साथ पैदा किया जाय , मन्त्रादि के प्रयोग से उनकी रक्षाकी जाय, फिर शास्त्रीय विधि से सम्मान पूर्वक पूजन करके निमन्त्रण देकर लाया जाय और शास्त्रीय विधि से उनका निर्माण किया जाय , निदान पूर्वक रोग का निश्चय करके रोगी की अवस्था, शक्ति, क्षमता आदि का विचार करके प्रयोग किया जाय तो वे कभी भी हानि नही करेन्गी तथा सर्वथा लाभ दायक ही होन्गी /

अन्ग्रेजी दवाइयां अनेक यन्त्रों में छान छान कर तैयार की जाती हैं, फिर भी उनकी विपरीत प्रतिक्रिया [रिएक्शन] होने पर भयन्कर हानि होती है / इसके विपरीत देशी दवाइयां विधि पूर्वक न बनने पर भी लाभ भले न करें, पर हानि कारक तो होती ही नहीं /

यह कहते हुये कष्ट होता है कि बहुत कम वैद्य ऐसे हैं, जो आदि से अन्त तक अपनी देख रेख में औषधि का निर्माण कराकर उसका उपयोग करते हैं / देखा तो यह जाता है कि वैद्यराज महोदय के यहां काम करने वाले वैद्यक विद्या से सर्वथा अनिभिग्य सेवक लम्बी चौड़ी लिस्ट लेकर पंसारी की दूकान जाते हैं /

पन्सारी समझता है कि स्टाक में रखा  कूड़ा करकट निकालने का अवसर आ गया है / वह पुडिया बन्धवाकर ले जाता है , कूट छानकर औषधि बना लेता है / यह भगवान की ही देन है कि इस प्रकार की भी औषधि रोगि को लाभदायक भले ही न हो, नुकसान कभी नही करती / आयुर्वेदिक औषधियों में यह बड़ी विशेषता है कि वे धीरे धीरे लाभ करती है, किन्तु उनका प्रभाव स्थायी होता है , जबकि अन्ग्रेजी दवाइयां शीघ्र लाभ करती हैं किन्तु उनका प्रभाव स्थायी नही होता / यह भी दुख: के साथ कहना पडता है कि आज कल के नये वैद्य पाश्चात्य ढन्ग से बन ठन कर अपने आपको डाक्टर कहलाने में गौरव समझते हैं / जब कि शास्त्रों के अनुसार वैद्यों को अनुल्वण-सौम्य वेष धारण करना चाहिये / आयुर्वेद का अध्ध्यन भी आचार्यों के आग्यानुसार उपनयन पूर्वक होना चाहिये / स्पष्ट है कि उपनयन के अधिकारी ही आयुर्वेद विद्या पढने के अधिकारी हैं /

यहां महापुरुषों से प्राप्त कुछ अनुभूत योग दिये जाते हैं / उनको चिकित्सक के निर्देशानुसार काम मे लाना चाहिये /

आधाशीशी [आधा सिर दुखना]

शुध्ध देशी घी एवम चीनी में बनी हुयी जलेबी  रात को कान्से के बर्तन में दूध में भिगोना चाहिये / रात भर उसे  छत पर रखना चाहिये जिससे चन्द्रमा की किरणें उस पर पड़ें / प्रात: स्नान कर अधिकारानुसार सन्ध्या पूजा के पश्चात भगवान को निवेदन करके जितना वह हजम हो सके खाना चाहिये /

सब प्रकार के उदर रोगों [सन्ग्रहणी] के लिये

एक रत्ती शन्ख भस्म, एक रत्ती सिध्ध प्राणेश्वर रस, एक रत्ती रामबाण रस, आधी रत्ती स्वर्ण पर्पटी, आधा रत्ती मकरधवज – इन सबको मिलाकर दो पुड़िया बनानी चाहिये / एक सुबह और एक शाम को भूने हुये जीरे के चूर्ण और शहद के साथ लेना चाहिये /

पुरानी सन्ग्रहणी

सन्ग्रहणी में प्रात: – सायं राम बाण रस सादे पानी के साथ और मध्यान में  दो रत्ती सिध्ध प्राणेश्वर चावल के धोवन के पानी के साथ लेना चाहिये /

पथ्य; प्रात: काल पुराने चावल और मून्ग की खिचड़ी खाये और सायन्काल भूख लगे तो थोड़ा शुध्ध घी और चीनी का हलवा खा लें /

ब्लड सुगर या यूरिन सुगर , खून , पेशाब की चीनी

इस रोग में दूध दही से बचना चाहिये / इसमे न अधिक बैठना चाहिये और न अधिक लेटे रहना चाहिये / अधिक नीन्द भी नही लेना चाहिये/ अधिक से अधिक पुट अभ्रक भस्म शहद के साथ  लेना चाहिओये / रात्रि में सोते समय एक तोला त्रिफला सादे जल के साथ लेना चाहिये /
 बिना दवाई के भी सूगर रोग गर्मी के दिनों में चैत्र से भाद्र पद तक जौ की रोटी खाने से और आश्विन से फाल्गुन तक बाजरे की रोटी, मून्ग की दाल, मेथी पालक, बथुआ एवम चौलाई का शाक खाने से मिट सकती है /

तमक श्वास [इस्नोफीलिया] दमा

इसमें करपूर रस और अभ्रक भस्म एक एक रत्ती लेना चाहिये / सूर्यास्त के बाद भोजन नही करना चाहिये/ घी या तेलों में तली हुयी वस्तुयें नही खानी चाहिये / भारी वस्तु भी नही लेनी चाहिये /

एग्जिमा
कल्पूर एवम नारियल का तेल तथा नीम्बू का रस समान मात्रा में खरल करके मल्हम बना लें / इसका दिन में दो बार प्रयोग करना चाहिये /

आन्ख की दवा
सभी प्रकार के आन्ख  के रोगों में नीम्बू के रस को मिश्री की एक तार की चासनी में डालकर ठन्डा करके , सादे कान्च की शीशी में भर ले / इसे काजल की तरह दिन में दो बार आन्ख में लगायें /

{ प्रेषक ; ब्रम्हचारी सर्वेश्वर चैतन्य }

कल्याण आरोग्य अन्क से साभार ; प्रकाशक ; कल्याण, गोरखपुर , उ०प्र०, भारत

 

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