महीना: जनवरी 2013

Use of HOMOeopathic Mother tinctures combination in Oral Cancer and Post Operative Cancer cases


I have used successfully some Homoeoapthic Mother tinctures in cases of Oral Cancer and Post Operative Cancer cases.

The problem arised after the findings got from the ETG AyurvedaScan reports that the condition for which treatment should be given to patient; there are no perfect medicaments in ayurveda for covering the total condition in appearance. This was the turning point where I have to think over it to use the other medicaments from other medical systems to complete the 100 percent covering of the syndromes of the patient and should not be left untreated any vital part in view of the treatment purposes.

Fortunately my attention went to Homoeopathic Mother tinctures, which I was using since over 50 years of my medical practice. Although Ayurveda medical system is totally perfect to treat any physical, mental or bodily ailments, but to make treatment much more fool proof in every angle, some other medicaments are needed either from Unani system of medicines or from Homoeopathic medical system.

Since my childhood, I was observing the use of Homoeopathic Mother Tinctures by my Father Late Vaidya Dr. Shitala Sahai Bajpai, a graduate of Ayurveda from Banaras [now Varanasi] and a graduate of Homoeopathy from Calcutta [now Kolakata] , practicing both in Homoeopathy and Ayurveda. I have seen many miraculous cures done by my Father and I still remember his caliber, how he was treating Chronic and Long Lasting disease conditions with their management.

Now I and my son Dr Anurag Bandhu Bajpai and my daughter Dr Mrs Sweta Tewari both are using Homoeopathic Mother Ticnctures successfully in almost incurable conditions. The results are very fast just like Allopathic medicines acts in the body and relieves instantly within fifteen minutes in very acute conditions, but relieves also in Chronic disease conditions and long lasting diseases.

In Cases of CANCER, where progress is almost nil in Allopathic treatment, homoeopathy mother tinctures acts perfectly to inhibit the progress of disease conditions and puts the curable effects in the disease conditions.

Generally some Homoeopathic mother tinctrues have been found effective in CANCER treatment.These are given below;

[a] ECHINESIA Q
[b] AVENA SATIVA Q
[c] ALFALFA Q
[d] HYDRASTIS Q
[e] CHIRAITA Q
[f] KALMEGHA Q
[g] TINOSPORA CARDI Q

and there is a number of Homoeopathic mother tinctures are available to cure or treat the ailing conditions of cancerous patient.

Physician community should view the potentials of the Homoeopathic medicaments in this dreaded disease conditions.

2012 in review


The WordPress.com stats helper monkeys prepared a 2012 annual report for this blog.

Here’s an excerpt:

About 55,000 tourists visit Liechtenstein every year. This blog was viewed about 450,000 times in 2012. If it were Liechtenstein, it would take about 8 years for that many people to see it. Your blog had more visits than a small country in Europe!

Click here to see the complete report.

ETG AyurvedaScan ; how the system detects the entire body problems and how accurate Ayurvedic-AYUSH treatment is possible?; ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन सिस्टम किस तरह से सारे शरीर का परीक्षण करता है और कैसे आयुर्वेद-आयुष द्वारा सही और सटीक इलाज सम्भव करता है ?


आयुर्वेद की नयी निदान ग्यान की क्रान्तिकारी तकनीक ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन द्वारा किस तरह से सारे शरीर का परीक्शण होकर किस तरह से सही और सटीक सभी बीमारियों का इलाज समभव हो जाता है , जिनके बारे मे धारणा है कि ऐसी बीमारियों का इस दुनियां में कोई इलाज नही है ?

सही बात यह है कि आयुर्वेद की इस क्रान्तिकारी तकनीक द्वारा सम्पूर्ण शरीर की तीन आयामी यानी 3 Dimentional अध्ध्य्यन किया जाता है / यह अध्ध्यन ठीक उसी तरह से है जिसे उदाहरण स्वरूप किसी पेड़ से तुलनात्मक रूप में कर सकते हैं / कैसे ?

यहां दिये गये स्केच चित्र के {A} भाग का अवलोकन कीजिये / इसमें दिये गये एक पेड़ को देखिये और उसका बेसिक structure समझिये / कोई भी पेड़ तीन मुख्य हिस्सों में बन्ट जाता है / ये हिस्से होते हैं [१] जड़ यानी root [२] तना यानी trunk और [३] ऊपर की शाखा यानी branches के साथ अन्य / यह एक पेड़ का मूल स्वरूप है , जो तीन हिस्सों में मुख्यतया बटा हुआ होता है / इस पेड़ की सारी जीवन कथा इन्ही तीन भागों मे समाहित है /

ETGchart

अब इसी स्केच चित्र के दूसरे {B} भाग को देखिये और समझिये / यही वह मुख्य समझने वाला तत्व है जो ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन को विशिष्ट बनाता है / दरअसल आयुर्वेद के मौलिक सिध्धान्तों के निदान और शरीर के रोगों के निदान ग्यान को त्रिआयामी यानी Three Dimentional रूप यहीं बनता है / जब इस तकनीक के फाइनल रिजल्ट मिलते हैं तो इसमें तीन स्तर का निदान हो जाता है / इन तीन स्तरों मे पहला स्तर Manifestation / Symptoms / Unhealthy conditions का होता है यानी वह मुख्य तकलीफें या वह मुख्य पीड़ायें, जिनके इलाज के लिये मरीज डाक्टर के पास आता है / दूसरा स्तर उस pathway यानी रास्ते का होता है , जिससे होकर मुख्य तकलीफ या व्यथा या पीड़ा उस स्थान से चलती है जहां मुख्य तकलीफ की जड़ बुनियाद होती है / यानी तीसरा स्तर जहां pathophysiology या pathology पैदा होती है, उन Organs / Vital parts / Torso Organs में , जिनकी कार्य विकृति या विकृति के कारण मौजूदा तकलीफ होती है और जिस तकलीफ का इलाज मरीज डाक्टर के पास कराने के लिये आता है / यहा उल्लेखनीय होगा और कहना होगा कि त्रिआयामी यानी Three Dimentional Diagnosis की सुविधा ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन के जरिये मिल जाती है /

यहां दिये गये स्केच चित्र के तीसरे भाग यानी {C} हिस्से को देखिये / यह वह महत्वपूर्ण चरण हैं जहां आयुर्वेद की दवाओं के multi-functional area का लोहा मानना पड़ता है / ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन की फाइन्डिन्ग्स रिपोर्ट के तीन आयामी पहलू के अध्ध्य्यन के पश्चात यह विभाग सुविधा देता है कि ऐसी आयुर्वेदिक औषधियों का चुनाव किया जाये तो [१] पहला और [२] दूसरा और [३] तीसरा यानी तीनों चरण की बीमारियों को एक ही दवा या बहुल दवा और उसका अनुपान बीमारी को जड़ बुनियाद से आरोग्य प्रदान कर देने की क्षमता पैदा कर देता है / चाहे उस बीमारी का कोई भी नाम दिया गया हो, चाहे उस बीमारी का कितना भी डरावना नाम हो , चाहे उस बीमारी का कितना भी भयभीत करने वाला आकार प्रकार बता दिया गया हो या बीमारी को यह बता दिया गया हो कि इसका कोई इलाज नही है /

यह बात सब्को समझ लेना चाहिये कि कोई भी बीमारी होगी तो यह शरीर में ही पैदा होगी और इस बीमारी को शरीर के विकृत अन्ग ही पैदा करेन्गे / बीमारी कहीं बाहर से नही आयेगी , न ही इसे कोई implant कर सकता है / ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन की इस तकनीक से तीन आयामी यानी पहला मुख्य बीमारी के लक्षण दूसरा इस बीमारी को लाने वाला या बनाकर लाने वाला रास्ता और तीसरा मुख्य बीमारी को पैदा करने वाला शरीर का अन्ग, आदि सभी बातों का पता चल जाता है / जिससे बीमारी कोई भी हो और उसका कोई भी नाम दिया गया हो , सभी आरोग्य होते है /

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डायबिटीज यानी खून में शक्कर का अधिक होना ; ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन आधारित इलाज से पूर्ण आरोग्य सम्भव


खून में शक्कर अथवा सूगर का अधिक पैदा होना जैसी तकलीफों को “डायबिटीज” या Diabetes के नाम से जानते है / यह बहुत सामान्य और तेजी से फैलने वाला रोग साबित हो रहा है /

लगभग ६० साल पहले डायबिटीज बीमारी को कोई जानता तक नही था / इसका कारण यह था कि निदान ग्यान के लिये कोई माकूल और भरोसे मन्द तकनीक नही थी, जो यह पहचान कर ले कि अमुक व्यक्ति को डायबिटीज हुयी है / कुछ पहचान अवश्य थी जिनसे यह पता चल जाता था कि अमुक को डायबिटीज की शिकायत है , मसलन [१] पेशाब करने के बाद पेशाब में चीन्टी अथवा चींटॊ का झुन्ड लगना [२] बार बार पेशाब होना [३] एक बार में बहुत अधिक मात्रा में पेशाब का होना [४] रात में कई कई बार पेशाब होना, जिससे नींद बार बार टूटना [५] प्यास बहुत अधिक लगना और बार बार बहुत ज्यादा मात्रा में पानी का पीना [५] भूख बहुत लगना [६] शरीर का मोटा होता जाना या शरीर अगर मोटा है तो दुबला होता जाना [७] त्वचा का रूखा हो जाना [८] घाव या कट जाने या खरोंच लग जाने के बाद जल्दी पकना और मवाद पड़ जाना तथा घाव का जल्दी जल्दी नही भरना [९] नपुन्सकता का आना [१०] महिलाओं में गर्भ धारण करने की क्षमता का कमजोर होना [११] नेत्रों की दॄष्टि का कमजोर होना आदि आदि /

जब यह सब लक्षण होते थे तो मधु-प्रमेह या डायबिटीज की आशन्का होती थी और यह निदान होता था कि मधु प्रमेह का इलाज रोगी का किया जाना चाहिये, ऐसा निर्धारित करते थे / ६० साल पहले लोग आयुर्वेदिक दवा और पथ्य परहेज का पालन करके डायबिटीज पर नियन्त्रण कर लेते थे और पूर्ण जीवन प्राप्त करते थे / उस जमाने में केवल पेशाब की जान्च द्वारा ही पता करते थे कि डायबिटीज है या नही है / बेनेडिक्ट सोल्यूशन को परख नली में डालकर स्प्रिट बर्नर से गर्म करके और फिर उसमें पेशाब की कुछ बून्दें छोड़्कर सोल्य़ूशन का रन्ग देखा जाता था और इस रन्ग परिवरतन को देखकर निर्धारित करते थे कि कितनी पेशाब में शूगर है / आयुर्वेदिक दवा का कितना असर होता है यह भी इसी टेस्ट से पता चल जाता था /

इस जमाने में डायबिटीज को दो भागों में शुमार करते थे / [१] Glycosuria [२] Glycoceamia [डायबेटीज इन्सीपिडस और डायबेटीज मेलायटिस ]
ग्लाइकोसूरिया का मतलब सीधा सीधा यही होता था कि मरीज को पेशाब के साथ शक्कर जाने की शिकायत है / ग्लायकोसीमिया का मतलब यही होता था कि खून में शक्कर अधिक होने की शिकायत है / साठ के दशक में खून की शक्कर जान्चने का तरीका बहुत पेचीदा होता था /

इससे पहले लोगों को और चिकित्सक समुदाय को यही पता था जैसा कि उस जमाने की Practice of Medicine की किताबों मे जिक्र मिलता है / बदलते समय के साथ साथ आज हाल यह है कि डायबेटीज टाइप १ से लेकर डायबेटीज टाइप ४ तक का शुमार किया जाने लगा है /

फिर भी आधुनिक चिकित्सा विग्यान के चिकित्सानुकूल क्षेत्र में डाय्बेटीज रोग के इलाज के लिये नित नई बातें सामने आ रही है / इस पर अध्ध्य्यन भी किये जा रहे हैं /

आयुर्वेद चिकित्सा विग्यान में भी आयुर्वेद के चिकित्सक प्रयोग कर रहे हैं लेकिन यह सब औषधियों को लेकर है / क्या आयुर्वेद के मौलिक सिध्धन्तों पर इस रोग के बारे में कोई अध्ध्यन हुआ है ? ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन आधारित अध्ध्यन कई साल पहले किया गया था, जिसमे १०० (एक सौ) मरीजों का पूरा रिकार्ड अध्ध्यन करके हमने अपने निष्कर्ष इसी वेब ब्लाग पर देकर सारी दुनियां को यह बताने की कोशिश की है, जो नीचे दी गयी है ;

१- यह कि pancrease अकेले डायबिटीज की बीमारी पैदा करने के लिये जिम्मेदार नही है
२- यह कि Liver अगर ठीक काम न करे या Liver Patho-physiology हो तो भी यह बीमारी होती है
३- यह कि small intestines ठीक कार्य न करे या small intestines की patho-physiology हो, तो भी यह तकलीफ होती है /
४- यह कि Gall Bladder और spleen दोनो का सम्मिलित कार्य यानी pathophysiology असामान्य हो तो भी यह तकलीफ होगी
५- यह कि Large Intestine की pathophysiology होगी तो भी डायबिटीज की बीमारी होती है
हमारे इस निष्कर्ष की बहुत आलोचना की गयी और यह चिकित्सकों के बीच में आलोचना का विषय बन गया / इस अनुसन्धान के प्रकाशन के बाद लोगों ने ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन की इन findings की जमकर खिल्ली उड़ाई / लेकिन इस ETG findings के प्रकाशन के डेढ साल बाद इस को उस समय बल मिल गया और हमारी findings को सही रास्ता मिला , जब जापान के वैग्यानिकों नें अपने प्रयोगों से यह सिध्ध करके सारी दुनियां को बताया कि डायबेटीज के लिये अकेले Pancrease जिम्मेदार नही है , बल्कि Liver के कारण भी डायबिटीज हो सकती है / जापान के वैग्यानिकों के यह सब निष्कर्ष भारत के अन्ग्रेजी और हिन्दी समाचार पत्रों मे प्रकाशित हुयी / हमारी बात सही निकली , जो खिल्ली उड़ा रहे थे, उनकी जबान बन्द हो गयी /

कुछ दिनों के अन्तराल के बाद ब्रिटिश वैग्यानिकों के शोध करताओं नें यह निष्कर्ष निकाला कि छोटी आन्तों के कार्य विकृति के कारण भी डायबिटीज होती है / अगर छोटी आन्तों की लम्बाई को काटकर छोटा कर दिया जाय तो डायबिटीज पर कन्ट्रोल किया जा सकता है /

इसके कुछ दिनों बाद आस्ट्रेलिया के वैग्यानिकों ने शोध करके बताया कि बड़ी आन्तों के कारण भी डायबिटीज होती है / अगर बडी आन्तों को काटकर लम्बाई घटा दी जाय तो डाय्बिटीज को कन्ट्रोल कर सकते हैं /

वैग्यानिकों के ऐसे निष्कर्ष से ETG AyurvedaScan की findings को बहुत सपोर्ट मिला / इसलिये कि अगर यह शोध हमे करने पड़्ते तो इसमें करोड़ो रुपये खर्च होते , जो हमारी क्षमता से परे है और हमारे लिये सपने जैसी है /

डाय्बेटीज के मरीजों का इलाज आज दिन भी ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन की परीक्षण फाइन्डिन्ग्स से किया जा रहा है / सभी मरीज लाभान्वित हुये है / हमे शत प्रतिशत रिजल्ट मिलते है /

एक बात और, Type 1और Type 2 और Type 3 [beginning] के मरीज जल्दी ठीक होते है जब कि टाइप ३ [एडवान्स] और टाइप ४ को ठीक होने में तुलनात्मक स्वरूप में अधिक समय लगता है / ऐसे मरीजों में हाई ब्लड प्रेशर या हृदय रोग यदि होता है तो वह भी उपचार के साथ साथ सुरक्षित होते है और बेहतर तरीके से ठीक होते हैं / बहुत एड्वान्स लेवल के मरीज यद्यपि निदान के डृष्टि कोण से सही बीमारियों का पता ई०टी०जी० आयुर्वेदस्कैन के जरिये रिपोर्ट के कर लेते हैं लेकिन समस्या औषधियों के प्रभाव को लेकर होती है और बीमारी के management तथा रोग के treatment को लेकर होती है, जो सिर्फ आरोग्यशाला या पन्चकर्म केन्द्र में ही रहकर की जा सकती है /

इस रोग में अगर रोगी परहेज और औषधियों का कुछ समय तक उपयोग करे तो टाइप एक तथा टाइप दो डायबिटीज अवश्य ठीक हो जाती है /

Tribhuvan Kirti Ras ; an Ayurvedic classical remedy for Winter Season


Every year winter season comes and while its commencement, it brings many health problems with the persons almost every one of all ages. Those who are living in those areas, where almost all months of a year, winter or winter like atmosphere persists, they also feel problems from more cold.

In those countries, where atmosphere of winter is persists around the year, in this region the skin of the person becomes more harder than comparatively to person of the tropical region. The persons, who are living in a cold atmosphere, their skin quality is somehow changed comparatively to those who are living in tropical regions and where cold or winter persists only few days or few months.

Case studies with the help of ETG AyurvedaScan system reveals that traces recorded from European countries and Tropical regions patients are differs from elevation , which is due to hard and soft skin of the patient belongs to specific regions. Where cold season is very prominent the skin of the person are thick and deposition of fat layer in under skin persists.

Although the diagnosis of disorders are same, ayurvedic fundamentals evaluations are same and no differences seen in between the results except the hights and longitudinal appearence of traces, which is due to skin of the subjects undergone for the test.

However, this dose not matter. Here TRIBHUVAN KIRTI RAS is beneficial in the following ailing conditions;

1- Cures exposure of cold either from cold of winter or wetting in rain
2- Used in almost all kinds of FEVER of any origin, whatever they may be.
3- Lower down HIGH FEVER just like PARACETAMOL do in feverish conditions.
4- suppressed sweat comes out after use of this remedy
5-= Very fast acts in Just appeared fever
6- acts fast in Phlegm-cough-Fever conditions
7- Useful in Pneumonia and Pneumonia like syndromes
8- Influenza of any origin and anywhere
9- Useful in small pox and measles and like syndromes

Doses; One /two tablets should be taken four hourly with tea or warm water or Ginger Tulasi tea

Ayurveda have many remedies for winter ailing conditions, TRIBHUVAN KIRTI RAS is one of them. Those who desire they should use this safe remedy.