आयुर्वेद की औषधियों के प्रकार ; Different kinds of Ayurvedic drugs


आयुर्वेद की औषधियों ो बनाने की कल्पना आयुर्वेद के मनीषियों नें समय समय पर प्राप्त अनुभवों के आधार पर की है / एक वर्ष में छह रितुयें और इन रितुओं में होने वाली वनस्पतियों तथा जीव जन्तु और मिनरल्स हमेशा और हर समय उपलब्ध नही होते हैं / इस कारण देश, काल और परिस्तिथियों के अनुसार आयुर्वेद्ग्यों नें प्रकृति से प्राप्त मेडिकामेन्ट्स को हमेशा चिकित्स्योपयोगी और चिकित्सा कार्य के लिये हमेशा available रहे और जब भी आवश्यकता हो उनका उपयोग किया जा सके , इसके लिये औषधियों के गुणों को सनरक्षित करने के लिये तरह तरह की “औषधीय कल्पनाओं ” की व्यवस्था की, ताकि औषधियों की जब भी जरूरत हो चिकित्सा कार्य के लिये हमेशा उपलब्ध रहें /

चिकित्सा कार्य में उपयोग के लिये आयुर्वेद ने कई तरह की औषधि कल्पनायें की है / “औषधि कल्पना” से यहां मतलब है कि आयुर्वेद की दवा किस स्वरूप में चिकित्सा कार्य के लिये उपलब्ध होती हैं /

१-फान्ट ; कुटी हुयी या दरदरा कर चूर्ण बनायी हुयी काष्ठ औषधि को खौलते हुये पानी में डाल देते है और फिर उसे कुछ समय बाद यथा पानी गुन्गुना और पीने लायक होने पर छानकर पीते है, इसे फान्ट के नाम से जानते है / उदाहरण के लिये कुटज छाल का दरदरा चूर्ण उके विधि से बनाकर उपय्पोग करने से Ameabic Colitis, Bloody dysentary, Inflammatory condition of bowels, Irritable bowel syndromes तथा अन्य छोटी और बड़ी आन्तों की बीमारियों को दूर करने में अमोघ है /

२- हिम ; जब किसी औषधीय द्रव्य को पानी में भिगोकर और छानकर तुरन्त पी लेते है या फिर औषधीय द्रव्य को कुछ घन्टे पानी में भिगोकर और छानकर या नितार कर पीते है या कुल्ला करते हैं या अन्य किसी चिकित्स्कीय काम के लिये लेते है, ऐसी औषधि कलपना को “हिम” के नाम से जानते हैं / उदाहरण के लिये धनिया के बीजों को पानी मे भिगोकर तुरन्त अथवा कुछ समय भीगने के बाद और इस भीगे पानी को छानकर उपयोग करते हैं , इसे हिम कहते है / ग्यात हो कि धनिया का भिगोया हुआ पानी Hyper-acidity और digestive disorders को दूर करने के लिये एक घरेलू औषधि है /

३- क्वाथ ; इसे लगभग सभी आयुर्वेद के प्रेमी जानते है, इसे “काढा बनाना” के नाम भी जानते हैं / आयुर्वेद की बहुत सी औषधियां बिना काढा के बन ही नही सकती है /
मोटे तौर पर यह चाय बनाने के समान की औषधि कलपना कही जा सकती है / उदाहरण के लिये अदरक, तुलसी और काली मिर्च का काढा जुखाम, सर्दी, खान्सी, मलेरिया बुखार आदि के लिये बहु उपयोगी घरेलू औषधि जानी जाती है /

४- कल्क ; तरह तरह की औषधियों के मिष्रण या एकल औषधियों को जब “चटनी” की तरह या paste की तरह गीला गीला पीस लिया जाता है तो इसे कल्क कहते है / उदाहरण के लिये ताजा आवला को पीसकर या ताजी अदरख को पीसकर उसे paste जैसा बनाकर खाने के लिये या औषधिओ के स्वरूप में उपयोग करते है / सब्जी में डाले जाने वाले मसाले जिन्हे चटनी जैसा पीसकर उपयोग करते हैं , यही आयुर्वेद का “कल्क” औषधि कलपना है /

५- स्वरस ; गीली या ताजी औषधियों को कूट पीस कर जब निचोड़ कर उनका रस निकालते है तो इसे स्वरस के नाम से जानते है / फलों से निकाले गये रस, निम्बू जैसे द्रव्यों के रस भी एक प्रकार के स्वरस होते हैं / नीम की पत्तियों को थोडा पानी का छीटा मार कर चटनी की तरह पीसकर और फिर कपडे मे रखकर निचॊड़ते है, प्राप्त रस को स्वरस कहते हैं /

आयुर्वेद की औषधियों को सेवन करने का यह सर्वोत्कृष्ट तरीका है / अनुभव से देखा गया है कि उक्त पान्च कल्पनाओं से तैयार दवाओं से इलाज करने से रोगी का रोग बहुत शीघ्रता से ठीक होता है / िसका कारण यह है कि द्रव्य स्वरूप में अथवा liquid form मे दवाये होने से जठराग्नि इसे बहुत शीघ्रता से पचा लेती है यानी दवा का assimilation बहुत तेज होता है और रक्त में शीघ्रता से मिलने के कारण इसका असर बहुत तेज होता है /

लेकिन समस्या यह आती है कि इस तरह से बनी हुयी दवायें बहुत से रोगियों अथवा अधिकान्श लोगों को पसन्द नही आती है / इसे ध्यान मे रखते हुये आयुर्वेदग्यों नें अन्य सुगम और स्वादिष्ट और सरल तरीका अपना कर तरह तरह की कल्पनायें प्रस्तुत की हैं , जैसे, वटी, चूर्ण,अवलेह, आसव, अरिष्ठ, घृत, तेल, मीठा शरबत, अर्क. रस, रसायन आदि आदि जिन्हे बहुत बेहतर तरीके से उपयोग करते है /

बहुत सी औषधियां ऐसी भी है जो खाने के साथ अथवा शराब alcohol, brandy, rum,whisky के साथ अथवा नाश्त या भोजन के साथ लेने का प्रावधान है /

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