Placebo treatment in United Kingdom ; प्लैसिबो ट्रीट्मेन्ट की शुरुआत अब इंगलैन्ड में भी


होम्योपैथी के जनक डा० हहनेमान ने मरीजों की चिकित्सा के लिये उनकी सुविधा के अनुसार जब दवा नही देने की जरूरत समझते थे, तो वे मरीजों को खाली sugar of milk अथवा pilules अथवा शक्कर की गोली का सेवन कराते थे, ताकि मरीज यह समझे कि वह अपने रोग के इलाज के लिये दवा खा रहा है /

अब यही काम ब्रिटिश चिकित्सक अपने मरीजों के लिये कर रहे है / दवा बाज़ार पत्रिका में प्रकाशित यह रिपोर्ट पढिये /

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इस तरह से दवा देने के भ्रम का सबसे पहले जिक्र जरमनी के होम्योपैथी के डाक्टर हाहनेमान ने अपनी होम्योपैथी के शोध के समबन्ध में प्रकाशित शोध ग्रन्थ आर्गेनान आफ मेडिसिन मे किया है, जिससे सारी दुनियां को इस बारे मे जानकारी मिली कि placebo treatment भी इलाज करने का एक तौर तरीका भी है /

आयुर्वेद और होम्योपैथी तथा यूनानी में placebo treatment के उपयोग का जिक्र ग्रन्थों में किया गया है / एलोपैथी में placebo treatment की बात किसी भी चिकित्सा ग्रन्थ मे नही कही गयी है / अब इसका कारण कुछ भी रहा हो, यह तो एलोपैथी के चिकित्सा वैग्यानिक ही बता सकते हैं /

आयुर्वेदिक और होम्योपैथी तथा यूनानी और प्राकृतिक चिकित्सा के साथ साथ मै अपने मरीजों में जब आवश्यकता होती है तो एलोपैथी की दवाओं का उपयोग मरीज को राहत देने के उद्देश्य
से करता रहता हूं / मेरी समझ में जब यह आता है कि मरीज को किसी दवा की जरूरत नही है तो मै मरीज को दवा लेनेसे मना कर देता हू / जिन मरीजों की जीवनी शक्ति बहुत प्रबल होती है वे दवा तुरन्त छोड़ देते है, लेकिन जिनकी जीवनी शक्ति कम अथवा रुग्ण अवस्था में होती है उनको दवा छोडने मे हिच्किचाहट होती है, ऐसे लोगों को मै कोई पाचक चूर्ण या sugar of milk की blank doses या सुगर पिल्स देता हूं / आजकल होम्योपैथी की ब्लैन्क डिस्केट्स आ गयी हैं जिनसे doses बनाने मे बहुत सुविधा हो गयी है / इस तरह से इलाज करने मे होम्योपैथिक के चिकित्सक को आसानी हो गयी है/

आयुर्वेदिक के चिकित्सक ब्लैन्क डोज्जेज के लिये आयुर्वेदिक शर्बत, आयुर्वेदिक पेय या शरीर के सामान्य स्वास्थय को बेहतर बनाने वाले चूर्ण, सप्त धातुओं को बढाने वाले पदार्थ और कुछ प्रकार की साधारण प्रतिदिन खाने के काम आने वाले मसाले से सम्बन्धित द्रव्य औषधियो का उपयोग करते है ताकि व्यक्ति का मान्सिक और शारीरिक सन्तुलन बराबर बना रहे और मरीज यह समझता रहे कि वह अपनि बतायी गयी तकलीफ की दवा खा रहा है /

जिन रोगियों मे प्लैसिबो ट्रीट्मेन्ट की आवश्यकता होती है, उनके बारे मे मैने जितना observation किया है उसे मै निम्न प्रकार से मूल्यान्कन करता हूं /

१- कुछ मरीजों को डाक्टरों के पास जाने की और उनसे सलाह लेने की प्रबृत्ति होती है / उनको जैसे ही कोई छींक आ गयी या पैरों में थकान सी मालूम पड़ने लगती है , उनको लगता है कि उन्हे या उनके परिवार के लोगों को कोई गम्भीर बीमारी हो सकने का अन्देशा है / अब ऐसे हालात में अगर मरीज आ जाता है तो चिकित्सक यह समझता है कि इसको दवा दो और इसकी जेब का पैसा अपनी अन्टी मे करो / चिकित्सक भी अपना नुकसान क्यों करे ? जब मरीज दवा का और consultation का पैसा देने को तैयार है तो डाकटर क्या करे ? वह अगर दवा नही देता और मरीज को बोलता है कि तुमको कोई बीमारी नही है तो मरीज किसी दूसरे डाक्टर के पास चला जायेगा, अब डाक्टर उसको दवा नही देकर अपनी रोजी रोटी को क्यों लात मारे / डाक्टर को दवा देनी है तो वह placebo tablets, placebo capsules ही मरीज को देगा और अपना पैसा वसूल करेगा /

२- कुछ मरीजों को डाक्टर से सलाह लेने और उनके chamber में जाने की सनक होती है / यह एक प्रकार का phobia है / बीमारी हो या न हो , तकलीफ हो या न हो , ऐसे मरीजों को शन्का बनी रहती है कि उनको कोई बीमारी हो रही है / ऐसी आशन्का से ग्रसित मरीज डाक्टर क्जे पास आते है जब्कि उनको कोई बीमारी नही होती है / जब डाक्टर के पास आयेन्गे तो डाक्टर अपना नुकसान क्यो करेगा ?

३- बहुत से ऐसे मरीज हैं जिनको डाक्टरों के पास जाने का “शौक” होता है / शहर का सबसे अच्छा और सब्वसे महन्गा डाक्टर के पास जाने का मतलब अब Status symbol से भी जुड़ गया है / जब status symbol बनाना है तो कुछ खुद की भी रन्गबाजी होनी चाहिये / वैसे सभी डाक्टर बहुत intelligent और अपने medical proffession के हिसाब से बहुत devoted होते है और हर मरीज के साथ बहुत मेहनत करते है , लेकिन भाग्य भी कोई चीज है ? किस्मत से शहर का अगर सबसे बेहतर डाक्टर होने का गौरव प्राप्त हुआ तो डाक्टर का भी status symbol बन जाता है / अब अगर कोई पैसे की गर्मी वाला , जिसके पास धन की कोई कमी नही है डाक्टर के पास आता है और बीमारी न होते हुये भी अगर डाक्टर दवा न दे तो डाक्टर साहब की कमायी तो गयी ही , उनको और भी नुकसान उठाना पड़ सकता है / इसलिये डाक्टर भी अपना status symbol बचाने के लिये पचास तरह के test लिख देते है जिनकी कोई जरूरत नही होती / जब सब Test नार्मल आते है तो डाक्टर के पास यह कहने का हक बनता है कि मरीज को कोई बीमारी नही है / यह सब होते हुये मरीज डाक्टर पर विश्वास नही करता और कहता है कि test गलत हुये है/

कई बार ऐसा हो चुका है, डाक्टर ने मरीज का test कराया , सब नार्मल निकला / मरीज नही माना और दूसरे डाक्टर के पास चला गया / दूसरा डाक्टर बहुत चालाक था , उसने सारी कहानी समझ ली / बह फिर क्या था उसने मरीज को यह test और वह Test , यह जान्च और वह जान्च करा के जब बीस पचीस हजार की गर्मी निकाल दी , तब उसने कहा कि आपको तो Fatigue Syndromes की बीमारी है / आप एक हफ्ते हमारे अस्पताल मे रहकर इलाज कराइये / ह्फ़्ते भर मे जब लाखों का बिल बना और मरीज की जेब की गर्मी निकल गयी तब जाकर मरीज सही हुआ /

कुछ किस्म के मरीज बड़े घाघ और चखड़ और चालाक किस्म के होते है / ऐसे मरीज समझते हैं कि वे डाक्टर के ग्यान से अधिक ग्यान वान है और डाक्टर बेवकूफ है / जितना ग्यान उनका बीमारी के बारे मे है शायद डाक्टर ने मेडिकल कालेज में उतना ग्यान भी नही पढा होगा / इस तरह के मरीज अपनी बीमारी के बारे में बहुत बढा चढा कर बताते है . इसलिये क्योंकि हल्की बीमारी होना उनकी Financial तथा Social status को देखते हुये ऐसे मरीजों के लिये शर्म की बात होती है / अब अगर डाक्टर ऐसे मरीजों के लिये उनकी “शर्म” नही दूर करेगा तो क्या करेगा ? कोई एन्टीबायोटिक उनके लिये है नही , कोई दवा डाक्टर किस बात के लिये और कौन सी बीमारी के लिये prescribe करे, डाक्टर का भी परिवार है और उसकी हैसियत है , अब वह खाली दवा की गोली नही देगा तो क्या करेगा, उसके पास दूसरा कोई रास्ता नही बचता ?
मैने पिछले काई साल पहले ऐसा ही यह सब कुछ बहुत बुरी तरह से झेला है और अपना पैसों तथा साख का बहुत बड़ा और बहुत लम्बा नुकसान किया है / कई साल पहले मै ऐसे मरीजों को बहुत ईमान्दारी के साथ समझाता था कि उनको किसी भी दवा की कोई जरूरत नही है और बहुत कड़ाई से व्यवहार करके उनको कतई दवा नही देता था / एक एक करके सभी मरीज मुझे छोड़ते चले गये लेकिन मै अपनी ईमान्दारी पर कायम रहा / एक समय ऐसा आया कि मुझे नौकरी करनी पड़ी और अपनी रोजी रोटी के लाले पड़ने लगे / यह बहुत कठिन काम था / मै कर्ज से घिर गया और मेरी बहुत खराब आर्थिक और सामाजिक हालत हो गयी / एक दिन अचानक मै ईश्वर की कृपा से हकीम मोहम्मद शरीफ अनसारी के पास न जाने कैसे पहुन्च गया, उनको अपने पूरे हालत बताये / हकीम साहब मुझसे कई दश्कों से परिचित थे, उन्होने मेरी बात समझ कर मुझे समझाना शुरू किया कि जमाने की रफ्तार और चलन के साथ चलिये आप्का कल्याण होगा /

उस दिन के बाद से मैने Honesty is the best RULE यानी “ईमानदारी सबसे अच्छा कानून है”, को छोड़्कर Honesty is the best POLICY यानी “ईमानदारी सबसे अच्छी नीति है”, पर उतर आया / अब मै मरीजों के साथ उतनी ही ईमान्दारी से पेश आता हूं जितना कि मरीज मेरी ईमानदारी हजम कर सकें / मै बीच का रास्ता निकलता हू कि मरीज का भी काम बन जाय , उसे अच्छी से अच्छी मेरी सेवा मिल जाये और मेरा धन तथा साख का भी किसी तरह का नुकसान न हो /

अब मै भी जहां जरूरत नही होती , वहां दवा देने लगा हूं, भले ही मरीज को दवा की जरूरत हो या न हो /

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