“VATA” DOSHA EVALUATION ; AN AYURVEDIC BASIC FUNDAMENTAL WITH MODERN SCIENTIFIC VIEWS ; “वात दोष” आयुर्वेद के बेसिक फन्डामेन्टल का आधुनिक चिकित्सा विग्यान आधारित विवेचन


वात दोष को आयुर्वेद का मूल स्वरूप में स्थापित उस तत्व का समन्वित रूप है जिसे प्राकृतिक शक्तियों से जोड़्कर देखा जाता है /

आयुर्वेद का मानना है कि मानव शरीर इस धरा के अन्दर व्याप्त पान्च मूल तत्वों से पोषित होकर बना है / यह पान्च तत्व वे है जिनके आधार के बिना इस धरा पर जीवन जी पाना बहुत मुश्किल और असम्भव है / ये पान्च तत्व है जो पहला है वह जल यानी पानी, जो दूसरा है वह हवा यानी वायु ,जो तीसरा है वह सूर्य यानी अग्नि , जो चौथा है वह आकाश यानी व्योम और जो पान्चवां है वह है पृथ्वी यानी जमीन, जिस पर सभी प्राणी रहते हैं /

image001
आयुर्वेद मे महर्षियों ने वात का स्थान शरीर में बहुत सोच विचार कर निर्धारित किया होगा ऐसा मेरा मनना है /

वायु के गुणो को आधार बनाते हुये इसके गुण किस तरह से मानव शरीर में प्राप्त हो सकते हैं इसके बारे मे उन्का तुलनात्मक विवेचन बहुत सटीक समझ मे आता है / वायु चलायमान है , एक स्थान से दूसरे एथान तक झोन्के के साथ बहती है , धीरे धीरे भी बहती है और तूफानी चाल से भी बहती है , जिसे अन्धड़ कह सकते है / वायु का मिजाज वैसे तो मौसम के हिसाब से और गर्मी और सर्दी और बरसात के प्रभाव के पड़ने से पैदा हुये कारण से बदलता रहता है और इसकी intensity level मे घटोतरी और बढोतरी होती रहती है / वायु को घूमने के लिये आकाश और पृथ्वी के बीच का खाली स्थान मौजूद है, जहां वायु का सन्चार कही अधिक कही कम होता रहता है /

यही वायु के गुण मनुष्य जाति क्या सभी पृथ्वी के प्राणियों मे पाये जाते हैं / कैसे? मनुष्य की टान्गे यानी दोनों पैर मनुष्य शरीर को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाते है / एक स्थान से दूसरे स्थान तक चलायमान होना वायु का गुण है / मनुष्य एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने के लिये अपने पैरों का उपयोग करता है और अपने धड़ यानी torso को ्यानी अपने शरीर के सभी अन्गों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने मे सफल होता है / वायु का सन्चरण का तरीका और concept यही है /

image001 001
यानी तात्पर्य यह है कि वायु और आकाश का जितना भी कार्य और चरित्र है और उनके जितने न्य़ूनाधिक अवस्था के गुण और दोष है वे सबके सब मानव शरीर मे पाये जाते है, ऐसा आयुर्वेद के मनीषियो का मानना है /

इसीलिये आयुर्वेद के मनीषियों ने मानव शरीर में वात का स्थान मूल रूप से Umblical से नीचे के हिस्से जिसे त्रिक स्थान का नाम सन्ग्या दी गयी है और जिसमें दोनों पैर , कूल्हा यानी कमर, Lumber Spine के साथ साथ बड़ी आन्त के तीनो हिस्से , पुरुष के जननान्ग अथवा महिला के जननान्ग, प्रोस्टेट और महिलाओं के जननान्ग यथा गर्भाशय आदि का एकल सन्कलन शामिल है, इनकी anatomy और physiology को शामिल करके वात का मुख्य स्थान माना है /

मनीषियों के इस तरह के Observation से पहले का उनका ग्यान और अनुभव से यह जानने को मिलता है कि उन्होने इससे पहले मानव की तीन प्रकृतियो का Observation कर लिया था / इसके लिये मनीषियों ने मानव की कद और काठी यानी बनावट, बोलने और बात चीत करने का तरीका , चाल ढाल, गुण और अवगुण आदि के बारे में ग्यान प्राप्त कर लिया था / इस आधार पर उन्होने मनुष्यो को सात तरह की विविधताओं के बारे मे आन्कलन कर लिया था अथवा यह कहे कि सात तरह की प्रकृतियो मे मानव की प्रकृतियों को बान्ट दिया गया था /

मूल रूप से तीन प्रकृतिया पहले observe की गयी थी जिनमें वात और पित्त और कफ प्रमुख थीं /

यहां विवेचन “वात” प्रकृति अथवा वात दोष अथवा वात शरीर के किस स्थान मे निर्धारित किया गया है , इसका discussion कर रहे है /

शरीर को इस तरह से “वात स्थान” के लिये निर्धारित करने से अथवा बान्टने से यह समझना बहुत जरूरी है कि जिन अन्गो को वात स्थान के लिये आबन्टित किया गया है , उनका क्या स्वरूप है और वे क्या क्या कार्य करते है तथा उनका शरीर में कितना महत्व है ?

त्रिक स्थान , जहां वात स्थान का निर्धारण किया गया है , उन स्थानॊ पर शरीर के कौन कौन से अन्ग प्रत्यन्ग पाये जाते है, पहले इन सबको जान लेते है /
pahalatriksthan001 001
जैसा कि ऊपर के चित्र मे इन्गित किया गया है कि नाभी के नीचे से लेकर पैरों के तलवों तक का स्थान आयुर्वेद के मनीषियों ने तय किया है / जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है कि इस बताये गये स्थान में शरीर के पेट का निचला हिस्सा सामने की ओर से माना गया है जो पीछे तक सीध मे रीढ की हड्डी तक जाता है /

photo001 004
ऊपर दिये गये चित्र मे यह बताने का प्रयास किया गया है कि मनुष्य जो भी खाता पीता है या वह जो भी ठोस या तरल पदार्थ मुख द्वारा निगलता है यह एक प्रकार का वायु का गुण धर्म है और आयुर्वेद के अनुसार वायु का एक कार्य है /

यह पाचन तन्त्र का माडल है जिसमे यह बताया गया है कि मनुष्य जो भी खाता पीता है वह कैसे और कहां से pass होकर बाहर निकल जाता है /

यहां सन्क्षेप मे वायु के गुण-धर्म बताये जा रहे है जिन्हे समझना जरूरी है /

वायु के बारे मे शास्त्रों मे कहा गया है कि वायु अन्य दूसरे दोषॊ तथा सप्त धातुओ को पहुचाने वाली रज गुण युक्त, जल्दी चलने वाली, सूक्ष्म, हल्की, रूखी और चन्चल है / श्वांस का लेना और छोड़ना इसी से होता है / हृदय और इन्द्रियों को और चित्त [मन] को धारण करती है / यह जिसके साथ मिलती है उसी के अनुसार कार्य करने [catalystic functions] लगती है / यहां केवल introduction के तौर पर वायु का उल्लेख किया गया है /

नीचे के चित्र मे यह बताने का प्रयास किया गया है कि आयुर्वेद के हिसाब से शरीर के किस हिस्से को तीनों दोषो को दृष्टिगत रखते हुये निर्धारण किया गया है / SKELETAL SYSTEM को देखने से यह पता चलता है कि कमर के हिस्से यानी LUMBER REGION से लेकर नीचे तलवो की हड्डियो तक को इसमे include किया गया है / इसमे Lumber spine के vertebras और Pelvis Girdle के अलावा Femur Bone आदि सभी हड्डियां शामिल हैं /

VATA001

मान्सपेशियों और उनके साथ के articulations यथा tendons और Ligaments तथा दूसरी बनावटें जो हड्डियों से चिपकते हुये मिलकर एक मज्बूत आधार बनाती हैं , जैसा कि यहां नीचे दिये गये चित्र मे बताया गया है / यहां बताया गया है कि “वात” स्थान में किस तरह की मान्स पेशियों की बनावट है और उनके क्या काम हैं ? उनका स्ट्रक्चर किस तरह का है / यह वात स्थान का MUSCULAR SYSTEM की उन मान्सपेशियों को इन्गित करता है जो वात के गुणों को कार्य रूप में परिणित करता है /
VATA001 001

नीचे के चित्र मे यह बताने का प्रयास किया गया है कि पाचन सन्सथान जो मनुष्य के शरीर का एक महत्वपूर्ण कार्य समपादन करने वाला हिस्सा है जिससे सारे शरीर को पोषण मिलता है और जिसके बगैर कोई भी प्राणी अपना जीवन जी नही सकता है, उसके लिये यहां इस चित्र के माध्यम से बताने का प्रयास है कि किस तरह वात प्रदेश का हिस्सा बड़ी आन्त के तीनो हिस्सों को जिन्हे कोष्ठ भी कहा जाता है / आयुर्वेद मे इस हिस्से को बहुत प्रधानता दी गयी है , क्योंकि आयुर्वेद का यह मानना है कि वायु का स्थान कोष्ठ मे ही है /

एक दूसरे नीचे दिये गये पाचन सनस्थान के चित्र मे यही बात बहुत स्प्ष्टता के साथ बता दी गयी है, जिसे देखकर समझा जा सकता है कि आयुर्वेद के मनीषियों का बड़ी आन्त यानी कोष्ठ का “वायु स्थान” निर्धारित करने का क्या कारण रहा होगा ? इसमे कोई complicacy नही है, यह समझने मे कि क्यों वात का स्थान आयुर्वेद के मनीषियों ने यही पर निर्धारित किया ? विचार करने पर यही मानना होता है कि वायु के जितने भी Charecteristics जो भी है और जितने भी है वे सबके सब इसी एथान पर चरितार्थ होते हैं / जैसे कि नीचे दिये गये वाय के गुण धर्म एक बार फिर से दोहराये जाते है /
VATA001 002

VATA001 003
Characteristics of VATA DOSHA as it is perceived ;

[1] Manifesters of Energy
[2] Kinetic Energy
[3] Regulates Movements
[4] Nervous system represents
[5] Dry
[6] Light
[7] Cold
[8] Mobile
[9] Active
[10] Clear
[11] Astringent
[12] Dispersing in Nature
…………….

VATA001 004
……………

VATA001 005
………….

VATA001 006
ऊपर के चित्र मे जहां जहां के स्थान SKELETAL मे लाल रन्ग RED COLORS से दर्शाये गये है , यह सभी स्थान लाल रक्त कण RED BLOOD CELLS पैदा करने के स्थान है / यानी जहां जहां लाल स्थान इन्गित है वहां वहां खून का निर्मान यानी खून बनता है / ध्यान से देखिये कि आयुर्वेद मे बताये गये “वात स्थान” मे कितनी महत्व्पूर्ण हड्डिय़ा है जहा रक्त बनता है / इन सभी स्थानो को देखने से पता चलता है कि शरीर के लिये रक्त यानी खून बनाने वाले स्थान सबसे अधिक यानी 45 % प्रतिशत के लगभग वात स्थान मे ही है /
VATA001 007
इसी तरह से ऊपर के चित्र मे बताया गया है कि WHITE BLOOD CELLS शरीर मे किस स्थान मे बनते है यानी W.B.C. शरीर मे किन किन स्थानों मे बनते है / इसमे भी यही बताया गया है कि आयुर्वेद के हिसाब से वात स्थान ही वह स्थान है जहां सफेद रक्त कण अधिक सन्ख्या मे इन्ही इन्गित स्थानो मे ही बनते है /
VATA001 008
000000000000000000
VATA001 009
000000000000000000
VATA001 010
000000000000000000
VATA001 011
यहां ध्यान देने की बात है कि शरीर के सभी EXCRETIONS मल और मूत्र और आर्तव और गर्भ और वीर्य आदि का निकास “वात स्थान” मे ही निश्चित किया गया है / जिनके बहुत specific कार्य है /

आयुर्वेद शास्त्रों मे वात दोष से उत्पन्न रोगों की सन्ख्या 80 बतायी गयी है / ऐसा माना जाना चाहिये कि देश और काल और परिस्तिथियों के अनुसार आयुर्वेद के महर्षियों का जितना भी अच्छा से अच्छा और अधिक से अधिक subjects के साथ किये गये conception और perception और observation की depth थी , उन्होने मानव समाज को देने का प्रयास किया है /

Our Studies regarding VATA have shown the following results. हमारे रिसर्च केन्द्र मे वात प्रकृति और वात विषय पर किये गये अध्ध्य्यन से निम्न निष्कर्ष निकाले गये हैं ;

E.T.G. AyurvedaScan के अलावा अन्य दूसरे आयुर्वेद के परीक्षण सन्साधनों [ यथा Machines and equipments के द्वारा ] की सहायता लेकर और इन साधनो का उपयोग करके “वात” विषय से सम्बन्धित विभिन्न आयामो के अध्ध्यन बड़े स्तर कर किये जा चुके हैं और यह कार्य निरन्तर जारी है /

इन अध्ध्यनों मे कुछ विशेष बाते स्पष्ट हुयी है जिनके सम्भव कारण क्या हो सकते है , यह जानने का प्रयास किया गया है ;

[१] ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन तथा अन्य आयुर्वेद की विकसित की गयी मशीनो और साधनो द्वारा अन्कित किये गये मनुष्य के दोनों पैरों के बीच के trace records और THERMAL SCANNING मे यह बात उभर कर सामने आयी है कि दोनो पैर के बीच का electrical behavior शून्य 00.00 से लेकर 00.05 pixel के करीब का होता है / इतना कम pixel measurement शरीर के किसी भी हिस्से मे नही पाया जाता है /

[२] इसका कारण यह समझ मे आया है कि इस हिस्से मे यानी दोनों पैरों के हिस्से मे शरीर की electrical activities बहुत कमजोर यानी weak होती हैं / इसका कारण यह है कि हृदय जब अपने द्वारा स्वत: उत्पन्न की गयी Self generated electrical pulses को diffuse करता है तो यह diffuse की गयी electric सूच्छ्म अवस्था मे आ जाती है और IONS मे convert होती है और इसके बाद नसों और नाड़ियो द्वारा शरीर के visceras मे फैल जाती हैं और शरीर के अन्ग तथा अन्गो के cells तथा Tissues को electrify करते हुये rejunevate करती है /

[३] इस प्रकार से electric pulses > converted IONS > का फैलने का कारण यह समझ मे आया है कि इसके IONS से प्रभावित होकर शरीर के visceras काम करने के लिये न्यूनाधिक उत्तेजित होते है और अपनी rejunevate capacity के अनुसार काम करते है /

[४] इन visceras के cells और tissues जितना ही अधिक हृदय द्वारा diffuse किये गये elctrical pulses को recieve करके प्रभावित होन्गे , visceras उतना ही अधिक या सामन्य या कम काम करने के लिये सक्रिय अथवा निष्क्रिय होन्गे /

[५] ETG AyurvedaScan परीक्षण रिपोर्ट के प्राप्त आन्कड़ो से इस बात का पता चल जाता है कि शरीर का कौन viscera कितना कार्य शील है उसकी PHYSIOLOGICAL य़ा PATHOILOGICAL स्तिथि कैसी है ? आयुर्वेद रक्त परीक्षण और आयुर्वेद रक्त केमिकल केमिस्ट्री परीक्षण तथा अन्य दूसरे परिक्षणो से प्राप्त डाटा इस बात को प्रमाणित करता है /

[६] दोनो पैरों में electrical bahaviour का न होना अथवा कमजोर होना यह इन्गित करता है कि Autonomic Nervous system और Musculo-skeletal system की कार्य-क्षमता और Physiology समन्वि्त combined तरीके से कार्य करती है , जो Brain Faculties से जुड़ा हुआ है , ऐसा निष्कर्ष निकाला जा सकता है /

Advertisements

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s