SINUSITIS ; A NASAL CAVITY PROBLEM ; CAUSES MANY AILMENTS OF HEAD AND EAR AND MOUTH AND TEETH AND OFCOURSE HEAD AND SPINE AND BRAIN RELATED AILMENTS ; ्सायनुसायटिस ; नाक से सम्बन्धित बीमारी जिससे सिर और दिमागऔर गरदन की रीढ की हड्डी से सम्बन्धित बहुत सी बीमारियां पैदा होती है यहां तक कि ब्रेन की अन्दरूनी तकलीफें भी ……….


आयुर्वेद मे उर्ध्व जत्रु रोग के विस्तृत विवरण मे गले से ऊपर के रोगो के बारे मे बताया गया है / उर्ध्व जत्रु रोगो के अन्तर्गत वे सभी प्रकार के विकार और बीमारियां गिनी जाती है जो गले के ऊपर की शारीरिक बनावट से जुड़ती है / इसमे दोनों हाथ तथा कन्धा भी शामिल हो जाता है , इसलिये कन्धे की तकलीफे और हाथ की तकलीफो को उर्धव ज्कत्रु रोग से जोड़्कर भी देखते और समझते हैं /

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आयुर्वेद के मनीषियों ने त्रिक स्थान यानी शरीर के वह सन्धि स्थल जहां तीन अन्ग सामूहिक रूप से मिलते है /  ऐसे तीन अन्ग सिर और दोनों हाथ  होते है , इसे समझने के लिये  पहला त्रिक स्थान का नाम दिया गया है और दूसरा दोनों पैरो और कमर की हड्डी से जुड़ा हुआ हिस्सा , इसे दूसरा त्रिक स्थान माना जाता है /

पहले त्रिक स्थान का महत्व इसलिये बहुत महत्व पूर्ण है क्योंकि शरीर को जिन आवश्यक  प्रक्रियाओं की आवश्यकता होती है वह यही से ही पूरी होती है / पहली प्रक्रिया [१] स्वांस यानी सांस यानी शरीर के लिये आवश्यक आक्सीजन की पूर्ति के लिये नाक अथवा मुख का उपयोग करना  , दूसरा [२] शरीर को जान देने के लिये खाना पीना मुख के द्वारा सम्भव करना  शामिल है / ्तीसरा काम senses  से जुड़ा है यानी देखना और सुनना और महसूस करना , यह सब brain  अथवा मष्तिष्क से जुड़ हुये है /

 

इस प्रकार से त्रिक स्थान कि शरीर का सबसे महतव पूर्ण स्थान स्थापित करने का कारण बनता है / अगर त्रिक स्थान की हिफाजत नही की जायेगी , और ऐसी ही धाराणा बनती है तो यह विचार करने की बात है कि मनुष्य कितने दिन जिन्दा रह सकेगा /

त्रिक स्थान से समबन्धित मुख्य बीमारियां निम्न श्रेणी मे बान्टी जा सकती है ;

१- कान से समब्नधित सभी विकार

२- दान्त और मसूढो से समब्नधित विकार

३- आन्ख से समब्नह्दित सभी विकार

४- मष्तिष्क से समब्नधित सभी विकार

५- नाक से समबन्धित सभी विकार

६- गर्दन की रीढ की हड्डी से समब्नधित सभी विकार

७- चेहरे की त्वचा से समब्नह्दित सभी विकार

८- चेहरे के जबडओ से समब्नधित सभी विकार

९- सिर और सिर के बालों से समबन्धित सभी विकार

१०- गर्दन और गरदन के चारो ओर के होने वाली बनावटॊ हड्डियो और मान्श्पेशियो के विकार

११-थायरायड और अन्दरूनी गले के विकार

१२- मुख तथा जीभ और Laryngal, pharyngeal and tracheal विकार

१३- श्वास नली का ऊपरी हिस्से के विकार

१४- Throat Pit  के विकार

यहां एक लम्बी लिस्ट उर्ध्व जत्रु रोग के विवरण के लिये General to specific level  की बीमारियो को बताने के लिये  दी जा सकती है लेकिन यह बताना यहा पर्याप्त है कि उर्ध्व जत्रु के रोग आयुर्वेद के हिसाब से एक दूसरे के साथ जुड़े हुये होते है और इन सभी तकलीफो का उपचार मूल बीमारी के उपचार के साथ साथ ठीक होती जाती है /

उदाहरण के लिये एक मरीज का विवरण नीचे दे रहा हूं /

एक पुरुष मरीज को नाक के अन्दर तेज दर्द होता है, यह बहुत तेज दर्द जब होने लगता है तब यह चेहरे के चारों तरफ फैलने लगता है और आन्ख और कान और सिर के ऊपर की ओर तथा नीचे के जबड़ो से लेकर गले की और बाहर और अन्दर  दोनो तरफ होता है / दरद इतना भीषण  और तेज होता है कि ्मरीज न तो ठीक से खाना पीना कर पाता है और न  ही दरद के मारे ठीक से रात मे सो पाता है / खाना चबाने मे भी उसे बहुत भीषण तकलीफ होती है /
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यह तकलीफ मरीज को कई साल से है / इलाज करने से ्दर्द ठीक हो जाता है लेकिन ठन्डक के दिनों मे तकलीफ फिर होने लगती है /

बहुत से लोगों ने कहा कि इसे Trigeminal neuralgia हो गया है कोई Sinusitis  की तकलीफ बता रहा है , कोई mandibular joints की ARTHRITIS   बता रहा है कोई कुछ और कोई कुछ बीमारी बता रहा है / कोई गले की बीमारी बता रहा है / कोई इस तरह के दर्द को Psychological  बताने लगा और किसी ने कहा कि “दर्द जैसी चीज इस दुनिया मे है ही नही , यह तो महसूस करने की बात है कि दर्द है क्या चीज” /

सब अपने अपने विचार व्यक्त करते है , इसके बारे मे क्या कहा जा सकता है /

मरीज कई साल से यह तकलीफ भोग रहा था /

बहरहाल मरीज के साथ इतनी तकलीफ होने के बाद जब मुझसे उसका साबका पड़ा तो मै भी थोड़ा सा पशोपेश मे पड़ा कि इसे क्या तकलीफ हो सकती है /

मैने मरीज की तकलीफ को जड़ बुनियाद से समझने की कोशिश करने का प्रयत्न किया / मुझे पता चला कि मरीज के निचले जबडे के कई दान्त टूटे हुये है, लेकिन इसके बावजूद वह चबा कर किसी तरह सेखाना खा लेता है /

मेरी निगाह उसके निचले जबड़े के DECAYED TOOTH  और इसके नीचे के मसूढे पर पड़ी जहां मुझे सूजन दिखाई पड़ी / मरीज ने बताया कि दान्त मे सूजन के कारण वह खा पी और चबा नही सकता तथा अधिक गरम तथा अधिक ठन्डी चिझे वह खा नही सकता / मैने अधिक जान्च पड़्ताल की और ANATOMICALLY  and physiologically  views से रोग को समझने की कोशिश की /

मैने diagnosis establish  की कि मरीज को तकलीफ दान्त मे हो रही जड़ों के neuralgic inflammation  के कारण है / इसी की वजह से चेहरे की सारी बीमारियां पैदा हो गयी है / मरीज बहुत लम्बे समय से बीमारी भोग रहा था / तकलीफ ठन्दक के शुरु होने के साथ साथ बहुत अधिक बढती थी / मरीज को बहुत severe  SPONDYLITIS  रही है जो पिछले तीस  साल से बनी हुयी थी  / मरीज को कान से कम सुनायी पड़ने की बीमारी पैदा हो गयी और कान मे दर्द भी रहने लगा /

बहुत ज्यादा इलाज कराने के बाद भी तकलीफ मे कुछ समय के लिये फायदा हो जाता था और दर्द भी कम हो जाता था लेकिन फिर पलट कर बीमारी एक दो दिन बाद आ जाती थी /

मुझे यह समझ मे आया कि मरीज को तकलीफ दान्त की जड़ मे पैदा हो गयी सूजन के कारण है जिससे NEURALGIA पैदा हुयी है और इसी के कारण न्यूरैल्जिक दर्द का विस्तार चेहरे के आधे हिस्से मे हो गया है जो गर्दन तक जा रहा है / इस neuralgic pain का extension कान और नाक और गले और आन्ख तथा चेहरे की मान्शपेशियों तक पहुन्च गया है जिससे तकलीप पैदा हो रही है / इससे पहले कान का इलाज और नाक का इलाज और आन्ख का इलाज और neuralgia pain  का अलग अलग बीमारी मानकर दवाये दी जा रही थी /

मरीज की बीमारी की जड़ बुनियाद समझ कर होम्योपैथिक और आयुर्वेदिक और एलोपैथिक की दवाये prescribe  की गयी /

१-  मरीज को दर्द के कारण नीन्द नही आती थी इससे उसका blood pressure  बढ जाता था / इसको रोकने के लिये मरीज को एलोपैथी की दवा खाने के लिये बताया गया /

२- दान्त की तकलीफो के लिये Homoeopathic and Bio-chemic  दवाये दी गयी क्योकि दान्त की तकलीफ मे मेरा अनुभव यही है कि Homoeopathic remedies तकलीफ को दूर करती है और दान्त के दर्द मे स्थायी फायदा पहुचाती है /

३- आयुर्वेद मे बताया गया है कि दान्त दर्द मे वात नाशक उपचार करना चाहिये / आयुर्वेद मे यह भी बताया गया है कि किस तरह का खान पान और जीवन शैली के management को ठीक रखने  से  बीमारिया चाहे जो भी हो वे अवश्य बहुत जल्दी ठीक होती है / इसलिये मरीज को वात नाशक उपचार के साथ साथ जीवन शैली को बदलने और यथायोग्य खान पान के निर्देश दिये गये /

एक हफ्ते के समन्वित आयुर्वेदिक और होम्योपैथिक और एलोपैथिक के दवाओ द्वारा किये गये उपचार से मरीज के सभी दर्द यथा कान का दर्द, नाक के अन्दर का दर्द, गले के दर्द, दान्त का दर्द, mandible  jaw joint आदि सारी तकलीफे ठीक हो गये / मरीज को किसी किस्म का कोई भी PAIN KILLERS   नही दिये गये /

निष्कर्ष;

निष्कर्ष स्वरूप यही कहा जा सकता है कि

[१] यह establish  करना बहुत आवश्यक है कि मरीज की तकलीफ किन कारणो से और क्यो और कैसे हो रही है ?

[२] सही इलाज करने से और जड़ मूल की तकलीफ दूर होने से ही बीमारी मे स्थायी फायदा होता है /

[३] लाक्षणिक उपचार से फौरन फायदा तो होता है लेकिन बीमारी बार बार पलट पलट कर आती रहती है , इसलिये स्थायी उपचार की ओर चिकित्सको को ध्यान देना चाहिये और ऐसे उपाय ढून्ढने चाहिये जिससे मरीज को स्थायी लाभ हो /

[४] आयुर्वेद मे सारे शरीर की तकलीफो का एक मुश्त चिकित्सा करने का विधान है / ऊपर बताये गये रोगी के विवरण से यह पता चलता है कि एक स्थान की बीमारी से किस तरह कई बीमारियों का जन्म हो जाता है

और

[५] यह कि एक ही बीमारी का इलाज करने से किस तरह से सभी additional problems आयुर्वेद और होम्योपैथी से ठीक होती है और मरीज को स्थायी लाभ मिलता है /

 

 

 

4 टिप्पणियाँ

  1. SIR I AM SUFFERING FROM FOOT DROP & BURNING SENCATION IN FEET . BURNING
    FEET ARE THROUGH OUT THE DAY & NIGHT .SO NOR I CAN SLEEP NOR CAN I WORK . I
    DO NOT HAVE DEBITIES BUT I AM SUFFERING FROM ASTHAMA FOR MANY YEARS
    .REQUESTING YOU TO SUGGEST ME SOME MOTHER TINCTURES TO COME OUT FROM THIS .

    2014-03-19 9:58 GMT+05:30 “आयुर्वेद : ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन : AYURVEDA :

    1. SIR MERI AGE 23 YEAR HE . AUR MUJHE HAR SAMAY NAK SE GADHA NETAA AATA HE ,LEFT NAK SE JADA AATA HE .AUR MERE MASTISK ME BHI MUJHE THIK NAHI LAGTA HE ,MUJHE APNE PICHLE MASTIK ME BHI KUCH AJIB LAGTA HE . KRIPYA MUJHE UPAY BATAIE.

      ………..reply………..Fauran hi kisi docotr se salah lekar ilaj kare

      is tarah ki laparvahi baratenge to apni jan jokhim me daal lenge

      yah khataranak bimari ke lakshan hai ise bahut halke me na le

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