पित्त भेद ; लोचक पित्त ; आयुर्वेद के मौलिक सिध्धान्त का विवेचन


आयुर्वेद के मौलिक सिध्धान्त बहुत ही अनूठे किस्म के आयुर्वेद के मनीषियों ने अपने विशाल ग्यान और तर्क के दृष्टीकोण को ध्यान मे रखते हुये प्रतिपादित किये है /

जिस तरह के तार्किक ग्यान का विष्लेषण आयुर्वेद के मनीषियों ने किया है वह बहुत ही अद्भुत किस्म का है /

समस्त आयुर्वेद वात [वायु और आकाश ] पित्त [अग्नि और प्रकाश] और कफ [जल और पृथ्वी] के मूल भूत सिध्धान्तों पर आधारित है / ये सभी प्रकृति मे पाये जाने वाले सभी पदार्थों का सूच्छ्म स्वरूप कहा जा सकता है /

जब विग्यान जितना आज विकसित है , उस समय नही था , तब प्राण दायनी वायु अथवा हवा के बारे मे आयुर्वेद के मनीषियों ने बहुत अनतरन्ग अध्ध्य्यन करके जितना भी बताया है वही आज भी उसी तरह उपयोगी है जितना उस समय था/

आयुर्वेद ने पित्त को और अधिक विवेचना करने के उद्देश्य से इसे पान्च भेदों मे बान्ट दिया है , इसमे से एक भेद “लोचक” कहा गया है /

दर असल लोचक भेद के पीछे का उद्देश्य आन्तरिक व्यवहार को देखते हुये मन और मष्तिष्क की ग्यानेन्द्रियों से जुड्डना और बाहरी तौर पर नेत्र से समबन्धित विकारो का निदान करना , ऐसा समाहित करके भाषित करना उद्देश्य है /

“लोचन” सन्स्कृत भाषा का शब्द है जिसके माने “नेत्र” अथवा “आन्ख” से होता है / “लोचक” पित्त भेद नाम  सुविधा के लिये कहा जाने लगा है / मेरा मानना है कि आयुर्वेद के मनीषियो ने स्वास्थय के अथवा शरीर के परीक्षण मे नेत्रों के चरित्रगत परिचय का उपयोग रोग के निदान ग्यान के लिये अव्श्य किया करते होन्गे /

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आन्ख के सफेद हिस्से मे रक्त की लाल रन्ग की नसों का होना और दिखना अच्छे स्वास्थय की निशानी मना जाता है / आज भी रोग निदान के लिये बहुत से चिकित्सक इस विधान का उपयोग करते है /

अधिक लाल आन्ख का होना “BLOOD PRESSURE”  की उपस्तिथि को दर्शाता है / अधिक लाल आन्ख कई रोगों के निदान को भी बताता है / सबल बाई, सिर दर्द, जुखाम, साइनुसाइटिस, मष्तिष्के रोग, आदि बीमारियोम को इन्गित करता है /

आन्खो के सफेद भाग का और अधिक सफेद होना और लाल नसो के अभाव का होना यह इन्गित करता है कि वयक्ति के “रक्त की कमी” है या anemia hai / पेट मे कीडे होने मे भी आन्ख का सफेद भाग अधिक सफेद होता है /

आन्ख का सफेद हिस्से का पीला होना JAUNDICE   या HEPATITIS  य़ा LIVER य़ा GALL BLADDER   से सम्बन्धित तकलीफों को इन्गित करता है / जितना ही अधिक आन्ख का पीलापन बढता है , उतना हॊ अधिक INTENSITY LEVEL खून में पित्त-रस BILE -JUICE  की उपस्तिथि का समझना चाहिये/

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आयुर्वेद मे लोचक पित्त के बारे मे बहुत अधिक विस्तार से विवरण नही मिलता है / इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि  जिस समय लिपि का अविष्कार नही हुआ था तब तक श्रुति और स्मृति पर ही सारा ग्यान और सूत्र सनकलित किया जाता रहा / सन्स्कृत भाषा मे सूच्छ्म सूत्रों को इसीलिये सन्क्षिप्त स्वरूप में रचित किया गया ताकि इन सूत्रो को अधिक से अधिक याद किया जा  सके और जब जरूरत हो तब इन सूत्रों को याद करके दुबारा उपयोग किया जा सके /  सुत्रो की व्याख्या बहुत विस्तार से करने की परम्परा रही है / इस सूत्रो की व्याख्या करना सूत्रों  मे स्थापित मुख्य शब्दों के ऊपर निर्भर करता रहा है /

“लोचक” शब्द का विवेचन भी इसी श्रेणी मे आता है /

आज हमारा वैग्यानिक ग्यान बहुत अधिक बढ गया है / उस जमाने मे जितने साधन अधिक से अधिक प्राप्य थे आयुर्वेद के मनीशियों ने उनका उपयोग करके अच्छा से अच्छा और सच्चा से सच्चा देने का प्रयास इस सन्सार के लिये किया / महर्षियो का सूत्र ही था “वसुधैव कुटुम्बकम” यानी यह धरती और इस धरती पर रहने वाले सभी जन और अशु पक्षी और वनस्पतियां सब के सब उनका परिवार है और परिवार से हैं /

इस तरह की विशद कल्पना भारतीय  आयुर्वेद के मनीशियों की रही है /

लोचक पित्त बाहरी तौर पर आन्ख से सम्बन्धित रोगों और शरीर के अन्य अन्ग अथवा अन्गॊ की विकृति का दर्शन करा देती है जिसका सन्क्षिप्त  जैसा विवरण ऊपर किया जा चुका है /

आन्तरिक तौर पर लोचक पित्त का कार्य मष्तिष्क और AUTONOMIC NERVOUS SYSTEM  से भी जुडा हुआ है जिससे शरीर के अन्य सिस्टम जैसे HORMONAL SYSTEM   भी प्रभावित होते है जो परोक्ष थवा अप्रोक्ष रूप मे शरीर पर प्रभाव डालते है /

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ददिमाग के अन्दरूनी हिस्से “आक्सीपीटल लोब” क जुड़ाव दिमाग के डुसरे हिस्से “टेम्पोरल लोब” और “पेराइटल लोब” से भी होता है और इन्से प्राप्त न्य़ूरो सूचनाये एक दूसरे हिस्से को  transfer  हुआ करती है /

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आन्ख के देखने की प्रक्रिया के रियक्शन मष्तिष्क द्वारा idea concieve  करने के ऊपर निर्भर करता है जिससे पूरे शरीर के असर पड़्ता है /

यह असर किस प्रकार का होता है इसे सन्क्ष्प्त मे नीचे के schematic structure  मे बताय गया है /

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आयुर्वेद मे वर्णित पित्त भेद का सन्क्षिप्त विवेचन करने के पश्चात यह कहा जा सकता है कि पित्त दोष के पित्त भेद का एक भाग “लोचक पित्त” रोग निदान और रोग चिकित्सा के लिये कितना महत्व पूर्ण है /

 

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