महीना: नवम्बर 2014

CONCEPT OF “RANJAK PITTA” ; A KIND OF AYURVEDIC FUNDAMENTALS TRIDOSHA PITTA-DOSHA BHED ; IN VIEW OF ANATOMY AND PHYSIOLOGY AND HOMOESTASIS ; आयुर्वेद सिध्धान्त त्रिदोष पित्त-भेद “रन्जक-पित्त” का शरीर रचना और शरीर कार्य के आलोक मे विवेचन”रन्जक पित्त” के बारे मे


आयुर्वेद के सिध्धन्तो का निर्धारण आयुर्वेद के ग्यानियो ने बहुत विवेक के साथ और बहुत सूक्षम स्तर पर विवेचना करने के उपरान्त जिस तरह से स्थापित किया है , वह उस समय के आयुर्वेद के ग्यानियो के विग्यान सम्मत होने की बात आज के युग मे ANATOMY & PHYSIOLOGY के अध्ध्य्यन करने और उसको CO-RELATE करने से प्राप्त एक-रूपता और समानता से आयुर्वेद के सिध्धान्तो की पुष्टि होती है /

“रन्जक पित्त” आयुर्वेद का एक त्रिदोष भेद है जो पित्त दोष के अन्तर्गत आता है /

पित्त दोष आयुर्वेद के तीन मूल सिध्धान्तो मे से एक है जो आयुर्वेद की बुनियाद है और यह दोष शारीरिक और ्मानसिक level  की “अग्नि” और “तापक्रम”  से समब्नधित होती है /

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रन्जक पित्त इसी पित्त का कार्य और शरीर के अन्दर उपस्तिथि के निर्धारण हेतु पान्च sub-division  मे बान्ट दिया गया है /

ये पान्च पित्त भेद निम्न प्रकार से जाने जाते है /

१- साधक पित्त

२- रन्जक पित्त

३- पाचक पित्त

४- भ्राजक पित्त

५- लोचक पित्त

जैसा कि आयुर्वेद के ग्रन्थो मे बताया गया है कि रन्जक पित्त के क्या कार्य है और यह कहां शरीर के अन्दर रहता है / आज के ANATOMY  और  PHYSIOLOGY   के दृष्टिकोण से देखा जाय तो प्राचीन काल मे आयुर्वेद के ग्यानियो ने जितना भी  Observe  किया है , वह सब सही प्रतीत होता है जैसा कि आधुनिक काल के PHYSIOLOGISTS कहते है /

प्राचीन काल के आयुर्वेदग्यो ने रन्जक पित्त के बारे मे  शरीर रचना यानी ANATOMY और तत्सम्बन्धित  PHYSIOLOGY   के हिसाब से बताया है कि यह पित्त भेद यकृत LIVER और प्लीहा  SPLEEN मे रहता है /

नीचे बताया गया है कि किस तरह आयुर्वेद के ग्यानियो यह निर्धारित करने मे सफलता पायी है कि शरीर के किस हिस्से मे “पित्त” का वास है या पित्त रहता है /

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शरीर कार्य-विधान  PHYSIOLOGY  के हिसाब से इसका काम रस [ process of ANABOLISM —–> METABOLISM को राग -रक्त वर्ण- प्रदान  ASSIMILATION –  NOURISHMENT करना है, ऐसा आयुर्वेद के ग्यानियो का मत रहा है /

आयुर्वेद मे बताये गये रन्जक पित्त का यह CONCEPT आधुनिक  HUMAN PHYSIOLOGY का नियम  HOMEOSTASIS से prove  होता है कि LIVER और SPLEEN  का सन्युक्त कार्य आयुर्वेद के रन्जक पित्त से बहुत कुछ मिलता जुलता है /

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आधुनिक आध्ध्यनो द्वारा  एकत्र किये गये   नीचे दिये गये विवरण को देखने से पता चलता है कि SPLEEN का कार्य कितना महत्व्पूर्ण है और यह किस तरह  से पूरे शरीर को सुरक्षित रखती है और जीवन को बचाती है /

नीचे दी गयी अध्ध्य्यन लिस्ट से पता चलता है कि शरीर के कई महत्व पूर्ण सिस्टम SPLEEN  और इसके कार्यो से किस तरह से प्रभावित होते है ?

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LIVER  के कार्य और इसकी उपयोगिता तथा पाचन सन्स्थान मे किस तरह का योगदान है यह निम्न शीट को देखने से पता चलता है /

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ऐसा प्रतीत होता है जैसा कि सुश्रुत सम्हिता मे बयान किया गया है कि “शवाच्छेदन” DISSECTION of HUMAN BODY किस तरह से करना चाहिये और इसके लिये किस तरह की तैयारिया करना चाहिये / जिस तरह से वरणन किया गया है और मानव शरीर के अध्ध्य्यन को किस तरह से समझना चाहिये इसका विधिवत PRACTICAL DESCRIPTION  ग्रन्थ मे महर्शि सुश्रुत द्वारा किया गया है / अति प्राचिन काल मे जब आयुर्वेद का अध्ध्य्यन किया जाता होगा तो उस समय उपलब्ध जितने भी साधन होन्गे समय और काल के हिसाब से वह अति आधुनिक कहे जाते होन्गे /

आधुनिक या वर्तमान युग मे ठीक वही HUMAN BODY DISSECTION की  विधिया अपनायी जा रही है जैसा कि BASIC CONCEPT  आयुर्वेद   मे बताया गया है जिसे समय के अनुसार MODIFY  कर दिया गया है जैसा कि available material  आज मिल रहा है उसी तरह से DISSECTION  की विधिया भी समयानुकूल परिवर्तित हो चुकी है /

प्राचीन काल मे निदान के लिये जितने भी उपाय हो सकते थे आयुर्वेद के महर्षियो ने उनका निर्माण करके जैसा अधिक से अधिक उपयोग किया जा सकता था , आयुर्वेद के ग्यानियो ने इस सबका उपयोग किया है और अपने ग्यान और analysis और synthesis  के .बल पर रोगो के निदान मे सफलता पायी है जो आज तक ठीक उसी बुनियाद पर सही और सटीक है जैसा कि उस समय प्रचिलित था /

उदाहरण के लिये डायबिटीज या  DIABETES को लेते है /  ………………………………..

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यहा डायबिटीज  का  उदाहरण देने का मतलब यही है कि प्राचीन काल के आयुर्वेद के ग्यानी जितना observation  कर चुके है वह अक्षरश: सही है और उसमे कही भी कोई गलती की आशन्का नही है / यह अवश्य हो सकता है कि ग्यानियो ने जो observations  किये है उनमे कुछ फेर बदल की जा सकती है लेकिन उसे नकारा नही जा सकता है / डायबिटीज के बारे मे प्राचीन ग्यानियो को जितना ग्यान था उन्होने सारी दुनियां को दिया / आज के ग्यानियो ने उस  प्राचीन सन्चित ग्यान को अपने हिसाब से और अपने  Observation  और experiments  से जितना तजुर्बा हासिल किया है , उस हिसाब से और ज्यादा बढा दिया है यानी पुराने ग्यान मे इजाफा कर दिया है /

यही सूरते हाल कमोवेशी आयुर्वेद के सिध्धान्तो पर भी लागू होती है / आज हमारा ग्यान प्राचीन काल से लेकर अब तक कफी बढ गया है , पुराने ग्यान . को आधार माना जा सकता है या इसे initial stage  का निदान ग्यान माना जा स्कता है  जो बाद मे समय के साथ साथ अधिक evidence के साधन पैदा हो जाने के कारण और मशीने तथा केमिकल परीक्षण और माइक्रोस्कोपिक परीक्षण की विधिया ईजाद हो जाने के कारण अधिक से अधिक उन सभी विष्यो पर ग्यान सूच्ष्म से चूच्छ्म्ता की ओर बढता जा रहा है / इसे केवल ग्यान का  extension   कहा    जा सकता है   / इसे केवल एक उदाहरण से समझा जा सकता है / जब तक चन्द्रमा के बारे मे ्जानकारी नही थी तन तक चन्द्रमा सबके मामा थे / चीन के हवाई पटाखो से यह समझ मे आया कि इसके सहारे दूर तक जाया जा सकता है / अगर पेट्रोल न होता तो इन्जन न बनता / इसी खोज बीन मे राकेट का निर्माण हुआ और धरती से बाहर जाकर समझने का मौका मिला कि वहा क्या है ? बाद मे इसी ग्यान के सहारे मनुष्य चन्द्रमा पर उतर गया और कुछ घन्टे वहा पर बिताये / यह ऐसे ही नही हुआ / यह हमारा ग्यान और हमारे जान लेने की उत्सुकता के कारण ऐसा हुआ है / यही हाल आयुर्वेद के निदान ग्यान और आज के निदान ग्यान के बीच के अन्तर का है /

“रन्जक पित्त” के बारे मे मेरा मानना है कि शरीर के शवच्छेदन करने के बाद आयुर्वेद के ग्यानियो ने यह पाया होगा कि abdominal arota  से लीवर और स्प्लीन की ओर जाने वाली arteries की branches के  कारण ऐसी धारणा बन गयी होगी कि यह रस यानी assimilate  किये गये sunstances  का खून मे मिलाकर सारे शरीर को nourish   करने का रास्ता है pathway  है / इसीलिये आयुर्वेद के ग्यानियो ने बहुत सन्क्षिप्त मे “रन्जक पित्त को रस और रक्त और राग title  से सम्बोधन किया है / यानी रन्जक पित्त के कार्य assimilation  और heamatics  और सारे शरीर मे VITAL NUTRIENTS पहुचाने  वाला माना गया /

आज के ग्यान और प्राचीन ग्यान मे  PHYSIOLOGY  के हिसाब से  बहुत कुछ समानता मिलती है / आधुनिक PHYSIOLOGICAL RESEARCH   से  इसकी  पुष्टि होती है /

LIVER  और SPLEEN दोनो अन्गो   की संरचना और कार्य को यदि समझा जाता है और इनके HOMOEOSTATIS  को समझा जाता है तो सब सम्झ मे आता है कि “रन्जक पित्त” का कार्य निर्धारण आयुर्वेद के ग्यानियो के दृष्टिकोण से कितना सही साबित होता है /

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“EPILEPSY” AND “SEIZURES” ; FACTS ABOUT THE DISEASE AND AYURVEDA CURE ; “मिर्गी” बीमारी क्या है और इसका सटीक आरोग्य दायक आयुर्वेदिक इलाज


मिर्गी के बारे मे बहुत तरह की भ्रान्तिया फैल रही है या ऐसा कहिये कि भ्रान्तियां  फैला दी गयी हैं / ये भ्रान्तिया ऐसी है जिनका कोई वैग्यानिक  आधार नही है ऐसा वासतविकता मे चिकित्सको के लिये बहुत चकरा देने वाला कार्य होता है क्योन्कि जो कुछ भी कहा जाता है वह डाक्टरो के द्वारा ही कहा जाता है /

मुसीबत आखिर मे रोगी को ही इन अवैग्यानिक भ्रान्तियो के कारण उठानी पड़्ती है / रोगी ही परेशान होता है और अन्त मे यह रोगी के लिये इतना खतरनाक हो जाता है कि ्जिस तरह के इलाज किये जाते है उसके इतने खराब असर पैदा होते है कि रोगी एक तरह से crippled  होकर सारे परिवार के लिये बोझ बन जाते है /

मेरे आयुर्वेदिक रिसर्च केन्द्र मे हर साल बहुत बड़ी संख्या मे EPILEPSY – SEIZERs  के रोगी देश और विदेश से इलाज कराने के लिये आते है / इन रोगियो के द्वारा बहुत कुछ ऐसा बताया गया जिसको सुनकर और देखकर बहुत आश्चर्य होता है कि किस तरह की भ्रान्तिया रोगियो के साथ मे डाक्टर्स पैदा कर रहे है  / इन भ्रान्तियो को फैळाकर डाक्टर क्या सन्देश देना चाहते है यह तो वही बता  सकते है लेकिन रोगियो की बहुत अपूरणीय क्षति होती है /

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मिर्गी की बीमारी के बारे मे G H   की Physiology मे बहुत विस्तार से बताया गया है /

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मिर्गी का रोग मुख्यतया तीन या चार भागो मे बांट दिया गया है / यह मिर्गी के लक्षणो के चरित्रगत लक्षणो को देखकर अलग अलग किस्म के बताये गये है /

मिर्गी एक तरह की neurological  समस्या है जिसमे दिमाग की कार्य प्रणाली के बाधित होने के परिणाम स्वरूप उतपन्न immediate shock को रोकने के लिये पैदा की गयी counter reaction  होता है जो शरीर को कुछ समय तक के लिये बेहोशी से लेकर अकड़न तक के लक्षण पैदा कर देती है /

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मष्तिष्क के nueronस जब एक सन्देश को लाने और ले आने का काम करते है और उसी समय किसी तरह का अनावश्यक stimulus  अचानक पैदा हो जाता है तब यह सन्देश बाधित होता है और मष्तिष्क यह समझ नही पाता कि क्या करना चाहिये ? मश्तिष्क   को क्षति से बचाने के लिये मष्तिष्क  Counter action  पैदा करता है जिससे यह स्तिथि पैदा हो जाती है /

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यह बाधा पैदा होने का कारण शरीर के VISCERA  भी होते है जिनके कार्यो का सन्देश  AUTONOMIC NERVOUS SYSTEM के द्वारा दिमाग तक जाता है / अगर इन अन्गो मे कोई विकृति होती है तो यह सन्देश अधिक उग्र या कम्जोर होते है जो दिमाग के उस control  करने वाले section  को अधिक या कम प्रभावित करते है / दिमाग के दोनो हिस्सो मे सूचनाये एक हिस्से से दूसरे हिस्से मे जाने आने मे fraction of seconds  का समय लगता है /

जैसा कि पता है कि दिमाग का बायां हिस्सा शरीर के दाये हिस्से को control करता है और दिमाग का दांयां हिस्सा शरीर के बाये हिस्से को control करता है / दिमाग के अन्दर हो रही गतिविधियो को यही दोनो हिस्से साझा करते है और इसके लिये सूचनाये एक हिस्से से दूसरे हिस्से मे बराबर अनवरत अदलती बदलती रहती है ताकि एक रूपता शरीर की बनी रहे /

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जब यह एक रूपता किसी कारण से बाधित होती है तो दिमाग इसे सुधारने की कोशिश करता है  और अपनी समाहित  faculties  को बचाने के लिये मिर्गी जैसे लक्षण पैदा करता है ताकि उसे सुधार सके / इसके लिये कभी उसे जल्दी या कभी उसे देर तक बचाव करने के लिये समय लगाना पड़्ता है / जितने समय तक उसे सुधार करना पड़्ता है उतने समय तक मिर्गी बनी रहती है और जैसे ही दिमाग की faculties  अपने को  सुधार लेती है , रोगी की चेतना भी वापस आ जाती है /

आधुनिक चिकित्सा विग्यान मे मिर्गी रोग की चिकित्सा के लिये anti-deppressive और anti-convulsive  और हhypnotic  दवाओ का उपयोग क्ररते है / इन दवाओ से मूल कारण की चिकित्सा नही हो पाती है / मूल कारण से तात्पर्य यह है कि किस patho-physiology  के कारण यह तकलीफ पैदा हो रही है और root-problem  कहा पर है /  ये दवाये मश्तिष्क की उत्तेजना को कम कर देती है और मष्तिष्क की सक्रियता को sedate  कर देती है जिससे मश्तिष्क के कार्यो पर जैसा कि ऊपर बताया गया है प्रभाव डाल कर कम कर देती है / इसी वजह से मिर्गी के झटके आना बन्द हो जाते है / लेकिन जब दवा का असर मरीज सहन कर लेता है तो इस दवा की डोज बढानी पड़ती है और यह सिल्सिला बढता चला जाता है / बहुत से मरीज ज्यादा समय तक दवा खाने से दिमाग की कार्य क्षमता कम होने लगती है और वे मान्सिक बीमारियो के शिकार होने लगते है / बहुतो को विकलान्गता जैसे लक्षन पैदा हो जाते है / बहुतो को याद्दाश्त क्म होने की बीमारी हो जाती है / बड़ी सन्ख्या मे मिर्गी के मरीजो का इलाज करने के लिये आये ऐसे मिर्गी रोगियो मे लक्षण पैदा हुये है जिन्हे यहां बताया जा रहा है /

इसके विपरीत आयुर्वेदिक और आयुष चिकित्सा मे मूल रोग को पहचान करके इलाज करते है जिससे हमेशा के लिये मिर्गी रोग मे स्थायी लाभ मिल जाता है / आयुर्वेद मे मष्तिष्क के रोगो के इलाज के लिये बड़ी सन्ख्या मे औषधियां है / इसके अलावा आयुर्वेद रोगो के मूल को पहचान कर सारे शरीर मे व्याप्त विकारो को दूर करता है तो मिर्गी रोग अवश्य जड़ मूल से ठीक होते है /

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ऊपर एक मिर्गी EPILEPSY / SEIZURES के  रोगी का ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन के तीन तरह के परीक्षणों की रिकार्डिन्ग दी गयी है / ये तीन अलग अलग  रिकार्डिन्ग तीन तरह की विकसित की गयी ई०टी०जी० मशीन के द्वारा    मरीज के शरीर से रिकार्ड की गयी है /  पहला रिकार्ड कम्प्य़ूटराइज्ड ई०टी०जी० मशीन से किया गया है जो HORIZONTAL POSITION  मे रिकार्ड किया गया है / दूसरा रिकार्ड TREAD MACHINE E.T.G. AYURVEDASCAN  का है , इसमे दौडा कर और शारीरिक मेहनत करके VERTICAL POSITION  मे रिकार्ड करते  है /    तीसरा रिकार्ड लम्बे समय तक RESTING POSITION मे CONTINUOUS E.T.G. AYURVEDASCAN TRACES RECORDER  द्वारा करते है और यह किसी एक चुने हुये सेक्टर का ही करते है / इस रोगी के सिर मे  9 Channel द्वारा दिमाग के चुने हुये   Sector की रिकार्डिन्ग दो घन्टे के लिये की गयी है / इन सभी रोकार्डिन्ग को ZOOM  करके परीक्षण करते है जिससे यह पता चलता है कि किस तरह की  anomalies  उपस्तिथि है /

ऊपर  बताये गये रोगी को  जब दौड़ा कर  ट्रेसेस की   रिकार्डिन्ग  VERTICAL POSITION मे   की गयी तो दिमाग के छुपे हुये हिस्सो की सक्रियता उभर कर सामने आ गयी / दिमाग के मुख्य हिस्सा FRONTAL LOBE की माप COMPUTERISED E.T.G. AYURVEDASCAN   मे सामान्य से अधिक लेवेल की प्राप्त हुयी / लेकिन जब दौड़ा कर FRONTAL LOBE की माप की गयी तो यह सामान्य से अभुत कम आ गयी / अधिक समय तक और लिटाकर लम्बे समय तक जब रिकार्डीन्ग की गयी तो इसमे waves level  बहुत dull LEVEL  का मिला है /

यह एक छोटी सी बानगी डाटा को लेकर यहा उदाहरण के लिये बताया गया है / इसका INTERPRETATION इस प्रकार का है कि जब मरीज आराम की अवस्था मे होता है  तो उसके दिमाग मे कई तरह की उत्तेजना अपने आप होती है जो AUTONOMIC NERVOUS SYSTEM  के कारण होता है जिससे मन के  विचार तेजी से बदलते रहते है / जब कि दौड़ा कर और मेहनत करके मिला हुआ डाटा यह बताता है कि शारीरिक मेहनत करने के बाद FRONTAL BRAIN   की सक्रियता काफी कम हो जाती है / यह AUTONOMIC NERVOUS SYSTEM  के शारीरिक मेहनत की एवज मे बने pressure  के कारण होता है/ लम्बे समय तक CONTINUOUS E.T.G. AYURVEDASCAN TRACES RECORDING का आराम करने के बाद जितने भी परिवरतन समय के बीतने के साथ रिकार्ड करके  observe  किये गये है  उनसे यही पता चलता है कि मष्तिष्क का electrical behaviour dull  किस्म का है /

इस तरह की analysis  से यह पता चल जाता है कि शरीर मे किस तरह की गड़्बड़ी पैदा हो गयी है / आयुर्वेद के सिध्धन्तो का जब पता चल जाता है कि किस तरह का दोष शरीर मे है और किस तरह से दोष-श्रोतो-दुष्टि हो गयी है इस तथा अन्य आधार को conclude  करके आयुर्वेद का इलाज विग्यान सम्मत हो जाता है /

आधुनिक आयुर्वेद की निदान ग्यान की तकनीक  ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन  द्वारा सारे शरीर और  मश्तिष्क की जान्च करने और इसके अलावा पूरे शरीर के अन्गो की जान्च करने मे तरह तरह की anomalies  का  combination  बनता है जिसके उपचार करने से मिर्गी का रोगी १००% शत प्रतिशत ठीक होते है / हमारे रिसर्च केन्द्र मे जितने भी मिर्गी के रोगी इलाज क्रा चुके है वे सभी सामान्य जीवन बिता रहे है /

आयुर्वेद की तकनीक पर आधारित मिर्गी रोगियो का इलाज जब किया जाता है तो अवश्य सफलता मिलती है / इसीलिये आयुर्वेद आधारित इलाज से मिर्गी जरूर ठीक होती है /

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FIVE TYPES OF E.T.G. AYURVEDASCAN ; ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन के पान्च स्वरूप


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 FIVE KINDS OF E.T.G. AYURVEDASCAN TESTS HEVE BEEN DEVELOPED FOR EVALUATION OF AYURVEDIC FUNDAMENTALS AND BODY DISORDERS IN BOTH VIEW OF PATHOPHYSIOLOGY AND PATHOLOGY

1- MANUAL E.T.G. AYURVEDASCAN IS DONE ON THE SIMPLE LINE OF EARLIER ESTABLISHED BODY MAPPING ACCORDING TO AYUVEDA DIVISIONS

2- COMPUTERISED R/T/G/ AYURVEDASCAN IS DONE FOR STATUS QUANTIFICATION OF AYURVEDA PRINCIPALS AND BODY DISORDERS  IN RESTING POSITION

3- TREAD-MACHINE / EXERCISING E.T.G. AYURVEDASCAN IS DONE IN VERTICAL POSITION AND DURING EXERCISING / RUNNING CONDITIONS  FOR STATUS QUANTIFICATION OF THE AYURVEDA PRINCIPLES FOR MAJOR EVALUATION

4- CONTINUOUS E.T.G. AYURVEDASCAN  IS DONE FOR THE PURPOSE OF THE ORGANS PATHOPHYSIOLOGY AND PATHOLOGY AND BODY BEHAVIOUR ACCORDING TO THE TIME MANAGEMENT DESCRIBED IN AYURVEDA

5- SECTOR EXAMINATION E.T.G. AYURVEDASCAN IS DONE FOR THE PURPOSE OF THE EVALUATION OF THE PARTICULAR BODY SECTION / REGION FOR EVALUATION ACCORDING TO AYURVEDA

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WORLD DIABETES DAY ; विश्व प्रमेह दिवस ; विश्व डायबिटीज दिवस


डायबिटीज जिसे आयुर्वेद मे प्रमेह के नाम से जानते है या मधुमेह कहते है / आयुर्वेद मे इस बीमारी का बहुत सटीक इलाज है / कारण का निवारण करने से यह बीमारी रोग्मुक्त की जा सकती है या इसका प्रभाव बहुत कम किया जा सकता है /

Diabetes, which is called PRAMEH or MADHUMEH in Ayurveda. Ayurveda have perfect treatment of this disease condition. Removal of the cause and causative factors , this disease can be cured or the severity of the DIebetic syndromes can be minimized at a comfortable level.

ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन और इसके अन्य supplementary  परीक्षण तथा आयुर्वेद के रक्त तथा मूत्र परीक्षण करने के बाद जब मधुमेह के रोगियो का इलाज किया जाता है तो यह बीमारी अवश्य ठीक होती है /

ETG Ayurveda and its supplementary tests and examinations including Ayurveda Blood examinations and Ayurveda Urine examinations and tests results after finding bases conclusion , when Diebetic patient is treated then the problem is surely recoverd.

लगभग पान्च साल पहले इसी ब्लाग मे डायबिटीज से समबन्धित एक पोस्ट मे हमारे सन्स्थान द्वारा किये गये रिसर्च के परिणामो को प्रकाशित किया गया था जिसमे यह बताया गया था कि निम्न शरीर के अन्गो की कार्य क्षमता pathophysiology  या  Pathology के कारण यह बीमारी पैदा होती है /

Before Five years back, One post in this blog regarding the Research result’s conclusion  in relation to Diebetes disorders  by  our institution, in which it is mentioned that cumulative pathophysiology of the body organs cause and generate disebetes disorders.

इस शोध कार्य मे बताया गया था कि

It is mentioned in the research  conclusion that ;

१- अकेले पैन्क्रियाज मधुमेह के लिये जिम्मेदार नही होता है जैसी कि अभी तक धारणा बनी हुयी है /

1- Only and solely Pancreas is not responsible for causing Diebetes disorders

२- मधुमेह मे [१] लीवर सह गाल-ब्लैडर  और [२]  छोटी आन्त और [३] बड़ी आन्त और [४] स्प्लीन और [५] गुर्दे यह अन्ग भी डायबिटीज को पैदा करते है या डायबिटीज पदा करने मे सहयोग पैदा करते है /

3- Dibetes is a cumulative disorders of the involmenet of the [1] Liver [2] Small Intestines [3] Large Intestines [4] Spleen and [5] Kidney are also co-responsible to cause and generate the problem.

यह रिसर्च पेपर प्रकाशित होने के बाद चिकित्सक समुदाय के  लोगो ने मेरे द्वारा किये गये रिसर्च कार्य की खूब खिल्ली उड़ाई और मेरे द्वारा की गयी findings  का बड़ा  मजाक बनाया गया /

The medical fraternity all along considered these findings of the report-conclusion as a joke and in fun.

हमारे  इस रिसर्च कार्य के प्रकाशन के लगभग डेढ साल बाद जापान के वैग्यानिको ने रिसर्च करके   यह सिध्ध किया कि डायबिटीज के लिये अकेले पैन्क्रियाज जिम्मेदार नही है बल्कि शायबिटीज पैदा करने मे  इसके साथ लीवर भी शामिल होता है /

After publication of the findings done by our efforts, Japanese Scientist declared after one and half years later  that in Diebetic problems LIVER can cause and in treatment Liver should be considered in producing disorders.

जापान देश द्वारा की गयी इस रिसर्च से मेरा कहना सही साबित हुआ है /

Our findings came in reality and true after findings of Japanese Scientis.

इसके लग्भग एक साल बाद ब्रिटेन के डाक्टरो और शोध करताओ ने  डायबिटीज पर  शोध करके बताया कि ्छोटी आन्त के कारण भी  डायबिटीज पैदा होती है इसलिये डायबिटीज के लिये छोटी आन्त भी जिम्मेदार है / इसी कारण जब डायबिटीज कन्ट्रोल नही होती है  तब छोटी आन्त को काटकर उस हिस्से को निकाल दिया जाता है जहा से यह समझा जाता है कि छोटी आन्त ग्लूकोज को सबसे ज्यादा चूसकर खून मे मिलाती है /

After one years of this Japanese findings British Scientists declared that Small Intestine is also responsible for creating diabetes.

ब्रिटेन के शोध करने वालो के परिणामो से हमारे शोध कार्य की पुष्टि हुयी है /

Our findings got an extra merit by the declaration of British Scientists.

इन दो शोधो के बाद आस्ट्रेलिया के शोध करने वालो ने बताया कि डायबिटीज के लिये बड़ी आन्त भी जिम्मेदार होती है /

After these two research Australian Scientists declared that Large Intestine is also responsible to produce diabetes.

डायबिटीज के रोग का जब इस तरह के शोध परिणाम प्राप्त हुये  तो इन सभी परिणामो से हमारे द्वारा किये गये ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन आधारित डाटा और findings  पर मान्यता की मुहर लग गयी है /

When these findings came in existence by the route of scientists, this stamped and recognised our findings, which was at one time a fun for the doctors.

आयुर्वेद के हिसाब से डायबिटीज रोग “कफ दोष” के कारण से होता है / इसीलिये कफ दोष के निवारण और शान्ति के लिये “कड़वा और कसैला और चरपरा” पदार्थ खाने के लिये recommend  किये जाते है ताकि कफ दोष हो तो वह शान्त हो जाये

According to AYURVEDA  Diabetes is generated by KAPHA DOSHA. Therefore KAPH dosha should be treated accordingly. The Anti-Kapha herbs are recommented for intake to treat the Kapha dosha.

कड़्वा और कसैला और चरपरा द्रव्य यथा करेला का सेवन, नीम का सेवन , काली मिर्च का सेवन ,  छोटी पीपल का सेवन, सोन्ठ का सेवन, आवला का सेवन , बहेड़ा का सेवन, हरड़ का सेवन , अकरकरा का सेवन , कुटकी का सेवन , शिलाजीत का सेवन, भरन्गराज का सेवन आदि आदि आयुर्वेवेद मे बताये गये बहुत से ऐसे  सभी द्र्व्य जो स्वाद मे कड़्वा और कसैला और चरपरा हो वे सभी डाय्बिटीज को ठीक करते है /

AYURVEDA recommends for treatment of KAPHA dosha those substances which are KADUVA & KASHAILA & CHARPARA [BITTER and PUNGENT Foods and herbs] in taste. Karela and Neem and Kali mircha and Chhoti Pipal and Sonth and Avala and Baheda and Harad and Akarakara and Kutaki and Shilajit and Bhrangaraj andothers like herbs are having curing properties for Diabeties.

आयुर्वेद की आधुनिक विकसित की गयी  हाई-टेक तकनीक  ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन और इसके अन्य चार मशीनी परीक्षण तथा आयुर्वेद के रक्त और मूत्र परीछण  के निष्कर्ष पर आधारित आयुर्वेद / होम्योपैथी / यूनानी और योग=प्राकृतिक चिकित्सा द्वारा औषधोपचार और आयुर्वेदीय जीवन शैली के धारण करने से डायबिटीज चाहे जैसी हो अवश्य ठीक होती है और रोग मे स्थायी आराम मिलता है /

AYURVEDA NEWLY developed Hi-tek E.T.G. AyurvedaSCan and its supplementary tests and examinations bases findings after Ayurveda -Ayush treatment certainly cures Dibeties and its related all syndromes , whatever they may be ?

आयुर्वेद के स्वस्थ्य-वृत्त और औशधोपार डायबिटीज के रोगियो को अप्नाना लाभ दायक सिध्ध होता है /

Ayurveda recommended LIFE STYLE adoption followed by  Ayurveda Treatment is certainly curative impressions.

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BRAIN AND BRAIN PARTS RELATED DISORDERS ; मष्तिष्क और दिमाग से सम्बन्धित बीमारिया


मानव शरीर मे मष्तिष्क यानी दिमाग एक बहुत महत्वपूर्ण अन्ग है जिससे सारा शरीर नियन्त्रित होता है और शरीर की बहुत सी क्रियाये समपादित होती है /

दिमाग का विकृत होने का मतलब है मानव शरीर के बहुत से कामो मे विकार होना और उनका ठीक ठीकऔर सामन्य तौर तरीके से perform न करना , ऐसा समझा जाता है /

[matter to be loaded soon]

STATUS QUANTIFICATION OF AYURVEDA PRINCIPLES TESTED BY E.T.G. AYURVEDASCAN SYSTEM ; आयुर्वेदिक मौलिक सिध्धान्तो का ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन परीक्षण द्वारा आन्कलन


आयुर्वेद के मौलिक सिध्धान्तो का आन्कलन करना अब आयुर्वेद की आधुनिक परीक्षण तकनीक ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन द्वारा सम्भव हो गया है /

अति आधुनिक विकसित की गयी तकनीक द्वारा अब तक निम्न आयुर्वेद के सिध्धान्त का status quantify किया जा चुका है /

एक रोगी का जिसे FACIAL NEURALGIA लगभग २५ साल से है और ALLOPATHY से अभी तक नही ठीक हुआ है इसका परीक्षण करके आयुर्वेद के निम्न मौलिक सिध्धन्तो का पता लगाया गया है /

यह मरीज स्वयम MEDICAL PROFFESSION   मे है और सरकरी सेवा मे है / एलोपैथी की दवाओ से इसका दर्द बिल्कुल नही ठीक हुआ बल्कि एलोपैथी की दवाओ की दवा खाते खाते दवाओ का असर कम होने लगा तो पचासो बार दवाओ की खूराक को और ज्यादा बढाना  की जरूरत  पड़ती  चली गयी है /

जिस  डाक्टर  के साथ यह सरकारी सेवा मे है उन्होने मेरे पास बहुत से मरीज जान्च के लिये  भेजे है और उन सब्को ठीक होता हुये देखकर इन्को भी सलाह दी कि बीमारी नही ठीक हो रही है और जैसे की तैसे है तो एक बार जान्च कराकर आयुर्वेद- आयुष का इलाज कराकर जरुर देखे /

मरीज के तीन ई०टी०जी० आयुर्वेदा स्कैन परीक्षण किये गये / साथ मे आयुर्वेद के रक्त परीक्षण तथा आयुर्वेद के मूत्र परीक्शन तथा अन्य सहयोगी परीक्शन किये गये /

१-  मैनुअल ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन

२- कम्प्य़ूटराइज्ड ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन

३- कन्टीनुअस ट्रेस रिकार्ड ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन

नीचे दिये गये आन्कडे कम्प्यूटराइज्ड ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन के है /

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ऊपर के ६ शीटो मे  मिले  आनकड़ो मे निम्न बाते सामने आयी हैं /

१-सत्व और तमो गुणी है

२- जन्म के समय मे इसका प्रकृति का आन्कलन –वात अधिक तथा पित्त थोडा कम रहा है

३- रोगी की जान्च के समय त्रिदोष की स्तिथि वात सामान्य और पित्त अधिक और कफ सामान्य से कम निकला है /

४- इसे विषमाग्नि है /

५- वायु त्रिदोष भेद मे अपान और समान और व्यान वायु कम और उदान वायु सामान्य से अधिक निकली है /

६- पित्त त्रिदोष भेद मे रन्जक और पाचक  सामान्य से अधिक  और लोचक और भ्राजक सामान्य से कम निकले है /

७- कफ त्रिदोष भेद मे श्लेष्मन कफ आधिक और स्नेहन कफ कम निकला है /

८- सप्त धातुओ मे रक्त और मान्स और अस्थि अधिक और रस मेद कम निकला लेकिन पित्त दोष से प्रभावित सप्त धातुये अधिक विकृति निकली है /

९- श्रोतो दोष विकृति मे सबसे पहले बडी और छोटी आन्त और उसके बाद मान्स श्रोत फिर उसके बाद अन्य श्रोतो की विकृतिया अधिक से कम की ओर होती चली गयी है /

१०- SEQUENTIAL DATA   देखने पर एक साफ picture  बन जाती है कि मरीज को किस तरह की तकलीफ पनप रही है /

नीचे की data sheet  देखने पर और अधिक स्पष्ट होता है कि इसे किस दोष के द्वारा तकलीफ प्राप्त हो रही है /

महर्षि चरक और माधव निदान कार ने वातादिक दोषो का चरित्र गत लक्षण अपनी विशिष्ट पुष्तको मे किया है / यह सब नीचे शीट मे बताया गया है / DOSHA TOWER मे यह विशिष्ट तरीके से बताया गया है /

मरीज को पित्त दोश्ढ की तकलीफ है यह सुनिश्चित हुआ / इसके स्रोतो दोष और अन्य विक्रतियो से पता चला कि कफ कमजोर होने के कारण यह FACIAL NEURALGIA  25 साल से अधिक समय तक इसे परेशान करता रहा है /

हलान्कि इसके रोग निदान और सेक्टर  निदान से यह स्पष्ट हुआ कि इसे किस तरह की बीमारी है और यह कहां से  generate  हो रही है और इसका  extension  कहा कहा से होकर फाइनल साइट की तरफ  जा रहा है और फिर इसके साथ क्या क्या तकलीफे सहयोगी तकलीफो के तौर पर क्या क्या पैदा हुयी है ?

इसे पित्त दोष  “उर्ध्व जत्रु रोग” पुर्ण रूप से निदान किया गया /

इस रोगी को  पित्त शमन कारी   आयुर्वेद की दवाये लिखकर दे दी गयी है जो [१] बढे हुये पित्त दोष को कम  करके सामान्य अवस्था मे  करने के लिये और [२] उर्ध्व जत्रु रोग को आरोग्य करने के लिये आयुर्वेदिक योग है, वे prescribe  कर दिये गये है /

यह अनुभव मे आया है कि लगभग सभी तरह के    FACIAL  NEURALGIC PAIN  आयुर्वेदिक दवाओ से अवश्य ठीक होते है /

ऐसा तभी समभव है जब आयुर्वेद के निदान ग्यान सटीक हो और आयुर्वेदिक औषधियो का चुनाव डाटा आधारित हो / [

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इस रोगी का चेहरे का CONTINUOUS E.T.G. AYURVEDASCAN TRACE RECORD  किया गया जो लगभग ६० मिनट तक रिकार्ड किया गया / नीचे 10 seconds  per stripes की रिकार्डिन्ग दी गयी है /

उदाहरण के लिये कि किस तरह से सेक्टर रिकार्ड करके रोग की तफ्सील  और तस्खीस और तफ्तीस करके पहचाना जा सकता है  और तकलीफ का नेचर जाना जा सकता है /

नीचे की रिकार्डिन्ग मे आयुर्वेद के मौलिक सिध्धन्तो को verify किया जा सकता है /

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कुछ waves positive  और कुछ लहरे negative deflection को दिखा रही है / पित्त और कफ के मिले हुये दोष के कारण spasmodic प्रोब्लेम्स  हो रही हैं / वात दोष के कारण अचानक muscular spasm होने लगते है /

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ऊपर के दर्शाये गये चित्र के द्वारा यह बताने का प्रयास किया जा रहा है कि आयुर्वेद का रोग निदान “उर्ध्व जत्रु रोग” कैसे पैदा होता है और इसका क्या mechanism  होता है / मरीज की जब FOUR DIMENSIONAL DIAGNOSIS की गयी तो पता चला कि इसे [१]   मूल  तकलीफ कही दूसरी जगह  है और [२] इस मूल तकलीफ की pathophysiology  के कारण metastasis  द्वारा  path-ways  बनकर  कहीं  [३] तीसरी जगह आकर रोग के लक्षण पैदा कर रही है और [४]   इस metastatic extension की वजह से अन्य syndromes  पैदा हो रहे है /

हलान्कि इलाज करने के दृष्टिकोण से केवल पहला और तीसरा डायमेन्शन ही consider  करते है क्योन्कि मूल तकलीफ जब ठीक होती है तो बाकी सभी बीमारिया जो इसी एक बीमारी के कारण से जुड़ जाती है , ये सब्के सब ठीक हो जाते है /

वात दोष मुख्य तया  शरीर के अन्दर विद्यमान   चार systems से मिलकर बना हुआ समझा जाता है / ये  चार  system  है [१] नरवस सिस्टम [२] मसकुलर सिस्टम [३] स्केलेटल सिस्टम और [४] लिम्फैटिक सिस्टम / इन चार के अलावा जब दोष-भेद की वात की जाती है तो आभ्यान्तरिक अन्ग  INTERNAL VISCERA  शामिल हो जाते है / यह सूछ्मता स्वरूप मे ज्यादा दूर तक analysis  करने के लिये ज्ररूरी होता है ताकि मूल रोग की पहचान आयुर्वेद के मौलिक सिध्धान्तो के अन्तर्गत किया जा सके /

रोगी के इलाज के लिये आयुर्वेद के सिध्धान्तो को मरीज की तकलीफ के साथ correlate  करना   और    इस कोरिलेट किये गये कान्सेप्ट को treatment  मे बदलना चिकित्सक की क्षम्ता पर निर्भर करता है  कि वह किस तरह से रोग के साथ दवओ का तालमेल और पथ्य परहेज की व्यवस्था कर पाता है /

इस तरह की निपुणता को प्राप्त करने के लिये ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन  हाई-टेक  तकनीक का प्रयोग   आयुर्वेद के  चिकित्सको  के    लिये सुफल्दायक होती है /

महर्षि  चरक  और माधव निदान के अनुसार  बताये गये दोष विकृति और दोष आन्कलन के दर्शाये गये ऊपर दोष-  टावर को देखने के बाद यह स्पष्ट हो जाता है कि CONTINUOUS E.T.G. AYURVEDASCAN  TRACE RECORDING के द्वारा प्राप्त डाटा से रोगी की चिकित्सा के लिये आयुर्वेदिक औषधियो का चुनाव और इसी आधार पर बताये गये आयुर्वेदिक विधि विधान  की जीवन शैली के management  के द्वारा रोगी का उपचार अत्यधिक सटीक और अचूक हो जाता है जिससे रोगी शीघ्रता से रोग मुक्त होता है चाहे वह कोई भी बीमारी हो /

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“MINISTRY OF AYUSH” MODI GOVERNMENT FORMATION ; HUNDREDS AND THOUSANDS CONGRATULATIONS TO MODI GOVERNMENT ; “आयुष मन्त्रालय” के गठन पर मोदी सरकार को लाख लाख बधाइयां


मोदी सरकार द्वारा भारत देश को दुनियां के नक्शे पर कमजोर से शक्तिशाली और   परम से परम वैभव का दर्जा दिलाने और विश्व गुरू की जमात मे शामिल करने और सम्मान जनक स्थान दिलाने के लिये भरपूर प्रयास किये जा रहे है / ऐसा हम सभी देश के नागरिक गौरान्वित  होकर अपने अन्दर भारतीय होने का  गर्व  मह्सूस कर रहे है /

भारत मे जन्मी और भारत मे ही विकसित की गयी  भारतीय आयुर्वेद और सिध्ध चिकित्सा विग्यान  और योग के अलावा  इस देश मे दूसरे देशो से आयी चिकित्सा विग्यान की पध्ध्यतिया यथा होम्योपैथी और यूनानी और तिब्बती चिकित्सा विग्यान   जहां इन्के मूल विकास    वाले देशो ने ही तिरस्कृत करके और अछूत समझ कर कूडे दान मे फेन्क दिया है , ऐसी उपेक्षित चिकित्सा विग्यान को मोदी सरकार ने “जीवन दान” दिया है /

अभी तक आयुष विभाग एक तरह से एलोपैथिक माइन्डेड और एलोपैथी को बढावा देने वाले  लोगो के हाथ मे था / इसीलिये यह  सभी आयुष  चिकित्सा विग्यान उपेक्षा का शिकार रहे / कहा जाता है कि बजट का ९६ प्रतिशत रुप्या एलोपैथी के लिये खर्चा किया जाता था और ४ प्रतिशत आयुष चिकित्सा मे खर्चा किया जाता था जिसमे उक्त पान्च या छ्य चिकित्सा विग्यान शामिल है /

मुझे याद है जवाहर लाल  नेहरु के मन्त्रिमन्डल मे शामिल एक स्वास्थय मन्त्री ने कहा था कि देश मे आयुर्वेद चिकित्सा विग्यान को खत्म कर देना चाहिये और केवल एलोपैथी     चिकित्सा विग्यान को ही इस देश मे एक मात्र चिकित्सा का दर्जा देना चाहिये इसके अलावा किसी को भी नही / 

इसी मानसिकता को लिये हुये   आयुर्वेद इस देश मे उपेक्षित रहा और यह किसी कारण से पनप नही सका /  आयुर्वेद को खत्म करने के लिये बहुत प्रयास किये गये / आयुर्वेद झुका तो जरूर लेकिन टूट कर खत्म नही हुआ/ यह  इसीलिये जीवित रहा  क्योन्कि इस देश की जन्ता को आयुर्वेद पर अनन्त समय से विश्वास और श्रध्धा बनी हुयी है जो आदिम काल से अब तक चली आ रही है /

जब श्री मती  सुषमा स्वराज जी स्वास्थय मन्त्री थी तो उन्होने ही अलग थलग पडे हुये इन सभी चिकित्सा विग्यान को “AYUSH” आयुष नाम दिया था/  श्री मुरली मनोहर जोशी जी ने आयुर्वेद के शल्य यन्त्रो की डिजाइनो पर भी काम किया था /

मोदी सरकार    ने आयुर्वेद को और दूसरी चिकित्सा विग्यान और पध्ध्यतियो    के विकास के लिये  अलग से  आयुष   मन्त्रालय बनाकर इन सभॊ च्विकित्सा विग्यान के पुष्पित होने और   पल्लवित  होने  और स्वतन्त्र रूप मे   फूलने फलने  और विकास करने और शोध करने का भरपूर   मौका दिया इसके लिये श्री नरेन्द्र भाई मोदी जी, प्रधान सेवक,   बधाई के पात्र है /

आयुर्वेद, योग और सिध्धा चिकित्सा विग्यान के अलावा अन्य दूसरे चिकित्सा विग्यान यथा होम्योपैथी, तिब्बती और यूनानी  चिकित्सा बिग्यान उन मूल देशो से एक्दम ही खत्म हो गयी है या खत्म होती जा रही है , इन सभी को भारत  देश मे बढने और पुष्पित और पल्लवित और  विकास करने का पूरा पूरा और अनन्त   मौका मिलेगा जिससे प्राप्त परिणामो से सारी दुनिया के लोग फायदा उठायेन्गे /

आशन्का सिर्फ इसी बात की है कि अफसर शाही के कारण कही अच्छे कदम गर्त मे न चले जाय / क्योन्कि सरकार अपनी नीयत से कितना भी अच्छा करे भारत की  अफसर शाही अव्छे कामो मे भी पानी फेर देती है /